ग़ज़ा की वो नर्स जिसने इसराइली बमबारी के बाद के भयावह मंज़र को फ़ोन पर रिकॉर्ड किया

स्वास्थ्यकर्मी नेवीन अल दवाबी
इमेज कैप्शन, स्वास्थ्यकर्मी नेवीन अल दवाबी का कहना है कि इसराइली बलों ने जबालिया की नाकेबंदी कर रखी है.
    • Author, जेरेमी बॉवेन
    • पदनाम, अंतरराष्ट्रीय संपादक, बीबीसी न्यूज़

ग़ज़ा में नागरिकों को किस हद तक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, बाहर से इसका अंदाज़ा लगाना बहुत कठिन है.

सोमवार, 21 अक्तूबर को जबालिया एक वीडियो सामने आया है. इसके ज़रिए इसराइल के ताज़ा हमलों की हैरान कर देने वाली जानकारियां, नागरिकों पर दबाव और आतंक की कहानी भी सामने आई हैं.

इसे देखते हुए आप खुद प्रत्यक्षदर्शी होने जैसा महसूस करते हैं.

(चेतावनी - इस रिपोर्ट में दिया गया कुछ ब्योरा पाठकों को विचलित कर सकता है.)

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इन वीडियो में वहां के अस्पतालों में घायल, मर रहे और मातम मना रहे लोगों के भयानक दृश्य दिखते हैं.

मलबे में दबे लोगों को बचाने और शवों को बाहर निकालने की कोशिश के दृश्यों के साथ इसराइली सेना द्वारा खदेड़े जाने के बाद खंडहर बने इलाक़ों से होते हुए रेत और मलबे से ढंकी सड़क पर पैदल चलते लोगों के दृश्य.

ये सब देखने में भयानक हैं. सोमवार की सुबह जबालिया पर हुए हमले के तुरंत बाद आया एक वीडियो भी उतना ही भयानक था.

घटना इतनी हृदय विदारक है कि अधिकांश लोग इसे अपने फ़ोन पर रिकॉर्ड करना नहीं चाहेंगे. युद्ध में सालों तक रिपोर्टिंग करते हुए मैंने इसी अविश्वास और हैरानी का अनुभव किया है.

21 अक्तूबर को सुबह नौ बजे जबालिया बॉयज़ एलीमेंट्री स्कूल पर हमला हुआ. फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनआरडब्ल्यूए ने इसे फलस्तीनियों के लिए शेल्टर में बदल दिया था.

इस वीडियो में नेवीन अल दवाबी नाम की एक पैरामेडिक घबराई हुई हैं और मर चुके और मर रहे लोगों के बीच बदहवास दौड़ रही हैं. साथ ही वो हमले के बाद के दृष्य को अपने फ़ोन पर रिकॉर्ड कर रही हैं.

ग़ज़ा शहर में हम उनका पता लगाने में क़ामयाब रहे और नेवीन ने बीबीसी के साथ उस समय की आपबीती साझा की.

‘ख़ून रोकने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था’

लीना इब्राहिम अबू नामोस
इमेज कैप्शन, जबसे युद्ध शुरू हुआ है लीना इब्राहिम अबू नामोस अपने दो बच्चों को गवां चुकी हैं.
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एपिसोड

समाप्त

नेवीन बुरी तरह घायल ख़ून से लथपथ एक महिला पर चिल्लाती हैं, "शांत रहो."

"मैं क़सम खाती हूं, ख़ून रोकने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है."

वो नीचे जाने वाले रास्ते की ओर भागती हैं, वहां और हताहत पड़े हैं. वो मुड़ती हैं, अपना बैग उठाते हुए कहती हैं, "यहां से चलो, वरना और लोग मारे जाएंगे."

वीडियो में एक आदमी की आवाज़ सुनाई देती है, "हमारे साथ रुको नेवीन." घाव पर बांधने वाली पट्टियों से भरा बैग पकड़े वो वापस सीढ़ी की ओर दौड़ती हैं, जहां सीढ़ियों पर ख़ून बह रहा है. उन्हें एक बच्चे की आवाज़ सुनाई देती है जो मदद की गुहार लगा रहा है, "मदद करो, मेरी बहन मर रही है."

एक महिला कहती हैं कि उनके बच्चे नहीं रहे. नेवीन पूछती हैं कि उन्हें कैसे पता है.

महिला इशारा कर कहती हैं, "देखो उन्हें, एक हिल-डुल नहीं रहा और दूसरे के सिर में गहरी चोट है, वो या तो मर गया है या मर रहा है."

नेवीन पट्टियां देती हैं, लेकिन तबतक देर हो चुकी थी. वहां वही एकमात्र स्वास्थ्यकर्मी हैं.

नेवीन ने मुझे बताया कि उस महिला का नाम लीना इब्राहिम अबू नामोस है. बीबीसी के लिए काम करने वाले पत्रकारों ने बताया कि उन्हें जबालिया के कमाल अदावान अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उन्हें बम के छर्रे लगे हैं. उनके सात बच्चों में से दो मारे गए हैं, सबसे बड़ी बेटी और उनका इकलौता बेटा.

जिस वक्त हमला हुआ उस वक्त लीना इब्राहिम के पति वहां नहीं थे, क्योंकि पहले हुए एक हमले में वो घायल हुए थे और उनका इलाज़ चल रहा है.

लीना इब्राहिम ने कहा, "मैं अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी को मरते देख रही थी. मैं कुछ नहीं कर सकती थी. वो मेरी सबसे बड़ी बेटी थी, मेरी पूरी ज़िंदगी थी. जब आपका बड़ा बच्चा आपके सामने मर जाता है...."

"मैं उसे बचा नहीं सकी. मैं भी घायल हो गई थी. मैं खुद संभल नहीं सकी, नीचे गिर पड़ी. फिर मैंने उसकी ओर रेंगना शुरू किया."

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इमेज कैप्शन, जबालिया में इसराइली सैन्य अभियान के चलते बच्चों के साथ बहुत से परिवार ग़ज़ा शहर की ओर जाने वाली सलाह अल-दिन सड़क से होते हुए सुरक्षित जगह की तलाश में जा रहे हैं.

नेवीन ने बताया कि उन्हें 16-17 दिनों तक स्कूल में "घेर कर" रखा गया था. स्कूल के ऊपर ड्रोन और क्वाडकॉप्टर उड़ाए जा रहे थे, जिनका इस्तेमाल इसराइली सेना करती है.

इसराइली सेना इनके ज़रिए सर्विलांस और जासूसी का काम करती है, साथ ही लाउडस्पीकर से घोषणाएं करने और जिस फ़लस्तीनी व्यक्ति को मारना चाहती है, उस पर गोली चलाने या बम गिराने का काम करती है.

नेवीन ने कहा, "हम डर के साये में रह रहे हैं. जब स्कूल पर हमला हुआ, लोग मारे गए और घायल हुए. वहां कुछ भी खाने या पीने को नहीं था. जो पानी का टैंक आम तौर पर भेजा जाता था उसे इसराइलियों ने उड़ा दिया. तीन दिन पहले, सवेरे नौ बजे एक ड्रोन स्कूल में आया और उसके लाइडस्पीकर से 10 बजे तक स्कूल खाली करने की घोषणा की गई, कहा गया कि हम ख़तरनाक़ फ़ाइटिंग ज़ोन में रह रहे हैं इसलिए हमें ये खाली करना होगा."

"उन्होंने हमें एक घंटे का समय दिया था. हम अपना सामान भी पैक नहीं कर पाए थे. 10 मिनट बाद ही इसराइली लड़ाकू विमानों ने स्कूल पर बम गिरा दिया. यह बड़ा जनसंहार था, 30 लोग घायल हुए और 10 से अधिक मारे गए."

इस वीडियो में ख़ून से सनी सीढ़ियों पर ही हताहत हैं ऐसा नहीं है. नेवीन वहां से एक घायल व्यक्ति की ओर दौड़ती हैं जो अपनी गर्दन पर हाथ रखे हुए बड़े बैग से सिर लगाए झुका हुआ है. उसकी गर्दन पर गहरा घाव था. नेवीन के पहुंचने से पहले वो मर चुका था.

वो ज़ोर से चिल्लाईं, "मदद करो, वो मर गए- यह अंकल अबू मोहम्मद हैं."

तीन दिन बाद मैंने एक फ़लस्तीनी स्वतंत्र महिला पत्रकार को ग़ज़ा शहर के अल-अहली अस्पताल के बारे में जानने के लिए कुछ सवाल भेजे थे. मैंने उनसे अबू मोहम्मद के बारे में भी पूछा.

उन्होंने बताया, "वो मेरे पड़ोसी थे. उनके दो बेटे भी मारे गए...एक का आधा सिर उड़ गया था."

उन्होंने हमारे रिपोर्टर से बात करते हुए अपने फ़ोन पर उस वीडियो को फिर से प्ले किया.

"इस वीडियो लड़कियों के शवों के टुकड़े दिख रहे थे. आदमियों की पेट में लगी चोट से उनकी आंतें बाहर निकल आई थीं... एक दस साल के लड़के की आंतें बाहर निकली हुई थीं. उसकी मां को सीने में चोट लगी थी, वो मर चुकी थी."

"कुछ महिलाएं जो बचने के लिए छिप रही थीं, वो भी घायल हुईं और इनमें से कुछ मारी गईं. स्कूल के एक सफ़ाई कर्मचारी के शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो गए. 12 साल की एक बच्ची का एक पैर उड़ गया था. इसी तरह उत्तरी ग़ज़ा के बेत हानून शहर से विस्थापित होकर यहां पनाह लेने वाली एक महिला भी घायल थीं. उनकी उम्र 35 से 40 साल के बीच रही होगी."

'हमास हमें बचा रहा है'

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इमेज कैप्शन, ग़ज़ा में आधे से अधिक इलाक़े रहने की हालत में नहीं हैं. युद्धविराम की शर्तों में हमास की ओर से पुनर्निर्माण की शर्त रखी गई थी.

स्कूल पर हमले के एक दिन पहले जब इसराइली हमला तेज़ हुआ तो यरूशलम में मौजूद संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ राजनयिक टॉर वेनेसलैंड ने एक कड़ा बयान जारी किया.

उन्होंने लिखा, "ग़ज़ा में तबाही और तेज़ हो गई है. संघर्ष के बीच ग़ज़ा पट्टी के उत्तरी हिस्से में भयानक दृश्य सामने आ रहे हैं. लगातार इसराइली हमले हो रहे हैं और अभूतपूर्व मानवीय संकट पैदा हो गया है."

"ग़ज़ा में कहीं भी सुरक्षित नहीं है. नागरिकों पर लगातार हमले की मैं निंदा करता हूं. यह जंग ख़त्म होनी चाहिए, बंधकों को छोड़ा जाना चाहिए, फ़लस्तीनियों का विस्थापन बंद होना चाहिए और नागरिकों को बचाया जाना चाहिए. लोगों तक मानवीय सहायता बिना बाधा के पहुंचाई जानी चाहिए."

इसराइल इसे आत्मरक्षा में उठाया गया कदम बताने पर अड़ा हुआ है और दावा करता है कि उसकी सेनाएं जंग के नियमों का सम्मान करती हैं.

पिछले एक साल से ग़ज़ा में लगभग हर दिन और हाल फिलहाल लेबनान में, इसराइल का दावा है कि नागरिक इसलिए माने जा रहे हैं क्योंकि हथियारबंद ग्रुप उन्हें मानव ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं.

इसराइली सेना के इस दावे के बारे में हमने नेवीV अल दवाबी से पूछा.

नेवीन का कहना था, "नहीं, हमास नागरिकों को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं कर रहा है. वे हमें बचा रहे हैं, वे हमारे साथ खड़े हैं."

इसराइल के अधिकतर लोगों के लिए नेवीन का ये बयान सोमवार सुबह नौ बजे इसराइली सेना के ग़ज़ा में नागरिकों पर ढहाए गए कहर को सही ठहराने के लिए बहाना बन जाएगा. लेकिन युद्ध अपराधों से जुड़े मामलों से निपटने वाली वकील सवाल पूछेंगे कि क्या ये हमला सही था.

युद्ध के नियम कहते हैं कि नागरिकों को हर हाल में बचाया जाना चाहिए और उन्हें होने वाला नुक़सान, हर हाल में हमलावर फ़ोर्स के ख़तरे के अनुपात में होना चाहिए.

अगर वहां हमास के वरिष्ठ कमांडर मौजूद थे या लड़ाके किसी लड़ाई के लिए इकट्ठा हो रहे थे, तो इसराइली सेना के वकीलों की ओर से इसे सही ठहराया जा सकता है.

लेकिन अगर हमास के कुछ हथियारबंद लोग वहां थे और तब हमला हुआ है तो यह क़ानून का उल्लंघन है. पिछले एक साल में इसराइल के हमलों ने हमास के लड़ने की ताकत को काफी हद तक तबाह कर दिया है.

ये मामला अगर कोर्ट में पहुंचा तो फ़लस्तीनियों के वकील कह सकते हैं कि उस समय इसराइली सेना को ऐसा कोई ख़तरा नहीं था कि 30 नागरिकों के घायल होने और 10 लोगों के मारे जाने को सही ठहराया जा सके, जिनमें कई बच्चे हैं.

पत्रकारों को इसराइल रोकता है

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इमेज कैप्शन, इसराइल ग़ज़ा में पत्रकारों को जाने की इजाज़त नहीं देता है.

मैं अनुमान लगाने को मजबूर हूं क्योंकि मैं यह यरूशलम में बैठकर लिख रहा हूं, न कि ग़ज़ा के जबालिया में हुए हमले के प्रत्यक्षदर्शियों से बात करने के बाद.

अगर घटनास्थल पर संवाददाताओं को जाने से रोका जाता है तो सच्चाई का पता लगाने में उन्हें हमेशा ही मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

जब पिछले साल हमास का हमला हुआ था तो इसराइल ने ग़ज़ा से सटे इसराइली बस्तियों में पत्रकारों को जाने की इजाज़त दी थी.

मैं कफ़ार अज़्ज़ा किबुत्ज़ में था जब वे मारे गए इसराइलियों के शवों को निकाल रहे थे और सैनिक उन इमारतों की जांच कर रहे थे जहां से गोलीबारी हो रही थी. वो चाहते थे कि पत्रकार खुद देखें कि हमास ने कैसे 1200 इसराइलियों को मार दिया और 250 को बंधक बनाकर ग़ज़ा में ले गए, जिनमें अधिकांश नागरिक थे .

हालांकि इसराइल ने जो कुछ ग़ज़ा में किया है उसके सबूतों का अंबार लग रहा है और वो नहीं चाहता कि पत्रकार उन्हें देखें. यही कारण है कि वे हमें उस इलाक़े में जाने नहीं देंगे, अगर कभी जाने दिया तो वो भी सेना की कड़ी निगरानी में होगा.

मैं युद्ध के पहले महीने में सिर्फ एक बार ग़ज़ा गया था. इसराइली सेना की कार्रवाई में उत्तरी ग़ज़ा का वो इलाक़ा, जहां मैं गया था, खंडहर बन गया था.

इसलिए ग़ज़ा के अंदर फ़लस्तीनियों की ओर से जो वीडियो या बयान आते हैं, पत्रकार उन पर भरोसा करते हैं.

इसके अलावा ग़ज़ा में जाने की इजाज़त पाने वाले अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों, स्वास्थ्यकर्मियों और सहायता कर्मियों और नेवीन की तरह स्मार्टफ़ोन से रिकॉर्ड करने वाले प्रत्यक्षदर्शियों पर पत्रकार भरोसा करते हैं.

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इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ने कहा है कि इसराइल भूख का इस्तेमाल हथियार के रूप में कर रहा है.

उधर, अस्पताल में लीना इब्राहिम अबू नामोस अपनी बड़ी बेटी और इकलौते बेटे के मारे जाने के ग़म में डूबी हुई थीं. उनका घर भी नष्ट हो गया है.

वो कहती हैं, "मेरे सात बच्चे थे और अब केवल पांच बच गए हैं... क्या कहूं, मुझे कुछ नहीं सूझ रहा. खुदा की क़सम उन्होंने हमारे दिलों को छलनी कर दिया है. हम थक चुके हैं, भावनात्मक रूप से खाली हो गए हैं. हम सब कुछ गंवा चुके हैं."

"बच्चों ने क्या अपराध किया था? उन्होंने क्या किया था? हमने क्या किया था कि हमारे साथ ऐसा हुआ?"

"हमने इसराइलियों के साथ क्या किया? क़सम से, उन्होंने हमारे बच्चों को तबाह कर दिया."

"मैं बहुत डरी हुई हूं. मैं कुछ भी खा-पी नहीं पा रही. मैं बस चाहती हूं कि मेरे बच्चे मेरे पास रहें क्योंकि हम डरे हुए हैं और हमें एक जगह से दूसरी जगह विस्थापित किया जा रहा है. मेरी बेटियों और मेरे लिये अब क्या बचा है? घर नहीं है, कहीं सुरक्षित जगह नहीं है, कहीं भी नहीं. मैं उन लोगों में से एक हूं जो कहीं नहीं जा सकते, जिनके लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं है. मैं थक गई हूं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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