बिहार: आज़ादी के 70 साल बाद आई थी बिजली, अब टॉर्च की रोशनी में खाना बनाने को मजबूर - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, रोहतास से
सरिता के मिट्टी से लिपे-पुते घर के आंगन में दो खंभे और उन पर टिकी सोलर प्लेट लगी है. इन सोलर प्लेट से कुछ तार भी लटके सुस्ता रहे हैं. ये तार बताते हैं कि कभी यहां बिजली उपलब्ध थी.
लेकिन कभी स्कूल नहीं गई सरिता बताती हैं, "2018 में ये लगा था. दो बल्ब और पंखा भी सरकार से मिला था. कुछ दिन चला, फिर भुकभुकाया और हमेशा के लिए बंद हो गया. बाद में मुखिया जी बल्ब भी ले गए."
पांच भाई-बहनों में से एक और बिना पिता की इस बच्ची से मैं पूछती हूं, फिर रात होने पर क्या करती हो? वो थोड़ा रुक कर कहती हैं, "कुछ नहीं जानवर की तरह अंधेरे में रहते हैं. जिनके पास थोड़ा भी पैसा है, उन्होंने अपना इंतज़ाम कर लिया है. मेरे यहां तो मम्मी गाय चराकर घर चलाती हैं और मेरा भाई बस घूमता रहता है."
सरिता के घर के ठीक बगल में सोनी देवी टॉर्च के सहारे अपने तीन बच्चों के साथ रहती हैं. वो 'टॉर्च' को बार-बार लाइट कहती हैं. मेरे कहने पर वो अपनी लाइट दिखाती हैं, जो दरअसल टॉर्च है.
सोनी के घर भी सोलर प्लेट खपरैल पर पड़ी धूप खा रही है. वो गुस्साए स्वर में कहती हैं, "सोलर प्लांट सरकार ने दिया तो जला ही नहीं. इससे अच्छा सरकार सबको नीचे ज़मीन दे कर वहीं रखे. रोहतास में तो सब जगह बल्ब बत्ती है ही."
'आज़ादी के अमृतकाल में अंधेरा कायम है'

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सरिता और सोनी दोनों ही रोहतास ज़िले के रोहतास प्रखंड के रोहतासगढ़ पंचायत के लुकापहरू गांव की हैं.
लुकापहरू कैमूर पहाड़ी का एक गांव है. आदिवासी बहुल इस दुर्गम इलाके में बसे लुकापहरू जैसे सैकड़ों गांव के लोग ऐसे ही अंधेरे में जीवनयापन करने को मजबूर है.
बिजली, सड़क, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित इस इलाके में आज़ादी के 70 साल बाद सौर ऊर्जा के ज़रिए बिजली आई थी, लेकिन ये खुशी जल्द ही काफूर हो गई.
कैमूर पहाड़ी लगभग 483 किलोमीटर लंबी विंध्य पहाड़ियों का पूर्वी भाग है जो मध्य प्रदेश के जबलपुर ज़िले में कटंगी से बिहार के सासाराम तक फैली हुई है.
इन पहाड़ियों पर रोहतास और कैमूर ज़िले के गांव बसे हैं. रोहतास ज़िले के रोहतास और नौहट्टा प्रखंड और कैमूर ज़िले की बात करें तो यहां अधौरा और चैनपुर प्रखंड के गांव हैं.

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रोहतास प्रखंड की रोहतासगढ़ पंचायत के मुखिया नागेन्द्र यादव बताते हैं, "मेरी पंचायत में 27 गांव हैं, जिसमें से 20 पहाड़ी पर हैं. इन 20 गांव में 23 हज़ार की आबादी है. यहां पर सरकार ने एलएंडटी कंपनी से साल 2017 में सोलर पैनल लगवाया था. उससे डेढ़ साल तक बिजली आई, लेकिन उसके बाद बैट्री ख़राब हो गई. हम लोगों ने ज़िलाधिकारी साहब को शिकायत लिखकर दी है, लेकिन कोई हल निकला नहीं है. पंचायत के सभी लोग हम ही को दोष देते रहते हैं."
इन गांवों में सरकार ने दो तरह से सोलर पैनल लगवाए हैं. गांव के ही सामूहिक सोलर पैनल और गांव के बाहरी इलाके में बसी बसावट में लिए उनके घरों के अंदर.
दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना के तहत आई बिजली

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कैमूर पहाड़ी का ये इलाका दुर्गम और ऊंचाई पर स्थित होने के साथ-साथ वन विभाग का भी क्षेत्र है.
एक वक्त में ये इलाका नक्सल प्रभावित भी रहा, जिसके निशान आज भी रोहतास क़िले के खंडहरों में देखे जा सकते हैं.
दिसंबर, 2014 में केन्द्र सरकार ने दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) शुरू की थी.
6 फरवरी, 2024 को राज्यसभा में दिए गए एक जवाब के मुताबिक़, इस योजना के अंतर्गत 18,374 गांव का विद्युतीकरण किया गया जिसमें से 2,763 गांव का विद्युतीकरण अक्षय ऊर्जा (सौर ऊर्जा आदि) से किया गया. बिहार को डीडीयूजीजेवाई और सौभाग्य के तहत साल 2020-23 तक 2,152 करोड़ रुपये जारी किए गए थे.
डीडीयूजीजेवाई योजना के तहत ही बिहार के कैमूर पहाड़ी इलाके में साल 2016 में सर्वे किया गया.
उसके बाद साल 2017 से यहां सोलर पैनल्स लगाने शुरू किए गए. साल 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब इस इलाके में आए तब तक ज्यादातर गांव सौर ऊर्जा से रोशन हो चुके थे.
'सूरज बुत गया, हम सुत गए'

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लेकिन एक साल बीतते-बीतते इन गांवों में लगे सोलर पैनल भी ख़राब होने शुरू हो गए.
पीपरडीह पंचायत के हसड़ी गांव के रामनरेश कहते हैं, "2018 से बिजली कभी बनती है, कभी बिगड़ती है. पूरे पहाड़ में सोलर वाला सिस्टम ख़राब पड़ा है. सब चाइना वाला सामान लगा दिया है तो क्या होगा? आप समझिए कि 'सूरज बुत गया, हम सुत (सो) गए' वाला हाल है यहां."
रोहतासगढ़ पंचायत के रानाडीह गांव के वार्ड नंबर 4 के वार्ड पार्षद श्यामनारायण उरांव हैं.
वो बताते हैं, "हमारे गांव में साल भर बिजली आया, फिर बिजली नहीं आई. मुखिया जी से शिकायत करने पर मिस्त्री आते हैं. वो थोड़ा थोड़ा बनाकर चले जाते हैं. सरकार ने जो सोलर पैनल लगाया है उससे एक-दो घर छोड़ दीजिए तो पूरे वार्ड में कहीं बिजली नहीं है."

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बिजली की इस स्थिति से निपटने के लिए लोगों ने निजी तौर पर अपने घर में सोलर प्लेट्स लगा ली है.
राजेन्द्र उरांव और रजन्ती देवी के घर के अंदर लगे सोलर पैनल बेकार पड़े हैं.
राजेन्द्र उरांव बताते हैं, "हम लोगों ने अपना सोलर प्लेट ख़रीद लिया है, जो 1800 रुपये का पड़ा, बैट्री 1,200 रुपये मे ली और 25 रुपये के तीन बल्ब लिए हैं, जो कुछ दिन बाद बदलने पड़ते हैं. ये तीन बल्ब ही रात के खाना बनाने और खाते समय जलते हैं."
टॉर्च के सहारे चलती ज़िंदगी

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राजेन्द्र उरांव ने जब दिन के उजाले में ये बल्ब जलाकर दिखाए तो वो जीरो वॉट बल्ब सरीखे ही थे. यानी ये ऐसी रोशनी दे रहे थे जो बिजली उपलब्धता वाले क्षेत्रों में लोग रात में सोते वक्त जलाते हैं.
लेकिन जो आर्थिक तौर पर सक्षम नहीं हैं, उनका क्या हुआ?
दरअसल सौर ऊर्जा आने के बाद सबसे पहला काम जो हुआ, वो ये कि जन वितरण प्रणाली से केरोसिन तेल मिलना बंद हो गया. जिससे ढिबरी-लालटेन जलाकर काम चलता था.
रोहतासगढ़ पंचायत की सुनीता उरांव से जब मैं मिली तो उन्होंने मुझे दो टॉर्च दिखाईं.
वो कहती हैं, "इसी को बार (जलाकर) खाना बनाते हैं. केरोसिन तेल अब मिलना बंद हो गया तो ढिबरी कैसे जलेगी? रोहतास (ज़मीनी इलाक़ा) जब कोई जाता है तो बैट्री ले आता है."
सुनीता की तरह ही पीपरडीह पंचायत के नयाडीह गांव के विजेन्द्र कहते हैं, "बिजली आई तो तेल मिलना बंद हो गया. पहले आधा लीटर केरोसिन तेल मिलता था. अब अंधेरा होता है तो अंधेरे में पड़े रहते हैं. हम मिस्त्री तो हैं नहीं कि बैट्री ठीक कर लें."
रेहल: बिहार का पहला कार्बन निगेटिव विलेज होने का दावा

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कैमूर पहाड़ी पर स्थित पीपरडीह पंचायत के रेहल गांव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 6 अप्रैल, 2018 को आए थे.
वो यहां राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे सात निश्चय और अन्य सरकारी योजनाओं के तहत चल रही विकास योजनाओं का जायजा लेने आए थे.
रोहतास जिले की वेबसाइट के मुताबिक ये कार्बन निगेटिव विलेज है यानी एक ऐसा गांव जहां सौर ऊर्जा से बिजली मिल रही है.
वेबसाइट पर गांव की पक्की गली-नाली, नल से पानी और मशरूम शेड की भी तस्वीर है.
इस गांव में चार जगह पर सोलर पैनल्स लगे हैं जिससे पूरे गांव को बिजली मिलनी थी.

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गांव के धनंजय यादव कहते हैं, "सिर्फ एक पैनल से बिजली थोड़ी-थोड़ी कुछ घर में मिल रही है, बाकी सारे पैनल शोभा का सामान बने हुए हैं. यहां न पीने के लिए पानी है और ना ही जीने के लिए बिजली."
रेहल गांव में ही नाई की दुकान चला रहे मुमताज कहते हैं, "हमारे बाप दादा मशाल जलाकर जी लेते थे. इतनी लकड़ी मिलती थी. लेकिन अब तो वन विभाग लकड़ी भी नहीं लेने देता. डीएम साहब को शिकायत करते हैं तो भी कोई कुछ नहीं सुनता. रिश्तेदार आते हैं तो जल्दी भाग जाते हैं."
गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय में लगे सौर चूल्हे का पूरा सिस्टम ही टूटा पड़ा है. ये वो चूल्हा है जिसमें कभी बच्चों का मिड डे मील तैयार होता था और जिसे देखकर मुख्यमंत्री ने कहा था, "हम रेहल गांव कभी नहीं भूलेंगे, जहां हम पहली बार सौर ऊर्जा चालित चूल्हा देखे हैं."
इस स्कूल में 2003 से कार्यरत शिक्षक सुरेन्द्र सिंह बताते हैं, "जब मुख्यमंत्री आए थे, तभी ये चूल्हा लगा था. कुछ दिन खाना भी बना लेकिन उसके बाद ख़राब हो गया. हम इसकी जानकारी प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी (बीडीओ) को कई बार दे चुके हैं."
बि-पा-सा के साथ साथ शिक्षा भी सपना

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कैमूर पहाड़ी पर मशहूर रोहतासगढ़ क़िला है, जो समुद्र तल से 1,500 फीट की ऊंचाई पर है. तक़रीबन इसी ऊंचाई पर रोहतास और कैमूर के ये गांव है.
ये सभी गांव बिपासा यानी बिजली, पानी, सड़क के साथ साथ शिक्षा से भी वंचित हैं. पहाड़ चढ़ने के लिए मुख्य सड़क भी यहां नहीं है. हालांकि ये निमार्णाधीन हैं.
इस पूरे इलाके में जगह-जगह सरकार ने नल-जल योजना के तहत घरों में नल लगाए हैं.
लेकिन जगह-जगह लड़कियां और महिलाएं अपने सिर पर एल्यूमीनियम के घड़ों में पानी लाती ले जाती मिल जाएंगी.

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मनवती देवी भी अपने सिर पर घड़ा रखे मुझे मिलीं. वो कहती हैं, "नल तो दे दिया लेकिन दुख तो रह गया. उसमें पानी आता ही नहीं. कपार (सिर) पर पानी ढो रहे हैं. रोज़ इसके लिए लड़ाई-झगड़ा होता है."
सिर्फ़ पानी ही नहीं बल्कि शिक्षा भी एक बड़ा मसला है. रानाडीह गांव के नीतीश कुमार को छठी क्लास के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी.
वो कहते है, "हमको हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करवाती थीं मम्मी, लेकिन उसके बाद पैसा नहीं जुटा तो पढ़ाई छोड़नी पड़ी."
रानाडीह गांव की रजन्ती देवी अपनी नौ साल की बेटी को हॉस्टल में रखकर पढ़ा रही हैं.
वो कहती हैं, "पूरा जंगल का इलाका है. गांव में स्कूल है नहीं. शाम में बिजली नहीं कि बच्ची पढ़ जाए. बरसात आएगी तो बाढ़ भी आ जाएगी. कहां लड़की को पढ़ने भेज दें?"
'सरकार बिजली देना चाहती है, लोग सपोर्ट नहीं करते'

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रोहतास ज़िले के इन गांव की तरह ही कैमूर जिले के पहाड़ी पर स्थित गांव अंधेरे में डूबे हैं.
कैमूर में दैनिक प्रभात खबर के ब्यूरो प्रमुख विकास कुमार कहते हैं, "अधौरा के 108 और चैनपुर के 18 गांव में ब्लैक आउट है. यहां बिजली की सुविधा सोलर पैनल से आई और चली गई. ऐसे में यहां के लोगों को किसी सरकारी योजना का लाभ लेना हो, फॉर्म भरना हो तो उन्हें शहर आना पड़ता है."
कैमूर पहाड़ी पर बिहार सरकार से एग्रीमेंट के तहत ये सारा काम लार्सन एंड टर्बो ने किया था.
बिहार के 12 ज़िलों में कंपनी का काम देख रहे रोहित शर्मा बीबीसी से कहते हैं, "हमारे ऊपर सोलर प्लेट्स लगाने और उसकी मेंटेनेंस का जिम्मा है. लेकिन दिक़्क़त की बात ये है कि लोगों का सहयोग नहीं मिलता. बैट्री चोरी, इन्वर्टर में तोड़-फोड़ की घटनाएं पहाड़ी इलाके में होती रहती हैं. रेहल की ही बात करें तो वहां 6 बैट्री चोरी हो गई. लोगों को रोज़ाना इस बिजली के लिए प्रतिदिन 1 रुपये देना है, लेकिन वो भी लोग नहीं चुकाते."
वो यह भी बताते हैं, "इस पूरे इलाके में छह से आठ घंटे बिजली की सप्लाई होनी है. लेकिन लोग प्लांट में लगे टाइमर से भी छेड़छाड़ करते हैं. जिसके चलते बैट्री पर लोड़ बढ़ता है, वो जल जाती है.”
इस मामले में रोहतास के ज़िलाधिकारी नवीन कुमार बीबीसी से कहते हैं, "बिजली की समस्या हमारे संज्ञान में है. वहां बैट्री ख़राब हो गई है. हम लोगों ने ऊर्जा विभाग को लिखा है, जल्द ही इसे ठीक करा लिया जाएगा."
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