भारत की म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने की योजना, समस्या सुलझेगी या और बढ़ेगी?

मणिपुर के मारेह में इंडो-म्यांमार फ्रेंडशिप गेट

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    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

गृह मंत्री अमित शाह ने एक हफ्ता पहले म्यांमार के साथ खुली सीमा पर बाड़ लगाने की घोषणा की.

उन्होंने कहा, "भारत 1,643 किमी (1,020 मील) की इस सीमा को ठीक उसी तरह सुरक्षित करेगा, जैसे हमने बांग्लादेश के साथ लगती देश की सीमा की बाड़बंदी की है, जो इससे भी दोगुनी लंबी है."

गृह मंत्री शाह ने कहा था कि सरकार छह साल पुराने मुक्त आवाजाही समझौते को ख़त्म करने पर भी विचार करेगी.

यह समझौता भारत और म्यांमार के सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों को बिना वीज़ा के एक-दूसरे की सीमा में 16 किमी तक की यात्रा की इजाजत देता है.

उन्होंने यह भी बताया था कि बाड़बंदी कैसे की जाएगी और इसमें कितने दिन का समय लगेगा.

लेकिन यह कदम चुनौतियों से भरा होगा. कुछ विशेषज्ञों की राय है कि पहाड़ी इलाके में बाड़ लगाना करीब-करीब असंभव है.

भारत की यह योजना सीमाई इलाके के लोगों में दशकों पुराने संतुलन को बिगाड़ सकती है और पड़ोसियों के साथ तनाव भी बढ़ा सकती है.

भारत की सीमा के पास स्थित म्यांमार का एक गांव

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कहां कहां लगानी होगी बाड़

सीमा पर बाड़बंदी जहां की जानी है, उसमें पूर्वोत्तर भारत के चार राज्य अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम शामिल हैं. ऐसा लगता है कि यह कदम दो बड़े घटनाक्रमों की वजह से उठाया गया है.

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पहला, फरवरी 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार में संघर्ष बढ़ने से भारतीय हितों के लिए बढ़ा खतरा.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, इस लड़ाई में करीब 20 लाख लोग विस्थापित हुए हैं. हाल के हफ्तों में जनजातीय विद्रोहियों ने चिन राज्य के प्रमुख शहर पलेत्वा पर क़ब्जे का दावा किया है. इससे म्यांमार और भारत के बीच एक प्रमुख मार्ग बाधित हो गया है.

दूसरा, पिछले साल मणिपुर में आरक्षण को लेकर जातीय हिंसा भड़क गई, जिसकी म्यांमार के साथ करीब 400 किलोमीटर लंबी सीमा जुड़ी हुई है.

बहुसंख्यक मैतेई और आदिवासी कुकी अल्पसंख्यक समाज में हुई झड़पों में 170 से अधिक लोगों की मौत हुई है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की मणिपुर में भी सरकार है. सरकार ने बड़ी संख्या में आए अवैध प्रवासियों की बात की है और कहा है कि मणिपुर में आकर बसने वाले म्यांमार के प्रभावशाली ड्रग माफिया और पोस्त की खेती करने वालों ने हिंसा को और भड़काया है.

पिछले जुलाई में, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने म्यांमार की सैन्य नेतृत्व वाली सरकार में विदेश मंत्री थान स्वे से बात की थी.

उन्होंने उन्हें बताया था कि भारत के सीमावर्ती 'इलाके की स्थिति गंभीर' है. उन्होंने कहा था कि सीमा पर ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचना चाहिए, जिससे हालात और बिगड़ें. उन्होंने मानव और मादक पदार्थों की तस्करी पर भी चिंता जताई थी.

मणिपुर में पिछले साल शुरू हुई हिंसा में अबतक 170 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है

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मणिपुर की जातीय हिंसा और म्यांमार

अमेरिकी थिंक-टैंक, 'विल्सन सेंटर' के माइकल कुगेलमैन का मानना ​​है कि सीमा पर बाड़बंदी का कदम भारत की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा के बढ़ते दोतरफ़ा ख़तरे की धारणा से प्रेरित है.'

उन्होंने बीबीसी से कहा, "म्यांमार में गहराते जा रहे संघर्ष के प्रभाव को कम करने और अशांत मणिपुर में घुसने वाले म्यांमार के अप्रवासियों के जोख़िम को भारत कम करना चाहता है."

ग्राफिक्स

कुछ लोग इन कारणों की वैधता पर ही सवाल उठाते हैं, जबकि मणिपुर की सरकार ने संघर्ष के लिए म्यांमार से आने वाले कुकी शरणार्थियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. हालांकि इसकी खुद की समिति ने पिछले साल अप्रैल में राज्य में म्यांमार से आए महज 2,187 अप्रवासियों की ही पहचान की थी.

म्यांमार में भारत के राजदूत रह चुके गौतम मुखोपाध्याय कहते हैं, "म्यांमार से बड़े पैमाने पर अवैध आप्रवासन का यह नैरेटिव झूठा है. ऐसा उस नैरेटिव का समर्थन करने के लिए किया जा रहा है कि कुकी 'विदेशी' और अवैध प्रवासी हैं, वे मणिपुर के नहीं हैं और हाल में शुरू हुए उनके विरोध-प्रदर्शन को म्यांमार से समर्थन मिल रहा है.''

वो कहते हैं, "इसके लिए तर्क और सबूत बहुत कमजोर हैं. कुकी सदियों से मणिपुर में बसे हुए हैं. सीमा पर मुक्त आवाजाही की व्यवस्था, मैतेई समेत सभी समुदायों के लिए अच्छा काम करती रही है और मैतेई लोगों ने तो इसका व्यावसायिक लाभ भी उठाया है."

मिज़ोरम ने म्यामांर से आए करीब 40 हजार शरणार्थियों को शरण दी है

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पूर्वोत्तर के विद्रोही गुटों का ठिकाना

इस इलाके का अच्छा-खासा अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ रिटायर्ड सैन्य अधिकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर कहा कि सीमा पर बाड़ लगाने का कारण नागरिकों की आवाजाही नहीं, बल्कि इसलिए है कि पूर्वोत्तर भारत के कई विद्रोही गुटों ने म्यांमार के सीमावर्ती गांवों और कस्बों में अपने शिविर बना लिए हैं.

भारत का पूर्वोत्तर का इलाक़ा दशकों से अलगाववादी विद्रोहों से प्रभावित रहा है.

इन इलाक़ों में आर्म्ड फ़ोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (अफ़स्पा) सुरक्षा बलों को तलाशी और ज़ब्ती की शक्तियां देता है और सैन्य अभियान के दौरान हुई नागरिकों की मौतों के आरोपों से बचाने वाला यह कानून विवादास्पद साबित हुआ है.

उन्होंने कहा कि म्यांमार में छिपे भारतीय विद्रोही आसानी से सीमा में घुस सकते हैं और "वसूली और हिंसक गतिविधियों" को अंजाम दे सकते हैं.

हालाँकि सीमा पर बाड़ लगाने के कदम का विरोध होने की संभावना है.

भारत-म्यांमार के बीच ऐतिहासिक धार्मिक, भाषाई और जातीय संबंध हैं- भारतीय मूल के करीब 20 लाख लोग म्यांमार में रहते हैं. लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत भारत से ये और आर्थिक क़रीबी आर्थिक संबंध चाहते हैं.

भारत ने अपनी 'लुक ईस्ट पॉलिसी' के तहत म्यांमार को सड़क, उच्च शिक्षा, क्षतिग्रस्त पगोडा की मरम्मत के लिए दो अरब डॉलर की मदद दी है, जिसका अधिकांश हिस्सा अनुदान है.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक म्यामांर के चिन प्रांत में जुंटा की गोलीबारी के बाद उठता धुंआ

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लोगों के सदियों पुराने संबंध

महत्वपूर्ण बात है कि यह सीमा साझा जातीय और संस्कृति वाले लोगों को अलग करती है.

मिज़ोरम के मिज़ो और म्यांमार के चिन जातीय चचेरे भाई-बहन हैं. उनके सीमा पार संबंध हैं. खासकर ईसाई बहुल चिन राज्य की सीमा मिज़ोरम से सटी है. सीमा के दोनों ओर नगा हैं.

कई नगा म्यांमार से आकर भारत में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं. अरुणाचल प्रदेश के वालोंग से शिकारी सदियों से सीमा पार आते-जाते रहे हैं.

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि मिज़ोरम ने केंद्र सरकार के निर्देशों को दरकिनार कर म्यांमार में भड़के गृहयुद्ध से भागकर आए 40,000 से अधिक शरणार्थियों को शरण दी हुई है.

भाजपा के सहयोगी और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने हाल ही में कहा था, "लोगों के लिए इस मुद्दे का हल कैसे किया जाए और घुसपैठ को कैसे रोका जाए, इसका एक फॉर्मूला तैयार करना होगा, क्योंकि नगालैंड की सीमा म्यांमार से लगती है और सीमा के दोनों तरफ नगा हैं.''

विशेषज्ञों का भी मानना ​​है कि पहाड़ों और घने जंगलों वाली सीमा पर बाड़ लगाने में महत्वपूर्ण चुनौतियां खड़ी होंगी.

म्यांमार मामलों के मशहूर विशेषज्ञ बर्टिल लिंटर ने कहा, "सीमा के पास सभी पहाड़ों और दूर-दराज के इलाक़े को देखते हुए पूरी सीमा पर बाड़ लगाना असंभव होगा. यह बांग्लादेश के साथ लगती सीमा पर बाड़ लगाने जैसा काम नहीं होगा."

वो कहते हैं, "बाड़ अव्यावहारिक है, इसे लगाने में कई साल लगेंगे. अगर कुछ जगह इसे बनाया भी जाता है, तो स्थानीय लोग इसमें भी रास्ता ढूंढ लेंगे."

भारत-म्यांमार की सीमा

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भारत को म्यांमार की कितनी ज़रूरत है?

ऐसे में महत्वपूर्ण कूटनीतिक सवाल भी हैं.

कुगेलमैन के मुताबिक़, ऐसे समय जब भारत को म्यांमार के साथ बातचीत में सावधानी बरतने की ज़रूरत है, सीमा पर बाड़ लगाना एक उकसाने वाला कदम हो सकता है.

वो कहते हैं, "अन्य प्राथमिकताओं के अलावा भारत सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढांचा विकास के लिए जुंटा का समर्थन चाहता है. ऐसे में इस परियोजना को अकेले आगे बढ़ाने की जगह म्यांमार के परामर्श से बाड़ लगाने से तनाव का ख़तरा कम होगा."

कुगेलमैन कहते हैं, "भारत अपने क्षेत्रीय पड़ोसियों के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए काम कर रहा है. वह अपने पीछे मौजूद चीन की चुनौतियों को दूर करने की कोशिश कर रहा है, सीमा की चुनौतियां एक अवांछित घुसपैठ है. इसलिए उन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है."

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