दुनिया भर में सज़ा-ए-मौत के मामलों में 31 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है: एमनेस्टी इंटरनेशनल

- Author, अनर इरम
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
एमनेस्टी इंटरनेशनल के नए आंकड़ों के मुताबिक़ पुरी दुनिया में मृत्यु दंड के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है.
संस्था ने साल 2023 में सज़ा-ए-मौत के 1153 मामले दर्ज किए, जो 2022 के मुक़ाबले 31 फ़ीसदी अधिक हैं. साल 2022 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मौत की सज़ा के 883 मामले दर्ज किए थे.
यह एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा साल 2015 के बाद से दर्ज किया गया सबसे बड़ा आंकड़ा है. साल 2015 में संस्था ने 1634 मामले दर्ज किये थे.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड बताती हैं, "दर्ज की गई सज़ा-ए-मौत के मामलों में भारी वृद्धि मुख्य रूप से ईरान के कारण हुई है. ईरानी अधिकारियों ने मानव जीवन के प्रति पूरी तरह से उपेक्षा दिखाई है. ईरान में नशीली दवाओं से संबंधित अपराधों के लिए फांसी की सज़ा के मामलों में तेज़ी देखी गई है. इससे ईरान के सबसे हाशिए पर पड़े और ग़रीब समुदायों पर मौत की सज़ा के भेदभावपूर्ण प्रभाव पड़ा."
हालांकि रिपोर्ट ये दर्शाती है कि दर्ज किए गए मृत्यु दंड के अधिकतर मामलों के लिए ईरान ज़िम्मेदार है. वहां 853 लोगों को फांसी की सजा दी गई है.
एमनेस्टी को लगता है कि सबसे ज्यादा मृत्यु दंड चीन में दिया जाता है. लेकिन चीन में दी जाने वाली मौत की सज़ा के मामलों पर कोई आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं.
एमनेस्टी का अनुमान है कि पिछले साल चीन में हज़ारों लोगों को सज़ा-ए-मौत दी गई थी.
एमनेस्टी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी पाया कि 2023 में वैश्विक स्तर पर मौत की सज़ा में 20 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. यह 2018 के बाद से दी गई मौत की सज़ा का सबसे बड़ा आंकड़ा है.
कौन से देश देते हैं सबसे अधिक सज़ा-ए-मौत
एमनेस्टी के मुताबिक़, साल 2023 में पांच देशों- चीन, ईरान, सऊदी अरब, सोमालिया और अमेरिका में सबसे ज्यादा मौत की सज़ा दी गई.
इनमें से अकेले ईरान में मृत्यु दंड के 74 फ़ीसदी मामले रिपोर्ट हुए हैं. वहीं, सज़ा-ए-मौत के कुल मामलों में 15 फ़ीसदी केस सऊदी अरब में रिपोर्ट हुए.
एमनेस्टी का कहना है कि चीन की तरह उसके पास उत्तर कोरिया, वियतनाम, सीरिया, फ़लस्तीनी क्षेत्र और अफ़ग़ानिस्तान के आधिकारिक आंकड़े नहीं मिल सकें.
कितने देशों ने मृत्यु दंड को समाप्त कर दिया है?
मृत्यु दंड को समाप्त करने वाले देशों में बढ़ोतरी हुई है.
साल 1991 में इस सूची में 48 देश शामिल थे. वहीं 2023 में मृत्यु दंड की व्यवस्था को ख़त्म करने वाले देशों की संख्या बढ़कर 112 हो गई.
नौ देश ऐसे हैं जहां सिर्फ़ गंभीर अपराधों के लिए मृत्यु दंड दिया जाता है, वहीं 23 देश ऐसे हैं जहां पिछले एक दशक में मौत की सज़ा का इस्तेमाल नहीं किया गया है.
अलग-अलग देशों में सज़ा-ए-मौत पर अमल के क्या तरीके़ हैं?

साल 2023 में ज्ञात रूप से चार तरह से मृत्यु दंड दिया गया, जिनमें सिर कलम करना केवल सऊदी अरब में लागू है.
पिछले साल सात देशों में फांसी का तरीका अपनाया गया, छह देशों में गोली मारकर हत्या की गई और तीन देशों में मौत के इंजेक्शन दिए गए.
यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स के चीफ़ वोल्कर तुर्क़ कहते हैं, "मौत की सज़ा के प्रावधान और मानव सम्मान, जीवन के मौलिक अधिकार, अत्याचार या क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार से मुक्त रहने का अधिकार के बीच सामंजस्य स्थापित करना बहुत कठिन है."
अपराध या सज़ा से बरी होना
कोई अभियुक्त अपराध से बरी तब होता है जब सज़ा सुनाए जाने और अपील प्रक्रिया के समापन के बाद, दोषी व्यक्ति को दोषमुक्त या आपराधिक आरोप से बरी कर दिया जाता है, और उसे क़ानून की नजर में निर्दोष माना जाता है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने तीन देशों में मौत की सज़ा का सामना कर रहे नौ क़ैदियों को बरी किए जाने का मामला दर्ज किया है. जिनमें से पांच कैदी कीनिया, तीन कैदी अमेरिका और एक ज़िम्बॉब्वे से है.
मानवाधिकार कार्यकर्ता मृत्यु दंड की सज़ा का विरोध करते हैं ताकि उन मामलों को रोका जा सके जहां ये सज़ा-ए-मौत की तामील के बाद ये पता चलता है कि अभियुक्त तो निर्दोष था.
क्या मृत्यु दंड की सज़ा से अपराध कम होते हैं
यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स ऑफिस का कहना है कि जिन देशों में मृत्यु दंड का प्रावधान है, वहां इसे "इस मिथक के कारण रखा जाता है कि इससे अपराध रुकते हैं."
समाज विज्ञानियों के बीच ये आम सहमति है कि सज़ा-ए-मौत अपराध को रोकने में कारगर साबित नहीं हुआ है.
कुछ लोगों का कहना है कि सबसे अधिक बाधा तो पकड़े जाने और दंडित किये जाने की संभावना से ही उत्पन्न होती है.
1988 में, संयुक्त राष्ट्र के लिए मौत की सज़ा और हत्या के मामलों के बीच संबंध निर्धारित करने के लिए एक सर्वे किया गया था.
इसे साल 1996 में अपडेट किया गया.
"शोध इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण देने में विफल रहा कि मृत्यु दंड, आजीवन कारावास की तुलना में अपराध को रोकने में अधिक प्रभावी है."
अमेरिका में मौत की सज़ा पाए क़ैदियों को मृत्यु दंड देने के लिए मृत्यु कक्ष का उपयोग किया जाता है.

बच्चों पर असर
साल 2010 में, अल्जीरिया, अर्जेंटीना, कज़ाकिस्तान, मेक्सिको और तुर्की सहित 14 देशों ने मिलकर मृत्युदंड के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय आयोग की स्थापना की थी.
इस आयोग में अब 24 सदस्य देश शामिल हो गए हैं, जिनमें ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और टोगो शामिल हैं.
पिछले साल जारी अपनी नई रिपोर्ट में आयोग ने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन में इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद कई देशों में बच्चों को मृत्यु दंड दिए जाने का खतरा है.
यह कन्वेन्शन 196 देशों में लागू है.
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (एपीए) ने अमेरिकी राज्यों से 21 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को मृत्यु दंड देने पर रोक लगाने का आह्वान किया है.
इसमें लिखा है, "विज्ञान की वर्तमान स्थिति के आधार पर, 18 से 20 वर्ष के बच्चों का दिमाग़ 17 वर्ष के बच्चों के दिमाग से बहुत भिन्न नहीं कहा जा सकता."
इसमें आगे कहा गया है, "16 और 17 साल के बच्चों को मृत्यु दंड नहीं देने के पीछे जो युवापन और अपरिपक्वता का कारण बताया जाता है, वही फैक्टर 18 से 20 साल के बच्चों पर भी लागू होता है. बच्चों पर सिर्फ़ फांसी की सज़ा का ही असर नहीं पड़ता."
आयोग का कहना है, "किसी अपराधी को दी जाने वाली सज़ा के दूसरे तरीकों से अलग, माता-पिता को फांसी की सज़ा दिए जाने से बच्चे को अपने माता-पिता के साथ संबंध बनाने का मौक़ा हमेशा के लिए खोना पड़ता है."
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