इब्राहिम रईसी की मौत के बाद कौन होगा ईरान का अगला राष्ट्रपति, क्या बदलेगी देश की सियासत?

इब्राहिम रईसी

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    • Author, बीबीसी फ़ारसी सेवा
    • पदनाम, .

28 जून को ईरान में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने वाले हैं. पिछले महीने हेलीकॉप्टर दुर्घटना में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद, चुनाव तय वक़्त से एक साल पहले हो रहे हैं.

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई के क़रीबी सहयोगी और कट्टरपंथी मौलवी रईसी के आने के बाद से इस्लामिक गणराज्य के हर हिस्से पर रूढ़िवादियों का दबदबा और भी मज़बूत हुआ.

ईरान का संविधान कहता है कि राष्ट्रपति की मौत के 50 दिन के अंदर नए राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना चाहिए. ऐसे में पार्टियों के पास इस पद के लिए अपने उम्मीदवार उतारने के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है.

इस चुनाव में ताकतवर रूढ़िवादी गुटों ने अपने उम्मीदवार उतारे हैं.

लेकिन बीते संसदीय चुनाव में बड़े स्तर पर लोगों को अयोग्य घोषित किए जाने और बीते सालों में देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों पर जबर्दस्त बलप्रयोग करने के कारण कई सुधारवादी समर्थक समूहों और कई चर्चित लोगों ने इस चुनाव में हिस्सा लेने से मना कर दिया है.

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कौन लड़ रहा है ये चुनाव

अयातुल्लाह अली ख़ामनेई साल 1989 से ईरान के सर्वोच्च लीडर हैं. कई प्रेक्षक ये मानते हैं कि ईरान के चुनाव ना तो निष्पक्ष होंगे ना ही इसमें कोई प्रतिस्पर्धा होगी क्योंकि कौन उम्मीदवार होगा इसका चुनाव भी देश की शक्तिशाली एजेंसियां करती हैं.

गार्डियन काउंसिल, जो संसद, राष्ट्रपति पद और असेंबली के चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन करती है उसने राष्ट्रपति पद के लिए रजिस्टर्ड 80 लोगों में से छह की लोगों को चुनाव लड़ने की मंज़ूरी दी है.

मोहम्मद बग़ैर गलिबाफ़: 62 साल के ग़लिबाफ़ बीते चार साल से ईरान की संसद में स्पीकर हैं. वह तीन बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुके हैं. जिसमें से दो बार हार गए और तीसरी बार 2021 में रईसी को समर्थन देते हुए उन्होंने उम्मीदवारी वापस ले ली थी. उच्च सैन्य पदों पर कार्य करने का उनका लंबा इतिहास रहा है और राजधानी तेहरान के मेयर के रूप में सबसे लंबे समय तक 12 सालों तक काम करने का रिकार्ड भी उनके नाम है.

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समाप्त

अमीरहुसैन गाज़िज़ादेह हाशमी: 53 साल के हाशमी एक ईएनटी (कान, नाक और गला) सर्जन हैं. रूढ़िवादी विचार वाले हाशमी चार बार सांसद रह चुके हैं. हाल ही में वे राष्ट्रपति रईसी के डिप्टी के रूप में कार्यरत थे. साल 2021 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने चुनाव लड़ा और दस लाख से भी कम वोटों के साथ चौथे स्थान पर रहे.

सईद जलील: 58 साल के जलील एक्सपीडिएंसी डिस्कर्नमेंट काउंसिल के सदस्य हैं. इससे पहले वह सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव थे और उन्होंने चार सालों तक ईरान की न्यूक्लियर नेगोसिएशन टीम का नेतृत्व किया था.

मसूद पेज़ेशकियन: 70 साल के पेज़ेशकियन हार्ट सर्जन है. वो पांच बार सांसद रहे हैं और चार साल तक देश के स्वास्थ मंत्री भी रहे हैं. वह अपने सीधी बात करने के अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने खुल कर ईरान के राजनीतिक माहौल और भ्रष्टाचार की आलोचना की है. उन्होंने सार्वजनिक रूप सैं ईरान सरकार के महसा अमीनी मामले को जिस तरह से हैंडल किया गया उसकी आलोचना की. उन्हें इस राष्ट्रपति चुनाव में सुधारवादी गुट का एकमात्र आधिकारिक उम्मीदवार माना जा रहा है, जिसके कारण कुछ लोग पेज़ेशकियन को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में स्वीकृति मिलने को एक उल्लेखनीय घटना के रूप में देख रहे हैं.

मुस्तफा पूरमोहम्मदी: मुस्तफा पूरमोहम्मदी गार्डियन काउंसिल से चुनाव लड़ने की सहमति पाने वाले छह उम्मीदवारों में से एकमात्र मौलवी हैं. वह एक रूढ़िवादी राजनेता है जिन्हे 'डेथ कमेटी' में अपनी भूमिका के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है.

अलीरेज़ा ज़कानी: 59 साल के ज़कानी पिछले तीन सालों से तेहरान के मेयर हैं. रूढ़िवादी राजनीति के लिए जाने जाने वाले ज़कानी ने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की सहायक संस्था बासिज के ज़रिए राजनीति में प्रवेश किया और चार साल सांसद रहे.

वो बड़े नाम जिन्हें काउंसिल ने रिजेक्ट कर दिया

मोहम्मद बग़ैर गलिबाफ़

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यह पहली बार नहीं है जब ईरान में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके कुछ जाने-माने राजनीतिक हस्तियों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराए जाने का मामला वहां के राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है.

मिज़ुरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस के कला, विज्ञान विभाग के डीन और ईरान मामलों के जानकार मेहरजाद बोरूजेर्डी का कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद और पूर्व स्पीकर अली लारीजानी को उम्मीदवारी की रेस से बाहर करना विवादस्पद है.

वह कहते हैं, "अहमदीनेजाद को आठ साल तक राष्ट्रपति रहने और देश के सर्वोच्च नेता को सलाह देने वाली प्रभावशाली संस्था एक्सपीडिएंसी काउंसिल में होने के बावजूद उन्हें मंजूरी नहीं दी गई."

हालांकि अहमदीनेजाद को कभी अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई का पसंदीदा माना जाता था, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल के अंत में वे सर्वोच्च नेता से दूर हो गए.

बोरूजेर्डी कहते हैं, "इसी तरह, अली लारीजानी एक और एक्सपीडिएंसी काउंसिल के सदस्य जिनकी पूर्व मंत्री, संसद के अध्यक्ष और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव के रूप में महत्वपूर्ण राजनीतिक पृष्ठभूमि है, उनको भी अयोग्य घोषित कर दिया गया."

"इन दोनों नेताओं को बार बार अयोग्य ठहरा देना ये बताता है कि उनका रूढ़िवादी विचार सर्वोच्च नेता के रूढ़िवादी विचार से अब मेल नहीं खाता."

जब से रईसी की हेलीकॉप्टर क्रैश में मौत हुई है जबसे देश में उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, इस पर ही सारा फोकस है.

लेकिन ऐसा क्यों हुआ

अयातुल्ला ख़ामनेई

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कई जानकार मानते हैं बीते राष्ट्रपति चुनाव और इस राष्ट्रपति चुनाव में गार्डियन काउंसिल का जो तरीका था वो बिलकुल नहीं बदला है.

काउंसिल आमतौर पर एक या दो उम्मीदवार सुधारवादी गुट से रखती है बाक़ी उम्मीदवार रूढ़िवादी होते हैं.

बोरूजेर्डी कहत हैं, "उदारवादी खेमे से एकमात्र उम्मीदवार मसूद पेजेशकियन हैं, जिनकी चुनौती निराश जनता को वोट देने के के लिए प्रेरित करना है."

"यदि वे सफल रहे, तो मुख्य मुकाबला उनके और संसद के वर्तमान अध्यक्ष और ईरान के शासन की ओर से समर्थित राजनेता मोहम्मद बाकर कलीबाफ के बीच होने की उम्मीद है."

ईरान के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को "ईरानी मूल के धार्मिक और राजनीतिक व्यक्ति" होना चाहिए और देश के आधिकारिक धर्म के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए.

हालाँकि इस्लामिक गणराज्य की स्थापना के बाद के कई दशकों में सरकार ने बार-बार गार्डियन काउंसिल का इस्तेमाल उन लोगों को अयोग्य ठहराने के लिए किया है जिनके संभावित काम या नीतियां सर्वोच्च नेता से की राय से अलग हो सकती हैं.

छह मौलवियों और छह ज्यूरिस्ट वाली परिषद को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च नेता ही नियंत्रित करते हैं, वो ही व्यक्तिगत रूप से छह मौलवियों की नियुक्ति करते हैं. वहीं ज्यूरिस्ट का चुनाव- न्यायपालिका के प्रमुख करते हैं जिन्हें खुद सर्वोच्च नेता और संसद के सदस्य ही चुनते है.

वो जानकार जो ईरान के चुनाव को 'पहले से तय' मानते हैं, वो उम्मीदवार तय करने की काउंसिल की प्रक्रिया पर सबसे बड़ा सवाल उठाते हैं.

ईरान

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क्या महिलाएं चुनाव लड़ सकती हैं?

पांच दिन की रजिस्ट्रेशन अवधि के दौरान चार महिलाओं ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा की. पहली बार, उनमें से दो रूढ़िवादी गुट से थीं, एक सुधारवादी खेमे से थीं, और चौथी महिला ने एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में रजिस्ट्रेशन कराया था.

इन चार महिलाओं ने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया, जबकि ईरान के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति का चयन 'धार्मिक और राजनीतिक पुरुषों' में से किया जाना चाहिए . इसके लिए अरबी में शब्द है 'रिजाल'.

ईरान के इस्लामिक गणतंत्र बनने के बाद से अब तक हुए 13 राष्ट्रपति चुनावों में किसी भी महिला को हिस्सा लेने की मंजूरी नहीं दी गई है- जो देश में कई कार्यकर्ताओं के बीच विवाद का एक बढ़ता कारण भी है.

कई महिला अधिकारों की वकालत करने वाले कार्यकर्ताओं का तर्क है कि अरबी में 'रिजाल' का अर्थ 'पुरुष' होता है, जबकि फ़ारसी में इसका अर्थ 'एक प्रमुख व्यक्ति' भी हो सकता है. इसलिए वो कहते हैं कि संविधान लिखने वालों का मतलब किसी विशेष पुरुष व्यक्ति नहीं 'राजनीतिक व्यक्ति' था.

महज़ अमीनी

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क्या देश में हुए बड़े प्रदर्शनों का इस पर असर होगा

ये चुनाव देश में महसा अमीनी को लेकर हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के दो साल बाद हो रहा है.

सितंबर, 2022 में महसा अमीनी को ईरान की मोरैलिटी पुलिस ने गिरफ्तार किया था और हिरासत में ही उनकी मौत हो गई थी.

उन्हें हिजाब ठीक से ना पहनने के कारण गिरफ़्तार किया गया था.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, ईरान के वीमेन लाइफ़ फ्रीडम मूवमेंट के दौरान सुरक्षा बलों ने 551 प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी गई - जिनमें से अधिकांश की मौत गोलीबारी में हुई.

ईरानी सरकार न केवल इस दमन की जिम्मेदारी लेने में नाकाम रही बल्कि बाद में उसने उन महिलाओं को हिरासत में लेना और सज़ा देना फिर से शुरू कर दिया, जो सरकार की ओर से तय हिजाब के बिना सार्वजनिक जगहों पर नज़र आईं. ये वही कानून है जिसके कथित उल्लंघन के लिए अमीनी को हिरासत में लिया गया था.

इसके कारण कई लोग और समूह जो चुनावों में पहले भाग लेते थे उन्होंने चुनावों के बायकॉट और राजनीतिक भागीदारी ना करने की अपील करनी शुरू कर दी.

चुनावों के इन बायकॉट की शुरुआत बीते महीने हुए संसदीय चुनावों से हुई.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केवल 41 फ़ीसदी वोटर्स ने ही इन चुनावों में हिस्सा लिया. जब से ईरान में इस्लामिक राज स्थापित हुआ है तब से मतदान का ये आंकड़ा सबसे कम था.

मतदान के सरकारी आंकड़े सच्चाई भी नहीं दिखाते. संसद और असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की जाती है और कई रिपोर्ट सामने आई कि ऐसे लोगों के भी आईडी नंबर से वोट डाले गए जिन्होंने चुनाव में हिस्सा ही नहीं लिया था.

ईरान

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क्या नए राष्ट्रपति बदलाव लाएंगे?

अनुभव बताते हैं कि ईरान में सारी नीतियां राष्ट्रपति नहीं, बल्कि सर्वोच्च नेता और उनके नियंत्रण में शक्तिशाली संस्थाएं तय करती हैं, इसलिए अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की सहमति के बिना घरेलू और विदेशी नीतियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव होने की संभावना नहीं है.

कई ऑब्ज़र्वर मानते हैं कि विदेश नीति में बदलाव जैसे न्यूक्लियर प्रोग्राम की समीक्षा या इसराइल को मान्यता देना नए राष्ट्रपति के बस में नहीं होगा- सर्वोच्च नेता आख़िरी अथॉरिटी हैं.

इसी तरह, ऐसा लगता है कि कोई भी राष्ट्रपति घरेलू नीति में बदलाव करने में सक्षम नहीं होगा- जैसे कि महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य करना - खामेनेई की मंजूरी के बिना इस नियम को कोई नहीं हटा सकेगा. खास कर गार्डियन काउंसिल की ओर से सहमति प्राप्त उम्मीदवारों की सूची को देखें तो इनमें ये ज्यादातर ऐसे नहीं करेंगे.

राजनीतिक जानकार मसूद साफ़री कहते हैं, "कोई भी नया फ़ैसला अगर राष्ट्रपति लेंगे तो ये उनका फैसला नहीं पूरे प्रशासन का फैसला होगा."

ख़ामनेई

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सुप्रीम नेता का चुनाव कैसे होता है?

ईरान का भविष्य नए राष्ट्रपति के हाथों में होगा?

अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई 85 साल के हो चुके हैं, इसलिए उनके उत्तराधिकारी को लेकर सवाल लगातार प्रासंगिक होते जा रहे हैं.

ईरान के संविधान के अनुसार, असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स सर्वोच्च नेता का चयन करते हैं.

हालांकि, कम से कम आधिकारिक तौर पर सर्वोच्च नेता का उत्तराधिकारी चुनने में राष्ट्रपति की कोई भूमिका नहीं होती है - सर्वोच्च नेता की मौत के बाद अस्थिरता की अवधि के दौरान, राष्ट्रपति के प्रभावित करने के मौके ज़रूर होते हैं.

आखिरकार ये तय है कि संविधान में जितना भी अधिकार राष्ट्रपति को मिल है कभी भी राष्ट्रपति ने उतने अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया.

साफ़िरी कहते हैं, "अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने पिछले 35 सालों में ईरान में लीडरशिप संस्थाओं को इस तरह से आकार दिया है कि उनकी मौत के बाद चाहे राष्ट्रपति कोई भी हो यह संस्थाएं देश को अपने तरीके से चलाने में सक्षम होगी."

"जैसा कि ईस्टर्न ब्लॉक में कम्युनिस्ट पार्टियों ने किया."

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