म्यांमारः 'फ़ौज को समझना होगा कि देश में शांति के लिए मेरी मां को रिहा करना पड़ेगा'

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म्यांमार की नेता आंग सान सू ची ने अपना 78वां जन्मदिन 19 जून को मनाया, उनके सबसे छोटे बेटे किम एरिक ने उनके लिए संदेश दिया है.
बीबीसी को भेजे किम एरिक के संदेश का संक्षिप्त हिस्साः
सबसे पहले तो मेरी मां और सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जाए. हम बर्मा की फ़ौज से अपील करते हैं कि वो चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपने के लिए बातचीत शुरू करे और संघर्ष विराम की घोषणा करे.
जबसे मेरी मां को गिरफ़्तार किया गया और जब से उन्हें जेल में डाला गया गया, मेरा उनसे कोई संपर्क नहीं है और मुझे ये भी नहीं पता कि वो कहां हैं और उन्हें किन हालात में रखा गया है.
लंदन में मैंने ब्रिटिश फ़ॉरेन ऑफ़िस के मार्फ़त बर्मा दूतावास से पता करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
मेरी मां की गिरफ़्तारी पूरी तरह ग़ैरक़ानूनी है और (उन पर लगाए गए) सभी आरोप ग़लत हैं. सुनवाई के दौरान मां को उनकी क़ानूनी टीम से सलाह मशविरा भी नहीं करने दिया गया और इस तरह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सुनवाई का मौका नहीं दिया गया.

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ब्रिटिश सरकार से अपील
अदालत में मेरी मां की सुनवाई के दौरान किसी भी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज म्यांमार में अधिकांश लोग ऐसे ही हालात का सामना कर रहे हैं.
जबसे फ़ौज ने तख़्तापलट किया है, 22,531 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है जिनमें 610 बच्चे हैं और 156 लोगों को मौत की सज़ा दी जा चुकी है. कुछ मौत की सजाओं ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया.
इस समय देश की एक तिहाई आबादी या लगभग 1.76 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की ज़रूरत है. ऐसे अनुमान हैं कि कुछ जगहों पर सुरक्षा और मानवीय सहायता की तत्काल ज़रूरत है.
वास्तविकता है कि ये आंकड़ा कहीं अधिक हो सकता है.
इन सूचनाओं के मद्देनज़र हम सभी सरकारों से आग्रह करते हैं कि वो बर्मीज़ मिलिट्री तानाशाहों पर वास्तविक दबाव डालना शुरू करें ताकि उनके की ओर से लोगों के साथ की जा रही बर्बरता और अमनवीयता पर रोक लग सके.
मैं उन सभी देशों और ख़ास तौर पर ब्रिटिश सरकार से अपील करना चाहता हूं कि वो वहां से अपने राजनयिकों और नागरिकों को बाहर निकालें और नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट के साथ खुली वार्ता करें.

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'जापान, भारत को तानाशाही से फ़र्क नहीं'
सभी आसियान देशों के लिए इलाक़ाई स्थिरता अहम है और अगर वे पड़ोसी देशों से मुक्त व्यापार करना चाहते हैं तो मैं उम्मीद करता हूं कि वो म्यांमार में एक लोकतांत्रित रूप से चुनी हुई सरकार देखना चाहेंगे.
ये निराशाजनक है कि जापान और भारत, जिन्हें दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक देश कहा जाता है, उन्हें सैन्य तानाशाही से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है.
सच्चाई ये है कि बहुत से कारणों की वजह से ये देश उन्हें सपोर्ट कर कर रहे हैं और ये मेरे लिए और निराशाजनक है.
मैं भारत और जापान में बचपन में रहा हूं और वहां की कुछ अच्छी यादें हैं, कम से कम मुझे इस बात से आश्चर्य नहीं है कि वहां की सरकारों का रवैया जनता की राय से बिल्कुल जुदा है.
मेरे लिए ये परेशान करने वाली बात है कि कुछ इसराइली हथियार कंपनियां हैं जो म्यांमार के फ़ौजी जुंटा से कारोबार करना चाहती हैं.
ये ध्यान देने वाली बात है कि जो भी जुंटा का समर्थन कर रहा है वो परोक्ष रूप से रूस का भी समर्थन कर रहा है.
फ़ौज कभी भी ये जंग नहीं जीत पाएगी. बर्मा के नौजवान अपनी आज़ादी छिनना कभी स्वीकार नहीं करेंगे.
दशकों तक इसके लिए लड़ी गई लड़ाई और इस दिशा में हासिल की गई प्रगति को जाया नहीं होने दिया जाएगा.
मैं उम्मीद कर रहा हूं कि दुनिया के लोग ये महसूस करेंगे कि मेरी नानी के बाद केवल मेरी मां ही हैं जो म्यांमार के जटिल और संवेदनशील हालात में अलग अलग समूहों को एकजुट कर सकती हैं.
इसके साथ ही, सेना को ये समझ जाना चाहिए कि स्थाई और शांत देश के लिए सबसे पहला कदम होना चाहिए मेरी मां को रिहा करना.
मैं उम्मीद करता हूं कि अगले साल इस मौके पर अपनी मां से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दे पाउंगा.
हालांकि ये पहली बार नहीं है कि मैंने इस तरह की उम्मीद ज़ाहिर की है और मैं बस ये उम्मीद करता हूं कि मां समझती है कि मैं उसके साथ हूं.
हैप्पी बर्थ डे मां.

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