जम्मू कश्मीर चुनाव में हार के बाद क्या होगा पीडीपी और इंजीनियर रशीद का सियासी भविष्य?

इंजीनियर रशीद

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इमेज कैप्शन, श्रीनगर में प्रेस वार्ता को संबोधित करते इंजीनियर रशीद (फाइल फोटो)
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव नतीजे में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन ने बहुमत हासिल किया है.

लेकिन घाटी के अंदर महबूबा मुफ़्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को कुल तीन सीटें ही मिल पायीं. इंजीनियर रशीद की पार्टी अवामी इत्तिहाद पार्टी केवल एक सीट जीत पाई.

इस चुनाव में डॉक्टर फ़ारूक़ अब्दुल्लाह की नेशनल कॉन्फ्रेंस 42 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. वहीं, कांग्रेस को जम्मू-कश्मीर में छह सीटें मिलीं. इनमें पांच सीटें कश्मीर से और एक जम्मू से मिली है.

वैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू क्षेत्र में भी सात सीटें जीती हैं. इस चुनाव के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबंधन किया था. जबकि पीडीपी ने अकेले विधानसभा का चुनाव लड़ा था.

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इंजीनियर रशीद की अवामी इत्तिहाद पार्टी ने इस चुनाव में प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया था. इसको कश्मीर में एक भी सीट हासिल नहीं हो सकी है.

जमात-ए-इस्लामी के नेता 1987 के बाद से लगातार चुनावों का बहिष्कार करते आए थे. लेकिन, आम चुनाव 2024 में जमात के कई नेताओं ने वोट डाल कर लोगों को हैरान कर दिया था.

चुनाव में पीडीपी का प्रदर्शन कैसा रहा?

महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती

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इमेज कैप्शन, दक्षिण कश्मीर की श्रीगुफवारा सीट पर महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती चुनाव हार गयीं

इस विधानसभा चुनाव में पीडीपी का गढ़ रहे दक्षिण कश्मीर में पीडीपी को ज़बरदस्त झटका लगा.

दक्षिण कश्मीर की श्रीगुफवारा सीट पर महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार डॉक्टर बशीर वीरी से चुनाव हार गयीं.

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श्रीगुफवारा-बिजबिहाड़ा सीट पर बीते दो दशकों से पीडीपी का क़ब्ज़ा रहा था. पीडीपी का वोट शेयर 22.67 फ़ीसदी से घटकर 8.87 फ़ीसदी पर आ गया है.

वर्ष 2014 में जम्मू-कश्मीर में आख़िरी बार विधानसभा चुनाव कराए गए थे. उस चुनाव में पीडीपी को 28 सीटें मिली थीं.

पीडीपी ने बाद में बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर गठबंधन सरकार बनाई थी, जो सरकार साल 2018 में दोनों पार्टियों के आपसी मतभेद के चलते गिर गई थी.

पीडीपी को जो झटका विधानसभा और लोकसभा चुनाव 2024 में लगा है, पार्टी ने शायद उसकी उम्मीद नहीं की थी. पार्टी घाटी में कई अहम सीटों पर हार गई है.

इस बार की हार से पीडीपी को लोगों की पसंद और नापसंद का अंदाज़ा हो गया होगा है. महबूबा मुफ़्ती ने लोकसभा चुनाव 2024 में भी अनंतनाग-राजौरी सीट से चुनाव हारा था. पार्टी ने कहीं से कोई सीट नहीं जीती थी.

विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद पार्टी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि वो इस हार को स्वीकार करती हैं और एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभाने की कोशिश करेंगी.

विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार रियाज़ मलिक पीडीपी की हार को लेकर कहते हैं कि पीडीपी की हार का मतलब ये नहीं है कि पार्टी का कोई रोल ही नहीं रहा है.

वो कहते हैं, "पीडीपी को जिस तरह से बीते कुछ वर्षों में उथल-पुथल का शिकार होना पड़ा, पार्टी में कई जोड़-तोड़ हुए. इस सब के बावजूद पीडीपी ने दक्षिण कश्मीर और उत्तरी कश्मीर में दूसरी पोजीशन हासिल की है. इसका मतलब है कि पार्टी ख़त्म नहीं हुई है."

उन्होंने कहा, "पार्टी के लिए ख़राब हालात के बावजूद पीडीपी ने अपनी मौजूदगी का एहसास ज़रूर दिलाया है. इसमें कोई शक नहीं कि पीडीपी को ज़बरदस्त झटका लगा है और आगे बढ़ने के लिए चुनौतियों का सामना होगा. तो इसका मतलब ये है कि पार्टी आगे भी अपने रोल को निभाएगी."

2018 में पीडीपी और बीजेपी की सरकार गिरने के बाद पार्टी से कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए. इससे पार्टी के अंदर एक अनिश्चितता बढ़ गई.

इंजीनियर रशीद की पार्टी का क्या हाल?

इंजीनियर रशीद

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इमेज कैप्शन, जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान इंजीनियर रशीद

इंजीनियर रशीद ने कुछ महीने पहले तिहाड़ जेल से लोकसभा चुनाव लड़ा था.

उस चुनाव में इंजीनियर रशीद ने क़रीब दो लाख वोटों से जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुलाह को बारामूला चुनावी सीट से हराया था.

लोकसभा चुनाव में इंजीनियर रशीद के साथ लोगों की बड़ी भीड़ उमड़ी थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में इंजीनियर रशीद के उम्मीदवार उस भीड़ को वोट में बदलने में कामयाब नहीं हुए.

सियासी माहौल पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में इंजीनियर रशीद के प्रदर्शन को लेकर जानकार कहते हैं कि इंजीनियर रशीद के साथ आम लोगों की वो हमदर्दी नहीं रही, जो जेल से चुनाव लड़ते समय उनके साथ थी.

हालांकि, इंजीनियर रशीद की हार का मतलब ये नहीं है कि उनको नज़रअंदाज़ किया जा सकता है.

रियाज़ मलिक बताते हैं, "जब इंजीनियर रशीद को वोट मिला था, तब वो जेल में बंद थे. उनको उस समय वोट देना लोगों की भावनाएं थीं. लोगों ने इसलिए वोट दिया कि वो जेल से बाहर आएं. जेल से बाहर आने के बाद लोग उनसे बड़ी संख्या में जुड़े नहीं. इंजीनियर रशीद के पास कोई बड़ा उम्मीदवार भी नहीं था. उनकी पार्टी का कोई बड़ा कैडर भी नहीं है. इसलिए इंजीनियर रशीद के उम्मीदवार हार गए. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं कि उनकी राजनीति ख़त्म हो गई है. ऐसा नहीं है. उनके उम्मीदवारों को कई जगहों पर अच्छा वोट शेयर मिला है."

रियाज़ मलिक कहते हैं कि इंजीनियर को अभी पार्टी बनाने में समय लगेगा.

उन्होंने कहा, "जिस जल्दबाज़ी में इंजीनियर रशीद तूफ़ान की तरह आये और हार कर चले गए, उसको समझने की ज़रूरत है. सबकुछ जल्दबाज़ी में किया गया. चुनाव प्रचार के लिए उनको कम समय मिला. पार्टी नई है. अभी उनकी पार्टी को बनने में समय लग सकता है. इंजीनियर रशीद को ख़ुद भी मालूम है कि वो जीत क्यों गए थे और आज हार क्यों गए."

रशीद की गिरफ़्तारी क्यों हुई थी?

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इमेज कैप्शन, सोपोर में चुनावी रैली के दौरान इंजीनियर रशीद (फाइल फोटो)

वर्ष 2019 में इंजीनियर रशीद को टेरर फंडिंग के आरोप में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. हाल के दिनों में उन्हें तिहाड़ जेल से ज़मानत पर 12 अक्तूबर तक छोड़ दिया गया है.

इंजीनियर रशीद की पार्टी ने तीस से अधिक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. पार्टी ने जो सीट जीती है, उस पर इंजीनियर रशीद के भाई खुर्शीद अहमद चुनाव लड़ रहे थे.

हाल के दिनों में जब इंजीनियर रशीद को जेल से रिहा किया गया तो कश्मीर की सियासी पार्टियों ख़ासकर नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने उन्हें बीजेपी का प्रॉक्सी बताया.

उन पर ये इल्ज़ाम लगाए गए कि वो बीजेपी के एजेंडा को कश्मीर में चलाने आये हैं. हालांकि, इंजीनियर रशीद ने इन आरोपों से बार-बार इनकार किया और इसे अपने ख़िलाफ़ सियासी दुश्मनों का प्रोपेगेंडा बताया.

सियासी दलों के आरोप अपनी जगह और इंजीनियर रशीद के आरोपों पर सफाई अपनी जगह, बीजेपी के प्रॉक्सी होने के आरोपों ने उन्हें ज़रूर एक सियासी नुक़सान पहुंचाया है.

बीजेपी को लेकर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

गुलाम नबी आज़ाद

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इमेज कैप्शन, गुलाम नबी आज़ाद पर भी बीजेपी के क़रीबी होने का इल्ज़ाम लगा. इसका ख़ामियाज़ा उनको उठाना पड़ा

जानकार कहते हैं कि कश्मीर की जिस किसी भी सियासी पार्टी ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया, उसकी राजनीति को जनता में स्वीकार्यता नहीं मिली और लोगों ने उस दल को खारिज कर दिया.

विश्लेषक हारून रेशी कहते हैं, "हमने बीते कई वर्षों में देखा कि कश्मीर के जिस किसी भी राजनीतिक दल पर बीजेपी के साथ क़रीब जाने का लेबल लग गया, उसको लोगों ने नकार दिया. लोगों को ऐसी जमातों पर कोई विश्वास नहीं है."

वो कहते हैं, "जो कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस को मैंडेट मिला है, वो क्या है? वो मैंडेट दरअसल बीजेपी के ख़िलाफ़ है. तो जब बीजेपी को लोग कश्मीर में पसंद नहीं कर रहे हैं, तो उन जमातों को क्यों पसंद किया जाएगा, जो बीजेपी के क़रीब हैं."

"पीडीपी ने बीजेपी के साथ सरकार बनाई, तो आज उसका अंजाम आप देख ही रहे हैं. फिर इंजीनियर रशीद मैदान में आये थे, लेकिन उन पर भी बीजेपी के प्रॉक्सी होने के आरोप लगे. सच क्या है और झूठ क्या है, वो हम कह नहीं सकते. लेकिन आरोपों ने इन सभी को सियासी नुक़सान पहुंचाया है. गुलाम नबी आज़ाद के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. उन पर भी आरोप लगे."

बीते एक दशक में कश्मीर के कई सियासी दलों को देखा गया, जिन पर बीजेपी की ए, बी, सी और डी टीम होने के आरोप लगे हैं.

और जिन्होंने बीजेपी के साथ खुलेआम हाथ मिलाया उन्हें उसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है.

2014 के विधानसभा चुनाव में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार बनने के बाद पीडीपी को उसकी क़ीमत अभी तक चुकानी पड़ रही है.

सईद अल्ताफ़ बुखारी की जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी को बीजेपी की "बी" टीम कहा गया और पार्टी को अपनी नाकामियों का सामना करना पड़ा है.

पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2024 और विधानसभा चुनाव 2024 में कोई भी सीट नहीं जीती है.

इसी तरह सज्जाद लोन की जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस पर भी बीजेपी की "ए" टीम का लेबल लगाया गया और वो विधानसभा चुनाव 2024 में केवल अपनी सीट बहुत कम वोटों से जीत पाए हैं.

गुलाम नबी आज़ाद पर भी बीजेपी के क़रीबी होने का इल्ज़ाम लगा. आज़ाद ने दो साल पहले डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी नामी राजनीतिक दल को स्थापित तो किया, लेकिन वो जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नक़्शे पर उभर नहीं पाया.

पीडीपी-रशीद के लिए आगे क्या चुनौतियां?

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती

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इमेज कैप्शन, जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के दौरान महबूबा मुफ़्ती

हारून रेशी बताते हैं कि भविष्य की सियासी ताक़त बनकर रहना इंजीनियर रशीद और पीडीपी के लिए चुनौतियों से भरा सफ़र होगा.

वो कहते हैं कि राजनीति में सक्रिय रहने के लिए विधायकों का होना ज़रूरी है, जो कि इंजीनियर रशीद के पास नहीं हैं और महबूबा मुफ़्ती के पास कम हैं.

हारून रेशी कहते हैं कि फ़िलहाल नेशनल कॉन्फ्रेंस दस वर्षों तक सत्ता से बाहर नहीं जाएगी.

उन्होंने कहा, "अगर नेशनल कॉन्फ्रेंस आने वाले पांच वर्षों में अच्छी सरकार दे पाई, लोगों की समस्याओं को दूर करने में सफल रही, तो अगले पंद्रह वर्षों तक पीडीपी और इंजीनियर रशीद को विपक्षी दल के रूप में रहना होगा."

वो कहते हैं, "लोगों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को एक बड़ा मैंडेट दिया है. इसका मतलब ये है कि एनसी को दिए गए मैंडेट पर ख़रा भी उतरना है. फ़िलहाल इंजीनियर रशीद या पीडीपी के सियासी भविष्य की कोई बड़ी कल्पना नहीं की जा सकती है."

विधानसभा चुनाव 2024 में कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस को जो वोट मिला है उसका संबंध सीधा वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 को ख़त्म करने और उसके बाद लिए गए कई फ़ैसलों के ख़िलाफ़ था.

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जिस ज़ोरदार तरीके से आर्टिकल 370, गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने, सख़्त क़ानूनों की वापसी जैसे मुद्दों को अपने घोषणापत्र और चुनाव प्रचार में उठाया और पेश किया, लोगों की भावनाएं एनसी के साथ जुड़ गईं.

साल 1999 में पीडीपी के स्थापित होने के साथ ही वर्ष 2002 में पार्टी ने विधानसभा में सत्ता को हासिल किया. मुफ़्ती मोहम्मद सईद पार्टी के संस्थापक थे.

पीडीपी पर हमेशा सॉफ्ट अलगावाद चलाने के आरोप लगे हैं. पीडीपी ने कश्मीर समस्या के हल के लिए "सेल्फ रूल" जैसा रोडमैप पेश किया. सेल्फ रूल नेशनल कॉन्फ्रेंस के 'ऑटोनोमी रोडमैप' से कुछ अलग था.

हालांकि, इंजीनियर रशीद भी उसी लहजे में बात करते हैं जिसमें पीडीपी करती आई है.

पीडीपी की तरह ही इंजीनियर रशीद कश्मीर समस्या, मानवाधिकार उल्लंघन पर रोक, सियासी कैदियों की रिहाई और पाकिस्तान से बातचीत वगैराह जैसे मुद्दों पर बात करते रहे हैं.

पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती एक ज़माने में मारे जाने वाले चरमपंथियों के घर जाया करती थीं और लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने की कोशिश करती थीं, जिसमें उनको बहुत कामयाबी मिली थी.

हालांकि, इस चुनाव में भी पीडीपी ने 'सॉफ्ट अलगाववादी' लहजे में बात की और मुद्दे भी उठाये, लेकिन लोगों ने अपना अलग मन बनाया था.

लोकसभा चुनाव में इंजीनियर रशीद की जीत के बाद विधानसभा चुनाव में भी एंट्री ने इस चर्चा को आगे बढ़ाया था कि इंजीनियर रशीद पीडीपी के उस स्पेस को हथिया लेंगे, जो पीडीपी ने 'सॉफ्ट अलगाववाद' की नीति चलाकर बनाई थी.

जानकार कहते हैं कि कश्मीर में हमेशा सियासी जमातों के लिए 'सॉफ्ट अलगाववाद' की सियासत करने का एक स्कोप रहा है और इंजीनियर रशीद भी वैसा कर सकते हैं और पीडीपी के स्पेस पर असर डाल सकते हैं.

रियाज़ मालिक कहते हैं, "कश्मीर में सॉफ्ट अलगाववाद की ही सियासत चलती है. अगर आप नेशनल कॉन्फ्रेंस के इस चुनाव का प्रचार देखेंगे तो वो भी एक सॉफ्ट अलगाववाद ही था. नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी अपने चुनाव प्रचार में आर्टिकल 370, अपनी पहचान, गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़, नौजवानों के ख़िलाफ़ मामले वापस लेना, पब्लिक सेफ्टी एक्ट क़ानून को ख़त्म करना, पाकिस्तान के साथ बात करना जैसी बातें शामिल की थीं."

वो कहते हैं, "ऐसे ही नारे पीडीपी भी लगाती थी. लेकिन इस बार पीडीपी के काम सॉफ्ट अलगाववाद नहीं आया. पीडीपी टूट-फूट का शिकार थी, बीजेपी के साथ हाथ मिलाने को लेकर पार्टी से नाराज़गी थी. इंजीनियर रशीद के लिए भी ज़मीन तैयार है. अगर वो भी उसी लहजे में बात करेंगे तो वो भी अपनी जगह बना सकते हैं और पीडीपी के स्पेस पर असर पड़ सकता है."

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