म्यांमार के युवा विद्रोही सेना के ख़िलाफ़ युद्ध में कैसे पलट रहे हैं बाज़ी
- Author, क्वेंटिन समरविल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, म्यांमार
दो बड़े लाउडस्पीकर पहाड़ पर ले जाए जा रहे हैं.
इनका साइज इन्हें ले जा रहे लोगों के बराबर का है. यहाँ से क़रीब 800 मीटर नीचे हपासांग शहर है, जहाँ एक बड़ा म्यांमार आर्मी बेस है.
यह बेहद गर्म दिन है. तापमान क़रीब 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर है और ऐसे में लाउडस्पीकर ले जा रहे लोगों के पीछे कुछ युवा विद्रोही लड़ाके भी हैं.
इनके हाथों में बाँस हैं, जिनमें एक भारी बैट्री और एंप्लीफायर रखकर भी ले जाया जा रहा है.
इस चढ़ाई का नेतृत्व सेना के पूर्व कप्तान म्यो ज़िन कर रहे हैं. वो 12 साल सेना का हिस्सा रहे हैं. फिर वो विद्रोही पक्ष का हिस्सा बन गए.
उन्होंने अपने कंधे पर सेना की हरे रंग की जैकेट रखी हुई है. उन्हें देखकर ऐसा लग रहा है कि जैसे वो मंच पर कुछ ही देर में किसी परफॉर्मर की तरह आएंगे.
वो यहाँ इसलिए आए हैं ताकि सैनिकों को विद्रोहियों में शामिल करने का आग्रह कर सकें. ये लोग देश में सत्ताधारी सेना के लिए वफ़ादार हैं.
म्यांमार के पूर्व करेनी राज्य के इन घने जंगलों में, विद्रोही लड़ाके और सेना के जवान किसी न किसी रूप में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते रहे हैं. लेकिन, हाल के महीनों में विद्रोह की गति में तेज़ी आई है. इससे संकेत मिलता है कि इस बार विद्रोहियों का पलड़ा भारी हो सकता है.
ये दक्षिण पूर्व एशियाई देश दशकों से सैन्य शासन और क्रूर दमन के बाद एक चौराहे पर आकर खड़ा हो गया है.
युवा विद्रोहियों की नई सेना और जातीय समूहों ने तानाशाही के लिए संकट खड़ा कर दिया है.

देश के आधे से दो तिहाई हिस्से पर विद्रोह का असर
पिछले 7 महीनों में, देश के क़रीब आधे से दो तिहाई हिस्से पर विद्रोह का असर हुआ है.
देश में साल 2021 में तख्तापलट के बाद से सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया. तब से लेकर अब तक हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें कई बच्चे भी शामिल हैं.
क़रीब 25 लाख लोग विस्थापित हुए हैं और सेना को अपने शासन में ऐसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जिसका उसने कभी सामना नहीं किया था. इस चुनौती यानी बढ़ते हुए विद्रोह को विफल करने के लिए सेना नागरिकों, स्कूलों और चर्चों पर हर रोज बम बरसाती है.
इसके पहले कि म्यो जिन का साउंड सिस्टम शुरू किया जाता और वो बोलना शुरू करते, सेना ने उनके बोलने वाली जगह पर गोलीबारी शुरू कर दी.
बिना डर के माइक्रोफोन लिए हुए ज़िन उसे स्विच ऑन करते हैं और चिल्लाते हैं, "सभी लोग, फायरिंग बंद करो! बंद करो फायरिंग, प्लीज. सिर्फ 5-10 मिनट सुन लीजिए."
आश्चर्यजनक रूप से गोलीबारी बंद हो जाती है.
वो उन्हें उन 4,000 सैनिकों के बारे में बताते हैं, जिन्होंने उत्तरी शान राज्य में विद्रोहियों के सामने सरेंडर कर दिया. वो हाल में ही हुई उस घटना के बारे में भी बताते हैं जो म्यांमार की राजधानी में हुई थी, जिसमें विद्रोहियों ने सैन्य इमारतों में ड्रोन से हमले किए थे.
वो कहते हैं कि हमारा संदेश ये है कि हम जीत रहे हैं, आपका शासन हार रहा है, इसलिए अब हथियार डालने का समय आ गया है.
यहां हपासांग, करेनी राज्य और देश के ज्यादातर हिस्सों में लड़ाई और विद्रोह ने जोर पकड़ लिया है.
एक बड़े विद्रोह ने सेना के शासन को ख़तरे में डाल दिया है. साल 2021 में सैन्य तख्तापलट की वजह से नागरिकों की निर्वाचित सरकार ख़त्म कर दी गई और इसकी नेता आंग सान सू ची के साथ कई दूसरे राजनीतिक नेताओं को क़ैद कर लिया गया.
प्रेस की आज़ादी पर लगाम
इन सबके बावजूद इस संघर्ष को बहुत कम रिपोर्ट किया गया है. दुनिया भर का अधिकतर ध्यान यूक्रेन और इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष पर है.
यहां म्यांमार में प्रेस को कोई स्वतंत्रता नहीं है. शायद ही कभी विदेशी पत्रकारों को आधिकारिक रूप से प्रवेश की अनुमति दी जाती है. अगर उनको प्रवेश करने दिया जाता है तो उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती है. अगर सरकार ने पत्रकारों को प्रवेश करने की अनुमति दी भी तो विद्रोहियों का पक्ष सुनने का कोई तरीक़ा नहीं रह जाता.
हमने म्यांमार की यात्रा की और देश के पूर्वी भाग में एक महीना बिताया. जहां हम थाईलैंड की सीमा से लगे करेनी राज्य और चीन की सीमा से सटे शान राज्य में विद्रोही समूहों के साथ रहे.
हमने फ्रंटलाइन तक पहुँचने के लिए जंगल के रास्तों से यात्रा की, जहां सेना हफ़्तों से अलग-थलग और घिरी हुई है. यहां पर हपासांग की तरह ही लड़ाकों का ऊंची जगह पर तैनात होना, उन्हें रणनीतिक तौर पर फ़ायदा पहुंचाता है. इससे उन्हें संघर्ष में भी लाभ मिलता है.
हपासांग में विद्रोही इंतज़ार कर रहे हैं. उन्हें विश्वास है कि उनका पलड़ा भारी है. क़रीब 80 सैनिक एक महीने से ज़्यादा समय से वहां फंसे हुए हैं. माना जा रहा है कि क़रीब 100 की या तो मौत हो गई है या ज़ख़्मी हैं.

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वो पल जब सेना को विद्रोहियों ने घेर लिया
पहाड़ी की चोटी से, ने म्यो ज़िन लाउडस्पीकर के ज़रिए आत्मसमर्पण के लिए कह रहे हैं, ''हमने तुम्हें घेर लिया है. हेलिकॉप्टर आने की कोई संभावना नहीं है. ज़मीनी स्तर पर कोई मदद? नहीं. आपके पास आज का दिन ये तय करने के लिए है कि जनता की पक्ष में आना है या नहीं.''
नीचे सैन्य शिविर में सन्नाटा पसरा है.
म्यो ज़िन इन सैनिकों से बर्मा की सेना के जनरल इनचार्ज मिन आंग लाइंग को छोड़ने के लिए कह रहे है.
वो कहते हैं, ''तुम सबकी जान बख़्श दी जाएगी. ये सबसे बड़ा वादा है जो मैं कर सकता हूं. ऐसे में मूर्ख मत बनो. क्या आप तानाशाह मिन आंग लाइंग की अवैध संपत्ति बचाने के लिए अपनी आख़िरी सांस तक लड़ेंगे? अब, मैं तुम लोगों के स्वागत का इंतज़ार कर रहा हूं.''
समय बीतता जा रहा है. पहाड़ की चोटी पर बस मक्खियों के भिनभिनाने की आवाज़ आ रही है.
शायद म्यांमार की सैन्य सरकार के फौजी ये सोच रहे हैं कि उन्हें क्या जवाब देना है. ये कोई मामूली फ़ैसला नहीं है, अगर वो सरेंडर करते हैं और सेना के नियंत्रण वाले इलाक़े में जाते हैं तो शायद उन्हें मौत की सज़ा दे दी जाएगी.
ऐसे में उनका जवाब ज़ोरदार आता है. सैनिकों ने चौकी पर फिर से गोलीबारी की. विद्रोही इस गोलीबारी से बचने के लिए छिपने लगे. आज कोई भी सरेंडर नहीं करेगा.
ज़िन ने अपना दृढ़ संकल्प दिखाते हुए बिना किसी रुकावट के प्रसारण जारी रखा. ज़िन के अलावा बेस पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए तैनात कमांडर ने भी रेडियो पर प्रसारण शुरू कर दिया. उन्होंने सैनिकों को मिन आंग लाइंग का कुत्ता बताया और अपने देश से विश्वासघात करने का आरोप लगाया.
सैनिक भी अपने अपमान का जवाब देते हैं. अतिरिक्त सेना और भोजन की आपूर्ति से वंचित ये सैनिक अपनी ज़िद पर अड़े हुए हैं, इनका विश्वास है कि देश पर शासन करना सैनिकों का अधिकार और उनकी नियति है.
दोनों तरफ़ की वैचारिक खाई को नहीं भरा जा सकता है. दोनों ही तरफ़ से ऐसा 30 मिनट तक चलता रहा, बाद में विद्रोही लड़ाके पीछे हट गए.
हज़ारों लोगों ने छोड़ी पढ़ाई और अपना करियर

ये वैचारिक लड़ाई से कहीं ज़्यादा है, ये एक पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला युद्ध है.
युवा सत्ता के ख़िलाफ़ हैं, एक नई व्यवस्था जो पुरानी व्यवस्था से आज़ाद होना चाहती है. ये वही युवा हैं, जिन्होंने नाकाम हुए आंदोलनों के बारे में सुना है और उन्होंने अब तय कर लिया है कि ये उनका समय है.
आधी सदी के सैन्य शासन के बाद, म्यांमार ने साल 2015 में सू की और उनके नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के साथ कुछ समय के लिए लोकतंत्र देखा था.
हालांकि, इस दौर में भी कई तरह की दिक्क़तें थीं, लेकिन बावजूद इसके कई युवाओं के लिए ये दौर देश के इतिहास में आज़ादी का सुनहरा पल था.
लेकिन लोकतंत्र को ख़त्म कर दिया गया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को हत्याओं और गिरफ़्तारियों का सामना करना पड़ा. विद्रोह करने वालों में से कई ने हमसे बताया कि हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.
यंगून जैसे प्रमुख शहरों के हज़ारों डॉक्टरों, गणितज्ञों, मार्शल आर्ट फाइटर्स और छात्रों ने पढ़ाई और करियर छोड़ दिया और सैन्य शासन के ख़िलाफ़ काम कर रहे विद्रोहियों के समूहों में शामिल हो गए.
इस मोर्चे पर सभी लड़ाके 25 साल से कम उम्र के हैं.
करेन नेशनलिटीज डिफेंस फोर्स (केएनडीएफ) के 22 साल के नाम री बताते हैं कि वो विद्रोही समूह में क्यों शामिल हुए.
वो कहते हैं, ''उन कुत्तों (सेना के अपमान के लिए आमतौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द) ने अन्याय किया है. उन्होंने एक ग़ैर-कानूनी तख़्तापलट किया है. हम युवा इससे नाख़ुश हैं."
नाम री ने बारूद बेल्ट पहना हुआ है. अपने आस-पास के ज़्यादातर पुरुषों से अलग उनके पास एक बैलिस्टिक हेलमेट है. इन विद्रोहियों के पास शारीरिक कवच नहीं है.

केएनडीएफ के आने से विद्रोही समूहों को मिली है मज़बूती
केएनडीएफ, युवा लड़ाकों और कमांडरों का समूह है जो तख़्तापलट के बाद सामने आया है.
करेनी राज्य में दशकों से विद्रोही समूहों के लोग सेना के ख़िलाफ़ लड़ते आए हैं लेकिन अब केएनडीएफ के आने से इन विद्रोहियों को कई सफलता मिली हैं.
सैन्य जुंटा के ख़िलाफ़ माहौल तब बनने लगा जब पिछले साल 27 अक्टूबर को देश के उत्तर में विद्रोहियों के समूह ने सैन्य चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया. इसके बाद से देशभर के दर्जनों शहर सशस्त्र विद्रोहियों के हाथ में आ गए.
सेना ने अब भी प्रमुख शहरों पर क़ब्ज़ा जमाए रखा है लेकिन ग्रामीण इलाक़ों और म्यांमार की सीमाओं पर सेना का नियंत्रण धीरे-धीरे कम हो रहा है.
केएनडीएफ का कहना है कि वो और दूसरे विद्रोही समूहों ने करेनी राज्य के 90% हिस्से पर नियंत्रण हासिल कर लिया है. ये भले ही छोटा इलाक़ा हो लेकिन ये प्रतिरोध का बड़ा केंद्र बन गया है.
एक आम के पेड़ की छांव में केएनडीएफ़ के डिप्टी कमांडर माउई फो थाइके बैठे हुए हैं. गठीले बदन वाले थाइके के हाथ पर टैटू बना हुआ है. अमेरिका से पढ़ाई करने वाले पर्यावरणविद थाइके ने पहली बार तीन साल पहले बंदूक उठाई थी.
वो सैन्य जुंटा को सरकार के तौर पर नहीं मानते. वो कहते हैं कि पूरा देश अब सेना से लड़ रहा है.
थाइके कहते हैं, ''रणनीति बदली जा रही है. अब समन्वय के साथ हमले किए जा रहे हैं.''

केएनडीएफ के पास लड़ाकों की कोई कमी नहीं है लेकिन हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति कम है. दूसरे देशों में रहने वाले म्यांमार के लोगों से इस विद्रोह को ज़्यादातर फंड मिलता है.
थाइके कहते हैं, ''हमारे पास दिल है, नैतिकता है, हमारे पास पर्याप्त मानवता है. इस तरह से हम उन्हें हराने जा रहे हैं.''
उनके हाथ पर बने टैटू पर लिखा है, ''स्वतंत्र सोच वाला''.
मैंने उनसे पूछा कि क्या आप अभी स्वतंत्र सोच वाली शख़्सियत हैं.
उन्होंने कहा, ''इस यूनिफॉर्म में नहीं, लेकिन इसके बिना मैं एक आज़ाद इंसान हूं. यही हमारा सपना है. हम इसे फिर से बनाएंगे.''

दुनिया से कट चुका है म्यांमार
म्यांमार में प्रवेश करना न केवल भुला दिए गए युद्ध की यात्रा करना है बल्कि बाहरी दुनिया से कटे देश की यात्रा करना है.
करेन राज्य में ज़्यादातर मोबाइल फोन नेटवर्क, इंटरनेट और बिजली काट दी गई है. सेना भले ही बैकफुट पर है लेकिन उनके बचे हुए अड्डे राज्य की मुख्य सड़कों को नियंत्रित करते हैं.
हपासांग से 60 किलोमीटर दूर डेमोसो जाने में 10 घंटे का समय लगा. इस यात्रा के दौरान उबड़-खाबड़ और गंदगी वाले रास्तों, पहाड़ियों और नदियों से होकर जाना पड़ा.
हम पास के शहर मोएबी में एक सैन्य अड्डे पर पहुंचे, जहां कुछ समय पहले ही हमला हुआ था और वहां 27 विद्रोही लड़ाके मारे गए थे.
जंगल में स्थित एक अस्पताल के बिस्तर पर कई केएनडीएफ़ के लड़ाके लेटे हुए हैं. कुछ मुस्कुराते हैं और थंब्स अप करते हैं. ज़्यादातर का हाथ या पैर गायब है.
बेस पर हुए हमले में 23 साल के ऑन्ग ग्ले की जांघ की नस में कील धंस गई जिससे बाएं पैर में सूजन आ गई है. ऑन्ग बात करने में सक्षम नहीं हैं और वो जैसे ही बात करना शुरू करते हैं उन्हें रोना आ जाता है.
ऑन्ग को रोता देख उनके साथी उन्हें संभालने आ जाते हैं.
अब वो ऑपरेट नहीं कर पा रहे हैं और इलाज के लिए ऑन्ग को थाईलैंड तक का लंबा सफर तय करना होगा.
मैंने एक डॉक्टर से पूछा कि क्या वो (ऑन्ग) बचेंगे? डॉक्टर ने कहा, ''हां वो ठीक हो जाएंगे लेकिन मुझे लगता है कि वो डिप्रेस्ड हैं क्योंकि अब ऑन्ग लड़ नहीं पाएंगे.''

जब मोर्टार ठीक हमारी गाड़ी के पास आकर गिरा
कई मामलों में ये जंग कई सदियों से चली आ रही है. वीभत्स और भयावह. मोएबी में हुई लड़ाई काफी दिनों तक चली, सैन्य बंकरों पर भी काफी करीब से फ्रंटल इन्फैंट्री हमले हुए.
एक शख्स को हाथों, पैरों और पेट में कई चोटें आई हैं. घायल शख्स ने बताया कि ये सब हैंड ग्रेनेड से हुआ. ये सभी अपने एक कमांडर को बचाने गए थे जिनके पैर में ये ग्रेनेड लगा था.
दक्षिणी राज्य शान के उत्तरी इलाके में सफर के दौरान हमने ये पाया कि ये युद्ध कम भयावह है. साथ ही राज्य की राजधानी लोइकॉव की तरफ जाने वाले रास्ते को भी सेना फिर से अपने क़ब्ज़े में लेने के लिए काउंटर-ऑफेंसिव ऑपरेशन चला रही है.
फिलहाल ये उनका राज्य नहीं है लेकिन KNDF दरथॉर नाम के एक लड़ाके के नियंत्रण में है. वो और उस जैसे ही उसके कई लोग भी हमलों में घायल हुए हैं. उसकी टी शर्ट की बाजू में से एक घाव नजर आ जाता है.
वो कहते हैं, “इस जगह की रक्षा करना हमारे लिए घर की रक्षा करने जैसा है.''
वो शॉर्ट्स और चप्पलों में हैं न ही उसके या उसके साथियों के शरीर पर कोई कवच है. न ही हमारे शरीर पर.
हम केले के एक बगीचे के पास पहाड़ के निचले हिस्से में जहां पर खड़े हैं वहां से वो हमें सैन्य ठिकानों की तरफ इशारा कर के दिखा रहे हैं. जो करीब 1.5 किलोमीटर दूर है.
गोलाबारी हो रही है और छिपने के लिए भगदड़ मच गई है. गोलाबारी, जैसा कि मोर्टार गिरे जा रहे हैं और पास में भी आ रहे हैं.
ऑटोमैटिक बंदूकों से हो रहे जवाबी हमलों की आवाज भी सुनी जा सकती है - ऐसा लग रहा है कि जितना अनुमान था उसके हिसाब से सेना काफी करीब हैं.
कम ही समय में इस बात का आभास हो गया कि सैनिक हमारी तरफ बढ़ रहे हैं. जारी हमले के बीच हम भी तेज रफ्तार के साथ मौके से निकल गए.
एक मोर्टार सड़क पर ठीक हमारी गाड़ी के आगे आकर गिरा. दरथॉर ने बताया, “उनकी टुकड़ी घायल हो गई है इसलिए वो अंधाधुध फायरिंग कर रहे हैं.''

केएनडीएफ ग्रेजुएशन
जंगल के बीच में कहीं बजरी वाली जमीन पर ग्रेजुएशन सेरेमनी की परेड हो रही है. हर रैंक के नए लड़ाके मार्च पास्ट कर रहे हैं. वो सभी केएनडीएफ के नेतृत्व को सलाम कर रहे हैं और उनके रबर की सोल वाले बूट की धमक से धूल उड़ रही है.
युवा लड़के और लड़कियां मार्च कर रहे हैं और वॉरियर नाम के अंग्रेजी गाने के साथ अपने कदम मिला रहे हैं. जो कुछ इस प्रकार है:
''मैदान छोड़ने वाला मैं आखिरी हूं लेकिन सबसे पहले मैं था
ईश्वर बूढ़ा बनाने से पहले मुझे मौत से मिलवा देना
सिपाही हूं मैं और चलता जा रहा हूं
मैं योद्धा हूं और यही मेरा गीत है''
इस बार रिकॉर्ड संख्या में 500 नए रिक्रूट्स की भर्ती हुई है.
जवानों की कमी से जूझ रहे सैन्य जुंटा की ओर से एक भर्ती आदेश लागू किया गया था जिसके बाद रैंकों पर असर आया. फिर सैकड़ों की संख्या में युवा क्रांति में शामिल होने के लिए विद्रोही क्षेत्र की तरफ भागे.
पिछली बार जब मैंने इन लोगों को देखा था तो वो बांस की बंदूकों से प्रशिक्षण ले रहे थे. अब इनके पास असली बंदूकें हैं.
उनके कमांडर माउई ने मुझे बताया कि उनके पास प्रशिक्षण के लिए ज़्यादा वक्त नहीं है. वो कहते हैं, ''हमारी रणनीति ये है कि हम एक महीने का गहन प्रशिक्षण कराते हैं और फिर हम लड़ने के लिए जाते हैं.''
जैसे ही समारोह ख़त्म होता है, मूड बदला हुआ नज़र आता है.

जब हम वापस हपासांग पहुंचे
ये अनुमान लगाना कठिन है कि विद्रोह कहां ले जाएगा. दोनों ही पक्षों के लिए ये वजूद की लड़ाई है और लगातार इसमें रक्तपात और कड़वाहट बढ़ती जा रही है. ऐसा लग रहा है कि इससे वापस आ पाना असंभव है.
साढ़े तीन हफ़्ते के बाद हम हपासांग वापस आ गए. वो आर्मी बेस, जहां पर विद्रोहियों का हमला होना था, ये अब भी यहां मौजूद है.
सेना ने क़रीब 100 लोगों की अतिरिक्त फौज़ यहां भेजी है. लेकिन विद्रोहियों के साथ लड़ाई में 57 पकड़े गए और बाकी के मारे गए या भाग गए.
सेना इस बेस को आपूर्ति देने में नाकाम रही लेकिन विद्रोहियों के साथ मुठभेड़ का एक और नतीजा आया. मतलब ये है कि विद्रोहियों का गोला बारूद ख़त्म हो गया. अब वो एक और चौकी पर हमला करने में सक्षम नहीं थे.
हमारे पहुंचने से एक दिन पहले सेना ने हवाई जहाज के जरिए हपासांग पर नज़र रखने वाली ऊंची चोटी पर बम बरसाए थे. इस हमले में तीन उन लड़ाकों की मौत हो गई जिन्हें हम पहले मिल चुके थे और 10 लोग घायल हो गए.
इससे पहले यहां पर संगीत देखने को मिल रहा था. लेकिन अब यहां माहौल खराब हो चुका था. अब आत्मसमर्पण के लिए अपील की संभावना नहीं दिख रही थी. अब ये मौत की लड़ाई होगी.
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