असद की सत्ता जाने के बाद सीरिया में मौजूद रूस के सैन्य अड्डों का क्या होगा?

सीरिया में बशर अल-असद सरकार के पतन के पहले तक रूसी सेना सीरियाई सरकारी सेना की मदद कर रही थी.

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इमेज कैप्शन, सीरिया में बशर अल-असद सरकार के पतन के पहले तक रूसी सेना सीरियाई सरकारी सेना की मदद कर रही थी.
    • Author, पावेल आक्सेनोव
    • पदनाम, रक्षा मामलों के संवाददाता, बीबीसी रूसी सेवा

2011 में सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ने से काफी पहले से, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सीरिया के अपदस्थ राष्ट्रपति बशर अल-असद के विश्वस्त सहयोगी रहे हैं.

सीरियाई सरकार के ख़िलाफ़ आगे बढ़ रहे विद्रोहियों को रोकने के लिए सितंबर 2015 से ही रूस की एक बड़ी सैन्य टुकड़ी सीरिया में मौजूद है.

सीरिया में रूस के दो बड़े सैन्य अड्डे हैं- पहला, टार्टस नौसेना सैन्य अड्डा और दूसरा, ह्मीमिम हवाई सैन्य अड्डा. ह्मीमिम सैन्य अड्डा लताकिया से क़रीब 20 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में मौजूद है.

लेकिन अब सीरिया में बशर अल-असद की सरकार के पतन के बाद रूसी मीडिया में चर्चा गर्म है कि रूस के इन सैन्य अड्डों का क्या भविष्य है.

यहां पर ठहरने वाले जहाज़ों, गाड़ियों और विमानों के साथ-साथ यहां जो मंहगे सैन्य उपकरण लगाए गए हैं उनका और यहां पर रह रहे 7,500 सैनिकों का क्या होगा.

वीडियो कैप्शन, बशर-अल-असद के देश छोड़ने के बाद से कई सीरियाई लोग अब वतन लौट रहे हैं.

इन दोनों सैन्य अड्डों पर कितने सैनिक हैं और कितना साजो-सामान रखा गया है इसे लेकर अलग-अलग आकलन हैं.

लेकिन माना जा रहा है कि रूस के सामने मुश्किल की स्थिति है कि अनिश्चितता के दौर में इस इलाक़े में तेज़ी से बदलते राजनीतिक परिदृश्य में, वो इन सैन्य अड्डों पर मौजूद अपने सामान की रक्षा कैसे करे.

साल 2017 में रूस और सीरिया के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था. इसके तहत सीरिया ने 49 सालों के लिए टार्टस और ह्मीमिम में सैन्य अड्डा रखने के लिए रूस को इजाज़त दी थी. ये समझौता साल 2066 तक है.

लेकिन अब इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है कि क्या ये दोनों सैन्य अड्डे रूस के नियंत्रण में बने रहेंगे.

रूस के नेतृत्व ने इस तरह के संकेत दिए हैं कि इन दोनों सैन्य अड्डों का इस्तेमाल जारी रखने का उनका इरादा नहीं है.

सोमवार को रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था कि रूस सीरिया में मौजूद सैन्य अड्डों के भविष्य के बारे में सीरिया में आने वाले नए शासन से चर्चा करेगा.

पेस्कोव के इस बयान से अंदाज़ा लगाया गया कि रूस ने अब तक टार्टस और ह्मीमिम के भविष्य को लेकर कोई फ़ैसला नहीं किया है लेकिन हो सकता है कि वो रूसी सेना को वहां से बाहर निकालने पर सोचना शुरू कर दे.

हालांकि बीते दिनों आई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि रूस ने अपने जहाज़ों के तट से दूर ले जाना शुरू कर दिया है.

बीबीसी वेरिफ़ाई के अनुसार रूस ने कम से कम अस्थायी तौर पर अपने जहाज़ों को बंदरगाह से बाहर किया है. यहां साथ में दो गाइडेड मिसाइल बेड़े भी हैं, जो सीरियाई तट से 13 किलोमीटर की दूरी पर हैं.

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सीरिया से बाहर निकलने की रूस की योजना

सीरिया की बशर अल-असद सरकार के लिए रूसी वायु सेना की मौजूदगी अहम थी, लेकिन अब सीरिया में इसकी मौजूदगी पर सवाल उठ रहे हैं.

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रूस के लिए ये काम आसान नहीं होगा. यहां रूस के बेड़े में 7,500 सैनिकों के साथ-साथ बड़े हथियार हैं और सैन्य उपकरण हैं, ख़ासकर ह्मीमिम सैन्य अड्डे पर.

इनमें बख्तरबंद गाड़ियां, एयर डिफेन्स सिस्टम, इंजीनियरिंग उपकरण के साथ साथ अन्य सैन्य साजो-सामान है. यहां से सामान निकालने की कोई भी कोशिश विरोधियों का ध्यान अपनी तरफ खींच सकती है.

बीते सालों में इस तरह की रिपोर्टें आई थीं कि सीरिया में मौजूद रूस के बेड़े में युद्ध में इस्तेमाल किए जाने वाले भारी टैंक भी शामिल हैं.

इनको यहां से निकालने के लिए रूस को ह्मीमिम सैन्य अड्डे की हवाई पट्टी से एएन-124 जैसे भारी विमानों का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जो दुनिया के सबसे बड़े विमानों में से एक हैं.

अगर रूस जल्दबाज़ी में ह्मीमिम सैन्य अड्डे से अपना सामान और सैनिक निकालने की कोशिश करता है कि संभव है कि इसके लिए उसे कम वक्त में सौ से अधिक एएन-124 और आईएल-76 विमानों का इस्तेमाल करना होगा.

दूसरी तरफ टार्टस नौसेना सैन्य अड्डे के से होकर समुद्री रास्ता भी गुजरता है, लेकिन यहां से ये काम भी इतना सरल नहीं होगा.

यहां से भारी सामान लेकर निकलने वाले युद्धपोतों को काला सागर तक पहुंचने के लिए तुर्की के बोस्फ़ोरोस और डार्डानेल्ज़ जलडमरुमध्य से होकर गुज़रना होगा, जो इन जहाज़ों के लिए बेहद मुश्किल होगा.

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद तुर्की ने मॉन्ट्रियू संधि के तहत रूस और यूक्रेन दोनों के युद्धपोतों के लिए बोस्फ़ोरोस और डार्डानेल्ज़ जलडमरुमध्य को बंद कर दिया है.

सीरिया में रूस के सैन्य अड्डे
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इसका मतलब ये है कि अगर रूस अपना सारा सामान युद्धपोतों में भरने में कामयाब हुआ और वो टार्टस के रास्ते बाहर निकलने की कोशिश करे तो उसे भूमध्यसागर के लंबे रास्ते से होकर जाना होगा.

यहां से उसे जिब्राल्टर की खाड़ी से होकर, यूरोप का पूरा चक्कर लगाने के बाद या तो बाल्टिक सागर से होकर रूस पहुंचना होगा या फिर नॉर्वेजियन सागर से होकर रूस पहुंचना होगा.

अगर रूस सीरिया से अपने सैन्य अड्डे हटाना चाहे तो ये अभियान उसे न सिर्फ बड़े पैमाने पर करना होगा बल्कि ये उसके लिए बेहद महंगा साबित होगा.

सीरिया में रूसी सैनिकों को संबोधित करते रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

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इमेज कैप्शन, सीरियाई शासक बशर अल-असद की मदद के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साल 2015 में हज़ारों रूसी सैनिकों को सीरिया में तैनात किया था.

रूस के लिए सीरिया में अपने सैन्य अड्डे खोने के मायने

सीरिया में रूसी सैन्य अड्डे की मौजूदगी केवल सीरिया में बशर अल-असद की सरकार की मदद के लिए थी ऐसा नहीं है, इसका अन्य महत्व भी था.

इनकी मौजूदगी मध्य पूर्व में ये सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण थी कि सैन्य ठेकेदारों और सामान को आसानी से अफ़्रीका भेजा जा सके, जहां हाल के सालों में रूस की दिलचस्पी बढ़ी है.

रूसी सरकार कहती रही है कि टार्टस पर मौजूद उसका ठिकाना दरअसल केवल जहाज़ों की मरम्मत करने की जगह है, इसे सैन्य अड्डा कहना सही नहीं है.

हालांकि सच ये है कि, ये सैन्य अड्डा भूमध्यसागर में रूस के नौसेना बेड़े की मौजूदगी सुनिश्चित करता है, भले ही अमेरिकी नौसेना बेड़े के मुक़ाबले ये छोटा है.

ह्मीमिम सैन्य अड्डा ख़ासकर अहम था क्योंकि ये अफ्रीका में मौजूद प्राइवेट आर्मी वैग्नर ग्रुप, और रूस की परियोजनाओं तक सामान लाने-ले जाने के लिए एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक सेंटर की तरह काम करता था.

एक आकलन के अनुसार सीरिया में रूस के 7,500 सैनिक मौजूद हैं.

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इमेज कैप्शन, एक आकलन के अनुसार सीरिया में रूस के 7,500 सैनिक मौजूद हैं.

अगर रूस सीरिया की नई सरकार के साथ बातचीत कर इन सैन्य अड्डों को बनाए रखने के लिए समझौता कर भी लेता है तो ये पहले हुए समझौते से अलग होगा.

पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार रूस और सीरिया में रूस सेना की मौजूदगी पर काफी हद तक निर्भर थी. अब सीरिया की नई सरकार के समर्थन के लिए रूस को भी कुछ पेशकश करनी होगी.

पुतिन के लिए 2015 में बशर अल-असद की मदद के लिए हज़ारों सैनिकों को सीरिया में तैनात करना, वैश्विक शक्ति के रूप में देश की छवि को मज़बूत करने जैसा था.

मध्य पूर्व में रूस की मौजूदगी, सोवियत संघ के दौर के बाद पश्चिम मुल्कों को रूस की पहली बड़ी चुनौती थी.

एक वक्त वो भी था जब सीरिया में रूस का मिशन कामयाब होता दिख रहा था. लेकिन अब सालों से सीरिया में रूस की सैन्य मौजूदगी और कूटनीतिक बढ़त को लेकर आशंका जताई जा रही है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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