अमरीका में रहने वाले ईरानी न घर के न घाट के

रेज़ा और लायला ईरान में
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, वॉशिंगटन से, बीबीसी संवाददाता
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"मैं ईरान में रहने वाले परिवार को लेकर काफ़ी चिंतित हूं. मैं न तो सो पा रही हूं और न ही कुछ खाने की स्थिति में हूं. मेरे सिर में लगातार माइग्रेन का दर्द बना रहता है."

ये शब्द 19 वर्षीय ईरानी मूल की अमरीकी नागरिक लायला ओघाबियन के हैं जो इस समय अमरीका में रह रही हैं.

अमरीका और ईरान के बीच जारी तनाव और कुछ समय पहले उठ रहीं युद्ध की आशंकाओं के चलते दस लाख से ज़्यादा आबादी वाला ईरानी-अमरीकी समुदाय बेहद तनावपूर्ण स्थितियों में जी रहा है.

लायला के पिता रज़ा का जन्म ईरान के कारमान इलाक़े में हुआ था. ये वही इलाक़ा है जहां से ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी आते थे.

सुलेमानी की अमरीकी ड्रोन हमले में मौत के बाद दोनों देशों में एक बार फिर रिश्ते ख़राब हो गए हैं.

सुलेमानी की मौत के बाद ईरानियों का हाल

अमरीका ने ईरान की ओर से किए गए मिसाइल हमलों के बाद ईरान पर नए प्रतिबंध थोप दिए हैं.

वहीं, अमरीकी प्रशासन की ओर से ईरान-विरोधी बयानबाजी और ट्वीट्स आ रहे हैं.

ऐसे में अमरीका में रहने वाले ईरानी मूल के लोग आने वाले दिनों को लेकर चिंता में हैं.

ईरानी-अमरीकी समुदाय के एक व्यक्ति बताते हैं, "ईरान से जुड़ी चर्चाओं का दौर हमें ये अहसास कराता है कि हम सबकी निगाह में हैं."

अमरीकी प्रशासन ने बार-बार ये दावा किया है कि उसके क़दम ईरानी सरकार के ग़लत व्यवहार को रोकने के लिए हैं और अमरीकी प्रशासन के ये क़दम ईरान के लोगों के समर्थन में हैं.

लायला ने पहली बार मात्र दो साल की उम्र में ईरान की यात्रा की थी. इसके बाद से वह 20 से ज़्यादा बार ईरान जा चुकी हैं.

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से पब्लिक पॉलिसी विषय में मास्टर की पढ़ाई कर रहीं लायला बताती हैं, "युद्ध हमें ख़तरे में डाल देगा. ये जगह युद्ध क्षेत्र बन जाएगी."

लायला के लिए एक ऐसे देश में बड़ा होना आसान नहीं था जहां पर मीडिया के एक सेक्शन की ओर से ईरान की छवि हमेशा नकारात्मक ढंग से पेश की जाती रही हो.

वो बताती हैं, "मेरे लिए अंतर्विरोध की स्थिति रही है जैसे कि मेरी शख्सियत दो हिस्सों में बँट रही हो. जैसे कि मुझे अपनी पहचान के एक हिस्से से नफ़रत करनी चाहिए. इसलिए मैंने अपनी ज़िंदगी को इस संघर्ष को सुलझाने के लिए समर्पित कर दी है."

लायला के पिता रज़ा भी इस संघर्ष से होकर गुज़रे हैं.

लायला
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कितना मुश्किल है अमरीका में ईरानी मूल का होना?

रज़ा बताते हैं, "जब मैं ईरान जाता हूं तो लोग मुझसे ऐसे सवाल करते हैं, जैसे कि मैं अमरीकी जासूस हूँ. और जब मैं अमरीका लौटता हूं तो लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं ईरान क्यों गया था और मैंने वहां क्या किया?"

ट्रंप सरकार के तीन सालों में रज़ा को डर लगता रहा कि ये उस दौर की वापसी है जब ईरानी-अमरीकी समुदाय को आक्रामकता का सामना करना पड़ा और समुदाय के ख़िलाफ़ अमरीका के अलग-अलग हिस्सों में सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुआ करते थे.

लेकिन एक ऐसा समय भी था जब अमरीका में लोग ईरान को संस्कृति और परंपराओं के लिहाज़ से पसंद करते थे.

साल 1979 में हुई ईरानी क्रांति और अमरीकी दूतावास पर हमले ने ईरानियों के बारे में अमरीकियों की सोच बदलकर रख दी.

इसके बाद लोगों को लगने लगा कि "ईरानी आतंकवादी और कट्टरपंथी" हैं.

स्टूडेंट वीज़ा पर अमरीका आए रेज़ा का पासपोर्ट
इमेज कैप्शन, स्टूडेंट वीज़ा पर अमरीका आए रेज़ा का पासपोर्ट

इस समुदाय से जुड़े लोगों का कहना है कि ट्रंप सरकार के दौरान ईरानी लोगों के आवागमन पर प्रतिबंध और ईरान पर प्रतिबंधों ने उनके अंदर डर की भावना को फिर से पैदा कर दिया है.

अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की एक ख़बर के मुताबिक़, अमरीकी सरकारी संस्थाएं लगातार छात्रों को अमरीका जाने वाली फ़्लाइट्स पर चढ़ने से रोक रहे हैं और उनकी यात्रा से पहले ही उनके वीज़ा रद्द किए जा रहे हैं.

हाल के दिनों में कई ईरानी छात्रों को आधिकारिक वीज़ा के बावजूद अमरीकी एयरपोर्ट पर हिरासत में लेकर वापस भेजा जा रहा है.

गार्डियन की ख़बर के मुताबिक़, कुछ छात्रों को अमरीका वापस आने से भी रोका जा रहा है.

अमरीकी कस्टम और बॉर्डर प्रोटेक्शन टीम ने हाल ही में नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले एक ईरानी छात्र को बोस्टन वापस आने से रोककर उसे ईरान वापस भेज दिया है.

नसरीन
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पुराने दौर की वापसी?

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में कंपेरेटिव लिटरेचर पढ़ाने वालीं प्रोफ़ेसर नसरीन बताती हैं, "एक प्रयास चल रहा है कि किसी भी ईरानी व्यक्ति को अमरीका आने से रोका जाए या उनके लिए समस्याएं खड़ी की जाएं."

हाल ही में वॉशिंगटन (ब्लेन) के पास स्थित पीस आर्क बॉर्डर से होते हुए अमरीका में प्रवेश करने वाले लगभग 60 ईरानी और ईरानी-अमरीकी लोगों को साढ़े सात घंटों तक रोककर रखा गया.

ईरानी अमरीकी बार असोशिएसन से जुड़े वकील बाबक यूसुफ़जादेह बताते हैं, "कई ईरानी-अमरीकियों को ये महसूस होता है कि उनको घेर लिया गया है. उन्हें लगता है कि जैसे वे दूसरे दर्जे के नागरिक हों जिन्हें उनकी नस्ल और माता-पिता की राष्ट्रीयता की वजह से निशाना बनाया जा रहा है."

यूसुफ़जादेह के पास ऐसे कई मामले आ रहे हैं जिनमें संपत्तियों को फ्रीज़ कर दिया गया हो या शैक्षणिक संस्थाओं में छात्रों के प्रवेश को रद्द कर दिया गया हो.

यूसुफ़जादेह को कई ऐसे केस भी देखने को मिल रहे हैं जिनमें ईरानियों को नौकरी देने से मना कर दिया गया क्योंकि नौकरी देने वाली कंपनियों को लगा कि ऐसा करना ईरान पर अमरीकी प्रतिबंधों का उल्लंघन होगा.

हेट क्राइम और सोशल मीडिया

एक ईरानी अमरीकी व्यक्ति बताते हैं कि मीडिया की ओर से नफ़रत और सोशल मीडिया पर नफ़रत भरी बातचीत की वजह से ईरानी अमरीकियों के ख़िलाफ़ नफ़रत से भरी कार्रवाइयां सामने आ रही हैं.

साल 2015 में एक मामला सामना आया था जिसमें एक अमरीकी व्हाइट सुपरेमिस्ट संगठन के सदस्य ने 22 साल के ईरानी-अमरीकी नागरिक शायन मज़ोरेई पर चाकू से हमला कर दिया था.

इस मामले में कानूनी कार्यवाही जारी है.

साल 2017 में दो भारतीय नागरिकों को ग़लती से ईरानी समझकर गोली मार दी गई थी. इनमें से एक व्यक्ति की जान चली गयी थी. हमलावर ने गोली चलाने से पहले कथित रूप से 'आतंकवादी' शब्द का प्रयोग किया और कहा - "मेरे देश से बाहर निकलो"

मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में पर्सियन स्टडीज़ विषय के प्रोफेसर फातेमह काशावर्ज कहते हैं, "लोगों को लगता था कि परमाणु संधि के बाद चीज़ें सुधर सकती थीं लेकिन इसके बाद व्हाइट हाउस में कोई आया और उसने ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगा दिए."

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर

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ट्रंप सरकार ने ईरान परमाणु संधि को ख़राब बताते हुए इसे मानने से इनकार कर दिया.

ईरानी क्रांति का दंश

ईरान से अमरीका आने वालों की पहली खेप 1950 के बाद आई. इसके बाद ईरानी लोगों का दूसरा जत्था साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद अमरीका आया.

लायला के पिता रज़ा 1977 में 17 साल की उम्र में ईरान से अमरीका हाई स्कूल की पढ़ाई करने आए थे.

तब उनके साथ फ्लैट में रहने वाले शख़्स कैलिफोर्निया के सेक्रेमेंटो के रहने वाले थे.

1979 में अमरीकी दूतावास संकट ने ईरान के ख़िलाफ़ लोगों की भावनाओं को भड़का दिया.

ईरानी प्रधानमंत्री हसन रुहानी

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ईरान को किए जाने वाले निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया. ईरानी संपत्तियों पर प्रतिबंध लगा दिए गए.

कुछ अपवादों को छोड़कर ईरानी नागरिकों को दिए गए अमरीकी वीज़ा अवैधानिक घोषित कर दिए गए. दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्ते बुरी तरह ख़राब हो गए.

अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अमरीका में अवैधानिक तौर पर रह रहे ईरानी छात्रों को ईरान वापस भेजने का आदेश दे दिया.

ख़ुमैनी का समर्थन करने वाले रज़ा के पिता उन दिनों ईरान में जनरल मोटर्स के डीलर हुआ करते थे. उनके पास बहुत सी महंगी कारें हुआ करती थी. लेकिन दोनों देशों के बीच उपजे इस संकट ने अमरीका में रज़ा की आरामदायक ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर दिया.

रज़ा बताते हैं, "उन दिनों मेरी ये हिम्मत नहीं होती थी कि मैं ईरान से हूं. लोग मुझे मारते थे, हमारे ऊपर सामान फेंकते थे और हमें तरह-तरह के नामों से पुकारते थे."

ईरानी छात्र

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जब अवैध ठहराए गए ईरानी छात्रों के वीज़ा

रज़ा के दोस्त शनिवार को सेक्रेमेंटो यूनिवर्सिटी के कैंपस में इकट्ठे होकर अपने अनुभव साझा किया करते थे.

एक दिन रज़ा के दोस्त बाहर घूम रहे थे और उन्हें गिरफ़्तार करके ईरान भेज दिया गया.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अमरीका में रुकने वाले रज़ा बताते हैं, "मैं बहुत डरा हुआ था. मुझे ऐसा बिलकुल भी नहीं लगा कि मैं सुरक्षित हूं."

वहीं, ईरान में रिवॉल्युशनरी गार्ड्स ने रज़ा के पिता की संपत्तियों पर कब्जा करके उनके डिप्रेशन की स्थिति में पहुंचा दिया.

पीएएआई रिपोर्ट के मुताबिक़, इस दौर में 56,700 ईरानी छात्रों ने इमिग्रेशन और नेचुरलाइजेशन सेवा से संपर्क किया और लगभग 7000 छात्रों का वीज़ा अवैध पाया गया. इनमें से कई छात्रों को ईरान वापस भेज दिया गया. वहीं, कई छात्रों ने अमरीका में राजनीतिक शरण ले ली क्योंकि उन्हें लगता था कि ईरान वापस जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है.

न्यूयॉर्क की कोलगेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले शेरविन मालेकज़ादेह बताते हैं, "ईरानी अमरीकियों की उस पीढ़ी ने खुलकर लोगों को प्रतिक्रिया नहीं दी. वो पीढ़ी सिर झुकाकर अपना काम करती रही."

ईरानी छात्र

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शेरविन साल 1975 में अपने बचपन में ईरान आए थे. लेकिन वे साल 2000 तक ईरान वापस नहीं गए. वह याद करते हैं कि उन्हें और उनके पिता को 'सैंड निगर' और 'अनिमल जॉकी' कहा जाता था. और ये भी कहा जाता है कि ईरान का मतलब कुछ पागलों का समूह है.

ईरान की क्रांति की वजह से ईरानी-अमरीकी समुदाय में भी विभाजन हुआ. कुछ लोग ईरान का समर्थन करते थे तो वहीं कुछ लोग ईरान के ख़िलाफ़ थे.

शेरविन बताते हैं, "अस्सी के दशक में ईरानी क्रांति की एक बड़ी ट्रेजिडी ये थी कि इसने ईरान में हीं लोगों को आपस में विभाजित नहीं किया. बल्कि, इसने ईरान के बाहर रहने वाले ईरानियों को भी आपस में बांट दिया."

दर्द और डर का पुराना अहसास

शेरविन बताते हैं कि चालीस साल बाद ट्रंप के सत्ता में आने के बाद उनके पिता की ज़िंदगी वापस उसी जगह पहुंच गयी है जहां से शुरू हुई थी.

वह बताते हैं, "लोग पूछते हैं कि जिस देश को वो अपना मुल्क मानते हैं, वहां पर उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों होता है"

"बच्चे पूछते हैं कि क्या ईरानी माता-पिता से पैदा होना क्या ग़लत है? राष्ट्रपति ऐसा क्यों कहते हैं? हमारे सगे-संबंधियों को यहां आने की इजाज़त क्यों नहीं है?"

लड़के-लड़कियां ट्रंप के ट्वीट पढ़ते हैं. वे इसके बाद लोगों से बात करते हैं जो कि ट्रंप की बयान बाजी से सहमत होते हैं."

ईरानी छात्र

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इमेज कैप्शन, अमरीका पहुंचने पर भावुक होती एक ईरानी छात्रा

ईरान में प्रतिबंधों की वजह से परिवारों में विभाजन होने के साथ ही खाद्य सामग्री और दवाइयों की किल्लत सामने आई है.

ईरान में अपनी माँ और बहन की आर्थिक रूप से मदद करने वाले रज़ा बताते हैं, "ट्रंप के आने से पहले लोग ईरान में रह रहे अपने परिवारों की मदद कर सकते थे. अब हर चीज बहुत महंगी हो चली है. डॉलर की कीमत बढ़ रही है लेकिन तनख्वाहें नहीं बढ़ रही हैं."

रज़ा के एक भाई डायबिटीज़ से पीड़ित हैं और हाल ही में उन्होंने किसी और की किडनी ली है.

रज़ा कहते हैं, "उनके लिए बाहर जाकर दवाएं लाना मुश्किल है. कई दवाएं ईरान नहीं जा सकतीं. मैं जब भी वहां जाता हूं तो उनकी मदद करता हूं."

लेकिन अब सभी लोगों की आँखें आने वाले चुनावों पर हैं कि नयी सरकार उनके लिए कैसा कल लेकर आएगी.

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