बिहार उपचुनाव: एनडीए की जीत का आने वाले विधानसभा चुनाव पर क्या असर होगा?

नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी

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इमेज कैप्शन, इस उपचुनाव को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, सुमंत सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

बिहार विधानसभा की चार सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे आ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने सभी सीटों पर जीत हासिल की है.

राज्य की तरारी, रामगढ़, इमामगंज और बेलागंज विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में तरारी और रामगढ़ में बीजेपी ने जीत दर्ज की है. जबकि इमामगंज में जीतनराम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और बेलागंज में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को जीत मिली है.

इसी साल जून में हुए लोकसभा चुनाव में बिहार में 2019 लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले एनडीए का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा था. इस लिहाज़ से यह जीत अहम मानी जा रही है. साथ ही अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है.

एनडीए को एकतरफ़ा मिली इस जीत पर विशेषज्ञ कई तरह के तर्क दे रहे हैं. ख़ास बात यह है कि जिन सीटों पर एनडीए को जीत मिली है, वहां विपक्षी दलों ने लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था.

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एनडीए को क्यों मिली जीत?

नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी

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इमेज कैप्शन, जानकारों का मानना है कि इस उपचुनाव में बीजेपी को हिंदुत्व की राजनीति का भी लाभ मिला है (फ़ाइल फ़ोटो)

बिहार उपचुनाव में एनडीए को सभी सीटों पर जीत मिलने के पीछे जानकार कहते हैं कि बीजेपी को नीतीश कुमार के चेहरे और हिंदुत्व की राजनीति का लाभ मिला है.

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार नवेन्दु कहते हैं, "इस जीत का सबसे बड़ा कारण तो यह है कि बिहार सामाजिक न्याय का राज्य रहा है. उस तरीके से देखा जाए तो यह बीजेपी स्टेट कभी नहीं रहा है. इसलिए बीजेपी को बिहार में अपनी इस स्थिति तक आने में बहुत लंबा समय लग गया. और अभी भी ये नीतीश कुमार का दामन थाम कर चल रहे हैं."

नवेंन्दु कहते हैं, "एनडीए के लिए नीतीश बिहार में वोट कैश करने के सबसे बड़े माध्यम हैं. क्योंकि नीतीश सामाजिक न्याय का चेहरा हैं. ऐसे में एक बात बहुत साफ है कि नीतीश का साथ होना और साथ-साथ हिंदुत्व का प्रबल तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर और बिहार में कैंपेन करना, ये दो बड़े कारण हैं."

"एक बात अब भी साफ है कि नीतीश कुमार जो कि सोशल जस्टिस और सेक्युलरिज़्म का चेहरा हैं, वो चेहरा एनडीए में रहेगा तभी उनको फायदा होगा. वो चेहरा अगर एनडीए से इतर होता है तो फिर एनडीए का ये गणित नहीं रह पाएगा, जो अभी उपचुनाव और लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया था."

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वो कहते हैं, "बिहार में सामाजिक राजनीति का जो गणित रहा है, उसमें कुछ बदलाव अब स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. इस उपचुनाव में और लोकसभा चुनाव में जिस तरीके से तेजस्वी यादव को प्रोजेक्ट किया गया और तेजस्वी यादव ने लोकसभा चुनाव में जो समा बांधा था, उससे लोगों को लग रहा था कि इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव में अच्छी बढ़त लेकर आएगा, लेकिन वैसा लोकसभा चुनाव में भी नहीं हुआ."

"विधानसभा उपचुनाव में वही ट्रेंड रिपीट हुआ. यह कहीं न कहीं बता रहा है कि बिहार की सामाजिक राजनीति का गणित बदल रहा है या अगले विधानसभा चुनाव में भी बदल सकता है."

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी एनडीए की जीत का अलग कारण मानते हैं. उनका मानना है कि वोट बंटने और कमज़ोर उम्मीदवार की वजह से एनडीए को फायदा मिला.

भेलारी कहते हैं, "इस जीत के पीछे पहला कारण तो ये है कि रामगढ़ में राजद के जो उम्मीदवार थे, ऐसा लगता है कि राजद ने वहां कमज़ोर कैंडिडेट दिया. उनको मात्र 35-36 हज़ार वोट ही मिले, जबकि जो बीजेपी से जीते हैं उनको 62 हज़ार वोट मिले. मुझे लगता है कि वो कमज़ोर कैंडिडेट थे और यादव वोट वहां बंट गया. रामगढ़ में यही मुख्य कारण हैं."

"रामगढ़ में एक और कारण है कि वहां राजपूत वोट नहीं बंटा, वह एकतरफा बीजेपी की ओर गया और दलित वोट बसपा को ज़्यादा गया. लोकसभा चुनाव में रामगढ़ क्षेत्र में राजद ने लीड किया था लेकिन उपचुनाव में राजद को बहुत कम वोट मिले. "

तरारी विधानसभा को लेकर वो कहते हैं, "तरारी में अगड़ा-पिछड़ा की राजनीति हुई. वहां अगड़े वोटर डोमिनेट कर गए. तरारी में दो बार माले जीती, इस बार लगता है कि वैश्य फिर से बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गए और राजीव यादव 10-12 हज़ार वोट से हार गए."

वो कहते हैं, "इमामगंज में जनसुराज के उम्मीदवार ने 17-18 हज़ार वोट काट लिए. यहां कड़ा मुकाबला था. अभय कुशवाहा जो औरंगाबाद से सांसद हैं, उनको दांगी-कुशवाहा से जोड़कर लोग देखते हैं. इमामगंज को यह भी कहा जाता है कि वो कुशवाहा का नैहर है. लेकिन उन लोगों ने जीतनराम मांझी को वोट देना पसंद किया."

एनडीए की जीत के क्या हैं राजनीतिक मायने?

लालू यादव और तेजस्वी यादव

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इमेज कैप्शन, विश्लेषकों का कहना है कि 'बिहार के लोग तेजस्वी यादव को लीडर के तौर पर देखते हैं लेकिन ये समर्थन वोट में तब्दील नहीं हो सका है.' (फ़ाइल फ़ोटो)

नवेन्दु का कहना है कि राजनीतिक रूप से देखा जाए तो बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति काम आई है. दूसरी तरफ बिहार के लोग तेजस्वी यादव को लीडर के तौर पर देखते हैं लेकिन ये समर्थन वोट में तब्दील नहीं हो सका है.

वो कहते हैं, "बिहार राजनीतिक रूप से बहुत कॉन्शियस स्टेट रहा है. देश की राजनीति का भी उस पर कहीं न कहीं असर पड़ता है. अभी एक तरह से रिवाइवल होने की स्थिति दिखाई दे रही है."

"ऐसा नज़र आ रहा है कि हिंदुत्व की जो बात है जिसका बार-बार योगी और मोदी जी ने राग अलापा है, फिर 'बंटेंगे तो कटेंगे' और 'एक हैं तो सेफ हैं' जैसे नारे और गिरिराज सिंह की यात्रा ने भी कहीं न कहीं असर छोड़ा है. और बीजेपी या एनडीए जिस दिशा में बढ़ना चाह रही है, लगता है कि बिहार की राजनीति उसी दिशा में जाती हुई दिख रही है."

नवेन्दु कहते हैं, "विधानसभा चुनाव में तो निश्चित रूप से एनडीए की ये बढ़त एक बड़ा संकेत है और इंडिया गठबंधन के लिए चुनौती है, खासतौर पर आरजेडी और तेजस्वी यादव के लिए. इसलिए कि तेजस्वी यादव नए लीडरशिप के तौर पर बिहार में उभर रहे थे या लोग मानते भी हैं. सवाल ये है कि क्या तेजस्वी यादव के लिए जनाधार भी वोट में तब्दील हो रहा है या नहीं?"

"बिहार विधानसभा का अगला चुनाव बहुत दिलचस्प होगा और मुझे लग रहा है कि पुराने फॉर्मूले से चीज़ें नहीं चलेंगी. फ़िलहाल इंडिया गठबंधन और आरजेडी को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में एनडीए दिखाई दे रहा है."

उपचुनाव का आने वाले विधानसभा चुनाव पर क्या असर होगा?

प्रशांत किशोर

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इमेज कैप्शन, इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज के उम्मीदवार भी चुनावी मैदान में थे (फ़ाइल फ़ोटो)

कन्हैया भेलारी का मानना है कि उपचुनावों का असर मुख्य चुनावों पर नहीं पड़ता है. वो यह भी मानते हैं कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जनता का मूड अलग होता है.

भेलारी कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि आने वाले विधानसभा चुनाव में इस उपचुनाव का असर पड़ेगा."

उदाहरण देते हुए वो कहते हैं, "2009 के लोकसभा चुनाव में 18-19 सीटों पर जो विधायक लड़े थे वो सांसद बन गए. फिर वहां उपचुनाव हुआ और 13 सीटों पर नीतीश और एनडीए को हार मिली."

"इसके बाद लगा कि नीतीश कुमार का करियर खत्म हो गया, लेकिन जब 2010 में विधानसभा चुनाव हुए तो उसमें एनडीए को बड़ी जीत मिली. तो मुझे लगता है कि उपचुनाव का मुख्य चुनाव पर कोई असर नहीं होता है."

कन्हैया भेलारी बताते हैं, "दूसरा यह कि लोकसभा चुनाव का असर विधानसभा चुनाव पर नहीं होता है और विधानसभा चुनाव का असर लोकसभा चुनाव पर नहीं होता है. महाराष्ट्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जनता का मूड दोनों चुनाव में अलग रहता है."

"उपचुनाव में ये भी देखा जाता है कि जो रूलिंग पार्टी होती है वो डोमिनेट करती है. पश्चिम बंगाल में भी टीएमसी सभी छह सीटें जीत गई है. उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी आगे चल रही है."

वहीं नवेन्दु की राय इससे कुछ अलग है.

वो कहते हैं, "ज़ाहिर तौर पर अगर यह ट्रेंड, जो लोकसभा चुनाव से शुरू होकर उपचुनाव में आया. ये बता रहा है कि बीजेपी को फायदा मिलेगा और बीजेपी अपनी सीटें भी बढ़ा पाएगी और उसके सहयोगी दलों को भी इसका लाभ मिलेगा."

नवेन्दु कहते हैं, "एक बात तो बहुत साफ है कि अगर ट्रेंड के साथ किसी का ग्राफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है तो फिर उसके साथ जो लोग हैं उनको भी लाभ मिलना तय है. तो ये एक ट्रेंड अगले विधानसभा चुनाव के लिए साफ तौर पर दिखाई दे रहा है कि मुकाबला दिलचस्प होगा और इंडिया और एनडीए गठबंधन के बीच बहुत कठिन मुकाबला होगा."

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