म्यांमार: हिंसक संघर्षों के चलते देश में अब गृहयुद्ध जैसे हालात

कचिन प्रांत में पीडीएफ़ के लड़ाके नवंबर 2021 में देसी हथियारों के साथ

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    • Author, सोइ विन, कू कू उंग और नासोस स्टालिनाउ
    • पदनाम, बीबीसी बर्मी सेवा और बीबीसी डेटा जर्नलिज़्म

म्यांमार में हाल के दिनों में सेना और संगठित लोगों के समूह के बीच हिंसक संघर्षों में तेज़ी आई है. नए आंकड़ों से बीबीसी को यह बात पता चली है. सेना के ख़िलाफ़ हिंसक लड़ाई में ढेरों युवा शामिल हैं जो अपनी जान को जोख़िम में डालकर यह संघर्ष कर रहे हैं. एक साल पहले जुंटा के शासन पर काबिज होने के विरोध में यह संघर्ष हो रहा है. यह संघर्ष इतना ज़्यादा बढ़ चुका है कि अब स्थिति संघर्ष से कहीं ज़्यादा गंभीर गृह युद्ध तक पहुंच चुकी है.

संघर्ष निगरानी समूह एकलेड (आर्म्ड कंफ्लिक्ट लोकेशन ऐंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट) के आंकड़ों के मुताबिक पूरा देश अब हिंसा की चपेट में है. ज़मीनी हालत के मुताबिक भी हिंसक संघर्ष अब कहीं ज़्यादा संगठित तौर पर देखने को मिल रहा है और अब यह शहरों तक पहुंच चुका है. पहले शहरी हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष की स्थिति नहीं थी.

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इस संघर्ष में अब तक कितने लोगों की मौत हुई है, इसकी पुष्टि करना बेहद मुश्किल है लेकिन एकलेड ने स्थानीय मीडिया सहित दूसरी रिपोर्टों के आधार पर अनुमान लगाया है कि बीते एक साल के सैन्य शासन के दौरान म्यांमार में क़रीब 12 हज़ार लोग मारे गए हैं. म्यांमार में हिंसक संघर्षों में तेज़ी अगस्त, 2021 के बाद देखने को मिली है.

सैन्य तख़्तापलट के बाद, सेना ने देश भर में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए जो कार्रवाई की, उसमें काफ़ी लोग मारे गए थे. एकलेड के मुताबिक इसके बाद से आम लोगों के साथ संघर्ष के चलते मरने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की प्रमुख मिचेल बाकेलेट ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा है कि म्यांमार के संघर्ष को अब गृह युद्ध कहा जाना चाहिए और देश में लोकतंत्र की वापसी के लिए अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को कहीं ज़्यादा मज़बूत क़दम उठाने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि म्यांमार के ज़मीनी हालात विनाश की तरफ़ बढ़ रहे हैं और यह क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती बन चुका है लेकिन अब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय स्थिति को लेकर तात्कालिकता से गंभीर नहीं हुआ है.

म्यांमार में सरकारी सेना के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले लोगों को सामूहिक तौर पर पीपल्स डिफेंस फोर्स (पीडीएफ़) कहा जा रहा है, जो सशस्त्र नागरिक समूह का एक नेटवर्क है. जिसमें मुख्य तौर पर युवा शामिल हैं.

18 साल की हीरा (वास्तविक नाम नहीं) ने अभी हाई स्कूल की अपनी पढ़ाई पूरी ही की थी लेकिन वे सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गईं. उन्होंने अपने आगे की पढ़ाई को टालने का फ़ैसला लिया और मध्य म्यांमार में पीडीएफ़ की एक हाई प्रोफ़ाइल कमांडर बन चुकी हैं.

उन्होंने बताया कि पीडीएफ़ से जुड़ने का फ़ैसला उन्होंने तब लिया था जब विरोध प्रदर्शन करते हुए छात्र मया त्वे त्वेखाइंग की मौत हुई थी, मया को फ़रवरी, 2021 के विरोध प्रदर्शन के दौरान गोली मार दी गई थी. हीरा ने जब पीडीएफ़ सशस्त्र संघर्ष की ट्रेनिंग लेनी शुरू की तो उनके माता-पिता बेहद चिंतित थे लेकिन बेटी को उद्देश्य के प्रति गंभीर देखकर वे भी मान गए.

कायिन राज्य में पीडीएफ़ के लड़ाके नवंबर 2021 में देसी हथियारों के साथ प्रशिक्षण लेते हुए

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हीरा ने बताया, "उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम यह करना चाहती हो तो मंज़िल हासिल करने तक करो. आधे रास्ते में इसे मत छोड़ना. इसके बाद मैंने अपने ट्रेनर से बात की और ट्रेनिंग हासिल करने के पांच दिन बाद इस क्रांति से जुड़ गए."

सैन्य तख़्तापलट से पहले हीरा जैसे युवा म्यांमार में लोकतंत्र में जीवन यापन कर रहे थे. लेकिन सैन्य तख़्तापलट के बाद इन युवाओं को दूसरे लड़ाका समूहों से मदद और प्रशिक्षण मिल रहा है, दूसरे लड़ाका समूह सीमावर्ती इलाके में सेना के साथ दशकों से संघर्षरत हैं.

म्यांमार का बदलता संघर्ष

म्यांमार में गृह युद्ध जैसे हालत

बीबीसी ने गैर सरकारी संगठन एकलेड के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है. यह संस्था दुनिया भर में राजनीतिक हिंसा और विरोध प्रदर्शन संबंधी आंकड़े जमा करती है. यह संस्था ख़बरों के अलावा नागरिक संगठनों, मानवाधिकार संगठनों एवं स्थानीय और वैश्विक स्तर के संस्थाओं की मदद से सामरिक जानकारी वाली रिपोर्ट प्रकाशित करती है.

हालांकि एकलेड स्वतंत्र तौर पर सभी ख़बरों की पुष्टि नहीं करती है लेकिन संस्था का दावा है कि मौत संबंधी हर ख़बर की अपडेट जानकारी को रिपोर्ट में शामिल किया गया है.

एकलेड के मुताबिक, संस्था की नीति मौतों की संख्या को लेकर न्यूनतम अनुमान देने की है, लेकिन संघर्ष क्षेत्र होने के वजह से जिन रिपोर्टों के आधार पर इसे तैयार किया गया है, हो सकता है वह शत प्रतिशत सही नहीं हो.

इसके बावजूद, एकलेड का दावा है कि संस्था ने सटीक आकंड़ों तक पहुंचने की हरसंभव कोशिश की है. लेकिन पूरी तरह से सटीक जानकारी का मिल पाना असंभव है क्योंकि दोनों पक्ष प्रोपगैंडा के तौर पर अपने अलग- अलग दावे करते रहे हैं. इसके अलावा संघर्ष के इलाक़ों में रिपोर्टिंग करने पर पाबंदियां भी लागू हैं.

बीबीसी बर्मी सेवा ने म्यांमार सेना और पीपल्स डिफ़ेंस फ़ोर्स (पीडीएफ़) से मई और जून, 2021 के दौरान मिले जानकारियों को भी एकत्रित किया है. यह एकलेड के आंकड़ों में भी ज़ाहिर हो रहा है.

म्यांमार में हिंसक होता संघर्ष

पीपल्स डिफ़ेंस फ़ोर्स में समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल हैं- किसान, घरेलू महिलाएं, डॉक्टर- इंजीनियर. ये सब लोग सैन्य सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं.

इसमें हर तबके के युवा शामिल हैं लेकिन बामर नस्ल के मैदानी इलाके और शहरों में रहने वाले युवा विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं, उन्हें दूसरे समुदाय के युवाओं का बखूबी साथ मिल रहा है. हाल के वर्षों में यह पहला मौका है जब बर्मा की सेना को बामर समुदाय के लोगों के हिंसक विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

बाकेलेट ने बीबीसी से बताया, "शहरों के आम नागरिक पीपल्स डिफेंस फ़ोर्स में शामिल हो रहे हैं. इसिलए मैं लंबे समय से कह रही हूं कि अगर हम लोगों ने मज़बूती से क़दम नहीं उठाया तो म्यांमार की स्थिति सीरिया जैसी हो सकती है."

बर्मा की मीडिया के अनुसार, थांटलांग में सेना के हमलों से लोगों के घरों में आग लग गई

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इमेज कैप्शन, बर्मा की मीडिया के अनुसार, थांटलांग में सेना के हमलों से लोगों के घरों में आग लग गई

पूर्व उद्यमी नागर मध्य म्यांमार के सागेइंग क्षेत्र की कई पीडीएफ़ यूनिट को संभालते हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा कि यह कोई बराबरी की लड़ाई नहीं है.

उनका दावा है कि पीडीएफ़ की शुरुआत में लोगों के पास कोई आर्म्स नहीं थे, लोगों ने गुलेल से संघर्ष शुरू किया था. बाद में लोगों ने अपने विस्फोटक बनाने शुरू किए. म्यांमार की सेना ने पिछले दिनों विद्रोह पर अंकुश के लिए कई हवाई हमले किए हैं. बर्मा की सैन्य सरकार को चीन और रूस से सैन्य मदद भी मिल रही है.

बीबीसी के पास मौजूद म्यांममार विटनेस की स्वतंत्र जांच रिपोर्ट के मुताबिक कुछ ही सप्ताह पहले रूस के एक सशस्त्र वाहन ने यंगून में हथियारों की आपूर्ति की है.

लेकिन पीडीएफ की असली ताक़त ज़मीनी स्तर पर स्थानीय समुदाय का समर्थन है. ज़मीनी स्तर पर होने वाले विरोध प्रदर्शन कहीं ज़्यादा संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं. निर्वासित नेशनल यूनिटी सरकार (एनयूजी) की सरकार भी इस संघर्ष में मदद कर रही है और वे पीडीएफ़ की कुछ यूनिटों को संचालित कर रही है.

पीडीएफ उन सरकार के दूर दराज वाले पुलिस स्टेशनों और सरकारी दफ़्तरों को निशाना बना रहा है. वे उस पर हमला करके हथियार और बम पर कब्जा कर लेते हैं. इसके अलावा टेलिकॉम टॉवर और बैंकों को भी निशाना बना रहे हैं.

नागर के मुताबिक पीडीएफ़ के पास संघर्ष के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है. उन्होंने बताया, "मुझे नहीं लगता है कि अब बातचीत से समस्याओं का हल होगा. दुनिया हमारे देश की उपेक्षा कर रही है. इसलिए हमलोगों ने अपने लिए हथियार उठाया है."

हीरा अकेली पीडीएफ़ में शामिल नहीं हुई हैं, उनकी बड़ी बहनें भी इस लड़ाई में उनके साथ हैं. हीरा को उम्मीद है कि एक दिन वे लोग सैन्य शासन को उखाड़ फेंकेंगे.

मार्च 2021 में सेना से लड़ते तख़्तापलट का विरोध करने वाले

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हीरा ने बताया, "सेना आम लोगों की हत्या कर रही है. वे लोगों के काम धंधे, संपत्ति और आजीविका को नष्ट कर रहे हैं, लोगों को डरा धमका रहे हैं. हम लोग इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं."

पिछले कुछ महीनों में म्यांमार में ऐसी घटनाएं लगातार देखने को मिली हैं जहां सेना ने आम लोगों की हत्याएं की हैं, जुलाई महीने में कम से कम से चालीस लोगों की हत्या हुई वहीं दिसंबर महीने में 35 लोगों की हत्या की गई, इनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल थे.

दिसंबर में सेना के एक अन्य हमले में बाल बाल बचे शख़्स से बात की है, इस आदमी ने जान बचाने के लिए मरे हुए शख़्स का अभिनय किया. मध्य म्यांमार के नागात्वेन इलाके में जब सैनिकों ने प्रवेश किया तो वहां छह लोग थे, जो नहीं निकल पाए.

गांव में तीन लोग बुज़ुर्ग थे और दो लोगों की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी फिर भी उन्हें सैनिकों ने मार दिया. हमले में बाल बाल बचे शख़्स ने बताया कि सेना के जवान विद्रोही लड़ाकों को तलाश रहे थे.

इस हमले में मारे गए एक आदमी की पत्नी ने बताया कि उनके पति के शरीर पर चोटों के निशान थे. उन्होंने बताया, "मेरे पति बूढ़े थे, ठीक बोल भी नहीं सकते थे, लेकिन उनको मार दिया. मैं कभी माफ़ नहीं करूंगी. जब भी सोचती हूं रोना आ जाता है."

म्यांमार के सैन्य शासन की ओर से किसी का इंटरव्यू मिलना बहुत ही दुर्लभ है लेकिन बीबीसी को 2021 में सैन्य शासन के प्रवक्ता जाउ मिन तुन से इंटरव्यू करने का मौका मिला था. उन्होंने पीडीएफ़ के लड़ाकों को चरमपंथी कहते हुए सेना की हिंसा को सही ठहराया था.

उन्होंने कहा, "वे जब हम पर हमला करते हैं, तो हम अपने सैनिकों को जवाबी कार्रवाई के लिए कहते हैं. हम देश बचाने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए उपयुक्त स्तर तक की सुरक्षा बढ़ा रहे हैं."

पिछले साल मार्च में सेना के साथ हुई झड़प में घायल एक शख़्स को ले जाते लोग

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हालांकि दोनों तरफ़ कितने लड़ाके युद्ध में शामिल हैं, ये कहना मुश्किल है. आधिकारिक तौर पर म्यांमार की सेना में तीन लाख 70 हज़ार सैनिक हैं लेकिन वास्तविकता में इनसे कम सैनिक होंगे. पिछले कुछ सालों में सैनिकों की ज़्यादा नियुक्तियां भी नहीं हुई हैं. पीपल्स डिफ़ेंस फ़ोर्स के लड़ाकों की संख्या भी स्पष्ट नहीं हैं.

एनयूजी के यूनिटों के अलावा पीडीएफ़ के लड़कों ने सीमावर्ती इलाके में सक्रिय सशस्त्र समूह से प्रशिक्षण हासिल किया है. इनमें से कुछ समूहों ने पिछली सरकारों के समय में युद्धविराम घोषित किया हुआ था, लेकिन अब युद्धविराम जैसी स्थिति नहीं है.

पीडीएफ़ ने सार्वजनिक तौर पर जनजातीय लड़ाकों के प्रति अपनी पूर्व सोच के लिए माफ़ी मांगी हैं. इस सोच के मुताबिक इन समूहों को देश को अस्थिर करने की कोशिश करने वाले लड़ाकों के तौर पर देखा जाता था. अब पीडीएफ़ ने कहा कि भविष्य की संघीय सरकारों में हर किसी को बराबरी के अधिकार मिलेंगे.

मार्च, 2021 में विरोध प्रदर्शन करने वालों के बचाव में पुलिस के सामने घुटनों पर झुकने वाली नन एन रोज नु त्वांग

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सैन्य तख्तापलट के बाद मार्च, 2021 में विरोध प्रदर्शन करने वालों के बचाव में पुलिस के सामने घुटनों पर झुकने वाली नन ने बीबीसी को बताया कि सैन्य शासन के बाद आम लोगों के जीवन में उथल पुथल की स्थिति बन गई है.

सिस्टर एन रोज नु त्वांग ने कहा, "बच्चे स्कूल नहीं जा सकते. शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक स्थिति, रोज़गार के काम धंधे सब कुछ पिछड़ता जा रहा है."

उन्होंने बताया, "कुछ महिलाओं ने गर्भपात तक कराया है क्योंकि वे आर्थिक संकट के चलते बच्चे पालने की स्थिति में नहीं है. माता-पिता आजीविका के संकट के चलते अपने बच्चों का लालन पोषण नहीं कर पा रहे हैं."

लेकिन नन लड़ाई में शामिल युवाओं की प्रशंसा करती हैं. उन्होंने बताया, "वे बहादुर हैं. वे लोकतंत्र हासिल करने, देश की भलाई शांति पाने और सैन्य शासन से देश को मुक्त कराने के लिए बलिदान से नहीं डरते हैं. मैं उनकी प्रशंसा करती हूं, उन पर गर्व करती हूं, उन्हें सलाम करती हूं."

(साथ में रेबेका हेनश्चके और बेकी डे की रिपोर्टिंग, डिज़ाइन: जाना ताउचिन्सकी)

वीडियो कैप्शन, बर्मा की विरासत

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