बिहार चुनाव: नीतीश सरकार के पूर्ण विद्युतीकरण का दावा कितना सच?

सुंदरपुर टोले की एक निवासी
    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गया से

"खाना कैसे मिलेगा, वो तो सोचना ही पड़ता है. उसके साथ खाना किस वक्त खाना है वो भी सोचना पड़ता है." निराशा और गुस्से से भरी आवाज़ में सीबा अपनी परेशानियां गिनवाने लगे.

कहने को तो सीबा गया ज़िले के बुधौल गांव के निवासी हैं लेकिन उनका सुंदरपुर टोला गांव से पूरी तरह कटा हुआ है. देश के दूसरे गाँवों की तरह यहाँ भी दलित, मुख्य बस्ती से दूर गाँव के एक कोने में अलग-थलग रहते हैं.

महादलितों के इस टोले में अब तक न बिजली पहुंची है और न पानी. यहां न तो शौचालय है और न ही टोले में बाकी सरकारी योजनाओं का कोई लाभ ही दिखता है. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का पुराना बोर्ड तो नज़र आता है लेकिन सड़क अभी बनी नहीं है.

पसीने से तरबतर सीबा कहते हैं कि यहां सूरज ढलने से पहले ही रात का खाना खा लेते हैं क्योंकि बिना बिजली के अंधेरे में खाना पकाना और खाना मुश्किल है.

केंद्र सरकार ने 2017 में ग़रीबों के घरों में बिजली पहुंचाने के लिए सौभाग्य योजना शुरू की थी. इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने 2018 में ही बिहार को 100 फ़ीसदी विद्युतीकृत घोषित कर दिया था.

यूं तो पटना से गया लगभग 100 किलोमीटर ही दूर है लेकिन सड़कों और ट्रैफ़िक की हालत ऐसी है कि इस जगह तक पहुंचने में पांच घंटे से ज़्यादा का वक़्त लग जाता है.

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का पुराना बोर्ड

दशरथ माँझी की केवल यादें

थोड़ी-बहुत मशक्कत के बाद कुछ घंटों में हम दशरथ मांझी द्वार तक पहुँचते हैं. वही दशरथ मांझी जिन्होंने लगभग 22 सालों की मेहनत से पहाड़ काटकर सड़क बनाई थी.

उनकी लगन और हिम्मत की यादगार निशानी के तौर पर अब सरकार गाँव में प्रवेश से पहले एक द्वार बनवाया है. द्वार के कुछ मीटर दूरी पर है बुधौल गाँव का छोटा-सा सुंदरपुर टोला.

टोले में जाते ही कई लोग हमें घेर कर खड़े हो जाते हैं जिनमें महिलाएं, युवा और और बच्चे भी हैं. यहां इक्का-दुक्का लोगों के पांव में ही चप्पलें दिखती हैं.

एक बूढ़े व्यक्ति से मैंने पूछा कि नंगे पांव क्यों चल रहे हैं तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "ग़रीब आदमी और कैसे चलेगा."

दशरथ माँझी द्वार

लोगों ने बताया कि इस टोले में लगभग 80 घर हैं हालांकि उस हिसाब से लोग दिखाई नहीं दे रहे थे.

गाँव के निवासी राजेंद्र इसकी वजह बताते हैं, "हम महादलित लोग हैं, चार महीने इस गांव में रहते हैं, फिर दूसरी जगह कहीं ईंट-भट्टे पर काम करने चले जाते हैं."

"बहुत से लोग तो दूसरे राज्यों में पलायन कर गए. कुछ लोग आठ-आठ महीने दूसरे शहर काम पर चले जाते हैं. यहां काम नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे. सरकार थोड़ा ध्यान देती तो हम भी बच्चों को शिक्षा के रास्ते ले जाते."

बिहार के गया का सुंदरपुर टोला

सीबा बताते हैं, "हम यादवों के यहां फ़सल काटते हैं, कोई बोझा ढो लेता है. किसी से बोझा ढोया नहीं जाता तो ईंट-भट्टे पर मज़दूरी कर लेता है. बस किसी तरह बच्चों को पाल रहे हैं."

टोले में बिजली तो नहीं ही है लेकिन यहां इससे भी बड़ी समस्या है पानी की.

टोले की सुनैना बताती हैं कि यहां दो नल लगे हैं और वे भी दूसरी पंचायत के किसी नेता के हाथ-पैर जोड़ कर उन्हें मिल पाए.

वो कहती हैं "गर्मियों में तो पास के गांवों से पानी लाना पड़ता है. वहां कुएं से पानी खींचते हैं. पानी भी 50 फुट नीचे मिलता है."

सीबा कहते हैं, "हम तो यहां कोई मवेशी भी नहीं पालते क्योंकि खुद के लिए पानी नहीं है तो जानवर को क्या पिलाएंगे."

लेकिन इन लोगों की शिकायत अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंची?

टोले के एक और निवासी राजेंद्र कहते हैं, "हम लोग अनपढ़ हैं, हम डीएम या कोर्ट तक नहीं पहुंच पाते. हम लोग ज़्यादा से ज़्यादा मुखिया को कहते हैं, वो एक कान से सुनते हैं और दूसरे से निकाल देते हैं लेकिन कुछ होता नहीं है."

सुंदरपुर टोले की एक निवासी

खुद ही कर रहे विकल्प की तलाश

यहां किसी घर में कोई टीवी या स्मार्टफ़ोन नहीं था इसलिए बाहर की दुनिया और चुनावी घटनाओं से लोग अनजान ही थे. जहां सरकारें डिजिटल कक्षाएं लगवा रहीं हैं, डिजिटल चुनाव करवा रही है, वहां बिजली के बिना जीवन के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है.

लेकिन यहां बिजली के लिए लोगों ने दूसरे विकल्प खोज लिए हैं. कुछ लोगों के पास छोटी-छोटी सोलर प्लेटें हैं उनसे ही वो अपने साधारण मोबाइल फ़ोन चार्ज कर लेते हैं. एक-दो घरों में छोटे सोलर लैंप भी दिखे.

एक लड़के ने बताया कि ये सोलर प्लेट डेढ़-दो हज़ार तक बाज़ार में मिल जाती हैं. हालांकि ये सोलर प्लेट खरीदने लायक पैसे भी सभी के पास नहीं हैं.

बिहार के गया का सुंदरपुर टोला

ज़मीन पर दिखती सरकारी दावों की हकीक़त

इस एक छोटे से टोले में ऐसा भी देखने को मिला कि योजनाओं का लाभ सबको एक समान नहीं मिला. किसी ने कहा कि उन्हें कोरोना काल में तीन बार सरकार से पांच सौ रुपये मिले और कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्हें एक बार भी पैसा नहीं मिला.

वहीं कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें बीते महीनों में सरकारी राशन मिला है जबकि कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें बिल्कुल राशन नहीं मिला है.

लालमणी देवी अपने संदूक से पॉलिथीन में लिपटे अपने बैंक पासबुक और उज्जवला योजना के कागज़ात दिखाती हैं.

उनके और उनके पति के पासबुक में 2016 तक मनरेगा के तहत आए पैसों की एंट्री है लेकिन इसके अलावा और कोई एंट्री नहीं है.

उनके पास उज्जवला कार्ड भी है लेकिन उसमें भी कोई एंट्री नहीं है. वो पास में रखा खाली सिलेंडर दिखाती हैं और कहती हैं, "वो लोग पहले 700 रुपया जमा करने को बोलता है इसलिए नहीं भरवाया."

लालमणी देवी
इमेज कैप्शन, लालमणी देवी

कुछ लोगों को पक्का मकान बनाने के लिए सरकार से 25 हज़ार रुपये मिले थे. हालांकि ज़्यादातर घर कच्चे थे या पक्के होने के बावजूद भी ठीक से नहीं बन पाए थे.

सुनैना देवी बताती हैं कि यहां पर लड़कों की शादी होना भी मुश्किल हो गया है.

वो कहती हैं, "यहां दो-तीन बारी परिवार आए देखने के लिए लेकिन देखा कि यहां तो कुछ नहीं है, इसलिए शादी की बात आगे बढ़ी ही नहीं. यहां कोई अपनी बेटी की शादी क्यों करेगा? आप खुद देख लीजिए यहां एक शौचालय तक नहीं है."

उनकी बात सही थी क्योंकि वहां जितने भी घर थे उनमें कोई शौचालय नहीं था. जबकि बिहार को भी 'खुले में शौच मुक्त' घोषित किया जा चुका है.

सुंदरपुर टोले के एक निवासी

इस एक छोटे से टोले से ही पता चलता है कि सरकारी योजनाओं तक पहुंच अब भी हर ग़रीब के पास नहीं है.

इस मामले पर बीबीसी ने सबसे पहले गांव के मुखिया से बात करनी चाही. उन्होंने हमें फ़ोन पर मिलने के लिए बुलाया लेकिन उसके बाद उनका फ़ोन बंद हो गया. हम डेढ़ घंटा सफर करके ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) के पास गया पहुंचे तो उन्होंने कहा कि उन्हें मीडिया से बात करने की इजाज़त नहीं है.

बीडीओ साहब ने उस इलाक़े के बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर का नंबर दिया.

जूनियर इंजीनियर ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया, "दो-तीन महीने पहले तार कट गई थी, इसलिए बिजली नहीं है लेकिन हम कल ही वहां तार लगा देंगे और बिजली आ जाएगी."

सुंदरपुर टोला

सौभाग्य योजना के तहत अगर कोई राज्य केंद्र सरकार की दी हुई टाइमलाइन तक हर ग़रीब के घर बिजली पहुंचा देता है तो उसे 100 करोड़ का अनुदान मिलता है. बिजली विभाग को भी 50 लाख की प्रोत्साहन राशि मिलती है.

बिहार सरकार को तो ये अनुदान मिला लेकिन एक महादलित दशरथ माँझी का बनाया रास्ता सुंदरपुर के महादलितों को मूल सुविधाओं से अब तक नहीं जोड़ पाया है.

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