म्यांमार के गृह युद्ध में सेना को क्या वापस मिल रही है बढ़त?

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    • Author, जोनाथन हेड
    • पदनाम, दक्षिण पूर्व एशिया संवाददाता

थाईलैंड से लगे म्यांमार बॉर्डर पर अब युद्ध तेज़ी से नया मोड़ ले रहा है. दो हफ्ते पहले ही म्यावाड्डी शहर के अपने सैन्य ठिकाने पर नियंत्रण खो देने के बाद सैन्य जुंटा ने इस पर एक बार फिर से क़ब्ज़ा कर लिया है.

म्यावाड्डी म्यांमार-थाईलैंड बॉर्डर से सटा हुआ शहर है.

ऐसे में जिस जुंटा को देश के दूसरे हिस्सों में कई बार हार का सामना करना पड़ा है, उसने म्यावाड्डी में अपना नियंत्रण बनाए रखा है.

लेकिन ये पूरी तस्वीर जितनी साफ दिख रही है उतनी है नहीं.

तीन साल पहले जिस तरीके से सैन्य जुंटा ने तख़्तापलट कर दिया था, उसके बाद से म्यांमार में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है.

अब इस महीने की शुरुआत में कैरेन नेशनल यूनियन (केएनयू) ने म्यावाड्डी के सभी सैन्य ठिकानों पर क़ब्ज़ा कर लिया था, उसके बाद से युद्ध में अहम बदलाव की शुरुआत हुई.

इस शहर पर नियंत्रण इतना अहम क्यों है?

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इमेज कैप्शन, सैन्य जुंटा को देश के दूसरे हिस्सों में कई बार हार का सामना करना पड़ा है, उसने म्यावाड्डी में अपना नियंत्रण बनाए रखा है.

ये दशकों में पहली बार था जब म्यांमार के सबसे लंबे समय तक चलने वाले विद्रोही समूह केएनयू ने शहर पर नियंत्रण हासिल किया है. ये एक अहम जीत थी, क्योंकि थाईलैंड के साथ होने वाला अधिकांश व्यापार यहीं से होकर गुज़रता है. साथ ही यहां पर कई बड़े और बेहद आकर्षक कसीनो कॉम्प्लेक्स भी हैं.

लेकिन वास्तव में केएनयू ने कभी म्यावाड्डी पर क़ब्ज़ा किया ही नहीं, बस शहर के ठीक बाहर के बटालियन 275 आर्मी बेस पर नियंत्रण के लिए अपने सहयोगी पीपुल्स डिफेंस फोर्सेज (पीडीएफ) की टुकड़ी तैनात की. और शहर को चलाने वाले पुलिस, इमिग्रेशन और स्थानीय सरकारी अधिकारियों को भी नहीं बदला.

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केएनयू, नियंत्रण को लेकर इसलिए भी संकोच में था क्योंकि इस इलाके में दूसरे कैरेन विद्रोहियों का गुट भी था, जिनके सैन्य जुंटा से अच्छे खासे संबंध थे. ऐसे में इन कैरेन विद्रोहियों की प्रतिक्रिया क्या होती इसके बारे में केएनयू अनिश्चित था. केएनयू नेतृत्व का कहना था कि अलग-अलग कैरेन समूहों के बीच टकराव वो नहीं चाहते थे.

इन विद्रोही गुटों में से जो सबसे बड़ा गुट है वो खुद को कैरेन नेशनल आर्मी (केएनए) कहते हैं, जिसका नेतृत्व सॉ चिट टू करते हैं. सॉ 90 के दशक में केएनयू से अलग हो गए थे.

इस इलाके में बदनाम श्वे कोक्को कसीनो कॉम्प्लेक्स को भी वो चलाते हैं, ऐसा माना जाता है कि ये कॉम्प्लेक्स कई घोटालों का केंद्र है. इससे जो पैसा हासिल होता है उससे हज़ारों लड़ाकों वाली प्राइवेट आर्मी को चलाया जाता है. साल 2010 से ही ये लड़ाके सेना को मदद पहुंचा रहे हैं.

जनवरी में सॉ ने एलान किया था कि वो जुंटा के साथ अपने संबंधों को तोड़ रहे हैं लेकिन केएनयू का आरोप है कि केएनए ने उन सैनिकों की मदद की जिन्हें बटालियन 275 पर कब्जे़ के वक्त बाहर निकाल दिया गया था.

केएनयू के संकोच के कुछ और कारण भी थे

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इमेज कैप्शन, थाईलैंड-म्यांमार बॉर्डर पर खड़े लोग

केएनयू की हिचकिचाहट का दूसरा कारण सेना की वायु शक्ति थी. जिसका इस्तेमाल सेना उन जगहों पर करती है जहां उसे हार का सामना करना पड़ा है.

पिछले हफ्ते Mi35 हेलीकॉप्टर गनशिप और Y12 विमानों ने म्यावाड्डी में केएनयू के ठिकानों पर बमबारी की थी, जिसमें कई लोग हताहत हुए और हजारों लोगों को बॉर्डर पर थाईलैंड की तरफ़ शरण लेनी पड़ी थी.

केएनयू के सूत्रों का ये भी कहना है कि थाई सेना ने उनसे कहा था कि म्यावाड्डी में नियंत्रण के लिए लड़ाई नहीं छेड़नी चाहिए क्योंकि इससे व्यापार बाधित होगा. साथ ही बड़ी संख्या में शरणार्थी थाईलैंड की तरफ़ जाएंगे.

केएनयू नेतृत्व ने अपनी सेनाओं को आंशिक रूप से बटालियन 275 बेस को छोड़ने का आदेश दिया था, जिससे म्यावाड्डी में और तबाही न मचे. हालांकि, शहर के पश्चिम में बड़ी लड़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए भी कहा.

सेना का गुस्सा और केएनयू की रणनीति

म्यावाड्डी की हार से गुस्से में आए जुंटा सेना ने सीमा के रास्ते पर अपना नियंत्रण हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर सेना, बख़्तरबंद गाड़ियों और हथियारों को भेजने का आदेश दिया. पिछले साल अक्टूबर से विद्रोहियों के हाथों मिल रही एक के बाद एक हार के बाद से ये सेना का सबसे बड़ा जवाबी हमला है.

केएनयू लड़ाकों को सेना के इस काफ़िले पर घात लगाने के लिए तैनात किया गया. इससे सेना की प्रगति धीमी हो गई और कई वाहन नष्ट कर दिए गए.

सेना की तरफ़ से इसकी कमान जनरल सो विन के पास थी, जो सेना में पद के लिहाज़ से दूसरे नंबर पर थे.

इससे साफ है कि जुंटा के लिए ये कितना अहम है. लेकिन अब सो विन सार्वजनिक तौर पर दिखाई नहीं दे रहे हैं. ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि या तो वो घायल हो गए हैं, या तो उन्हें उनके लीडर मिन आंग लाइंग ने पद से हटा दिया है

अगर इस सैन्य गतिविधि को रोक दिया जाता है या सेना को पीछे लाया जाता है तो ये म्यावाड्डी पर क़ब्ज़े से ज़्यादा बड़ी घटना होगी. इससे ये तय हो जाएगा कि इलाके में सीमा तक पहुंचने तक का नियंत्रण केएनयू के पास रहेगा.

केएनयू की दुविधा

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इमेज कैप्शन, म्यांमार में सबसे लंबे समय से मौजूद विद्रोही समूह है केएनयू

लेकिन केएनयू को कई तरह की दुविधाओं का सामना करना पड़ता है.

तख्तापलट के बाद से कैरेन राज्य में लड़ाई की वजह से 7 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं, ये आंकड़ा राज्य की आबादी का आधा है. जुंटा के ख़िलाफ़ लड़ाई के बढ़ने से हालात और बदतर हो जाएंगे.

केएनयू को अपने सभी सात ब्रिगेड्स के बीच एकता बनाए रखने की भी चुनौती है. इन सब में तख्तापलट से पहले कई विवाद थे.

केएनयू को अब ये भी तय करना होगा कि म्यावाड्डी के लिए उसकी क्या नीति है, ये इलाक़ा कैरेन राज्य की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है.

सॉ चिट टू से अलग हुए केएनए के लिए लोगों में अविश्वास है. कैसीनो कॉम्प्लेक्स को केएनयू मानव तस्करी जैसे अपराधों का अड्डा मानता है और केएनयू का मानना है कि इसे बंद कर देना चाहिए.

लेकिन सॉ चिट टू की योजना है कि चीनी कंपनी याताई के साथ साझेदारी में वो श्वे कोक्को कॉम्प्लेक्स को एक बड़े क्रॉस बॉर्डर एंटरटेनमेंट ज़ोन में तब्दील कर दें.

सॉ इतने शक्तिशाली हैं कि वो श्वे कोक्को को बंद करने की किसी भी योजना को नाकाम कर सकते हैं. लेकिन अगर थाईलैंड के साथ मिलकर इसे बंद कराने की योजना हो तो बात कुछ और हो सकती है, क्योंकि इस कॉम्प्लेक्स को इलेक्ट्रिसिटी और कम्युनिकेशन थाईलैंड से ही मिलता है.

हालांकि थाईलैंड से मिलकर ऐसा करने की भी कोई संभावना नहीं दिखती, क्योंकि श्वे कोक्को प्रोजेक्ट में वित्तीय रूचि दिखाने वालों में कई थाई लोग शामिल हैं. इतना ही नहीं केएनयू के भी कुछ प्रभावशाली लोग कैसीनो बिज़नेस में शामिल हैं.

केएनयू सूत्रों से बातचीत में ऐसा लगता है कि 11 अप्रैल को जब इस ग्रुप ने सैन्य ठिकाने पर नियंत्रण हासिल किया था, उस वक्त तक वो म्यावाड्डी पर नियंत्रण से जुड़ी मुश्किलों को संभालने के लिए तैयार नहीं था.

केएनयू 75 सालों से अधिक समय से स्वशासित कैरेन राज्य के लिए लड़ रहा है, इस संगठन का नेतृत्व करने वाले इस मसले को लंबी लड़ाई के तौर पर देख रहे हैं. वो तख़्तापलट के बाद अपदस्थ सरकार नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट को शरण भी दे रहे हैं.

लेकिन सैन्य जुंटा के ख़िलाफ़ अलग-अलग जातीय सेनाओं, वॉरलॉर्ड, पीडीएफ के लड़ाकों का समन्वय करना एक अहम कार्य है और इस काम में कामयाबी भी मिल जाए ये भी निश्चित नहीं है.

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