बच्चों से बलात्कार: फांसी से इंसाफ़ मिलेगा?

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- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
केंद्र सरकार एक अध्यादेश लाई है जिसमें कहा गया है कि 12 साल और इससे कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार पर फांसी की सज़ा होगी.
लेकिन क्या फांसी की सज़ा बलात्कार के मामलों में न्याय दिलाने का कारगर तरीका है? आंकड़े कुछ और कहते हैं.
ये रहीं वो 5 बातें जो साबित करती हैं कि फांसी से कोई फ़ायदा नहीं होगा
1. मौत की सज़ा से नहीं रुके बलात्कार
2012 निर्भया गैंगरेप के बाद क़ानून में बदलाव कर मौत की अधिकतम सज़ा लाई गई. तर्क ये था कि इससे अपराधियों में खौफ़ होगा और खौफ़ की वजह से अपराध घटेंगे.
इसके बाद निर्भया और फिर शक्ति मिल गैंगरेप के दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई भी गई.
लेकिन इसके बाद क्या हुआ? फिर 'नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो' यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में बलात्कार के 34,651 और 2016 में 38, 947 मामले दर्ज हुए. 2012 में ये संख्या 24,923 थी.

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यानी दो चर्चित मामलों में दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद भी बलात्कार के अपराध बढ़े ही, घटे नहीं.
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यहां ये भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि निर्भया गैंगरेप के बाद जस्टिम वर्मा कमेटी की रिपोर्ट के मद्देनज़र बलात्कार के मामले दर्ज कराने की प्रक्रिया में कई सुधार किए गए थे.
बलात्कार के ज़्यादा मामले दर्ज होने के पीछे एक वजह ये भी है.
2. अपराध साबित नहीं होते
बच्चों के साथ यौन हिंसा के मामलों में 'कन्विक्शन रेट' यानी अपराध साबित होने की दर बेहद कम है.

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 में 'पॉक्सो ऐक्ट' के तहत बच्चों के साथ बलात्कार के 64,138 मामले दर्ज हुए थे और इनमें से सिर्फ 3% मामलों में अपराध साबित हुआ.
इतना ही नहीं, बच्चों के साथ होने वाली यौन हिंसा के मामले लगाातार बढ़े थे.
तो जब अपराध साबित ही नहीं होगा तो फांसी देंगे किसे?
3. अपराधी अजनबी नहीं, क़रीबी होता है
एनसीआरबी के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार के 94% मामलों में अपराधी पीड़िता का क़रीबी या फिर जान पहचान वाला ही था.
अपराधियों में 29% पड़ोसी, 27% शादी का वादा करने वाले प्रेमी और 6% रिश्तेदार और बाकी 30% दूसरे क़रीबी थे.

पिछले पांच साल के आंकड़े यही बताते हैं कि औसतन 90% से ज़्यादा मामलों में अपराधी पीड़िता का करीबी संबंधी ही रहा.
इसलिए ज़्यादातर मामलों में अपराधी क़रीबी होने की वजह से पीड़िता पर शिक़ायत न करने और केस वापस लेने का दबाव होता है.
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यानी मौत की सज़ा एक और वजह बन सकती है जो पीड़िता और उसके परिवार को क़रीबी के ख़िलाफ़ शिकायत करने से रोके.
ऐसे में अपराधी कड़ी सज़ा से डरे ना डरे, बलात्कार पीड़िताएं पुलिस में शिकायत करने से ज़रूर डरेंगी.
4. पुलिस पर कोई कार्रवाई नहीं
नए अध्यादेश में कहा गया है रेप मामलों की जांच एफ़आईआर लिखे जाने के बाद तीन महीने के भीतर पूरी हो जानी चाहिए. लेकिन मौजूदा हालात को देखें तो ऐसा होना बेहद मुश्किल है.

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जानी-मानी वकील वृंदा ग्रोवर के मुताबिक भारत में आज तक किसी भी रेप केस की जांच तीन महीने के अंदर पूरी नहीं हुई.
वो कहती हैं, "अगर तीन महीने के भीतर जांच पूरी नहीं हुई तो क्या होगा? क्या जांच कर रहे पुलिसकर्मियों या जांच अधिकारी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होगी या पीड़िता को कोई मुआवज़ा दिया जाएगा, इन बड़े सवालों का अध्यादेश में कोई जवाब नहीं है."
साल 2016 के आखिर में पॉक्सो ऐक्ट के तहत जो मामले दर्ज हुए उनमें से 90% मामले आज भी पेंडिंग हैं.

ऐसे में न्याय मिलने में देरी, कड़ी सज़ा के मुकाबले ज़्यादा बड़ी समस्या है क्योंकि मुक़दमा जितना लंबा खिंचता है पीड़ित महिला या बच्चे के लिए चीजें उतनी ही मुश्किल होती हैं.
5. बेअसर फ़ास्ट ट्रैक और पॉक्सो कोर्ट
नाबालिगों से यौन हिंसा मामलों की सुनवाई के लिए पॉक्सो कोर्ट बनाए जाने की बात होती है. लेकिन वृंदा ग्रोवर पॉक्सो कोर्ट को एक मिथक भर कहती हैं.
वो कहती हैं कि देश में दिल्ली के अलावा किसी और राज्य में पॉक्सो कोर्ट है ही नहीं
नए अध्यादेश में फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाने की बात कही गई है. फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट वो अदालतें हैं जहां हर उम्र की महिलाओं और बच्चों के यौन हिंसा की सुनवाई होती है.
वृंदा पूछती हैं, "फास्ट ट्रैक कोर्ट तो बन जाएंगे लेकिन उसके लिए जज कहां से आएंगे? ज़ाहिर है, इन अदालतों में भी वही जज जाएंगे जिनके पास पहले से तमाम मुकदमों का बोझ है. ऐसे में फ़ास्ट ट्रैक अदालतों के प्रभावी साबित होने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती."
एक बड़ा सवाल ये भी है कि अब नाबालिग लड़कों के साथ बलात्कार और यौन शोषण के मामलों में क्या होगा? क्योंकि केंद्र सरकार का अध्यादेश में लड़कों के साथ होने वाले अपराधों का कोई ज़िक्र नहीं है जबकि पॉक्सो ऐक्ट 2012 में लड़कों और लड़कियों दोनों से यौन हिंसा पर समान सज़ा का प्रावधान है.
हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ बलात्कार पर भी मौत की सज़ा का प्रावधान लाने का विचार कर रही है.

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ऐसे में इन सबका सीधा असर अपराधी को मिलने वाली सज़ा और पीड़िता को मिलने वाले इंसाफ़ पड़ेगा.
गैर सरकारी संस्था 'इंडियास्पेंड' की रिसर्च बताती है निर्भया गैंगरेप के बाद 2013 में दिल्ली में छह फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए थे.
मक़सद था, यौन हिंसा मामलों में बरसों से चली आ रही जांचों को पूरा करके पीड़िताओँ को जल्दी इंसाफ़ दिलाना.
इन फ़ास्ट ट्रैक अदालतों ने 2014 में बलात्कार के 400 मामले निबटाए जबकि रेग्युलर अदालतों ने 2012 में 500 मामले निबटाए थे.
इस तरह फ़ास्ट ट्रैक अदालतों के काम करने के तरीके पर एक और सवाल खड़ा हो गया.

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नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अनूप सुरेंद्रनाथ के मुताबिक कछुए की चाल वाली पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के पीछे साफ वजहें हैं.
ये वजहें हैं आबादी के अनुपात में पुलिस और जजों की संख्या में भारी कमी.
उन्होंने बताया, "संयुक्त राष्ट्र के तय मानक के मुताबिक 454 लोगों के लिए एक पुलिस अधिकारी होना चाहिए जबकि गृह मंत्रालय के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 514 लोगों के लिए सिर्फ एक पुलिस अधिकारी ही उपलब्ध है.''

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इसके अलावा क़ानून मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 10 लाख लोगों के लिए 19 जज हैं जबकि यूएन के मानकों के मुताबिक यह संख्या 50 होनी चाहिए.''
यानी इन सारे आंकड़ों और तथ्यों को देखकर लगता है कि अगर सरकार वाक़ई बच्चों और महिलाओं को इंसाफ़ दिलाना चाहती है तो नए क़ानून बनाने के बजाय 'क्रिमिनल लॉ सिस्टम' को सुधारे जाने और मौजूदा कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करें.
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