दुर्गा पूजा: 'भगवान की मूर्ति बनाने वाले' बांग्लादेश के समर्पित मूर्तिकार

दुर्गा की प्रतिमा

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, बांग्लादेश में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है
    • Author, सहर जांद
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहारों में से एक दुर्गा पूजा की शुरुआत नौ अक्तूबर से हो चुकी है और बांग्लादेश के मूर्तिकार दिन-रात काम में लगे हुए हैं.

हाल ही में हुए राजनीतिक उथल-पुथल और हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों की वजह से इस साल बुराई पर अच्छाई की जीत वाला यह त्योहार विशेष रूप से मार्मिक लगता है.

जैसे-जैसे दुर्गा पूजा का त्योहार नज़दीक आता है, बांग्लादेश के गांव और कस्बे उत्सुकता से भर जाते हैं.

यह त्योहार भारत और नेपाल के करोड़ों लोग मनाते हैं.

बांग्लादेश में इस त्योहार का विशेष महत्व है. यहां की करीब 17 करोड़ जनसंख्या में आठ प्रतिशत तक हिंदू आबादी है.

बीबीसी
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

यह त्योहार बांग्लादेश की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. मुस्लिम बहुसंख्यक समेत अलग-अलग समुदाय से आने वाले लोग इस त्योहार को मनाते हैं.

बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं के लिए दुर्गा पूजा एक त्योहार से बढ़कर है. उनके लिए यह एक पवित्र समारोह है, जिसमें सभी साथ आते हैं और सामुदायिक सौहार्द को मजबूत करते हैं.

हालांकि इस साल यह त्योहार राजनीतिक उथल-पुथल के बाद आयोजित हो रहा है. हाल में छात्र आंदोलन और शेख़ हसीना सरकार के जाने के बाद हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों की वजह से तनाव बढ़ा है.

फिर भी दुर्गा पूजा ध्रुवीकरण की ओर तेज़ी से बढ़ रहे समाज के लिए एकता और लचीलेपन का प्रतीक है.

इस राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद यह त्योहार सामूहिक रूप से आशा और चिंतन को जगह देता है.

पिछले कुछ हफ्तों में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में मूर्ति बनाने वाले लोग दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए बिना किसी थकावट के काम कर रहे हैं.

ये मूर्तियां बहुत जल्द ही इस त्योहार का केंद्र बन जाएंगी और लाखों-करोड़ों लोग उनकी पूजा करेंगे.

इस चुनौतीपूर्ण समय में यह त्योहार अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को दिखाएगा.

ढाका का शाखारी बाज़ार

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, ढाका के शाखारी बाज़ार में दुर्गा प्रतिमा बनाई जाती हैं

ढाका का हिंदू हृदय

पुराने ढाका के ऐतिहासिक शाखारी बाजार की अनगिनत संकरी गलियों के बीच एक गली में शहर के सबसे जाने माने मूर्तिकार बलाई पाल की कार्यशाला है.

इस बाजार के भूल भुलैया वाले रास्ते और बिना किसी पहचान वाले दरवाजे किसी खोजकर्ता को भी भ्रम में डाल सकते हैं.

रिक्शों की आवाज़ और बिरयानी की लाजवाब खुशबू वाली इस जगह को बिना किसी की सहायता के खोजना लगभग असंभव है.

यहां ईंट की बनी कुछ इमारतें हैं, जिनमें से कुछ चार सौ साल पुरानी हैं.

इन इमारतों में छोटे-छोटे मंदिर बने हैं, जिनमें देवी-देवताओं की कठिन और जटिल मूर्तियां बनी हुई हैं.

ये मंदिर हमें याद दिलाते हैं कि यह हिस्सा शहर की 15 लाख हिंदू आबादी का केंद्र है.

शाखारी बाजार, हिंदू त्योहारों के लिए ढाका का केंद्र माना जाता है, जहां दुर्गा पूजा बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है.

दुर्गा प्रतिमाओं को चिकनी मिट्टी और रंगों की मदद से तराशा जाता है

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, दुर्गा प्रतिमाओं को चिकनी मिट्टी और रंगों की मदद से तराशा जाता है

ढाका के सबसे बड़े मूर्तिकार

एक संकरी गली में श्री प्राण बल्लभ ज्यू मंदिर कार्यशाला है. यह कार्यशाला लगभग 130 सालों से जस की तस बनी हुई है.

यहां एक अस्थायी टिन की छत के नीचे असाधारण कला देखने को मिलती है.

इस कार्यशाला में पाल के नेतृत्व में करीब 16 लोगों की टीम अलग-अलग सामग्रियों की मदद से मूर्ति बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करती है.

जल्द ही शहर के लाखों हिंदू पांच दिन चलने वाले इस त्योहार में इन मूर्तियों की पूजा करेंगे. इस त्योहार का समापन 13 अक्तूबर को होगा.

दुर्गा प्रतिमा को बनाते मूर्तिकार

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, दुर्गा प्रतिमा को बनाते मूर्तिकार

मूर्ति की दिव्यता को गढ़ना

इन कार्यशालाओं में कदम रखते ही एक अलग दुनिया में पहुंचने का अनुभव होता है.

यहां प्रदूषित हवा और हॉर्न की आवाज़ गायब हो जाती है. इसकी जगह ठंडी छाया, ब्रशों से की जाने वाली कलाकारी का अनुभव, घास और गीली मिट्टी की खुशबू आती है.

हर एक मूर्तिकार काम में गहराई से जुटा हुआ दिखता है और बिना किसी भटकाव के सावधानीपूर्वक मूर्तियों को दिव्य आकार देता है.

इन मूर्तियों को बनाते समय मूर्तिकार का समर्पण साफ़ दिखाई देता है.

यह कार्यशाला साल भर ऐसे ही चलती है. इस दौरान यहां काली पूजा, महाशिवरात्रि और दिवाली समेत अलग-अलग हिंदू त्योहारों के लिए भगवान की मूर्तियां बनाई जाती हैं.

हालांकि, मूर्तिकारों के लिए दुर्गा पूजा का समय सबसे ज्यादा व्यस्त समय होता है, क्योंकि इस समय देवी दुर्गा और उनके बच्चों की मूर्तियों की मांग सबसे ज़्यादा होती है.

दुर्गा प्रतिमा

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, दुर्गा की मूर्तियों को रंगों की मदद से सजाया जाता है

दुर्गा मां

मैं देवी दुर्गा की मूर्तियों को देखकर मोहित हूं, जिन्हें प्यार से “दुर्गा मां” कहा जाता है.

दुर्गा पूजा धरती पर देवी के अवतरण और राक्षस महिषासुर पर विजय का प्रतीक है. इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी मनाया जाता है.

हिंदुओं की मान्यता है कि हर साल देवी शरद ऋतु में पांच दिनों के लिए अपने भक्तों से मिलने आती हैं और उन्हें दर्शन देती हैं.

ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी की आत्मा उनकी मूर्तियों में निवास करती है और श्रद्धालुओं को पवित्रता से जोड़ने का काम करती हैं.

कई महीनों की मेहनत से तैयार की गई इन जटिल मूर्तियों में दुर्गा को हथियार चलाते और शेर या बाघ की सवारी करते हुए दिखाया गया है.

श्रद्धालु इन मूर्तियों की पूजा रंग-बिरंगे पंडालों, मंदिरों और अपने घरों में करते हैं और उन्हें प्रसाद चढ़ाते हैं.

दुर्गा प्रतिमा

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, मूर्तिकारों के लिए मूर्ति का निर्माण एक पूजा और भक्ति के समान है

मूर्तिकारों की श्रद्धा

इन मूर्तिकारों के लिए मूर्ति का निर्माण एक पूजा और भक्ति के समान है, जिसका उन्हें फल मिलेगा.

यहां लंबे समय से काम कर रहे मूर्तिकारों में से एक नीलांद्री कहते हैं, "यह दुर्गा की शक्ति ही है जो मुझे इतने घंटे और इतनी मेहनत से काम करने की ताकत देती है."

वो कहते हैं, "दुर्गा मां हमारा मार्गदर्शन करती हैं और अलग-अलग सामग्री से अपनी छवि बनाने के लिए हमें प्रेरित करती हैं."

इन कलाकारों का मानना है कि उनका काम पवित्र है और वो दुर्गा की प्रतिमा बनाते समय मांस खाने और शराब पीने से परहेज करते हैं.

मूर्तिकार

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, कलाकारों का मानना है कि उनका काम बेहद पवित्र है

'मूर्तिकला के लिए ईश्वर ने चुना'

बांग्लादेश के सबसे प्रतिष्ठित मूर्तिकारों में से एक, पाल इस कार्यशाला के मालिक हैं.

वो बड़े ही गर्व से बताते हैं कि यह अपने तरह की ढाका की सबसे बड़ी कार्यशाला है.

पाल के दावे की पुष्टि स्थानीय लोगों ने भी की. वो और उनका परिवार करीब तीन पीढ़ियों से इस कार्यशाला में मूर्तियां बना रहा है.

अब 55 साल के हो चुके पाल ने 10 साल की उम्र से अपने पिता के साथ मिलकर मूर्तियां बनाना शुरू कर दिया था.

मूर्ति की एक आंख बनाते हुए वो कहते हैं, "भगवान ने मुझे इसके लिए चुना था. हमारे लिए यह एक आशीर्वाद है कि हमें अपने देवताओं की सेवा करने के लिए चुना गया है."

मूर्तिकार

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, थकान के बावजूद कलाकार बताते हैं कि मां दुर्गा उनकी लगन को बनाए रखती हैं

समय पर काम पूरा करने की दौड़

आमतौर पर कलाकार अपनी कला को बेहतर करने के लिए हर रोज़ करीब आठ से नौ घंटे काम करते हैं. वो शुक्रवार के दिन अवकाश भी लेते हैं.

हालांकि, दुर्गा पूजा के समय ये लोग हर रोज़ 12 से 13 घंटे तक काम करते हैं. यह समय साल भर का सबसे व्यस्त समय होता है.

इस त्योहार के शुरू होने से पहले के कुछ समय के दौरान ये लोग कार्यशाला में ही खाते-पीते और सोते हैं.

शारीरिक थकान के बावजूद ये कलाकार बताते हैं कि मां दुर्गा उनकी लगन को बनाए रखती हैं और उन्हें काम करने के लिए प्रेरित करती हैं.

वो इस बात को समझते हैं कि मूर्तियों को समय पर बनाकर पूरा करने से श्रद्धालुओं में खुशी और भक्ति का भाव आता है.

जैसे-जैसे दुर्गा पूजा का समय करीब आता है, माहौल में उत्साह और दबाव का मिश्रण दिखने लगता है.

दुर्गा प्रतिमा

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, मूर्तिकार चेहरे और आंख को बहुत ही बारीकी से चित्रित करते हैं

प्रकृति की सामग्रियों से चित्रण

कलाकार मूर्तियों को बनाने के लिए सदियों पुरानी कला का इस्तेमाल करते हैं और यह प्रक्रिया दुर्गा पूजा से चार से पांच हफ़्ते पहले शुरू हो जाती है.

मूर्ति बनाने की प्रक्रिया में किसी भी तरह के सांचों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

इसके बजाय कलाकार बांस, लकड़ी, सूत और भूसे से फ्रेम बनाते हैं और फिर उस पर हाथ से मिट्टी और चिकनी मिट्टी की मोटी परतें लगाते हैं.

मूर्ति में सफेद पेंट करने के बाद पाल जटिल कला खासकर के चेहरे और आंख को बहुत ही बारीकी से चित्रित करते हैं.

इस पूरी प्रक्रिया में कई घंटों तक नाजुक हाथों और बारीकी से ब्रश से काम किया जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि मूर्ति का हर अंग देवी दुर्गा की सुंदरता का प्रतीक हो.

दुर्गा प्रतिमा

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, मूर्तिकार वर्तमान ट्रेंड के अनुसार से डिजाइन बनाते हैं

परंपरा का वर्तमान दौर से मिलन

पाल बताते हैं कि उनके दादाजी के इस पेशे से जुड़ने से पहले मूर्तियां बहुत ही न्यूनतम आकार की बनाई जाती थीं. हालांकि समय के साथ अब ये अधिक जटिल और रंगों से भर गई हैं.

सोशल मीडिया के आने के बाद अब श्रद्धालु और मूर्तिकार ट्रेंड के हिसाब से डिजाइन बनाते हैं.

खासकर कि वो बॉलीवुड अभिनेत्रियों द्वारा अपनाए गए ट्रेंड से प्रभावित होते हैं. इसका असर आभूषणों और पहनावों मे देखने को मिलता है.

जैसे कि पहले मूर्तियों को पारंपरिक रूप से सजाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सूती और रेशमी बांग्लादेशी साड़ियां मिट्टी के रंग की होती थीं और उनमें बहुत कम सजावट होती थी.

लेकिन बीते कुछ सालों में इनकी जगह अब सिंथेटिक कपड़ों ने ले ली है. इन कपड़ों में आकर्षक रंग होते हैं, जिसमें आधुनिक ड्रेपिंग तकनीक का इस्तेमाल होता है और ये ग्लैमर से भरे होते हैं.

मूर्ति

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, दुर्गा पूजा के समय देवी दुर्गा और उनके बच्चों की मूर्तियों की मांग सबसे ज़्यादा होती है

मूर्तिकार और उनके फ़ायदे

पाल के ग्राहक मुख्य रूप से पूजा समितियां हैं. यह करीब 50 समुदायों के बुजुर्गों का एक समूह है जो मंदिरों का प्रबंधन करते हैं और दुर्गा पूजा जैसे धार्मिक आयोजनों की देखरेख करते हैं.

साथ ही ये लोग यह सुनिश्चित करते हैं कि मूर्तियों की खरीद में समुदाय के कलात्मक, धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की झलक दिखे.

पाल दुर्गा पूजा के समय आठ से नौ लाख टका (करीब 6 लाख रुपये) कमाते हैं. यह सालभर में उनका सबसे फ़ायदेमंद समय होता है.

यह बांग्लादेश के लोगों की औसत वेतन (करीब दो लाख 75 हज़ार रुपये) से कहीं ज़्यादा है. इसके बावजूद पाल इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उनके काम करने की प्रेरणा पैसा नहीं, बल्कि उनका समर्पण है.

दुर्गा प्रतिमा

इमेज स्रोत, Sahar Zand

इमेज कैप्शन, मूर्तियों को आकर्षक रंगों से सजाया जाता है

विजयादशमी

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

दुर्गा पूजा के आख़िरी दिन को विजयादशमी के रूप में जाना जाता है. यह दिन मां दुर्गा के अपने घर लौटने का प्रतीक है.

इस दिन शाखारी बाज़ार के चारों ओर से श्रद्धालु जुलूस निकालते हैं. इस दौरान जयकारे लगाए जाते हैं और नाच-गान करते हुए ढाका की बुरीगंगा नदी तक मूर्तियों को ले जाया जाता है.

जहां वो मूर्तियों को नदी में विसर्जित कर देते हैं. इसके बाद ये मूर्तियां धीरे-धीरे विलीन हो जाती हैं, इसे देवी के अपने पति भगवान शिव के पास जाने का प्रतीक माना जाता है.

इस दौरान माहौल खुशी और दुख के मिश्रण से भरा होता है. एक तरफ देवी की उपस्तिथि का जश्न होता है, दूसरी ओर उनके जाने का वियोग महसूस होता है.

इन रिवाज़ों के साथ ही शरद ऋतु की दुर्गा पूजा संपन्न हो जाती है.

और अपनी पिछली पीढ़ियों की तरह पाल और उनकी टीम यह जानकर आराम कर सकती है कि उनकी भक्ति और कला एक और साल के लिए है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)