हरियाणा में केजरीवाल की इतनी बुरी हार क्यों हुई, क्या दिल्ली के चुनाव पर भी होगा असर?

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इमेज कैप्शन, आम आदमी पार्टी के पास हरियाणा में ना मज़बूत संगठन है और ना ही ज़मीन पर सक्रिय कार्यकर्ता
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली और पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को हरियाणा विधानसभा चुनावों में ज़बरदस्त झटका लगा है.

आम आदमी पार्टी को हरियाणा में दो प्रतिशत से भी कम मत मिले और पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल सकी.

अरविंद केजरीवाल के धुआंधार प्रचार के बावजूद, हरियाणा में आम आदमी पार्टी के 88 में से 87 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई.

सिर्फ़ दो सीटों पर ही पार्टी उम्मीदवारों को 10 हज़ार से अधिक वोट मिल सके.

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मूलरूप से भिवानी में सिवानी के रहने वाले अरविंद केजरीवाल ने हरियाणा में दर्जनों रैलियां कीं और ख़ुद को ‘हरियाणा का लाल’ बताकर वोट मांगे.

कथित शराब घोटाले में जाँच का सामना कर रहे और ज़मानत पर जेल से रिहा अरविंद केजरीवाल ने ‘ईमानदार सरकार’ देने का वादा किया लेकिन जनता ने उन्हें और उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को पूरी तरह नकार दिया.

दिल्ली जैसी मुफ़्त बिजली देने, मोहल्ला क्लिनिक खोलने, मुफ़्त और अच्छी शिक्षा देने के अलावा पार्टी ने कई वादे किए, बेरोज़गारी को मुद्दा बनाया और जमकर बीजेपी पर निशाना साधा.

लेकिन हरियाणा के मतदाताओं ने केजरीवाल और उनकी पार्टी को तवज्जो नहीं दी.

समूचे हरियाणा में सिर्फ़ जगाधरी सीट पर ही आम आदमी पार्टी उम्मीदवार आदर्श पाल सिंह 43813 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे. आम आदमी पार्टी का बाक़ी कोई भी उम्मीदवार अपनी ज़मानत नहीं बचा सका.

कांग्रेस के साथ गठबंधन ना होने का असर?

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चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन का प्रयास किया, लेकिन जब बात नहीं बनीं तो अंत में पार्टी ने अकेले 90 में से 88 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फ़ैसला किया.

इससे कुछ महीने पहले ही हरियाणा में लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ी थी और इंडिया गठबंधन ने हरियाणा में 47 फ़ीसदी मत और दस में से पांच सीटें हासिल की थीं. हालांकि आम आदमी पार्टी अपने हिस्से की कुरूक्षेत्र सीट हार गई थी.

विधानसभा चुनावों की आहट के बीच, पार्टी ने अपने दम पर चुनाव लड़ने के प्रयास शुरू कर दिए थे और कांग्रेस से बातचीत के दौरान ही, अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल हरियाणा में रैलियां कर रहीं थीं.

जब कांग्रेस से बात नहीं बनीं तो चुनावी रैलियों के दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी पार्टी अहम खिलाड़ी बनकर उभरेगी और बिना उनकी पार्टी के हरियाणा में सरकार नहीं बनेगी.

हालांकि, नतीजे पार्टी की उम्मीदों के बिल्कुल उलट रहे. हरियाणा में सिर्फ़ एक उम्मीदवार को छोड़कर आम आदमी पार्टी का कोई भी उम्मीदवार मज़बूत मौजूदगी तक दर्ज नहीं करवा सका.

वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र गांधी कहते हैं, "आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ जाने की भरसक कोशिश की लेकिन बात नहीं बन सकी. कांग्रेस का अतिआत्मविश्वास भी इसमें आड़े आया. अगर आप और कांग्रेस का गठबंधन होता तो निश्चित रूप से चार-पांच सीटों के नतीजों पर इसका असर होता."

मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को नकारा

टीवी पर पोल देखते लोग

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इमेज कैप्शन, साल 2019 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 0.5 फ़ीसदी वोट मिले थे

आम आदमी पार्टी को कुल मतों में से सिर्फ़ 2.48 लाख यानी लगभग 1.8 प्रतिशत मत ही मिले.

इससे पहले पार्टी ने साल 2019 में जब 46 सीटों पर चुनाव लड़ा था तब पार्टी को 0.5 फ़ीसदी वोट ही मिले थे.

हालांकि 2024 लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को 3.9 प्रतिशत वोट मिले थे.

चुनाव नतीजों के बाद पार्टी कांग्रेस पर निशाना साध रही है. मीडिया को संबोधित करते हुए आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा, “हमने लोकसभा चुनाव में गठबंधन किया, इंडिया गठबंधन को हरियाणा में 47 प्रतिशत वोट मिले. विधानसभा चुनावों के दौरान हम कहते रहे गठबंधन करो, लेकिन गठबंधन नहीं किया.”

वहीं मंगलवार को दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पार्षदों को संबोधित करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस का नाम लिए बिना कहा, “दिल्ली के चुनाव नज़दीक हैं. पहली बात दिमाग़ में ये रखनी है कि किसी को हल्के में नहीं लेना है. आज के चुनाव नतीजे बताते हैं कि किसी को अति आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए.”

हरियाणा में भले ही आम आदमी पार्टी को झटका लगा हो लेकिन विश्लेषक इससे हैरान नहीं हैं.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, "दरअसल, आम आदमी पार्टी का हरियाणा में कोई मज़बूत आधार नहीं है और पार्टी यहाँ अपनी मज़बूत पकड़ बनाने की महत्वाकांक्षा रखने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर संघर्ष करती रही है. हरियाणा में पार्टी के पास न ही मज़बूत ढांचा है और ना ही कार्यकर्ता. अरविंद केजरीवाल मूल रूप से हरियाणा से हैं और आम आदमी पार्टी के गठन के बाद से ही उन्होंने हरियाणा में पार्टी को विस्तार देने के प्रयास किए हैं लेकिन हरियाणा में पार्टी कोई बड़ा चेहरा पैदा नहीं कर सकी है."

हरियाणा में नहीं चला दिल्ली में चलने वाला एजेंडा

अरविंद केजरीवाल

विश्लेषक मानते हैं कि दिल्ली और हरियाणा के मुद्दे भी अलग हैं, ऐसे में आम आदमी पार्टी का मुफ़्त सेवाएं देने का जो एजेंडा दिल्ली में चल जाता है, वो हरियाणा में बहुत हद तक काम नहीं करता.

वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र गांधी कहते हैं, “हरियाणा में आम आदमी पार्टी का ख़राब प्रदर्शन हैरान नहीं करता. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली जैसी मुफ़्त सेवाएं हरियाणा में भी देने का वादा किया लेकिन यहाँ की जनता इससे आकर्षित नहीं हो सकी क्योंकि हरियाणा में ज़मीनी मुद्दे और राजनीतिक हालात अलग हैं. हरियाणा के लोगों के लिए मुफ़्त बिजली मुद्दा नहीं है. जिस तरह ये मुद्दे आम आदमी के लिए दिल्ली में काम करते हैं, वैसे हरियाणा में नहीं करते.”

देवेंद्र गांधी कहते हैं, “दिल्ली में झुग्गी-बस्तियों में रहने वाला एक बड़ा वर्ग है जो आम आदमी पार्टी की नीतियों से प्रभावित होता है. लेकिन हरियाणा में ऐसा वर्ग नहीं है जो सीधे तौर पर पार्टी से जुड़ सके. यहाँ आम आदमी पार्टी का एजेंडा नहीं चलता है.”

गांधी कहते हैं, “बीजेपी और कांग्रेस की तुलना में आम आदमी पार्टी के पास हरियाणा में मज़बूत संगठन भी नहीं है. चुनावों के बीच आप के कई नेता बीजेपी में शामिल हो गए. जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल हैं या पंजाब में भगवंत मान हैं, वैसा कोई चेहरा भी आप के पास हरियाणा में नहीं है. ज़मीनी स्तर पर दिल्ली जैसे समर्पित कार्यकर्ता भी पार्टी के पास नहीं हैं.”

हरियाणा में जातिगण समीकरण चुनावों में हावी रहे हैं. विश्लेषकों के मुताबिक़, चुनाव जाट बनाम ग़ैर जाट रहे लेकिन आप के पास ना ही कोई बड़ा जाट नेता था और ना ही ग़ैर जाट. जातिगत समीकरणों में भी पार्टी पिछड़ गई.

देवेंद्र गांधी कहते हैं, “हरियाणा में आम आदमी पार्टी अध्यक्ष सुशील गुप्ता बनिया जाति से आते हैं. हरियाणा में इस जाति का कोई मज़बूत आधार नहीं है. पिछड़े मतदाता पिछड़े नेताओं के पीछे चले गए, जाट जाटों के पीछे लेकिन आप के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं था जो किसी बड़े जाति वर्ग को अपनी तरफ़ खींचे रखते.”

कांग्रेस-भाजपा के बीच मुक़ाबले में नदारद रही आप

दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी भी कोई सीट नहीं जीत सकी है

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हरियाणा में 10 साल से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है. चुनावों से पहले ये माना जा रहा था कि राज्य में सत्ता विरोधी लहर है, जिसका फ़ायदा कांग्रेस को हो सकता है.

विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि हरियाणा में सीधा मुक़ाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच था, ऐसे में आप के नेता ज़मीनी स्तर पर बहुत सक्रिय भी नहीं रहे.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, “आम आदमी पार्टी का हरियाणा में जो प्रदर्शन है उसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है. जो दुर्गति आप की हरियाणा में हुई है, वह तय थी. दरअसल कोई तीसरी पार्टी राज्य में मुक़ाबले में ही नहीं थी. पिछले चुनावों में 10 सीटें जीतने वाली जननायक जनता पार्टी भी अपने एक भी उम्मीदवार की ज़मानत तक नहीं बचा सकी. दरअसल कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर में किसी और पार्टी के लिए इस चुनाव में कोई गुंजाइश थी ही नहीं.”

हेमंत अत्री कहते हैं, “हरियाणा में तमाम प्रयासों के बावजूद, आम आदमी पार्टी शोर-शराबा करने तक ही सीमित है. पार्टी की कोई प्रभावी उपस्थिति राज्य में नहीं है. ये अलग बात है कि इस बार पार्टी ने राज्य में पूरा ज़ोर लगाया. लेकिन यहां आम आदमी पार्टी के लिए बहुत गुंजाइश थी नहीं."

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दिल्ली चुनावों पर हो सकता है असर?

दिल्ली में अगर तय समय पर चुनाव हुए तो ये चुनाव फ़रवरी 2025 में होंगे. ऐसे में दिल्ली चुनावों में बहुत लंबा वक़्त नहीं है. आम आदमी पार्टी के पास इस समय दिल्ली में प्रचंड बहुमत है.

आम आदमी पार्टी ने बुधवार को आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने के संकेत दिए हैं. हालांकि लोकसभा चुनाव पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था लेकिन गठबंधन कोई भी सीट नहीं जीत सका था.

हरियाणा में चुनावों में मिली हार के बाद ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या इन नतीजों का असर दिल्ली चुनावों पर भी हो सकता है.

देवेंद्र गांधी कहते हैं, “दिल्ली और हरियाणा के मुद्दे और लोगों का वोट करने का तरीक़ा अलग है. बावजूद इसके, हरियाणा में मिली बुरी हार का असर आम आदमी पार्टी के दिल्ली चुनाव अभियान पर भी पड़ सकता है. अगर बीजेपी ने जिस तरह से हरियाणा में रणनीति बनाई और जातिगत कार्ड खेला, वैसे ही कोई मुद्दा दिल्ली में उठा दिया तो निश्चित रूप से आप के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं.”

हालांकि हेमंत अत्री इस संभावना को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, “दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पास एक समर्थित वोट बैंक है. ख़ासकर दिल्ली के ग़रीब और पिछड़े वर्ग के लोग आम आदमी पार्टी के साथ एक जुड़ाव महसूस करते हैं. फ़्री बिजली दिल्ली में एक बड़े वर्ग के लिए सबसे अहम मुद्दा है और शायद आगे भी ऐसा ही रहे. ऐसे में, ये नहीं कहा जा सकता कि हरियाणा के चुनाव नतीजों का कुछ ख़ास असर दिल्ली चुनावों पर भी होगा.”

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