इसराइल और हिज़्बुल्लाह, हमास के बीच जंग को कौन रोक सकता है?

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इसराइल पर हमास के हमले और फिर ग़ज़ा में इसराइली कार्रवाइयों के एक साल बाद कहानी अब लेबनान और हिज़्बुल्लाह तक पहुंच चुकी है.
पिछले साल 7 अक्तूबर को हमास के हमले में 1200 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी और इसके बाद इसराइल ने ग़ज़ा में जो जंग छेड़ी, उसमें अब तक 42 हज़ार से ज़्यादा फ़लस्तीनी मारे जा चुके हैं.
फ़लस्तीन के समर्थन में लेबनान से हिज़्बुल्लाह और यमन का विद्रोही हूती संगठन भी इसराइल पर हमले करता रहा है. इसराइल के हमलों में हमास और हिज़्बुल्लाह के कई बड़े नेता मारे जा चुके हैं.
हमास के शीर्ष नेता इस्माइल हनिया तेहरान में जहां एक हमले में मारे गए, वहीं उनके बाद बने याह्या सिनवार ग़ज़ा पट्टी में मारे गए.

इसराइल ग़ज़ा तक ही सीमित नहीं रहा, उसने लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज़्बुल्लाह के गढ़ पर बम बरसाए और उसके प्रमुख हसन नसरल्लाह भी हवाई हमले में मारे गए.
दूसरी ओर हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती का समर्थन करने वाले ईरान को भी इसराइल ने नहीं बख़्शा, उसने उस पर भी मिसाइलें दागीं.
पिछले एक साल के दौरान इसराइल-गज़ा संघर्ष में स्थायी युद्धविराम समझौते के कोई आसार नज़र नहीं आए. क्या मध्यपूर्व में दशकों से चल रहे संघर्ष को रोकने के लिए नए तरीके से शांति प्रयास किए जा सकते हैं?
इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे हमास-इसराइल-हिज़्बुल्लाह जंग को कौन रोक सकता है?
शांति का मार्ग

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यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ शोधकर्ता ह्यू लोवेट कहते हैं कि मध्यपूर्व का आधुनिक इतिहास दरअसल विफल शांति प्रयासों का इतिहास बन कर रह गया है.
उन्होंने कहा, “सबसे मशहूर शांति प्रयास इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच 1993 में ओस्लो शांति समझौते के साथ शुरू हुआ था. उसके बाद दशकों से इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच वार्ताएं चलती रही हैं. लेकिन यह वार्ताएं क्षेत्र में शांति लाने, इसराइल का कब्ज़ा समाप्त करने और दो अलग राष्ट्र बना कर समस्या का समाधान करने में विफल रही हैं.”
उस ऐतिहासिक समझौते पर अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, इसराइली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक रबीन और तत्कालीन फ़लस्तीनी नेता और पीएलओ के प्रमुख यासिर अराफ़ात ने हस्ताक्षर किए थे.
इस समझौते के तहत ग़ज़ा पट्टी और पश्चिम तट पर प्रशासन के लिए पांच सालों तक के लिए एक फ़लस्तीनी प्रशासन का गठन किया गया था और उस दौरान स्थायी समझौता किया जाना था.
मगर वो समझौता वार्ताएं विफल हो गयीं और इसराइल और हमास और इसराइल और लेबनान के चरमपंथी गुट हिज़्बुल्लाह के बीच लड़ाई जारी रही.
इसके बाद अगला शांति प्रयास 2020 में अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अब्राहम समझौते के तहत हुआ जिसका उद्देश्य इसराइल के बहरीन, अरब अमीरात और अन्य अरब देशों के साथ संबंध सामान्य करना था.
उम्मीद की जा रही थी कि इससे मध्यपूर्व में तनाव कम होगा. मगर इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच शांतिवार्ता पर ख़ास ध्यान नहीं दिया गया और फिर 7 अक्तूबर 2023 को लड़ाई छिड़ गयी.
ह्यू लोवेट ने कहा कि पिछले छह महीनों के दौरान अमेरिका के नेतृत्व में कतर के साथ मिल कर ग़ज़ा संघर्ष को रोकने और हमास की कै़द से इसराइली बंधकों की रिहाई के लिए कई प्रयास किए गए मगर दुर्भाग्यवश वो सफल नहीं हो पाए.
इन्हीं प्रयासों के तहत अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने मध्यपूर्व के कई दौरे किए, जिसे शटल डिप्लोमसी कहा जाता है.
ह्यू लोवेट कहते हैं कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने येरूशलम और कई अरब देशों के दौरे किए, क्योंकि इसराइल और हमास के नेता एक कमरे में आकर बातचीत को तैयार नहीं हो पा रहे थे.
लेकिन, अमेरिका के इसराइल के साथ विशेष संबंधों के चलते अमेरिका को निष्पक्ष मध्यस्थ की तरह देखना मुश्किल है.
ह्यू लोवेट कहते हैं कि शांति प्रयासों मे अमेरिका की आलोचना इसलिए होती है, क्योंकि वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद मे इसराइल का बचाव करता है, युद्ध में उसे हथियार सप्लाई करता है जिस नाते अमेरिका इस संघर्ष में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है.
वो कहते हैं अमेरिका, क़तर और मिस्र के प्रयासों के बावजूद कूटनीति विफल हो गयी है.
ह्यू लोवेट कहते हैं, “हम इस स्थिति में इसलिए पहुंचे हैं क्योंकि अमेरिका, यूरोपीय देश और अरब देश इसराइल और हमास को युद्ध विराम के लिए राज़ी करने में असफल रहे हैं. और यही विफ़ल कूटनीति दोबारा अपनायी जा रही है.”
कौन क्या चाहता है?

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मध्यपूर्व में युद्धविराम और शांति कायम करने के लिए युद्धरत पक्षों को समझौते के लिए राज़ी करने से पहले यह समझ़ना ज़रूरी है कि वो क्या चाहते हैं?
इसराइल का कहना है कि वो क्षेत्र से हमास और हिज़्बुल्लाह को ख़त्म करना चाहता है. मगर इन दोनों गुटों को सहायता मिलती है ईरान से.
संयुक्त अरब अमीरात में ट्रेंड्स रीसर्च एंड एडवाइज़री नाम के थिंकटैंक में अमेरिका और मध्यपू्र्व संबंधों के विभाग के प्रमुख बिलाल साब से हमने ईरान की भूमिका के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि, “ईरान ने यह तथाकथित एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टंस या प्रतिरोध की धूरी बनायी है जिसके ज़रिए वो क्षेत्र में इसराइल को घेरना चाहता है.”
उन्होंने कहा, “इसमें यमन, सीरिया और लेबनान शामिल हैं. ईरान इस ज़रिए इसराइल को कमज़ोर करना चाहता है क्योंकि सीधी लड़ाई में ईरान की परंपरागत युद्ध क्षमता इसराइल के मुकाबले काफ़ी कम है.”
बिलाल साब ने कहा, “फ़िलहाल तो ईरान की यह नीति असफल नज़र आ रही है क्योंकि हमास और हिज़्बुल्लाह सैनिक दृष्टि से टूट चुके हैं. मगर ना तो ईरान और उसके सहयोगी और ना ही इसराइल अपने सामरिक लक्ष्य को हासिल करने में सफल होते दिख रहे है.”
यह तो बात हुई इसराइल और ईरान की, मगर दुनिया भर में आतंकवादी संगठन घोषित किए जा चुके हमास और हिज़्बुल्लाह अपने लिए क्या चाहते हैं?
बिलाल साब कहते हैं कि हमास के घोषणापत्र के अनुसार तो वह इसराइल का नामोनिशान मिटाना चाहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वो वार्ता या समझौते के लिए तैयार नहीं होगा.
मगर उसका सबसे बड़ा मक़सद फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना है. उसी तरह हिज़्बुल्लाह भी व्यवहारिक है और समझौते के लिए तैयार है, मगर वो भी इसराइल को कमज़ोर करना चाहता है.
स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के लिए ज़मीन की ज़रूरत है, तो इसराइल को इसके लिए ज़मीन सौंपने के लिए कैसे राज़ी किया जा सकता है?
बिलाल साब कहते हैं कि इसके लिए इसराइली नेतृत्व की राजनीतिक सोच में बड़े बदलाव की ज़रूरत है और मौजूदा सरकार से इसकी उम्मीद कम है.
इसराइल कई दशकों से लड़ाई लड़ता रहा है, मगर वो अपने प्रतिद्वंदियों को सामरिक तौर पर नष्ट नहीं कर पाया है. वो लगातार पुर्नसंगठित होते रहे हैं. इसराइल को शांति प्रयासों में निवेश करना चाहिए.
बिलाल साब का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पारित 1701 प्रस्ताव के तहत पिछला इसराइल-लेबनान युद्ध 2006 में समाप्त हुआ था, जिसके तहत तय हुआ था कि हिज़्बुल्लाह दक्षिण लेबनान में रहेगा और इसराइल भी सीमा नहीं लांघेगा.
कहा जाता है कि मौत से पहले हिज़्बुल्लाह के नेता नसरल्लाह इस प्रस्ताव के तहत दोबारा समझौते के बारे में सोच रहे थे.
बिलाल साब ने कहा, “लेबनान सरकार ने हाल में दावा किया था कि मौत से पहले हसन नसरल्लाह प्रस्ताव 1701 की कुछ शर्तों के तहत युद्धविराम पर विचार कर रहे थे. हिज़्बुल्लाह का वर्तमान नेतृत्व क्या फ़ैसला करेगा यह तो मैं नहीं जानता लेकिन अगर लेबनान का यह दावा सच है तो हिज़्बुल्लाह समझौते के बारे में सोच सकता है.”
टूटी हुई व्यवस्था

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मध्यपूर्व में शांति लाने के अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रयास विफल रहे हैं.
इसकी एक वजह यह भी है कि दुनिया लगातार बदलती गयी है और बहुत कम ऐसे देश बचे हैं, जो इस संघर्ष में निष्पक्ष भूमिका निभा सकते हैं.
वो कौन हैं? यह समझने के लिए हमने बात की क्रिस्टोफ़र फ़िलिप्स से, जो लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर हैं.
उनका कहना है कि “शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद के दौर में अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के तौर पर उभरा था और उसने विश्व व्यवस्था पर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया था. इसका इस्तेमाल उन्होंने मध्यपूर्व संबंधों को प्रभावित करने के लिए भी किया.”
उन्होंने कहा, “एच. डब्लू बुश और बिल क्लिंटन दुनिया में पूंजीवादी लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहते थे और मध्यपूर्व का संघर्ष इसमें बाधा बन रहा था. जो बाइडेन उस सोच में विशेष विश्वास नहीं रखते बल्कि वो इसे सामरिक महत्व के मुद्दे की तरह देखते हैं. उनका अधिक ध्यान रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन के प्रभाव पर नियंत्रण रखने पर है.”
क्रिस्टोफ़र फ़िलिप्स कहते हैं कि दुनिया के दूसरे संघर्षों में ध्यान बंटने और 2008 के आर्थिक संकट के बाद से मध्यपूर्व पर अमेरिका का प्रभाव कम होता गया है. तो अब इसमें संयुक्त राष्ट्र की क्या भूमिका है?
क्रिस्टोफ़र फ़िलिप्स का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र अपने आप में प्रभावशाली शक्ति नहीं है बल्कि वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों की नीति और फ़ैसलों पर निर्भर है.
अमेरिका के इसराइल के साथ घनिष्ठ संबंध हैं, जबकि रूस और चीन ईरान के नज़दीक हैं.
इसलिए संयुक्त राष्ट्र मध्यपूर्व में एक स्वतंत्र शक्ति की तरह काम नहीं कर पाता है. वो उन नीतियों को लागू करता है जिन पर सुरक्षा परिषद में सहमति बन गयी हो.
संयुक्त राष्ट्र का प्रभाव सीमित है और सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के अपने हित मध्यपूर्व संघर्ष से जुड़े हुए हैं, मगर इसमें यूरोपीय संघ की क्या भूमिका हो सकती है?
क्रिस्टोफ़र फ़िलिप्स का मानना है कि यूरोपीय संघ के मध्यपूर्व के कई देशों के साथ व्यापारिक संबंध है, मगर वहां की समस्या के समाधान के लिए यूरोपीय संघ एकजुट होकर कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है क्योंकि उसके सदस्य देशों में इस मुद्दे पर कई मतभेद हैं.
क्रिस्टोफ़र फ़िलिप्स के अनुसार यह कहना भी सही नहीं है कि कूटनीति के पुराने ज़रिए टूट चुके हैं. हां यह ज़रूर है कि अब कूटनीति में नयी शक्तियां शामिल हो चुकी हैं, जिससे नयी चुनौतियां भी आई हैं.
क्रिस्टोफ़र फ़िलिप्स बताते हैं कि मध्यपूर्व में पहले जो भूमिका अमेरिका निभाता था, उसकी जगह यह भूमिका कौन निभाए यह एक बड़ा सवाल भी है और चुनौती भी.
इस क्षेत्र में रूस और चीन का प्रभाव तो है, लेकिन वो इस भूमिका को अपनाने में ख़ास रुचि नहीं रखते.
अब हम एक बहुध्रवीय दुनिया में रहते हैं, जहां सिर्फ़ अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों का ही दबदबा नहीं है. अब कई नयी शक्तियां इस मैदान में हैं जो कई बार पश्चिमी कूटनीतिज्ञों की बात पर कान नहीं धरतीं.
इसलिए पश्चिमी कूटनीतिज्ञों को इस नये यथार्थ को स्वीकार करना होगा.
नई विश्व व्यवस्था

अगर देखा जाए तो मध्यपूर्व की समस्या का समाधान ढूंढने के रास्ते में हम वहीं आ खड़े हुए हैं, जहां से चले थे. शांति के लिए सबसे पहले ज़रूरत है कि संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को बातचीत की मेज़ पर लाया जाए.
मगर यह काम कौन कर सकता है, यह जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर बूर्चू ओज़ेलिक से, जो लंदन स्थित थिंकटैक दी रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट में मध्यपूर्व सुरक्षा मामलों की वरिष्ठ शोधकर्ता हैं.
उन्होंने कहा कि, “मध्यपूर्व समस्या का कूटनीतिक समाधान ढूंढने के लिए खाड़ी के देश सक्रियता से काम कर रहे हैं. कत़र अपना रुतबा बढ़ाने के लिए अधिक खुल कर काम कर रहा है, जबकि ओमान भी सक्रियता से इस दिशा में काम कर रहा है.”
ओज़ेलिक ने कहा, “तुर्की भी शांति प्रयासों में मध्यस्थता के लिए कोशिश कर रहा है. इन प्रयासों में मोरोक्को भी शामिल है. लेकिन इनमें से कोई भी देश क्षेत्रीय महाशक्ति नहीं है.”
इन सभी देशों का क्षेत्र और विश्व की कूटनीति में महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन एक देश है, जो प्रभावी भूमिका निभा सकता है.
डॉक्टर बूर्चू ओज़ेलिक के अनुसार, भविष्य में किसी भी शांति समझौते और गज़ा में स्थापित होने वाले प्रशासन के ढांचे संबंधी समझौते में सऊदी अरब का विशेष महत्व होगा.
डॉक्टर बूर्चू ओज़ेलिक का कहना है कि सऊदी अरब अपने प्रभाव का इस्तेमाल ईरान के साथ संबंध में काफ़ी सावधानी से कर रहा है.
वहीं, एतिहासिक तौर पर उसके अमेरिका के साथ करीबी संबंध रहे हैं. इसराइल और अरब देशों के बीच संबंध सामान्य करने के लिए 2020 में किए गए अब्राहम समझौते में भी सऊदी अरब की बड़ी भूमिका थी.
इसी बात का हवाला देते हुए डॉक्टर बूर्चू ओज़ेलिक कहती हैं कि सऊदी अरब मध्यपूर्व विवाद में शामिल पक्षों को बातचीत की मेज़ पर साथ ला सकता है.
डॉक्टर बूर्चू ओज़ेलिक कहती हैं कि सऊदी अरब इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य करने पर ज़ोर देता रहा है. यह बात अमेरिका और पश्चिमी देश भी चाहते हैं.
मगर उसने फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन को शर्त बना कर अपने आपको फ़लस्तीनियों के बड़े हिमायती के रूप में भी पेश किया है. इससे सऊदी अरब को उसकी घरेलू राजनीति और विश्व कूटनीति में भी फ़ायदा होगा.
लेकिन क्षेत्र की ताकतों के अपने हित क्या समस्या का समाधान ढूंढने में बाधा नहीं बनेगे?
इसके जवाब में डॉक्टर बूर्चू ओज़ेलिक ने कहा कि, “दरअसल यह देश अपने हितों की वजह से ही क्षेत्र की समस्या का समाधान ढूंढने के लिए प्रेरित होंगे.”
उन्होंने कहा, “ज़ाहिर सी बात है कि जो भी समाधान निकले उन्हें उसके साथ जीना है, क्योंकि यह मामला उनके पड़ौस में है. पश्चिमी देश इस क्षेत्र से दूर हैं इसलिए उनकी बात अलग है.”
ओज़ेलिक ने कहा, “मगर क्षेत्रीय ताकतों के लिए इस समाधान का स्वरूप बहुत माइने रखता है. लेकिन जो भी समाधान हो वो ग़ज़ा को केंद्र में रख कर ही हो सकता है. यह एक टेस्ट केस होगा, जिससे ना कि फ़लस्तीनियों के लिए बल्कि इसराइल और पूरे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा कायम की जा सकती है.”
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर - क्या कोई मध्यपूर्व में शांति ला सकता है?
गज़ा, लेबनान और इसराइल के लोग हर दिन हमलों के साये में बिता रहे हैं. रोज़ लड़ाई में मरने वालों की संख्या बढ़ रही है.
मध्यपूर्व की स्थित पहले कभी इतनी विकट नहीं हुई थी. अमेरिका निश्चित ही समझौता वार्ताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. मगर वो क्षेत्र में पहले जैसी कूटनीतिक ताकत नहीं रहा है.
इस समस्या का समाधान निकालने में दूसरे देश बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. इन देशों में कतर, ओमान और सऊदी अरब शामिल हैं.
दुनिया की व्यवस्था बदल चुकी है. अब मध्यपूर्व के देश समस्या के समाधान के लिए पश्चिम की ओर देखने के बजाय ख़ुद कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















