कुवैत जा रहे हैं पीएम मोदी, भारत के अरब देशों से मज़बूत होते रिश्तों की ये हैं सात बड़ी वजहें

नरेंद्र मोदी पिछले 43 सालों में कुवैत का दौरा करने वाले पहले भारतीय पीएम होंगे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, नरेंद्र मोदी पिछले 43 सालों में कुवैत का दौरा करने वाले पहले भारतीय पीएम होंगे
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 दिसंबर से दो दिनों के लिए मध्य पूर्व के तेल समृद्ध देश कुवैत की यात्रा पर जा रहे हैं.

1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद ये किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला कुवैत दौरा होगा. यानी 43 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री कुवैत पहुंच रहे हैं.

इससे पहले साल 2009 में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कुवैत का दौरा किया था, जो किसी भारतीय राजनेता का इंदिरा गांधी के दौरे के बाद से सबसे अहम कुवैत दौरा था.

प्रधानमंत्री के दौरे से पहले दोनों देशों के विदेश मंत्री एक-दूसरे देश की यात्राएं करके पीएम मोदी के इस अहम दौरे के लिए मंच तैयार कर चुके हैं.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भले ही भारत और कुवैत के राष्ट्राध्यक्षों के दौरे सीमित रहे हैं लेकिन दोनों देशों के बीच मज़बूत कारोबारी और सांस्कृतिक रिश्ते रहे हैं.

कुवैत में तेल मिलने से पहले ही भारत और कुवैत के बीच समुद्री रास्ते से कारोबार होता था.

ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के बीच रिश्ते दोस्ताना रहे हैं. 1961 तक कुवैत में भारत का रुपया चलता था.

भारत और कुवैत के बीच साल 1961 में राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे. शुरुआत में भारत ने कुवैत में ट्रेड कमिश्नर नियुक्त किया था.

भारत और कुवैत के बीच राजनेताओं के उच्च स्तरीय दौरे होते रहे हैं. 1965 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन ने कुवैत का दौरा किया था.

कुवैत के शीर्ष नेता भी भारत आते रहे हैं. साल 2013 में कुवैत के प्रधानमंत्री शेख जाबिर अल मुबारक अल हमाद अल सबाह ने भारत का दौरा किया था.

इससे पहले साल 2006 में कुवैत के तत्कालीन अमीर शेख सबाह अल अहमद अल जाबेर अल सबाह भारत आए थे.

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अगस्त 2024 में कुवैत का दौरा किया जबकि कुवैत के विदेश मंत्री अब्दुल्लाह अली अल याह्या 3-4 दिसंबर को भारत आए.

इस यात्रा के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुवैत आने का न्यौता दिया.

दोनों देशों के बीच कारोबार को बढ़ावा देने के लिए इसी महीने कुवैती विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान साझा सहयोग कमीशन (जेसीसी) भी स्थापित किया गया.

भारत और मध्य पूर्व के देशों के रिश्ते ऊर्जा सुरक्षा, सहयोग और कारोबार पर आधारित हैं. नीचे वे सात बड़े कारण बताए जा रहे हैं, जिनसे अरब मुल्क भारत के लिए अहम बन गए हैं.

1. व्यावहारिक विदेश नीति

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (साल 2019)

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. तस्वीर साल 2019 की है
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद से ही वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान बढ़ाने की कोशिश की है. उन्होंने मध्यपूर्व पर ख़ास ज़ोर दिया है.

कुवैत की ये यात्रा नरेंद्र मोदी का अरब देशों में चौदहवां दौरा होगा.

मोदी सात बार संयुक्त अरब अमीरात, दो-दो बार क़तर और सऊदी अरब और एक-एक बार ओमान और बहरीन जा चुके हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में भारत मध्य पूर्व के साथ रिश्ते मज़बूत कर रहा है.

भारतीय विदेश नीति में मध्य पूर्व के अरब देश सबसे अहम रणनीतिक और कूटनीतिक प्राथमिकता के रूप में उभर रहे हैं.

इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अपने दस साल के कार्यकाल में मनमोहन सिंह सिर्फ तीन बार मध्य पूर्व के अरब देशों के दौरों पर गए थे.

वो एक-एक बार क़तर, ओमान और सऊदी अरब गए थे. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुवैत के दौरे के साथ ही लगभग सभी अहम अरब देशों के दौरे कर लेंगे.

अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार प्रोफेसर स्वस्ति राव कहती हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान बढ़ाने के लिए कई क़दम उठाए हैं. मध्य पूर्व पर ख़ास ध्यान देने की अहम वजह कारोबारी रिश्ते हैं. मोदी ने सिर्फ़ पड़ोसी देशों से ही नहीं बल्कि दूर के पड़ोसियों की तरफ़ भी हाथ बढ़ाया है."

वहीं इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स से जुड़े सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "मोदी ने एक नई ऊर्जा के साथ मध्य पूर्व के देशों के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाया है. प्रधानमंत्री मोदी खुद को अपने से पहले के भारतीय नेताओं से अलग भी साबित करना चाहते हैं. वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप के हिसाब से उन्होंने भारतीय विदेश नीति को बदला है."

2. मध्य पूर्व में प्रवासी भारतीयों की बड़ी आबादी

प्रवासी भारतीय

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, कुवैत में रहने वाले भारतीय सालाना क़रीब 4.7 अरब डॉलर भारत भेजते हैं

भारत के मध्य पूर्व के साथ रिश्ते मज़बूत करने के पीछे एक बड़ा कारण इस क्षेत्र के देशों में रह रही बड़ी भारतीय आबादी भी है.

कुवैत में क़रीब दस लाख भारतीय रहते हैं, जबकि संयुक्त अरब अमीरात में क़रीब पैंतीस लाख और सऊदी अरब में क़रीब छब्बीस लाख भारतीय हैं.

मध्य पूर्व में रहने वाले भारतीय बड़ी राशि भारत भेजते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आबादी को अपने साथ जोड़ने के प्रयास किए हैं.

कुवैत में रहने वाले भारतीय सालाना क़रीब 4.7 अरब डॉलर भारत भेजते हैं. विदेश में रहने वाले भारतीय जो पैसे भारत भेजते हैं, ये राशि उसका 6.7 फ़ीसदी है.

प्रोफ़ेसर राव कहती हैं, "इसमें कोई शक़ नहीं है कि मोदी ने विदेश में रहने वाले भारतीयों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है और प्रवासी भारतीयों में मोदी के प्रति एक क्रेज़ भी बढ़ रहा है. इसका भारत की घरेलू राजनीति पर भले ही कोई ख़ास असर ना हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासी भारतीयों को अपने साथ जोड़ने के प्रयास किए हैं."

प्रोफ़ेसर फ़ज्ज़ुर्रहमान भी कहते हैं कि मध्य पूर्व में रहने वाली भारतीय आबादी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है.

प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात को समझा है कि मध्य पूर्व में रहने वाली बड़ी भारतीय आबादी भारत के लिए आय का एक बड़ा स्रोत है. मध्य पूर्व के साथ रिश्ते मज़बूत कर उन्होंने इस प्रवासी भारतीय आबादी में भरोसा मज़बूत किया है."

3. भारत की ईंधन ज़रूरतें

भारत की ईंधन जरूरतें

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, भारत ईंधन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है

भारत अपनी ईंधन ज़रूरतें पूरी करने के लिए अरब देशों पर निर्भर है. भारत ने अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को सुरक्षित करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत और क़तर के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत किया है.

कुवैत ही भारत की क़रीब तीन प्रतिशत तेल ज़रूरत को पूरा करता है. भारत ने भले ही रूस से अधिक तेल ख़रीदा हो लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि भारत मध्य पूर्व पर निर्भर रहेगा.

प्रोफ़ेसर फज्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "मध्य पूर्व के साथ रिश्तों को और मज़बूत करने का एक अहम कारण ये है कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करने के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है."

वहीं प्रोफ़ेसर राव कहती हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्य पूर्व के शासकों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी रिश्ते मज़बूत कर रहे हैं इसका एक कारण ये भी है कि भारत तेल ज़रूरतों के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है."

दोनों देशों ने द्विपक्षीय रिश्ते और कारोबारी संबंध मज़बूत करने के लिए 26 समझौते और सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं.

2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत और कुवैत के बीच सालाना क़रीब 10.47 डॉलर का कारोबार हुआ.

हालांकि, इस कारोबार का अधिकतर हिस्सा कुवैत से भारत आने वाला तेल और अन्य ईंधन उत्पाद हैं.

भारत ने क़रीब दो अरब डॉलर का निर्यात कुवैत को किया. कुवैत, भारत का छठा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है और भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का तीन प्रतिशत कुवैत से मिले तेल से पूरा करता है.

यहीं नहीं कुवैत ने भारत में क़रीब दस अरब डॉलर का निवेश भी किया है.

4. अरब देशों की आर्थिक ताक़त

अरब देशों की मुद्रा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, कुवैत, क़तर, यूएई और सऊदी अरब जैसे अरब देशों की आबादी भले कम है लेकिन आर्थिक मोर्चे पर ये ताक़तवर माने जाते हैं

कुवैत, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और बहरीन आर्थिक रूप से ताक़तवर देश हैं. भले ही इन देशों की आबादी कम है लेकिन वैश्विक स्तर पर इनकी अलग आर्थिक ताक़त है.

प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "बदलते वैश्विक परिवेश में भारत अलग आवाज़ बनने का प्रयास कर रहा है. भारत ऐसे सहयोगी चाहता है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी मज़बूत हैं और ज़रूरत पड़ने पर भारत के साथ आवाज़ मिला सकें. भारत के मध्य पूर्व के देशों से रिश्तों को बढ़ावा देने के पीछे एक व्यावहारिक कारण इन देशों की आर्थिक ताक़त भी है."

प्रोफ़ेसर राव कहती हैं, "मध्य पूर्व भारत का दूर का पड़ोसी है. भारत मध्य पूर्व में बहु-संरेखण नीति पर चल रहा है यानी एक साथ कई देशों के साथ संबंध मज़बूत कर रहा है."

"भारत की मध्य पूर्व को लेकर एक संतुलित नीति है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले कोई भारतीय प्रधानमंत्री संयुक्त अरब अमीरात नहीं गया था. आज भारत का यूएई के साथ कारोबारी समझौता है. यूएई आज भारत का एक मज़बूत सहयोगी है."

"प्रधानमंत्री दो बार सऊदी अरब गए, जी-20 में अरब देशों के नेताओं को बुलाया. ये दर्शाता है कि भारत ने मध्य पूर्व के महत्व को समझा है और वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बढ़ाने के लिए भारत मध्य पूर्व को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है."

5. इसराइल और अरब देशों के रिश्तों में आती नरमी

येरुशलम

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, हाल के सालों में इसराइल और कुछ अरब देशों के बीच रिश्ते सामान्य हुए हैं

ग़ज़ा युद्ध से पहले और अमेरिका में ट्रंप के शासनकाल के दौरान अरब देशों के इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने के प्रयास हुए. यूएई और बहरीन ने इसराइल के साथ संबंध स्थापित किए. सऊदी अरब और इसराइल के राजयनिक संबंध बहाल कराने की पहल हुई.

इसराइल भारत का अहम सहयोगी देश है, ख़ासकर रक्षा क्षेत्र में. भारत ने अरब देशों और इसराइल के बीच हो रहे सामान्यीकरण का फ़ायदा उठाया और इसराइल के साथ अपने संबंध मज़बूत करने के साथ-साथ अरब देशों की तरफ़ भी हाथ बढ़ाया.

प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "भारत ने एक संतुलित नीति अपनाई और इसराइल के साथ संबंधों को खुलकर आगे बढ़ाया. अब्राहम समझौतों का भी भारत को फ़ायदा पहुंचा."

वहीं प्रोफ़ेसर राव कहती हैं, "आज ग़ज़ा युद्ध की वजह से भारत-मध्यपूर्व-यूरोप कॉरिडोर पटरी से उतर गया है, लेकिन ये एक बेहद अहम समझौता है. भारत ने इसराइल को भी साथ लिया और मध्य पूर्व के अरब देशों के लिए भी हाथ बढ़ाया, जो दर्शाता है कि भारत व्यावहारिक विदेश नीति अपना रहा है."

6. सुरक्षा और सहयोग

भारत और सऊदी अरब

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, अरब देशों के साथ भारत ने सुरक्षा सहयोग हाल के सालों में बढ़ाया है

भारत हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा के नज़रिए और अरब देशों के साथ सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने के मक़सद से भी अरब देशों से व्यावहारिक संबंध बनाए हुए है.

प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "आज वैश्विक स्तर पर कई साझा चुनौतियां हैं जैसे पर्यावरण, आतंकवाद और सुरक्षा. भारत बहरीन, यूएई और अन्य अरब देशों के साथ सुरक्षा जानकारियों का आदान-प्रदान करता है."

वहीं प्रोफ़ेसर राव कहती हैं, "आतंकवाद एक साझा चुनौती है. भारत के एक तरफ़ जहां इसराइल के साथ संबंध हैं, वहीं अरब देशों के साथ भी अच्छे सुरक्षा संबंध हैं. ऐसा करने के भारत के अपने हित भी हैं."

7. वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान का कमज़ोर होना

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ

पिछले कुछ सालों में वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान कमज़ोर हुआ है और अब मध्य पूर्व और भारत के रिश्तों के बीच पाकिस्तान अड़चन नहीं है.

प्रोफ़ेसर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "भारत के मध्य पूर्व के देशों के और क़रीब आने का एक बड़ा कारण ये भी है कि अब भारत और मध्य पूर्व के रिश्तों के बीच पाकिस्तान नहीं है."

वहीं स्वस्ति राव का कहना है कि मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर में भारत एक बहुत बड़ा बाज़ार और सहयोगी है. इसलिए अरब देश पाकिस्तान की बजाय अपने हितों को तरजीह दे रहे हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)