निर्भया गैंगरेप मामला: सिर्फ़ फ़िल्मों में पूछी जाती है मरने वाले की आख़िरी इच्छा?

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- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
निर्भया गैंगरेप मामले के चारों दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई गई है. पांच मार्च को दिल्ली की एक अदालत ने चारों दोषियों के लिए नया डेथ वारंट जारी किया था.
इस नए डेथ वारंट के मुताबिक़, निर्भया मामले के दोषियों विनय कुमार, मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर और पवन गुप्ता को 20 मार्च, 2020 को सुबह 5:30 बजे फांसी दी जाएगी.
इससे पहले जारी किए गए डेथ वारंट के मुताबिक़ तीन मार्च को फांसी दी जानी थी लेकिन पवन गुप्ता की दया याचिका के कारण उसे टाल दिया गया था.

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इससे पहले अदालत ने फांसी की तारीख़ 22 जनवरी को तय की थी लेकिन एक दोषी की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित होने के कारण फांसी की तारीख़ टाल दी गई थी. बाद में अदालत ने एक फ़रवरी का दिन तय किया था लेकिन उस दिन भी फांसी नहीं दी जा सकी और इसे अगले आदेश तक टाल दिया गया.
उसके बाद तीन मार्च की तारीख़ दी गई थी लेकिन पवन गुप्ता की दया याचिका के कारण उसे टाल दिया गया था. जिसके बाद 20 मार्च की तारीख़ दी गई.

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चारों दोषियों के लिए 5 मार्च को डेथ-वारंट जारी किया गया था जिसमें 20 मार्च की तारीख़ तय की गई थी. ऐसे में ये सवाल उठ सकता है कि पांच मार्च को जब डेथ-वारंट जारी किया गया तो 20 मार्च की ही तारीख़ क्यों दी गई.
यानी सज़ा सुनाए जाने के बाद फांसी दिये जाने के लिए लगभग दो सप्ताह का वक़्त क्यों?
क़ानून के जानकारों के मुताबिक़, यह एक तय सीमा है. जिसे भी फांसी की सज़ा सुनाई जाती है उसे यह वक़्त दिया जाता है ताकि अगर उन्हें अपनी वसीयत आदि तैयार करनी है या फिर अगर परिवार वालों से मिलना है तो इस दौरान वो ये सारे काम पूरे कर लें.
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वक़ील कमलेश कहती हैं, "समयसीमा देना ज़रूरी है, वरना भारतीय क़ानून में इतनी सारी चीज़ें और स्तर हैं कि दोषी हर बार कोई ना कोई रास्ता चुनकर कोई ना कोई याचिका लगाते ही रहे. इसीलिए समयसीमा निर्धारित की गई है."
फांसी के दिन तक क्या कुछ बदल जाता है?
'ब्लैक वॉरंट कन्फ़ेशंस ऑफ़ अ तिहाड़ जेलर' के लेखक सुनील गुप्ता बताते हैं कि इस दौरान जेल प्रशासन काफ़ी सावधानियां बरतता है.
वो कहते हैं इस दौरान सबसे बड़ी सावधानी तो यही रखी जाती है कि जिसे फांसी दी जानी है उसकी सेल में कुछ भी ऐसा सामान न हो जिससे वो ख़ुद को नुकसान पहुंचा सके.
सुनील गुप्ता ने बताया, "कई बार जिन्हें फांसी की सज़ा सुनाई जाती है, वे आत्महत्या की कोशिश करते हैं या ख़ुद को चोट पहुंचाने की कोशिश करते हैं. ऐसे में डेथ वॉरेंट मिलने के बाद उन्हें अलग सेल में रखा जाता है. उनके सेल में धातु के बर्तन की जगह प्लास्टिक का या पत्तल देते हैं. उनके पजामे में नाड़ा भी नहीं दिया जाता है."
हालांकि अगर कोई पढ़ने के लिए साहित्यिक या धार्मिक किताबें मांगता है तो उसे मना नहीं किया जाता और किताबें मुहैया कराई जाती हैं.
सुनील बताते हैं कि ऐसे क़ैदियों के लिए 24 घंटे की निगरानी की व्यवस्था होती है. हर दो-दो घंटे पर गार्ड बदलते हैं और हर दो घंटे की ड्यूटी के बाद स्टाफ़ पूरा ब्यौरा लिखता है. मसलन, जिसे फांसी की सज़ा सुनाई गई है वो क्या कर रहा था, खाना खाया या नहीं...वगैरह-वगैरह.
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काउंसलिंग भी दी जाती है
सुनील बताते हैं कि इन दिनों में लगभग हर रोज़ फांसी की सज़ा पाए शख़्स की काउंसलिंग की जाती है. यह काउंसलिंग उसे इसलिए दी जाती है कि वो 'उस दिन' के लिए तैयार हो जाए.
सुनील बताते हैं कि डेथ वॉरंट की एक कॉपी दोषी करार दिए गए शख़्स के घरवालों को भी सौंपी जाती है ताकि उन्हें सारी जानकारी रहे. पहले यह अनिवार्य नहीं था लेकिन अब इसे अनिवार्य प्रक्रिया बना दिया गया है.
इसके साथ ही दोषी की मेडिकल जांच भी की जाती है. अगर दोषी बीमार है तो जेल में ही डॉक्टर को बुलाया भी जाता है.
सुनील के मुताबिक़, ''फांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद निश्चित तौर पर दोषियों को निराशा होती है. इसलिए प्रशासन की तरफ़ से पूरी कोशिश होती है कि उन्हें इसके लिए तैयार किया जाए.''
जेलों के सुधार से जुड़े 'तिनका-तिनका मूवमेंट' की संयोजक और जेल सुधारक वर्तिका नंदा बताती हैं कि इस दौरान बंदियों की मानसिक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी होती है.
वो कहती हैं, "इस बदलाव की एक बड़ी वजह ये है कि कोई भी व्यक्ति उम्मीद को आख़िर तक छोड़ना नहीं चाहता है. उस शख़्स को हमेशा किसी चमत्कार की उम्मीद रहती है. फांसी की सज़ा मिलना किसी झटके से कम नहीं होता है."
वर्तिका मानती हैं कि कई मामलों में जिस शख़्स को फांसी की सज़ा सुनाई जाती है वो ख़ुद को ही ये समझा लेता है कि उसने जो किया वो ग़लत था.
वो कहती हैं कि "कई बार परिवार साथ बना रहता है और कई बार परिवार एकदम से दूर हो जाता है."
हालांकि वर्तिका मौजूदा समय में फांसी की सज़ा पर मीडिया की प्रतिक्रिया और कवरेज को 'गंभीर' नहीं मानती हैं. उनका कहना है कि यह एक गंभीर विषय है जिसे 'मज़ाक' के तौर पर 'सनसनी' के रूप में प्रसारित नहीं करना चाहिए.
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फांसी पाने वालों से पूछी जाती है अंतिम इच्छा?
फ़िल्मों में हम अक्सर देखते हैं कि फांसी देने से पहले जेल अधिकारी आख़िरी इच्छा पूछते हैं लेकिन क्या हक़ीकत में भी ऐसा होता है?
इस पर सुनील गुप्ता कहते हैं कि हर जेल का अपना मैनुअल होता है लेकिन अगर बात सिर्फ़ दिल्ली की करें तो यहां कोई ऐसा नियम नहीं है.
वर्तिका नंदा भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं. वो कहती हैं कि आख़िरी इच्छा पूछे जाने का यह कॉन्सेप्ट पूरी तरह से फ़िल्मी है.
वो कहती हैं, "हो सकता है कि किसी-किसी जेल में पूछा जाता हो लेकिन जेल मैनुअल में इस बात की अनिवार्यता कहीं भी नहीं है."
वर्तिका नंदा के मुताबिक़, ''जिन जगहों पर अंतिम इच्छा पूछी भी जाती होगी वहां इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता होगा कि वही इच्छा मान्य होगी जो जेल की उस चारदिवारी के भीतर संभव है, न्यायिक रूप से संभव हो.''
वो स्पष्ट कहती हैं कि इस संबंध में किसी भी तरह की बाध्यता नहीं है लेकिन हां अगर कोई चीज़ पूरी हो सकती है तो उसे किया भी जा सकता है.
लेकिन क्या हर फांसी का वक़्त तय होता है?
इस सवाल के जवाब में सुनील गुप्ता कहते हैं कि हर फांसी एक ही समय पर नहीं दी जाती. गर्मियों में फांसी सुबह तड़के दी जाती है जबकि सर्दियों में इसे थोड़ा बढ़ा देते हैं.
वो कहते हैं कि फांसी दिए जाने के बाद ही जेल को खोला जाता है. यही वजह है कि सुबह सूरज उगने के साथ ही फांसी दी जाती है.

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कैसी दिखती है वो जगह जहां फांसी होती है?
वर्तिका नंदा बताती हैं कि दिल्ली की तिहाड़ जेल में जहां फांसी दी जाती है, वो उस जगह कई बार जा चुकी हैं.
अपने अनुभव के आधार पर वो बताती हैं, "अमूमन फांसीघर के बारे में वहां के बंदियों को भी पता नहीं होता है. वो जगह हमेशा बंद रहती है लेकिन वहां सफ़ाई जरूर होती रहती है."
उन्होंने बताया कि फांसीघर में किसी को भी जाने की अनुमति नहीं होती है. यहां तक की जब अधिकारी भी जाते हैं तो वो अपने पूरे दस्ते के साथ ही जाते हैं.
बतौर वर्तिका इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता है कि जैसे ही आप उस फांसी घर में प्रवेश करते हैं आपको 'उस ख़ौफ़' का अंदाज़ा ज़रूर होता है.
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