नीतीश कुमार बनाम तेजस्वी यादव: विधानसभा विश्वास प्रस्ताव में किसने मारी असली बाज़ी?

नीतीश और तेजस्वी

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    • Author, नलिन वर्मा
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार विधानसभा में सोमवार को विश्वास प्रस्ताव के दौरान भाषण में साफ़ दिखा कि नीतीश कुमार पर तेजस्वी यादव भारी साबित हुए.

राजनीतिक कद में नीतीश कुमार के आगे तेजस्वी यादव अब उनसे लंबे नज़र आ रहे हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री ने विश्वास प्रस्ताव जीत लिया. ऐसा इसलिए वो आराम से कर पाए क्योंकि आरजेडी के तीन विधायकों ने पाला बदलते हुए बीजेपी का साथ दिया.

लेकिन उनके पूर्व उप-मुख्यमंत्री और अब विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने बीजेपी-आरएसएस विरोधी पार्टियों का दिल ज़रूर जीत लिया.

इसके साथ ही उन्होंने उनका दिल भी जीता जो संघ परिवार की ‘ताक़त’ के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही है.

तेजस्वी का भाषण और लालू प्रसाद यादव

तेजस्वी और लालू

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नीतीश कुमार 18 साल के अंदर नौवीं बार जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब वो थके हुए, उलझन में और परेशान नज़र आ रहे थे जबकि उनके ख़िलाफ़ तेजस्वी एक विजेता की तरह भाषण दे रहे थे.

सदन में गरजते हुए तेजस्वी ने कहा, “आप (नीतीश) हमारे साथ आए थे मोदी जी को हटाने के लिए. आपका ये भतीजा अब अकेले मोदी जी के ख़िलाफ़ झंडा उठाएगा और मोदी जी को बिहार में रोकेगा.”

तेजस्वी ने न केवल नीतीश की चमक फीकी की बल्कि ख़ुद को बिहार में इकलौते बीजेपी विरोधी के तौर पर ‘निर्णायक दावेदार’ के तौर पर स्थापित किया.

एक तरह से उन्होंने अपने पिता की अदम्य छवि को पेश किया. उनके पिता लालू प्रसाद यादव ने 90 के दशक में हिंदुत्व आइकन लालकृष्ण आडवाणी को राम रथयात्रा के दौरान गिरफ़्तार कर लिया था.

तेजस्वी की बीजेपी के सामने जंग की हुंकार उस समय गूंजी है जब अनुभवहीन विपक्षी गठबंधन इंडिया ध्वस्त हो रहा है.

इसकी शुरुआत इसके कथित ‘निर्माता’ नीतीश कुमार से हुई. इसके बाद उत्तर प्रदेश में आरएलडी नेता जयंत चौधरी, महाराष्ट्र में कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण बीजेपी के पाले में जा चुके हैं.

इसी दौरान तेजस्वी यादव को संघ परिवार के ख़िलाफ़ लगे संगठनों और लोगों की नज़र में उन्हें ‘हीरो’ बना दिया है.

तेजस्वी के सवाल

तेजस्वी

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तेजस्वी ने नीतीश के आगे कुछ ऐसे सवाल रखे जिनका जवाब शायद उनके पास नहीं था.

उन्होंने कहा, “साल 2017 में आपने हमें ये कहकर छोड़ दिया था कि प्रवर्तन निदेशालय ने मुझ पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है. लेकिन आप 2022 में हमारे साथ आ गए और कहा कि जांच एजेंसियां हमारे परिवार पर शिकंजा कस रही हैं क्योंकि आप महागठबंधन के पक्ष में आ गए हैं."

"आपने बार-बार यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी ने मीडिया पर कब्ज़ा कर लिया है जो आपकी बात नहीं छाप रही है. अब आप स्वयं 'कब्ज़े के पक्ष में' खड़े हैं. आप इस बारे में कैसे समझाएंगे?”

इसके अलावा तेजस्वी ने हिंदू पौराणिक कथाओं के किस्सों का भी ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, “आपने मुझे अपना बेटा बताया लेकिन आपने राजा दशरथ की तरह व्यवहार किया जिन्होंने अपने बेटे राम को कैकेई के दबाव में वनवास दिया था. आपने किसके दबाव में मुझे वनवास दिया ? ”

तेजस्वी यादव ने कहा, “आपने हम पर आरोप लगाया कि हम चार लाख नौकरियों का श्रेय ले रहे हैं. यह मैं था जिसने 2020 के विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि 10 लाख नौकरियां देंगे और आपने इसकी हंसी उड़ाते हुए कहा था कि- ‘पैसा कहां से लाएंगे, अपने बाप के यहां से लाएंगे, जेल से लाएंगे.’ जब आप महागठबंधन में शामिल हुए तो हमने आपकी इच्छा न होते हुए भी आपको हमारा वादा पूरा करने के लिए राज़ी कराया.”

“अब आप चार लाख नौकरियां देने का श्रेय लेने के लिए हमें कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, जो कि राज्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व उपलब्धि है. मुझे गर्व है कि महागठबंधन सरकार ने इतने बड़े पैमाने पर नौकरियां दीं. हमें हमारे किए गए काम का श्रेय क्यों नहीं लेना चाहिए? अब आप बीजेपी के पाले में चले गए हैं तो जो काम आपकी सरकार करेगी उसका बीजेपी श्रेय नहीं लेगी क्या.”

नीतीश का जवाब

नीतीश

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हालांकि नीतीश की जब जवाब देने की बारी आई तो उन्होंने तेजस्वी के सवालों के जवाब देने की जगह उनके परिजनों (लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी) के कार्यकाल की याद दिलाई.

नीतीश कुमार ने कहा, “अंधेरा होने के बाद कोई घर से नहीं निकलता था. 2005 के पहले क्या था? सड़क और बिजली का नामों निशान नहीं था. हम लोगों ने सब क्षेत्रों में और सब वर्गों के लिए काम किया और राज्य का विकास किया.”

लेकिन नीतीश कुमार इस दावे को लेकर सरासर ग़लत थे कि लालू-राबड़ी के कार्यकाल में बिहार में हिंदू-मुस्लिम दंगे आम थे और साल 2005 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने दंगों के मामलों को दोबारा खोला और अल्पसंख्यकों के लिए न्याय सुनिश्चित किया.

लालू-राबड़ी कार्यकाल की कुछ कमियां हो सकती हैं लेकिन उस समय सांप्रदायिक दंगे बहुत कम हुए थे.

असल में लालू 1990 में उस समय सत्ता में आए जब उससे पहले 1989 में भागलपुर में सबसे भयानक दंगे हुए थे. उन्होंने सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ कड़ा प्रहार किया और राज्य में अमन और एकता क़ायम की. 1990 के दशक में सीतामढ़ी का दंगा इस बीच एक अपवद है.

लालू ने तेज़ी से सीतामढ़ी का दौरा किया और लोगों के बीच एक सप्ताह तक वहां डेरा डाले रहे. उन्होंने समुदायों के बीच शांति बनाई और बड़े पैमाने पर राहत कार्य चलाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने दंगा प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया और सांप्रदायिक नफ़रत की आग को बुझाने के लिए लालू की तारीफ़ की.

इसमें कोई शक नहीं है कि नीतीश कुमार ने बिहार के अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए कई क़दम उठाए हैं.

क़ब्रिस्तानों की चारदीवारी हो या फिर मदरसे के अध्यापकों को नियमित करना हो या फिर भागलपुर के दंगा पीड़ितों को पेंशन देनी हो, ये सब नीतीश ने किया.

हालांकि वो बिलकुल अलग युग था जब लिबरल अटल बिहारी वाजपेयी के रास्ते पर बीजेपी चल रही थी.

नीतीश के वोट बैंक में सेंध लगाती बीजेपी

विधानसभा

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हालांकि देश ने हाल ही में दिल्ली के महरौली इलाक़े में 600 साल पुरानी मस्जिद को ढहाए जाते भी देखा है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बस्तियों को गिराते, उत्तराखंड में दंगे और कई बीजेपी के मंत्रियों और नेताओं का ज्ञानवापी मस्जिद और दूसरी धार्मिक जगहों पर भड़काया जाना भी देखा गया है. इसके साथ ही देश के कई राज्यों में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ मुहिम देखी गई है.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में जेडीयू को सिर्फ़ 45 सीटों पर जीत मिली थी और वो तीसरे पायदान पर रही थी.

साल 2022 में नीतीश कुमार बीजेपी पर ‘जेडीयू को तोड़ने की कोशिशों’ का आरोप लगाकर महागठबंधन में शामिल हो गए थे.

लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वो वापस बीजेपी के पास जाकर एक बड़े जाल में फंस गए हैं. बीजेपी ने धर्मशीला गुप्ता और भीम सिंह को राज्य सभा के लिए नामित किया है.

ये दोनों अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) से आते हैं जिनके ज़रिए बीजेपी उस ईबीसी के वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है जिसे नीतीश का वोट बैंक माना जाता है. इससे पहले ईबीसी वोटों के लिए बीजेपी नीतीश पर निर्भर थी.

ऐसा लगता है कि सोमवार को जब वह विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पर जवाब देने के लिए खड़े हुए थे तो शायद उनके चारों ओर बिछाए गए बीजेपी के जाल ने उनकी तीव्रता, स्पष्टता और नैतिक शक्ति को छीन लिया था.

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