म्यांमार: सेना के ख़िलाफ़ क्यों बढ़ रही है राष्ट्रवादी बौद्ध भिक्षुओं की नाराज़गी?

म्यांमार जुंटा नेता

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    • Author, जोनाथन हेड
    • पदनाम, दक्षिण पूर्व एशिया संवाददाता

कट्टर राष्ट्रवादी बौद्ध भिक्षुओं की ओर से पेश चुनौतियों के कारण म्यांमार में तख़्तापलट करने वाले नेता पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

बीते मंगलवार को, म्यांमार के मशहूर पहाड़ी क़स्बे प्यिन ऊल्विन के छोटे से मुख्य चौराहे पर एक चश्माधारी भिक्षु की बातें सुनने के लिए कई सौ लोगों की भीड़ इकट्ठी हुई.

उस भिक्षु ने कहा कि देश के सैन्य शासक मिन आंग लाइंग को गद्दी से उतर जाना चाहिए और अपने सहयोगी जनरल सोए विन को सत्ता सौंप देनी चाहिए.

मिन आंग लाइंग ने 2021 में चुनी हुई आंग सान सू ची की सरकार के ख़िलाफ़ तख़्तापलट की अगुवाई की थी.

उन्होंने एक विनाशकारी गृह युद्ध को भड़काया और उन पर अंतरराष्ट्रीय जगत की ओर से कई प्रतिबंध लगाए गए. ये कहा जाता है कि म्यांमार की अधिकांश जनता उनसे नफ़रत करती है.

हालांकि उनकी ताज़ा आलोचना बिल्कुल अलग कोने से आ रही है. पॉक को ताव, बौद्ध भिक्षुओं के कट्टर राष्ट्रवादी धड़े से आते हैं और अभी तक सैन्य जुंटा के पक्ष में दृढ़ता से खड़े थे.

लेकिन हाल के सप्ताह में जनजातीय विद्रोहियों के हाथों सेना की एक के बाद एक भारी हार ने कभी मिंग आंग लाइंग के कट्टर समर्थक रहे पॉक को सोचने पर मजबूर कर दिया.

पॉक को ताव

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इमेज कैप्शन, जुंटा समर्थक डेमोक्रेटिक कारेन बुद्धिस्ट आर्मी मिलिशिया के सदस्यों की हिरासत में पॉक को ताव.

सेना के समर्थकों में गिरावट

पॉक को ताव ने भीड़ से कहा, “सोए विन का चेहरा देखिए. यह एक असली सैनिक का चेहरा है. मिन आंग लाइंग हालात संभाल नहीं पा रहे. उन्हें नागरिक प्रशासन की ओर लौट जाना चाहिए.”

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ये स्पष्ट नहीं है कि पॉक को ताव की सेना में कितनी पैठ है. लेकिन उनकी टिप्पणी जुंटा के अन्य समर्थकों से ज़्यादा अलग नहीं है, जो विरोधियों के ख़िलाफ़ म्यांमार की सेना के नेतृत्व की अक्षमता से लगातार हताश होते जा रहे हैं.

बीबीसी बर्मीज़ को इंटरव्यू देने से पॉक को ताव ने मना कर दिया.

प्यिन ऊ ल्विन एक समय ब्रिटिश उपनिवेश का हिल स्टेशन रहा है और अब यहां प्रतिष्ठित डिफ़ेंस सर्विसेज़ एकेडमी है, जहां सेना के शीर्ष अधिकारी प्रशिक्षण पाते हैं. भाषण देने के लिए इस जगह के चुनाव का मतलब है कि सेना को संदेश देना कि उनके समर्थकों की तादाद घट रही है.

म्यांमार में सेना और बौद्ध भिक्षु संगठनों के बीच साठ गांठ कोई नई बात नहीं है.

बर्मा के भिक्षुओं की सत्ता विरोधी गतिविधियों की एक लंबी कड़ी रही है, 1930 के दशक में उपनिवेश विरोधी आंदोलनों से लेकर 1988 और 2007 में सैनिक शासन के ख़िलाफ़ उभार तक.

अधिकांश भिक्षुओं ने 2021 के तख़्तापलट का विरोध किया और कुछ ने तो अपने चीवर (वस्त्र) छोड़ जुंटा के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए.

लेकिन कुछ ने जनरलों के साथ काम किया और सेना के नैरेटिव के साथ खड़े हुए. उनका कहना था कि बौद्ध धर्म और बर्मा की संस्कृति को बाहरी प्रभाव से बचाने की ज़रूरत है.

म्यांमार की आबादी में सिर्फ़ 8% मुस्लिम हैं.

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इमेज कैप्शन, म्यांमार की आबादी में सिर्फ़ 8% मुस्लिम हैं.

बौद्ध संघ और मिलिटरी जुंटा

साल 2012 में रखाइन प्रांत में स्थानीय बौद्धों और मुस्लिम रोहिंग्या के बीच हिंसक झड़पों के बाद एक चरमपंथी भिक्षु विराथु ने मा बा था (नस्ल और धर्म को बचाने वाला संघ) नामक एक आंदोलन शुरू किया.

इसने मुस्लिमों के व्यवसायों के बहिष्कार को प्रोत्साहित किया और दावा किया कि बर्मा के बौद्धों पर मुस्लिमों की ओर से ख़त्म किए जाने का ख़तरा मंडरा रहा है. लेकिन सच ये है कि म्यांमार की आबादी में सिर्फ 8% मुस्लिम हैं.

2017 में इस आंदोलन पर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन उसे सेना का समर्थन जारी रहा.

नस्लीय हिंसा भड़काने के लिए पहले जेल जा चुके विराथु को 2020 में भी जेल हुई थी. लेकिन एक साल के अंदर उन्हें सेना ने रिहा कर दिया और मिन आंग लाइंग ने उन्हें सम्मानों और पैसे से नवाज़ा.

फ़रवरी 2021 में मिन आंग लाइंग के तख़्तापलट के विरोध में बड़े पैमाने पर विरोध फूट पड़ा. लोकतांत्रिक शासन की मांग को लेकर विशाल रैलियां हुईं, जिन्हें बर्बर तरीके से दबा दिया गया. उसके बाद से ही 67 साल के जरनल अपनी वैधता बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और खुद को बौद्ध धर्म के चैंपियन के रूप में पेश कर रहे हैं.

सरकारी मीडिया में ऐसी तस्वीरें लगातार प्रकाशित हो रही हैं जिनमें इस कमज़ोर तानाशाह को मठों को उपहार देते और वरिष्ठ मठाधीशों के अंतिम संस्कार में आगे आगे दिखाया जाता है.

राजधानी नाय प्यी ताव में दुनिया के सबसे बड़े बैठे हुए बुद्ध की प्रतिमा की आधारशिला रखते हुए उन्हें दिखाया गया है, जिसका पूरा खर्च सेना उठा रही है.

म्यांमार

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सेना का खुलकर समर्थन

म्यांमार की शीर्ष धार्मिक संस्था, कार्यकारी बुद्धिस्ट काउंसिल या स्टेट संघ ने तख़्तापलट पर सार्वजनिक रूप से शायद ही कुछ बोला है. माना जाता है कि इसके कुछ सदस्यों ने खामोशी से जनरलों को संयम बरतने को कहा है.

लेकिन संघ के एक वरिष्ठ भिक्षु सितागु सायादाव ने सेना का खुलकर समर्थन किया और रूस से हथियार खरीद के दौरे पर मिन आंग लाइंग के साथ यात्रा भी की.

अन्य भिक्षु इससे भी आगे गए. विराथु के एक अनुयायी वथावा ने जुंटा से लड़ रहे पीपुल्स डिफ़ेंस फ़ोर्सेस से भिड़ने के लिए अपने गृह प्रांत सागैंग में हथियारबंद मिलिशिया ग्रुपों को खड़ा करने में मदद की.

बर्मा के एक मिथकीय राजा प्यूसाहती के नाम पर बने मिलिशिया पर स्थानीय लोगों को ज़बरस्ती भर्ती करने और नागरिकों पर अनेक अत्याचार ढहाने के आरोप लगे.

लेकिन इनकी मौजूदगी कुछ चंद समुदायों के बीच है, जहां सेना की खुद की पार्टी पहले से मजबूत है.

सेना के ख़िलाफ़ व्यापक और एकजुट विपक्ष को नाकाम करने में ये नाकामयाब रहे हैं.

वथावा जिस इलाक़े में 2022 से लोगों को इकट्ठा करते रहे हैं, वहां के एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया कि वो हर गांव में केवल 10 से 15 लोगों की ही भर्ती कर पाने में क़ामयाब रहे और वो भी उनके घरों को जलाने की धमकी के बाद.

उन्होंने बताया कि अधिकांश भर्ती किए गए लोग भाग गए और वथावा और उनके बंदूकधारी भिक्षुओं से छिपने में गांव के अन्य लोगों ने मदद की.

म्यांमार में हथियारबंद संघर्ष

पीछे हटती सेना

हथियारबंद जनजातीय समूहों के साथ हालिया युद्ध में सेना के शर्मनाक प्रदर्शन से उसके समर्थकों के मन में संदेह पैदा हो रहा है.

एक चर्चित ब्लॉगर ने मिन आंग लाइंग को ‘अक्षम’ तक कहा.

उन्होंने कहा कि उनके नेतृत्व में देश ने नुकसान झेला और ऐतिहासिक शर्म का सामना करना पड़ा है, इसके लिए उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए और उन्हें पद छोड़ देना चाहिए.

उनका आशय, उत्तरी शान प्रांत के एक बड़े हिस्से पर तीन जनजातीय सेनाओं के गठबंधन 'ब्रदरहुड अलायंस' के विद्रोहियों के कब्ज़े से था. यह इलाक़ा चीन की सीमा से लगा हुआ है.

उन्होंने पिछले अक्टूबर में अपना अभियान शुरू किया था, जिसमें हज़ारों सैनिकों ने अपने हथियारों समेत समर्पण कर दिया. दो साल से विद्रोही गुटों और सेना के बीच चली आ रही यथास्थिति लगता है टूट गई है.

इस साल के शुरुआती सप्ताहों में सेना लगातार पीछे हटी है. देश के दूसरी तरफ़ बांग्लादेश सीमा से लगे हिस्से में गठबंधन सेना की अराकान आर्मी ने कई सैन्य अड्डों पर कब्ज़ा कर लिया और चिन और रखाइन प्रांतों के एक बड़े हिस्से पर उनका नियंत्रण हो गया है.

इसने एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें पकड़े गए कई सैनिक और उनके पास से बरामद हथियार और गोलाबारूद दिखता है.

सड़कों को घात लगाकर किए जाने वाले हमलों से सुरक्षित करने में असमर्थ सेना, घिरे हुए सैन्य अड्डों पर आपूर्ति पहुंचाने का काम अपने चंद हेलिकॉप्टरों से ले रही है और उनकी सुरक्षा के लिए हवाई हमले कर रही है जिसमें भारी संख्या में नागरिक हताहत हो रहे हैं.

काचिन प्रांत के विद्रोहियों ने कहा कि उन्होंने एक हेलिकॉप्टर और एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है.

आत्मसमर्पण करने वाले कुछ सिपाही लड़ाई का कम अनुभव रखने वाली यूनिटों में शामिल हो गए हैं.

सैकड़ों सैनिक ने भागकर भारतीय सीमा में घुसना ठीक समझा; हज़ारों ने बिना लड़ाई आत्मसर्पण कर दिया. शान प्रांत में जिन छह जनरलों को पकड़ा गया, विद्रोहियों के साथ जाम लड़ाते उनकी तस्वीरें देखी गईं.

सेना को सौंपे जाने के बाद तीन को मौत की सज़ा और तीन को आजीवन कारावास दिया गया. शायद ऐसा बाकियों को हथियार न डालने की नसीहत देने के लिए किया गया.

विद्रोहियों के ख़िलाफ़ म्यांमार की सेना के 75 साल लंबे इतिहास में यह अभूतपूर्व है. शीर्ष नेतृत्व में हताशा है. ऐसे हालात में भर्तियां और मुश्किल हो गई हैं.

2021 में तख़्तापलट के ख़िलाफ़ कई भिक्षु सड़क पर उतरे थे.

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इमेज कैप्शन, 2021 में तख़्तापलट के ख़िलाफ़ कई भिक्षु सड़क पर उतरे थे.

सहयोगी बने दुश्मन?

तो क्या तख़्तापलट के नेता को इन असंतुष्ट आवाज़ों से चिंतित होना चाहिए?

पिछले हफ़्ते पॉक को ताव का निर्भीक भाषण, लगता है नब्ज़ को छू लिया है.

सैनिकों ने उन्हें हिरासत में ले लिया और पूछताछ की लेकिन जल्द ही छोड़ दिया. इससे लगता है कि उनकी पैठ गहरी है.

सरकारी मीडिया में उनकी सभा की ख़बर छपी लेकिन सैनिक शासक पर टिप्पणी नहीं.

पॉक को ताव जिस जनरल सोए विन की बात कर रहे थे, ख़बर है कि वो अपनी सेना के प्रदर्शन से ख़ुश नहीं हैं.

हालांकि अभी तक उनकी तरफ़ से शीर्ष पद लेने को लेकर किसी तैयारी का संकेत नहीं है

मिन आंग लाइंग का अतीत रहा है कि वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को पहले प्रमोट करते हैं और फिर दरकिनार कर देते हैं.

बीते सितम्बर में जनरल मोइ म्यिंट टुन को सबसे संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा था, अचानक उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया और आजीवन कारावास दे दिया गया.

जुंटा के उत्साही प्रशंसकों के सपनों के लिए, सेना में दम भरने वाला कोई उत्तराधिकारी नज़र नहीं आता.

जंग के मैदान में सेना की बुरी तरह हार के बावजूद मिन आंग लाइंग आधिकारिक समारोहों की अध्यक्षता करना जारी रखे हुए हैं, एक मिलिटरी कमांडर से ज़्यादा सम्राट की तरह.

यह उनका डगमगाया आत्मविश्वास है या सच्चाई से अलगाव, ये स्पष्ट नहीं है. लेकिन पिछले तीन महीनों की तरह सेना और नुकसान झेलने की स्थिति में नहीं है.

उत्तरी शान प्रांत के मुख्य शहर लाशियो, पश्चिम में रखाइन प्रांत या थाईलैंड की सीमा पर कारेन्नी प्रांत, जहां विद्रोही प्रांतीय राजधानी के क़रीब पहुंच चुके हैं, अगर जुंटा सेना बिखरती है तो यह सेना के आत्मविश्वास को तोड़ने वाला होगा और इसका असर सरकार पर भी पड़ सकता है.

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