बिहार के सुपौल में कोसी नदी पर बन रहे पुल का एक हिस्सा कैसे गिरा

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार के सुपौल से
बिहार के सुपौल ज़िले में कोसी नदी पर बन रहे पुल का एक हिस्सा गिर जाने से कम से कम एक मज़दूर की मौत हो गई है.
यह घटना शुक्रवार सुबह क़रीब सात बजे हुई है. इस घटना में 10 अन्य मज़दूर घायल भी हुए हैं.
यह पुल सुपौल ज़िले के बकौर से भेजा के बीच बन रहा है. यह केंद्र सरकार की परियोजना का हिस्सा है.
इस पुल के बन जाने के बाद बिहार के मधुबनी और सुपौल के बीच इस इलाक़े में संपर्क का एक नया रास्ता तैयार हो जाएगा. इससे दोनों ज़िलों के बीच की दूरी क़रीब 30 किलोमीटर तक कम हो जाएगी.
यह दूरी कहने को 30 किलोमीटर कम होगी लेकिन इससे लोगों को बड़ी राहत मिलेगी और समय की भी काफी बचत होगी.
जब हम दरभंगा-सुपौल हाइवे से कटकर कमला बांध के रास्ते पर मुड़े तब इसका अनुभव हुआ कि यह पुल इलाक़े के लिए कितना अहम है.
दर्जनों लोग कोसी नदी पर बांस के बने पुल से पैदल पार करते हुए, कई किलोमीटर तक अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ रहे थे.
नदी में पानी ज़्यादा हो तो यहां बांस का पुल भी काम में नहीं आता है और लोगों को नाव के ज़रिए नदी पार करनी होती है.
बकौर पुल की लंबाई 10 किलोमीटर से ज़्यादा है. यानी हर लिहाज़ से यह पुल एक बड़ी महत्वाकांक्षी परियोजना का हिस्सा है. उसके बाद भी पुल पर हुए हादसे की सूचना पाते ही इलाक़े के सैकड़ों लोग घटनास्थल और कोसी नदी के दोनों तरफ इकठ्ठा हो गए.
तकनीकी समस्या या लापरवाही

घटनास्थल पर जाकर हमने देखा कि पुल का एक स्पैन नीचे एक गाड़ी पर गिरा हुआ है.
इस गाड़ी का इस्तेमाल संभवतः पुल निर्माण में लगने वाले सीमेंट के बड़े-बड़े ढांचे की ढुलाई के लिए हो रहा था.
स्थानीय गांववालों को आशंका है कि गाड़ी और ढांचे के नीचे कुछ और मज़दूर दबे हो सकते हैं.
हालांकि मौक़े पर मौजूद पुल निर्माण कराने वाली कंपनी के लोगों ने हादसे के बारे में कोई जानकारी नहीं दी.
मीडियाकर्मियों को देखकर वो दूर हटते नज़र आये. मौक़े पर बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षाबल भी मौजूद थे.
इस मामले में सुपौल के पुलिस अधीक्षक ने बीबीसी को बताया कि पुल का निर्माण गैमॉन और ट्रांसरेल कंपनी मिलकर कर रही थी.
उनके मुताबिक़ कंपनी की टीम इस मामले की जांच करेगी और तभी बताएगी की हादसे की वजह क्या थी.
राहत की बात बस इतनी रही है कि उस वक़्त नाइट ड्यूटी करने वाले केवल 16 लोग ही काम पर थे, जिनमें 11 लोग हादसे की चपेट में आये.
स्थानीय लोगों का आरोप

स्थानीय निवासी युति नारायण यादव का आरोप है कि हादसा काम की सही तरीके से निगरानी न होने के कारण हुआ है.
अजय कुमार पेशे से वकील हैं और सुपौल के उसी इलाके़ के रहने वाले हैं जहां हादसा हुआ है. उनका आरोप है, "आप देखेंगे कि इलेक्टोरल बॉन्ड और ठेका मिलने की यह साझेदारी है. ऐसी कंपनियों के ख़िलाफ़ कौन कार्रवाई करेगा?"
उनका कहना है कि बिहार के लोग राज्य से बाहर मज़दूरी करने जाते हैं तो वहां भी हादसे का शिकार होते हैं और अपने राज्य में भी हादसे में मारे जाते हैं. वो इन हालात पर दुख जताते हैं.
स्थानीय निवासी मोहम्मद हीरा के मुताबिक़- "जब लाभ होगा तब होगा, लेकिन इस पुल पर चार-पांच साल से काम चल रहा था. इससे पहले भी 10 नंबर पिलर के पास एक लड़का गिर गया था और उसकी मौत हो गई थी. क्या पीड़ित परिवार और उनके बच्चों की देखभाल की गारंटी सरकार देगी?"
वैसे बिहार में पुल हादसे की यह पहली घटना नहीं है. इससे पहले भागलपुर में गंगा नदी पर बन रहे पुल का एक बड़ा हिस्सा नदी में समा गया था.
बिहार के पुल हादसे

बिहार में बीते चार साल में इस तरह से क़रीब 10 पुल हादसे हो चुके हैं.
सुल्तानगंज-अगुवानी ब्रिज: पिछले साल बिहार में गंगा नदी पर बन रहे पुल का एक हिस्सा गिर गया था. यह पुल क़रीब 1,717 करोड़ की लागत से भागलपुर ज़िले के सुल्तानगंज और खगड़िया ज़िले के अगुवानी नाम की जगह के बीच बन रहा था.
सुल्तानगंज-अगुवानी ब्रिज: इससे पहले 2022 में भी इसी सुल्तानगंज-अगुवानी ब्रिज का एक हिस्सा टूटकर गिर गया था. राज्य सरकार ने बार-बार हो रहे हादसों की वजह से ब्रिज को दोबारा बनवाने का फ़ैसला किया था.
दुमुहनी नाले का पुल: पिछले साल जनवरी में पूर्णिया के बैसी में दुमुहनी नाले पर बन रहा क़रीब बीस मीटर लंबा पुल गिर गया था. ख़बरों के मुताबिक़ ठेकेदार ने पुल बनाने के सभी दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया था.
फ़टकी-बरिया रोड पुल: इसके दो महीने बाद ही पूर्णिया के ही फ़टकी-बरिया रोड पर बन रहा एक पुल गिरा था.
तरैया का पुल: बीते साल मार्च में सारण के तरैया इलाक़े में भलुआ में एक पुल गिर गया था. यह हादसा एक ट्रक के गुज़रने के दौरान हुआ जिसमें ट्रक का ड्राइवर और हेल्पर घायल हो गए थे. यह पुल अंग्रेज़ों के ज़माने में बनाया गया था.
कमला नदी का पुल: जनवरी 2023 में दरभंगा ज़िले के कुशेश्वरस्थान में कमला नदी पर बना पुल गिर गया था. उस दौरान रेत से लदा एक ट्रक पुल के ऊपर से गुज़र रहा था. इस पुल का निर्माण साल 2004 में हुआ था.
बूढ़ी गंडक नदी का पुल: बिहार के बेगूसराय ज़िले में दिसंबर 2022 में बूढ़ी गंडक नदी पर बने पुल का एक हिस्सा टूटकर नदी में गिर गया था. इस पुल का उद्घाटन भी नहीं हो पाया था और इसके एक हिस्से में पहले दरार देखी गई थी, उसके बाद यह टूटकर गिर गया.
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नालंदा में फ्लाईओवर: इससे ठीक एक महीने पहले यानी नवंबर 2022 को बिहार के नालंदा ज़िले में एक सड़क पुल (फ़्लाईओवर) हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. यह हादसा क्रेन से एक बीम को ब्रिज के ऊपर रखने के दौरान हुआ था.
कोसी पर बना पुल: जून 2022 को बिहार के सहरसा में कोसी तटबंध पर बन रहा पुल गिर गया था. ख़बरों के मुताबिक़ यहां पुल निर्माण के लिए जारी गाइडलाइंस की अनदेखी की बात की गई थी. इस हादसे में कुछ मज़दूर ज़ख़्मी भी हुए थे.
गंडक नदी का पुल: जुलाई 2020 को गोपालगंज में गंडक नदी पर सत्ताघाट के क़रीब 9 किलोमीटर लंबे पुल का एक हिस्सा बाढ़ की वजह से टूटकर गिर गया था. यह हादसा पुल के उद्घाटन के एक महीने के अंदर हुआ था. हालांकि उस वक़्त राज्य सरकार ने कहा था कि बारिश और बाढ़ की वजह से पुल तक पहुंचने वाली सड़क टूटी है और इससे पुल को कोई नुक़सान नहीं हुआ है.
उस वक़्त बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कई तरह के आरोप लगाए थे.
वहीं नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का दावा रहा है कि पुल निर्माण का ठेका टेंडरिंग के ज़रिए दिया जाता है और यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती है.
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हादसों की वजह
नदी के ऊपर बन रहे पुल या किसी फ़्लाईओवर के गिरने की घटना पूरे भारत में देखने को मिलती हैं.
सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट के ब्रिज इंजीनियरिंग एंड स्ट्रक्चर डिविज़न के चीफ़ साइंटिस्ट डॉ. राजीव कुमार गर्ग ने अपनी टीम के साथ इस विषय पर एक विस्तृत अध्ययन किया है.
उन्होंने अपने शोध में पाया है कि ब्रिज फ़ेल होने के मामले में चीन भारत से भी आगे है.
उन्होंने साल 1977 से 2017 भारत में ब्रिज फ़ेल होने के मामलों का अध्ययन किया है. ब्रिज फ़ेल यानी जिसमें ब्रिज या उसके किसी हिस्से को नुक़सान होने से ब्रिज को इस्तेमाल के लिए बंद करना पड़ा हो.
वो कहते हैं कि भारत में पुल की उम्र औसतन महज़ 34.5 साल की है, जो कि उम्मीद से काफ़ी कम है. 2010 के पुलों के एक अध्ययन में उन्होंने पाया है कि भारत में 80 फ़ीसदी से ज़्यादा पुल प्राकृतिक हादसों की वजह से गिरते हैं. इसमें बाढ़, भूकंप और आंधी जैसी प्राकृतिक आपदा शामिल हैं.
भारत में बाढ़ की वजह से ही क़रीब 52 फ़ीसदी पुल गिरते हैं और इसका एक बड़ा कारण सीमा से ज़्यादा बालू का खनन है, जिससे पुल की जड़ें कमज़ोर हो जाती हैं.

अमेरिका में भी जितने ब्रिज गिरते हैं उनमें से क़रीब 60 फ़ीसदी प्राकृतिक आपदा की वजह से गिरते हैं, इसमें चक्रवात की बड़ी भूमिका होती है.
भारत में ब्रिज के फ़ेल होने की दूसरी बड़ी वजह निर्माण में इस्तेमाल होने वाला ख़राब सामान हैं. इसकी वजह से 10 फ़ीसदी से ज़्यादा पुल समय से पहले गिर जाते हैं. जबकि डिज़ाइन और निर्माण की विसंगतियों की वजह से क़रीब 4.13 फ़ीसदी ब्रिज गिरते हैं.
वहीं तय सीमा से ज़्यादा भारी वाहनों के गुज़रने से भारत में 3.28 फ़ीसदी पुल गिरते हैं. जबकि पुल पर हुए हादसों या हमलों की वजह से 2.19 फ़ीसदी पुल इस्तेमाल के लायक नहीं रह जाते हैं.
आमतौर पर पहाड़ी इलाक़ों में किसी पुल की लाइफ़ कम होती है. कई इलाकों में ज़मीन के धंसने की वजह से पुल का सब-स्ट्रक्चर (ज़मीन के नीचे का भाग) ख़ुद को ज़मीन के मुताबिक़ एडजस्ट कर लेता है लेकिन पुल के ऊपरी हिस्से में दरार आ जाती है.
बड़ा निवेश

सुपौल में जिस ब्रिज पर हादसा हुआ है वह क़रीब 1,200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हो रहा है.
अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक़ भारत में पिछले कुछ साल में सड़क और पुल के निर्माण पर ख़र्च बढ़ा है. अनुमान लगाया गया है कि जहां साल 2014-15 में इस पर 8.28 बिलियन डॉलर का ख़र्च किया गया था, वहीं साल 2018-19 में यह बढ़कर 21.88 बिलियन डॉलर हो गया.
इसके बावजूद भी भारत में ऐसे पुल गिरने के मामले लगातार हो रहे हैं.
232 पुलों के एक अध्ययन में देखा गया है कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद भी क़रीब 36 फ़ीसदी पुल बनने के दस साल के अंदर गिर गए. यही नहीं 26 फ़ीसदी से ज़्यादा पुल तो बनने के पांच साल के अंदर ही गिर गए.
राजीव कुमार गर्ग के मुताबिक़ भारत में फ़्लड को लेकर इंजीनियरिंग मॉडल बहुत अच्छा नहीं है, जबकि पुल बनाने की प्रक्रिया काफ़ी जटिल होती है. इसमें स्ट्रक्चर, फ़्लड, मैकेनिकल, जियो टेक्निकल ग्राउंड सब शामिल होते हैं.
उनके मुताबिक़, "आप ओवर लोड का क्या करेंगे, जिसे रोकने का साधन पुलिस के पास नहीं है. हमारे यहां निरीक्षण काफ़ी कमज़ोर है. भारी वाहनों या भूकंप से पुल में नीचे की तरफ दरार आ जाए तो हमें पता भी नहीं चलता. जब तक हमें समझ में आता है तब तक काफ़ी देर हो जाती है."
राजीव गर्ग बताते हैं कि अमेरिका में ब्रिज फ़ेल के मामले भारत से थोड़े कम होते हैं. लेकिन वहां हर हादसे के बाद रिसर्च होता है और उससे भविष्य में सुधार की कोशिश होती है. भारत इस मामले में काफ़ी पीछे है.
राजीव गर्ग ने जब भारत में पुलों के गिरने या फ़ेल होने के मामलों पर अध्ययन शुरू किया तो उनके सामने भी यही चुनौती थी. भारत में टूटे पुल का केंद्र से लेकर क्षेत्रीय स्तर पर कोई डेटाबेस नहीं है, जहां से कोई पुख़्ता जानकारी जुटाई जा सके.
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