भारत ने ऐसा क्या किया कि रूस-चीन भी ख़ुश और पश्चिम भी ख़ुश

मोदी और लावरोफ़

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत की अध्यक्षता में जी-20 शिखर सम्मेलन ख़त्म होने के बाद रविवार की शाम भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी.

इस तस्वीर में पीएम मोदी और लावरोफ़ एक दूसरे का हाथ पकड़े खुलकर हँस रहे हैं. कई लोग कह रहे कि यह तस्वीर सब कुछ बयां कर रही है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ एसएल कांतन ने इस तस्वीर को ट्वीट करते हुए लिखा है, ''मानो दोनों एक दूसरे से कह रहे हैं- हमने रूसी आक्रामकता के साथ निंदा जैसे शब्दों को जी-20 के प्रस्ताव से दफ़ा कर दिया. बल्कि अब ज़्यादा अच्छा हो गया- 'यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध' के बदले 'यूक्रेन में युद्ध'.

एसएल कांतन कह रहे हैं कि भारत की अध्यक्षता में नौ और 10 सितंबर को हुए जी-20 समिट में जिस साझा प्रस्ताव को पास किया गया, वह पुतिन के लिए बड़ी जीत है और आधी नींद में रहने वाले बाइडन के लिए बड़ी हार.

दिल्ली समिट में जो साझा प्रस्ताव पारित किया गया है, उसमें 'यूक्रेन में युद्ध' लिखा गया है जबकि पश्चिमी देशों की मांग थी कि 'यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध' लिखा जाए.

दिल्ली घोषणापत्र से ख़ुश रूस

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पीएम मोदी और लावरोफ़ की इस तस्वीर पर अलग-अलग टिप्पणियाँ आ रही हैं, लेकिन सबका यह मानना है कि पुतिन इस समिट में नहीं आकर भी अपने मन का प्रस्ताव पास कराने में कामयाब रहे हैं.

दिल्ली समिट के समापन के बाद रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोफ़ रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने आए, तो वे काफ़ी ख़ुश दिख रहे थे.

लावरोफ़ ने दिल्ली समिट के साझा बयान की तारीफ़ करते हुए कहा कि यह ग्लोबल साउथ को एकजुट करने वाला है और इससे जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रेरित करता है.

लावरोफ़ ने कहा, ''जब सहमति बनी, तो ऐसा लगा कि यह उनकी अंतरात्मा की आवाज़ है. सच हूँ तो मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी. हम इस बात के लिए पूरी तरह से तैयार थे कि बयान में अपने पक्ष का बचाव करना है. लेकिन दिल्ली समिट में जो बयान जारी हुआ, वो ईमानदार और निष्पक्ष था.''

रूसी विदेश मंत्री ने कहा, ''दिल्ली समिट का साझा बयान जागृत करने वाला है. यह बताता है कि जेलेंस्की के फ़ॉर्मूले से ग्लोबल साउथ को रूस के ख़िलाफ़ भाषण नहीं दिया जा सकता है. हम दिल्ली समिट के पूरे बयान को रूस और यूक्रेन से जुड़े पैरा में नहीं देख सकते. इसका अहम हिस्सा ग्लोबल साउथ की चिंताओं और भविष्य पर है.’’

रूसी विदेश मंत्री ने भारत का आभार जताते हुए कहा, ''भारत ने जी-20 समिट को राजनीतिकरण से बचा लिया. हमने पश्चिम की उस कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसके तहत वे इस मंच का यूक्रेनीकरण करना चाहते थे.’’

भारत की उपलब्धि

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समाप्त

पिछले साल नवंबर महीने में भारत को जी-20 की अध्यक्षता इंडोनेशिया से मिली थी.

भारत ने अपनी अध्यक्षता में नौ और 10 सितंबर को हुए जी-20 के शिखर सम्मेलन से पहले मंत्री स्तर की कुल 11 बैठकें की थीं.

इन सभी मंत्री स्तरीय बैठक में सहमति से कोई भी साझा बयान जारी नहीं हो पाया था.

ऐसे में डर था कि शिखर सम्मेलन के बाद भी शायद ही कोई साझा बयान जारी हो.

ऐसी आशंका अमेरिका भी जता चुका था कि चीन और रूस साझा बयान पास नहीं होने देंगे.

जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जी-20 में भारत नहीं आने का फ़ैसला किया तब यह डर और बढ़ गया था. रूसी राष्ट्रपति पुतिन पहले ही नहीं आने का फ़ैसला कर चुके थे. हालाँकि पुतिन इंडोनेशिया के बाली समिट में भी नहीं गए थे.

अगर भारत अपनी अध्यक्षता में सहमति से कोई साझा बयान जारी नहीं कर पाता, तो यह कूटनीति के लिहाज़ से असहज करने वाली स्थिति होती.

जी-20 के इतिहास में अब तक ऐसा कोई समिट नहीं हुआ है, जिसमें साझा बयान पारित न हुआ हो.

बाली समिट में जो साझा बयान पास हुआ था, उसकी भाषा और विषय पर चीन और रूस आख़िरकार सहमत हो गए थे लेकिन दिल्ली समिट आते-आते उनका रुख़ बिल्कुल बदल चुका था.

बाली बनाम दिल्ली

मोदी

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इसी का नतीजा था कि भारत में जी-20 से जुड़ी जितनी मंत्री स्तरीय बैठक हुई, उनमें सहमति नहीं बनी. ऐसे में भारत के लिए बड़ी चुनौती थी.

शनिवार को जब जी-20 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने घोषणा की कि साझा बयान पर सहमति बन गई है तो यह सबके लिए हैरान करने वाला था.

लेकिन दिल्ली समिट में जो अंतिम बयान जारी हुआ, उसमें यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया है, उससे साफ़ हो गया कि सहमति क्यों बनी.

बाली में जो साझा बयान जारी हुआ था, उसमें यूक्रेन युद्ध से जुड़े पैरा में रूसी आक्रामकता लिखा गया था और रूस की निंदा भी थी. इसके अलावा दिल्ली के बयान में ‘यूक्रेन में युद्ध’ लिखा गया है न कि यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध.

ज़ाहिर है कि जी-20 देश यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा नहीं कर पाए और बाली डिक्लेरेशन से दिल्ली डिक्लेरेशन की भाषा यूक्रेन में रूसी हमले को लेकर बिल्कुल बदल गई.

दिल्ली डिक्लेरेशन में तो यूक्रेन में जारी जंग को लेकर रूस का नाम तक नहीं लिया गया है.

दिल्ली समिट में जारी हुए बयान पर यूक्रेन युद्ध से जुड़ी भाषा पर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘’यह सच है कि आज की तारीख़ में यूक्रेन बहुत ही ध्रुवीकरण वाला मुद्दा है. इस पर सबके अलग-अलग विचार हैं. सबके विविध विचार हैं, ऐसे में मुझे लगता है कि मीटिंग रूम की हक़ीक़त को दर्ज कर लेना ही सबसे सही तरीक़ा है.’’

जयशंकर से बाली डिक्लेरेशन में रूस की निंदा और उसकी आक्रामकता दर्ज होने और दिल्ली डिक्लेरेशन में नहीं होने पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''बाली बाली है और दिल्ली दिल्ली है. एक साल में चीज़ें बहुत बदल गई हैं. हम किसी से किसी की तुलना नहीं कर सकते.

क्या कह रहा है पश्चिम

यूएई

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वहीं यूक्रेन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "रूसी आक्रामकता को लेकर जी-20 ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिसकी सराहना की जा सके."

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मध्य एशिया और रूसी अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय कुमार पांडे कहते हैं कि दिल्ली डिक्लेशन का पास होना भारत की डिप्लोमेसी की जीत है.

प्रोफ़ेसर पांडे कहते हैं, "रूस और चीन का जैसा रुख़ था, उससे तो यही लग रहा था कि दिल्ली समिट से कोई साझा बयान जारी नहीं हो पाएगा. लेकिन इस बार पश्चिम को झुकना पड़ा. अगर पश्चिम नहीं झुकता, तो रूस और चीन नहीं मानने वाले थे. ऐसे में दिल्ली समिट बिना किसी साझा बयान के ही ख़त्म हो जाता और यह भारत की डिप्लोमेसी के लिए किसी झटके से कम नहीं होता. बाली समिट और दिल्ली समिट में एक बड़ा फ़र्क़ यही है कि बाली में रूस और चीन को झुकना पड़ा था और दिल्ली में पश्चिम को झुकना पड़ा."

लेकिन सवाल उठता है कि पश्चिम झुकने के लिए तैयार कैसे हुआ? वो भी तब जब यूक्रेन जंग में अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिम खुलकर रूस के ख़िलाफ़ है.

शनिवार को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से पूछा गया कि क्या इंडोनेशिया, भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका के साथ होने के कारण दिल्ली डिक्लेरेशन पर सहमति बनी?

इसके जवाब में एस जयशंकर ने कहा, "आख़िरकार सबने मदद की लेकिन उभरते बाज़ार वाले देशों ने इस मामले में अगुआई की. हमलोग के साथ काम करने का मज़बूत इतिहास रहा है."

जयशंकर शायद गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल देशों का हवाला दे रहे थे कि साथ काम करने का इतिहास रहा है.

उभरते मार्केट वाले देशों का संदर्भ भी जी-20 में शामिल दक्षिण अफ़्रीका, इंडोनेशिया और ब्राज़ील से है.

प्रोफ़ेसर संजय कुमार पांडे कहते हैं, "दिल्ली समिट में जो साझा बयान जारी हुआ, उससे न रूस और चीन को दिक़्क़त है और न ही पश्चिम को. दोनों पक्ष ख़ुश हैं. ये भारत की सफलता है. इसे ही कहते हैं, साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे. यानी जिस विषय और भाषा पर विवाद था, उसे ख़त्म भी कर दिया गया और दोनों में से कोई पक्ष नाराज़ भी नहीं हुआ."

भारत की जीत?

जी-20

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सिंगापुर के राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असोसिएट रिसर्च फेलो नाज़िया हुसैन ने समाचार एजेंसी एपी से कहा कि दिल्ली समिट के बयान से साफ़ है कि यूक्रेन में युद्ध को लेकर रवैया नरम हुआ है.

नाज़िया कहती हैं, ''हालाँकि दिल्ली समिट के साझा बयान में यूक्रेन कई संदर्भों में आया है या फिर ये कह सकते हैं कि यूक्रेन में जारी जंग को लेकर अमेरिका अपने पश्चिमी सहयोगियों के साथ और रूस के साथ झुकने के तैयार नहीं थे, ऐसे में दिल्ली डिक्लेरेशन सहमति से पास होना एक जीत से कम नहीं है.’’

दिल्ली डिक्लेरेशन से केवल रूस ही नहीं बल्कि पश्चिम के देश भी ख़ुश हैं. जर्मन चांसलर ओलाफ़ शोल्त्स ने दिल्ली समिट में साझा बयान जारी होने को भारत की कूटनीतिक कामयाबी कहा है.

जर्मन चांसलर ने पत्रकारों से कहा, "यह अहम है कि रूस ने आख़िर में अपनी ज़िद छोड़ दी और साझा बयान हस्ताक्षर किया, जिसमें यूक्रेन की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा की बात है.''

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने भी दिल्ली डिक्लेरेशन की तारीफ़ करते हुए कहा कि रूस को कड़ा संदेश दिया गया है.

समाचार एजेंसी एपी से यूरोपियन यूनियन के एक अधिकारी ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर कहा कि ईयू ने यूक्रेन मामले में अपने रुख़ से कोई समझौता नहीं किया, लेकिन रूस का दिल्ली डिक्लेरेशन पर हस्ताक्षर करना अहम है.

इस अधिकारी ने बताया- हमारे पास दो ही विकल्प थे- या तो घोषणापत्र आता या नहीं. मुझे लगता है कि घोषणापत्र पर सहमति बनना ज़्यादा अच्छा है. कम से कम अगर वे इस पर अमल नहीं करते तो हमें पता रहेगा कि हम उन पर भरोसा नहीं कर सकते.

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन ने भी दिल्ली समिट के साझा बयान की तारीफ़ की है.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, "हमारे हिसाब से यह पर्याप्त है. सिद्धांततः बल का इस्तेमाल कर किसी देश की राजनीतिक स्वतंत्रता, संप्रभुता और उसकी अखंडता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है. और यह बात दिल्ली समिट के साझा बयान में है."

पश्चिम क्यों झुका?

जी-20

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इसके बावजूद इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है कि रूस की निंदा के बिना पश्चिम के देश दिल्ली समिट के साझा बयान से सहमत क्यों हो गए?

अंग्रेज़ी अख़बार दे हिन्दू से यूरोपियन यूनियन के एक अधिकारी ने कहा, "अगर दिल्ली समिट में कोई साझा बयान जारी नहीं होता, तो हाल ही में दक्षिण अफ़्रीका में चीन के दबदबे वाले संगठन ब्रिक्स समिट से तुलना होने लगती. ब्रिक्स समिट में चीन और रूस की सहमति से यूक्रेन पर एक बयान पास हुआ था, जिसमें सदस्य देशों की अलग-अलग राय थी. फिर कहा जाने लगता कि जी-20 से अच्छा ब्रिक्स ही है. ऐसे में जी-20 को ज़िंदा रखने के लिए साझा बयान ज़रूरी था."

खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं, "बाली से दिल्ली तक में न केवल रूस और चीन का रुख़ बदला है, बल्कि पश्चिम का तेवर ज़्यादा नरम पड़ा है. अगर पश्चिम नहीं मानता तो भारत शायद ही साझा बयान जारी कर पाता. पश्चिम को पिछले एक साल में अहसास हो गया है कि यूक्रेन पर उसे ग्लोबल साउथ का समर्थन नहीं मिल रहा है. ऐसे में उसकी ज़िद बहुत काम नहीं आती. अब तो पश्चिम में भी यूक्रेन को लेकर लोकप्रिय समर्थन कम हो रहा है."

तलमीज़ अहमद कहते हैं, "दूसरी अहम बात यह है कि भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के मामले में किसी के सामने घुटने नहीं टेके. भारत एक संदेश देने में सफल रहा है कि वह अपने हितों के हिसाब से काम करेगा और किसी का पिछलग्गू नहीं बनेगा. असल में दिल्ली समिट में जारी हुआ साझा बयान ग्लोबल साउथ के लिए घोषणापत्र है. भारत को आने वाले दिनों में इस पर आगे बढ़ाना चाहिए. मैं दिल्ली डिक्लेरेशन को किसी की हार और जीत के रूप में नहीं देख रहा हूँ लेकिन पश्चिम को सच्चाई पता चलने लगी है."

मोदी का बढ़ा क़द?

अर्दोआन

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दिल्ली समिट में ही 55 अफ़्रीकी देशों के संगठन अफ़्रीकन यूनियन को जी-20 में जगह मिली.

ज़ाहिर है, इसका श्रेय भी भारत को मिलेगा. भारत के बाद जी-20 की अध्यक्षता ब्राज़ील के पास गई है और ब्राज़ील के बाद दक्षिण अफ़्रीका को मिलेगी.

दोनों देश ग्लोबल साउथ के ही हैं और गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल रहे हैं.

ऐसे में दिल्ली समिट के डिक्लेरेशन में जिस तरह से ग्लोबल साउथ को प्राथमिकता दी गई, उसे देखते हुए ब्राज़ील और दक्षिण अफ़्रीका भी इसे अपना सकते हैं. दिल्ली डिक्लेरेशन में रूस और यूक्रेन के बीच ब्लैक सी ग्नेन डील का भी ज़िक्र किया गया है.

अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि दिल्ली समिट में साझा बयान पर सभी सदस्य देशों की सहमति भारत की डिप्लोमैटिक कामयाबी के दावे को मज़बूत करती है.

जी-20 में भारत के शेरपा अमिताभ कांत ने कहा कि यह पहला डिक्लेरेशन है, जिसमें सिंगल फुटनोट तक नहीं है.

वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा है, ''कुछ विशेषज्ञ इसे रूस की जीत बता रहे हैं तो कुछ पश्चिम की उपलब्धि मान रहे हैं. लेकिन यह मोदी की विदेश नीति की जीत है और विश्व मंच पर भारत का प्रभाव बढ़ा है.''

रैंड कॉर्पोरेशन में इंडो-पैसिफिक विश्लेषक डेरेक ग्रॉसमैन ने लिखा है, ''भारत ने ग्लोबल साउथ के मुद्दे को बहुत गंभीरता से शामिल किया है. चीन से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत ने इसे पलट कर रख दिया.''

जी-20 देशों में मल्टिलैटरल डिवेलपमेंट बैंकों से क़र्ज़ का दायरा बढ़ाने पर सहमति बनी है. ख़ास कर विश्व बैंक से मिलने वाली मदद की क्षमता और बढ़ाने की बात कही गई है.

इसे विकासशील देशों में चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव के काउंटर के रूप में देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि चीन से आर्थिक मदद लेने वाले ज़्यादातर देश क़र्ज़ के जाल में फँसते जा रहे हैं.

एशिया निक्केई ने लिखा है, ''अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और भारत चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बैंक इतने सक्षम हों कि विकासशील देशों को चीन की शरण में न जाना पड़े. हार्वर्ड बिज़नेस रिव्यू ने फ़रवरी 2020 में अनुमान लगाया था कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा क़र्ज़दाता है और उसने 150 से ज़्यादा देशों को 1.5 ट्रिलियन डॉलर का क़र्ज़ दिया है. इतना क़र्ज़ विश्व बैंक, आईएमएफ़ और दूसरे वित्तीय संस्थानों ने भी नहीं दिए हैं.''

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