इस विषय के अंतर्गत रखें अगस्त 2010

भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट

महबूब ख़ानमहबूब ख़ान|गुरुवार, 26 अगस्त 2010, 01:30

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बात कई सप्ताहों से चर्चा में है लेकिन मैं भी कहने से ख़ुद को रोक नहीं सका. राष्ट्रमंडल खेल तो अक्तूबर में शुरू होंगे लेकिन एक बड़ी प्रतियोगिता तो पहले से ही चल रही लगती है. ये प्रतियोगिता उन कुछ नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच चली है जिसमें भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट बनने की होड़ लगी हुई है.

लगता है कि इन खेलों से जुड़ा एक बड़ा अमला लूटखसोट में एक दूसरे को पीछे छोड़ने पर तुला हुआ है और इसी के आधार पर उन्हें पदक (सोना,चाँदी) मिलेंगे.

ब्रिटेन के एक अख़बार ने ख़ाका दिया है कि दिल्ली में प्रस्तावित राष्ट्रमंडल खेल भारतीय भ्रष्टों के लिए ही नहीं, बल्कि कुछ विदेशी कंपनियों के लिए भी बेहतरीन अवसर साबित हो रहे हैं. ब्रिटेन की एक कंपनी ने जिस एक टॉयलेट पेपर के लिए 64 पाउंड यानी क़रीब 4600 रुपए लिए वही पेपर दूसरी कंपनी से सिर्फ़ नौ पाउंड यानी क़रीब 650 रुपए में उपलब्ध था. ऐसे 360 टॉयलट पेपर इस कंपनी ने राष्ट्रमंडल खेलों के लिए सप्लाई किए.

एक और बानगी देखिए, इसी कंपनी ने एक कूड़ेदान के लिए 104 पाउंड यानी लगभग साढ़े सात हज़ार रुपए लिए जोकि दूसरी कंपनी सिर्फ़ 16 पाउंड यानी 1150 रुपए में देने को तैयार थी. एक नज़र और डालें, टॉयलेट में हाथ धोने के लिए इस्तेमाल होने वाले तरल साबुन का एक डिस्पैंसर 129 पाउंड यानी क़रीब साढ़े नौ हज़ार रुपए में ख़रीदा गया जबकि यही डिस्पेंसर स्विट्ज़रलैंड की एक कंपनी सिर्फ़ ढाई पाउंड यानी लगभग 170 रुपए में देने को तैयार थी. लिक्विड सोप डिस्पेंसर से ही ब्रिटेन की इस कंपनी ने क़रीब 62 हज़ार पाउंड यानी क़रीब 45 लाख रुपए कमा लिए. shera.jpg

ये तो सिर्फ़ एक कंपनी से ख़रीदे गए सामान की कहानी है. अगर परतें खोली जाएँ तो पता चलेगा कि राष्ट्रमंडल खेलों में न जाने कितनी देसी-विदेशी कंपनियों और लोगों ने अपना बुरा वक़्त संवार लिया है. शायद लूट-खसोट की इसी साँठ-गाँठ की वजह से राष्ट्रमंडल खेलों का बजट पाँच गुना ज़्यादा हो गया है.

विडंबना ये है कि दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति ने जो इस तरह का सामान विदेशों से ख़रीदा है वो सामान यूरोपीय देशों में बहुत सी बड़ी कंपनियाँ भारत जैसे विकासशील देशों से मंगाती है जो सस्ता पड़ता है और उसे फिर इन देशों में मुनाफ़ा लेकर बेचा जाता है. ये उल्टी गंगा भारतीय आयोजकों ने भला क्यों बहाई है, ये जानने की ज़िम्मेदारी किस पर है, हमें तो नहीं पता.

ये तो हम जानते ही हैं कि ग़रीबी उन्मूलन के लिए मिला बहुत सारा अंतरराष्ट्रीय धन भी इन खेलों की ही भेंट चढ़ गया है. जिस दिल्ली को सँवारने का दम भरा जा रहा है वही दिल्ली बरसात का मौसम आने पर बेबस नज़र आती है. जहाँ-तहाँ पानी जमा हो जाता है और फिर जब डेंगू फैलता है तो अस्पताल और प्रशासनिक ढाँचे की असलियत सामने आ जाती है.

कोई ग़रीब महिला किसी नर्सिंग होम की सीढ़ियों पर ही बच्चे को जन्म देती है क्योंकि उसके पास डॉक्टर की फ़ीस नहीं होती है. अब ये तो आयोजक ही जानें कि इन खेलों के आयोजन के बाद क्या दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ियों की क़िस्मत बदलेगी? दिल्ली के बाहर रहने वाले ग़रीबों को वैसे भी उम्मीद कम ही रहती है.

लेकिन इससे भी ज़्यादा रोना इस बात पर आता है कि भारत में ना तो प्रतिभाशाली लोगों की कमी है और ना ही धन की लेकिन भारत का कोई स्टेडियम एक ऊसेन बोल्ट नहीं तैयार करता. चिंता की बात यही है कि इसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया गया है और अगर ये खेल हो भी गए तो बाद में सब रफ़ा-दफ़ा करने में कितनी देर लगती है.

एक सवाल और, आर्थिक मंदी के दौर में जब लोगों की जीविका ही ख़तरे में पड़ी हुई है तो क्या ये खेल स्थगित नहीं किए जा सकते थे? या देश का दीवाला निकालना और बदनाम कराना ज़रूरी था? बदले समय के अनुसार प्राथमिकताएँ बदलना समझदारी होती है. उस पर भी तुर्रा ये है कि देश के आम लोग ख़ामोशी से निरीह होकर सबकुछ देख रहे हैं, जो लोग चुनाव में सरकार बदल सकते हैं तो देश धन की लूट को रोकने के लिए कोई पत्थर आसमान में क्यों नहीं उछाल सकते?

लेकिन इस बार कुछ उम्मीद करना अनुचित नहीं होगा क्योंकि इतना बेतहाशा धन लगाकर अगर इन खेलों का आयोजन हो रहा है तो भारत के कुछ अति प्रतिभावान खिलाड़ी को सामने आने ही चाहिए, लेकिन अभी तो संकेत यही हैं कि ये खिलाड़ी खेल के मैदान में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और लूट-खसोट के मैदान में तैयार होंगे यानी भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट.

मनमोहन सिंह नेताओं के नेता, लेकिन क्यों?

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|मंगलवार, 24 अगस्त 2010, 15:32

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पिछले दिनों खुशवंत सिंह ने अपनी नई किताब में मनमोहन सिंह को भारत का महानतम प्रधानमंत्री क़रार दिया, नेहरू से भी महान.

और तो और जानी मानी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका-न्यूज़वीक ने भी लिखा कि वे नेताओं के नेता हैं. जिन्हें दुनिया के नेता सबसे ज्यादा पसंद करते हैं. उनकी ख़ूबियाँ गिनाई गईं कि वौ सौम्य और शांत हैं, ईमानदार हैं और भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने में उनका ख़ासा योगदान है.

लेकिन अब इसको दूसरे नज़रिए से भी देखिए. प्रधानमंत्री के रूप में उनके पद का तकाज़ा है कि भारत को बेहतर बनाने के लिए उनमें कुछ अलोकप्रिय फ़ैसले लेने की हिम्मत भी होनी चाहिए. निस्संदेह मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ख़ूबियाँ अपनी जगह हैं, लेकिन इससे भारत को कहाँ तक फ़ायदा पहुँचा है?

मज़े की बात ये है कि न्यूज़वीक के ही एक और सर्वेक्षण में भारत को दुनिया के बेहतरीन देशों की सूची में 78वीं पायदान पर रखा गया है.

छह साल तक लगातार प्रधानमंत्री रहने के बावजूद भारत की बेहतरी के मुहिम में उनके योगदान को साधारण ही कहा जा सकता है.

खाने की चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं. दो साल तक शांत रहने के बाद कश्मीर एक बार फिर पुराने दिनों की तरफ़ लौट चुका है. माओवादी क़हर बरपा कर रहे हैं.

राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले के कीचड़ की छीटें थोड़ा-बहुत मनमोहन सिंह पर भी पड़ी हैं- इसलिए नहीं कि वे ईमानदार नही हैं बल्कि इसलिए कि वो भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं.

मनमोहन सिंह के समर्थक ये कहते नहीं थकते कि भारत को बाज़ार अर्थव्यवस्था बनाने का श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है. लेकनि यह 20 साल पहले हुआ था वो भी एक ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जिसमें अलोकप्रिय फ़ैसले लेने की हिम्मत थी.

आज कांग्रेस में उन्हीं नरसिम्हा राव को बदनाम करने की होड़ सी लगी हुई है.

मनमोहन सिंह को ये अहसास होना चाहिए कि वो अपनी पिछली उपलब्धियों को हमेशा तो नहीं भुना सकते. उनकी सबसे बड़ी विफलता ये है कि नए आर्थिक सुधारों की तरफ़ उन्होंने कोई नया क़दम नहीं बढ़ाया है.

आख़िर दुनिया भर के नेता उनकी किस अदा पर फ़िदा हैं कि उन्हें 'लीडर ऑफ़ द लीडर्स' कहा जा रहा है?

उनकी नेहरु जैकेट पर...या उनकी क़रीने से बंधी आसमानी पगड़ी पर...या फिर उनके एक मील लंबे सीवी पर?

क्या इन लोगों को पता है कि मनमोहन सिंह चार साल में एक बार तो संवाददाता सम्मेलन बुलाते हैं और वहाँ पर जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं तो कहते हैं कि मैं इस पर अभी टिप्पणी नहीं कर सकता.

क्या ये विश्व नेता उनकी इस बात पर क़ायल हैं कि कि वो प्रधानमंत्री कार्यालय का हर काम प्रणव मुखर्जी और उनके पचासियों 'मंत्रियों के समूह' को आउटसोर्स कर देते हैं?

क्या उन्हें ये बात पसंद आई है कि उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार जो कि भारत है उनके लिए खोल दिया है?

शायद उनको ये बात भी जँची है कि मनमोहन सिंह ये सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि परमाणु दुर्घटना होने पर उनकी कंपनियों को मुआवज़े के रुप में अरबों रुपए न देने पड़ें!!!

एक पत्र पीएम के नाम

सुशील झासुशील झा|रविवार, 22 अगस्त 2010, 07:39

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माननीय प्रधानमंत्री जी,

मेरा नाम xyz है. संघ लोक सेवा आयोग में इस वर्ष मेरा भी चयन हुआ है. रिज़ल्ट देखकर मेरे मां पिता दोस्त सभी खुश हुए. मैं भी लेकिन जब से मुझे ट्रेनिंग का पत्र मिला है मेरी खुशी क़ाफूर नहीं तो कम से कम आधी हो गई है.

इसमें ट्रेनिंग के लिए ज़रुरी सामानों की एक सूची है. दो सूट, एक कोट, जूते, सूटकेस इत्यादि इत्यादि..कुल मिलाकर सस्ता भी हो तो इसकी क़ीमत तकरीब 35 हज़ार रुपए से कम नहीं बैठती है. इसके अलावा एक महीने का खर्च भी लेकर जाना है. खाने के पैसे भी पहले देने है क्योंकि वेतन ट्रेनिंग शुरु होने के अगले महीने मिलता है.

मैंने दोस्तों से उधार लेकर यह पैसा जमा किया है क्योंकि मेरे पास एकमुश्त इतनी बड़ी राशि नहीं थी.

मेरे जैसे कई और लोग होंगे जिनके पास इतने पैसे नहीं होंगे. हां ऐसे भी होंगे जिनके लिए ये राशि कोई मायने नहीं रखती है.

मैं पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा हूं और ट्यूशन के ज़रिए अपनी आजीविका चलाता हूं. मैंने यूपीएससी के लिए कोई कोचिंग सिर्फ़ इसलिए नहीं की क्योंकि वो बहुत मंहगी होती है.

नौकरशाह बनने की मेरी इच्छा कभी नहीं रही. मै आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करके लेक्चरर बनना चाहता था और ये चाहत अभी भी है.

मेरे माता पिता चाहते थे कि मैं आईएएस बनूं. क्योंकि बिहार के हज़ारों मां बाप की तरह उनका भी सपना था कि उनका बेटा बड़ा अधिकारी बने. मैंने आयोग की परीक्षा सिर्फ़ इसलिए दी ताकि मेरे मां पिता बाद में पढ़ाई के मेरे फ़ैसले को मानें.

लेकिन इससे मेरे जैसे ग़रीब छात्रों की समस्या सुलझ नहीं जाती है. मेरे दोस्तों ने मेरी समस्या सुलझा दी लेकिन न जाने कितने ऐसे होंगे जिनकी क़िस्मत में ऐसे दोस्त नहीं होंगे.

प्रधानमंत्री जी...मैं बस ये कहना चाहता हूं कि भारत जैसे देश में ये क्यों ज़रुरी है कि एक नौकरशाह कोट टाई और ब्लेज़र पहन कर ही क्लास करने के लिए जाए.. क्या इस मानसिकता को नहीं बदला जा सकता कि कोट और टाई सभ्य होने की निशानी है. क्या शर्ट और पैंट पहनने वाला सभ्य नहीं हो सकता है.

क्यों नौकरशाहों को एक बने हुए सांचे में ढालने की कोशिश की जाती है ताकि वो तथाकथित रुप से अभिजात हो जाएं.जब देश की अधिसंख्य जनता ग़रीब है तो क्या नौकरशाह ऐसा न हो जो सिर्फ़ गरीबी उन्मूलन की योजना न बनाए बल्कि ग़रीबी के दर्द को समझे भी.

बस मैं इतना ही कहना चाहता हूं. मैं जानता हूं कि मेरी एक चिट्ठी से व्यवस्था नहीं बदलेगी लेकिन मैंने कहीं पढ़ा था ...

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

आपका ही...xyz

बराक ओबामा मुसलमान नहीं हैं!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शुक्रवार, 20 अगस्त 2010, 14:33

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दुनिया के सबसे ताक़तवर व्यक्ति बराक ओबामा मुसलमान नहीं हैं. अगर अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में शामिल हर पाँच में से एक व्यक्ति ऐसा मानता है तो यह उसकी एक बहुत बड़ी भूल है.

सर्वेक्षण होते रहते हैं और कई बार नतीजे चौंका देने वाले आते हैं.

अकसर लोग पढ़ते हैं और भूल जाते हैं.

लेकिन इस सर्वेक्षण ने जिस तरह अमरीकी अधिकारियों को चौकन्ना किया वह शायद आमतौर पर नहीं होता.

अगर सर्वेक्षण यह होता कि ओबामा सैर-सपाटे के लिए कहाँ जाना पसंद करते हैं, या उन्हें खाने में क्या भाता है, या फिर उनके कुत्ते का नाम क्या है, तो भी उसे दरगुज़र किया जा सकता था.

लेकिन ओबामा और मुसलमान? यह तो हद ही हो गई.

उनके सलाहकारों ने इसे विरोधियों का दुष्प्रचार कहा. इतनी सफ़ाइयाँ दी गईं कि लगने लगा कि जैसे ओबामा का बहुत बड़ा अपमान हुआ हो और यह सब उसकी भरपाई के लिए किया जा रहा है.

प्रशासन की मशक़्क़त को देखकर यह अहसास होने लगा कि अगर मैं अमरीकी मुसलमान होती तो शर्म से पानी-पानी हो गई होती. राष्ट्रपति मेरे मज़हब को मानने वाले कैसे हो सकते हैं. यह तो डूब मरने वाली बात है.

ओबामा ने अभी पिछले हफ़्ते ही इफ़्तार की दावत दी और वहाँ ग्राउंड ज़ीरो के पास बनने वाली मस्जिद का खुल कर समर्थन किया. उन्हें एक क्षण को भी नहीं लगा कि इससे उन पर मुसलमानों का हिमायती होने का ठप्पा लग सकता है.

हालाँकि यह सर्वेक्षण उससे पहले की बात है. बाद में होता तो शायद नतीजे और भी चौंकाने वाले होते.

ओबामा के ऊपर से मुसलमान होने का ठप्पा तो हट जाएगा. लेकिन वे मुसलमान क्या करें जो अमरीका में इस बार खुल कर ईद भी नहीं मना पाएँगे क्योंकि उसकी तारीख़ 11 सितंबर है.

वैसे, अगर इस सब से ऊपर उठ कर सोचा जाए तो सवाल यह भी है कि मुसलमानों को शक की नज़र से देखने या यह मज़हब इतना संवेदनशील मामला होने के लिए असल में ज़िम्मेदार कौन है?

खेल भावना या बीसीसीआई का दबदबा

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|गुरुवार, 19 अगस्त 2010, 02:27

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श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने सूरज रंदीव और तिलकरत्ने दिलशान के विरुद्ध तुरत-फुरत कार्रवाई करके क्या वास्तव में खेल भावना को बरक़रार रखने की दिशा में क़दम उठाया है.

वीरेंदर सहवाग का शतक पूरा नहीं हो सके उसके लिए नो बॉल फेंक देना काफ़ी कुछ गली क्रिकेट की याद दिला गया था जहाँ हार की चिढ़ मिटाने के लिए बल्लेबाज़ को विजयी रन बनाने का मौक़ा नहीं देने पर कोई आश्चर्य नहीं होता.

वैसे रंदीव ने जो किया वो सिर्फ़ उस समय भावावेश में उठाया गया क़दम ज़्यादा लगता है. उनके पास अभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का उतना अनुभव भी नहीं है ऐसे में शायद तिलकरत्ने दिलशान का उकसावा उन्हें इस क़दम की ओर ले गया.

मगर श्रीलंका बोर्ड ने मामले को गंभीरता से लिया और तुरंत जाँच करते हुए दो दिनों के भीतर कार्रवाई कर दी और उस पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने श्रीलंका बोर्ड की पीठ भी थपथपा दी.

रंदीव पर एक मैच का प्रतिबंध और भारत के विरुद्ध हुए मैच की उनकी फ़ीस ज़ब्त कर ली गई जबकि उकसाने की वजह से दिलशान की भी मैच फ़ीस काट ली गई.

इस बात में कोई शक नहीं कि मैदान में जो कुछ हुआ वो दुर्भाग्यपूर्ण था और खेल भावना के विपरीत भी इसलिए ये देखकर लगा कि श्रीलंका बोर्ड खेल भावना को लेकर गंभीर है.

मगर फिर दूसरे पक्ष की ओर भी ध्यान गया, क्या ये वास्तव में खेल भावना को ध्यान में रखकर उठाया गया क़दम है या भारतीय क्रिकेट बोर्ड के दबदबे का असर.

किसी भारतीय क्रिकेटर की जगह अगर यही काम रंदीव ने किसी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर के विरुद्ध किया होता तो भी क्या उनकी इसी तरह आलोचना हो रही होती और बोर्ड ऐसी ही कार्रवाई करता.

क्या उन हालात में भी इतनी चीख-पुकार मचती.

यहाँ बस ये याद दिला दूँ कि लगभग ढाई साल पहले श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष
अर्जुन रणतुंगा ने बीसीसीआई से आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी और इस मदद पर बीसीसीआई की सकारात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आई थी.

पीपली लाइव बनाम असली भारत

सुशील झासुशील झा|शनिवार, 14 अगस्त 2010, 15:08

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'पीपली लाइव' फ़िल्म को देखकर लगता है कि यह पत्रकारिता पर चोट करती है, फिर लगता है कि शायद अफ़सरशाही इसके निशाने पर है या फिर राजनीति.

सच कहें तो यह फ़िल्म पूरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है.

ऐसी व्यवस्था जिसके पास मरे हुए किसान के लिए तो योजना है लेकिन उसके लिए नहीं जो जीना चाहता है.

ये उन पत्रकारों पर तमाचा है जो लाइव आत्महत्या में रुचि रखते हैं तिल-तिल कर हर रोज़ मरने वाले में नहीं.

फ़िल्म न तो नत्था किसान के बारे में है और न ही किसानों की आत्महत्या के बारे में. ये कहानी है उस भारत की जहां इंडिया की चमक फीकी ही नहीं पड़ी है बल्कि ख़त्म हो गई है.

उस भारत की जो पहले खेतों में हल जोतकर इंडिया का पेट भरता था और अब शहरों में कुदाल चलाकर उसी इंडिया के लिए आलीशान अट्टालिकाएं बना रहा है.

जहां तक नत्था के मरने का सवाल है जिसे केंद्र में रख कर आमिर ख़ान ने पूरा प्रचार अभियान चलाया है...उसके बारे में इतना ही कहूंगा कि नत्था मरता नहीं है उसके अंदर का किसान ज़रुर मरता है जो आज हर भारतीय किसान के घर की कहानी है.

अनुषा बधाई की पात्र हैं जो उन्होंने ऐसे मुद्दे पर फ़िल्म बनाई. अंग्रेज़ी में जिसे ब्लैक ह्यूमर कहते हैं...उसकी भरमार है और यही इसकी थोड़ी कमज़ोर स्क्रिप्ट का अहसास नहीं होने देती.

यह फ़िल्म एक बार फिर इस बात का अहसास दिलाती है कि हम कैसे भारत में रह रहे हैं. वो भारत जो न तो हमारे टीवी चैनलों पर दिखता है और न ही हमारे नेताओं की योजनाओं में.

अगर जाने माने फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रहात्मज के शब्द उधार लूं तो फि़ल्म शानदार है जो रोंगटे खड़े कर देती है.

मुद्दा ग़रीबी नहीं है...मुद्दा जीने का है..चाहे वो मिट्टी खोदकर हो या मर कर. क्या फ़र्क पड़ता है गांव की मिट्टी खोद कर मरें या कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए मिट्टी खोदते हुए.

फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय सर्किट में पसंद किया जा रहा है और किया जाएगा. हो सकता है लोग कहें कि इसमें भारत की ग़रीबी को ही दिखाया गया (जैसा कि स्लमडॉग मिलियनेयर के बारे में कहा गया था) मैं तो यही कहूंगा कि यही सच्चाई है..

पत्रकार, अफ़सर और राजनेता ये फ़िल्म ज़रुर देखें और अपनी कवरेज योजना और व्यवहार में थोड़ी सी जगह इस असली भारत को दें तो अच्छा होगा.

बिलावल भुट्टो की ताजपोशी?

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शुक्रवार, 13 अगस्त 2010, 14:22

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पिछले दिनों ऑक्सफोर्ड से इतिहास की डिग्री ले चुके 21 वर्षीय बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के ग्रामीण आवास 'चेकर्स' में उनके साथ तस्वारें खिंचवाईं. इससे पहले वो फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोज़ी और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ भी इसी तरह की तस्वीरें खिंचवा चुके हैं.

आम तौर से किसी देश में जाने वाले शासनाध्यक्ष औपचारिक मौकों पर अपने बच्चों को ले जाने से परहेज़ करते हैं लेकिन राष्ट्रपति ज़रदारी इसका अपवाद हैं.

पिछले दिनों जब ज़रदारी बीजिंग में राष्ट्रपति हू जिन ताओ से मिलने गए थे तो उनके साथ उनकी दोनों पुत्रियां बख़्तावर और आसिफ़ा भी थीं.
1972 में जब जुल्फ़िकार अली भुट्टो शिमला आए थे, तो अपनी पुत्री बेनज़ीर को भी अपने साथ लाए थे.

इस समय पाकिस्तान में ज़रदारी की लोकप्रियता ऊंचाइयों को नहीं छू रही है, इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि इस तरह के भाव प्रदर्शन से वो बाहरी दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि वो जो कुछ भी हों, वो मारी गई पाकिस्तानी नेता के बच्चों के पिता भी हैं.

ज़रदारी के आलोचक उन पर फ़ब्तियां कस रहे हैं कि उन्हें पाकिस्तान के बाढ़ पीड़ितों की कोई परवाह नहीं है और वो इस मौके का इस्तेमाल अपने लड़के को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं.
शायद यही वजह थी कि बिलावल ने बर्किंघम में अपनी पूर्व निर्धारित रैली रद्द कर दी और लंदन में पाकिस्तानी उच्चायोग द्वारा बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए आयोजित किए गए समारोह में भाग लिया.

इस तरह के भी संकेत मिल रहे हैं कि बिलावल की एक साल छोटी बहन बख़्तावर भी राजनीति में आने के बारे में सोच रही हैं. उन्होंने महिलाओं और पिछड़े हुए लोगों के लिए काम करना भी शुरू कर दिया है.
भाई-बहनों के बीच इस तरह की प्रतिद्वंदिता कोई नई बात नहीं है. बेनज़ीर और मुर्तज़ा भुट्टो के बीच भी अपने पिता की राजनैतिक विरासत लेने की होड़ हुआ करती थी.
लेकिन बिलावल और बख़्तावर के राजनीति में असली कदम रखने में अभी देर है क्योंकि बिलावल मात्र 21 साल के हैं और उनकी बहनें उनसे भी छोटी हैं. पाकिस्तान में किसी भी सदन का सदस्य बनने के लिए 25 साल की उम्र ज़रूरी है.

एक सोच ये भी है कि शायद बिलावल और उनकी दोनों बहनें राजनीति में आने के लिए इतने तत्पर न हों लेकिन उनके पिता उनका सहारा लेकर अपनी गिरती हुई छवि को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं.

बहरहाल बिलावल, बख़्तावर और आसिफ़ा में से कौन बेनज़ीर की विरासत ले पाएगा, उस पर आखिरी मोहर पाकिस्तान की जनता लगाएगी.

भारत में भी इंदिरा गांधी की लाख कोशिशों के बावजूद संजय गांधी को लोगों ने पसंद नहीं किया था. हां, जब मौका आया तो उन्होंने राजीव गांधी को ज़रूर सिर आंखों पर बैठाया था.

समर्थकों का मुँह बंद क्यों

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|बुधवार, 11 अगस्त 2010, 15:10

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अभी कुछ ही दिनों पहले चैनल बदलते हुए दूरदर्शन पर रुक गया. मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों के समापन कार्यक्रम में भारत की प्रस्तुति दिखाई जा रही थी.

'दिल्ली चलो' के नारे के साथ हिंदी फ़िल्म अभिनेता सैफ़ अली ख़ान, रानी मुखर्जी, पार्श्व गायिका सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल और श्यामक दावर स्टेज पर थे. रंग-बिरंगी प्रस्तुति थी और देखकर लगा था कि भारत में काफ़ी रंगारंग कार्यक्रम के साथ भव्य खेल होंगे.

भारतीयों का ये सपना शायद अब भी सच हो जाएगा मगर भारत को जब ये राष्ट्रमंडल खेल मिले थे तब से लेकर अब तक भारतीयों का एक बड़ा वर्ग इन खेलों के विरुद्ध हो चुका है.

पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रमंडल खेलों के मुखर विरोधियों के सुर ज़्यादा तेज़ सुनाई दे रहे हैं वहीं एक खेमा है जो ये कहता है कि सिर्फ़ कुछ भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से इन खेलों को तो छोड़ा नहीं जा सकता.

आख़िर ऐसा क्या हुआ कि खेलों के समर्थक रहे कई लोग अब उतने खुलकर समर्थन नहीं व्यक्त कर पा रहे.

ऐसी नौबत आई ही क्यों.

सही बात है कि जब बारात दरवाज़े पर खड़ी हो तब आप अब क्या करेंगे पर अगर इन खेलों की सारी तैयारियाँ समय से पूरी कर ली गई होतीं तब शायद इतनी हाय-तौबा न मचती.

जल्दी-जल्दी में काम ख़त्म करने के नाम पर कॉन्ट्रैक्टर ज़्यादा दाम भी नहीं वसूल पाते और क्वालिटी पर भी आसानी से नज़र रखी जा सकती थी.

एथलीट्स को तैयारी का सही समय मिल जाता और भारतीय खिलाड़ियों को अपने देश में हो रहे खेलों का फ़ायदा भी मिलता.

उस सूरत में जो भी बहस होनी थी वो सब समय रहते पूरी हो सकती थी और लोग खेलों पर ध्यान लगा सकते थे.

खेलों से लगभग दो महीने पहले लोगों में राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर उत्साह भरने की बात होती और चमचमाती दिल्ली में लोग उसकी बातें भी कर रहे होते.

मगर खेलों के इतने नज़दीक़ तक उठ रहे ये विवाद खेलों का रंग फीका कर रहे हैं और खेलों के आयोजन का समर्थन करने वाला एक बड़ा वर्ग खुलकर सामने नहीं आ पा रहा है.

परेशानी यहाँ भी वहाँ भी...

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 09 अगस्त 2010, 13:00

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बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर दो चित्र नज़र आ रहे हैं.

एक में एक लड़का अपने बूढ़े पिता को पीठ पर उठा कर गहरे पानी से गुज़र रहा है तो दूसरी तस्वीर एक महिला की है जो अपने छोटे बच्चे को सीने से लगाए बिलख रही है.

इनमें से एक तस्वीर पाकिस्तान में जानोमाल को भारी नुक़सान पहुँचाने वाली बाढ़ की है तो दूसरी भारतीय कश्मीर के लेह में बादल फटने से मची तबाही की.

दोनों में से कोई भी चित्र कहीं का भी हो सकता है. क्योंकि दोनों चित्रों में दिखाई दे रहे लोगों की शक्ल-सूरत, रंग एक जैसे हैं. मुसीबत की घड़ी में अपनों को खोने का शोक मना रहा या फिर उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा कौन व्यक्ति भारतीय है और कौन पाकिस्तानी बताना मुश्किल है.

दोनों देशों के संबंधों में खटास है, यह उनके राजनीतिज्ञ बताते हैं या फिर मीडिया से पता चलता है.

आम जनता के बीच हमेशा एक रिश्ता रहा है-दर्द का रिश्ता.

ग़रीब यहाँ भी ग़रीब है और वहाँ भी. मजबूर यहाँ भी मजबूर है और वहाँ भी. और लाचार और बेबस लोग भी दोनों ही जगह मौजूद हैं.

जब दोनों देशों के नेता शर्म-अल-शेख़ में या फिर आगरा में या फिर लाहौर में विदेश नीति की चर्चा कर रहे होते हैं तो उनकी बहुसंख्यक जनता रोटी का जुगाड़ कर रही होती है.

रोटी के जुगाड़ के लिए मज़दूरी करती, सर पर पत्थर ढोती यह जनता आप को दोनों जगह नज़र आएगी, एक से कपड़े पहने, एक ही तरह का पसीना बहाती.

क्या यह कहना सही होगा कि तकलीफ़ में दोनों देशों के लोग एक ही तरह सोचते हैं, उस समय उनके मन में एक दूसरे के लिए कटुता नहीं होती, हमदर्दी होती है, भाईचारे का भाव होता है.

कौन सा भारतीय है जो पाकिस्तान की बाढ़ के दृश्य टीवी पर देख कर ख़ुश हो रहा होगा. या फिर कौन सा पाकिस्तानी लेह में मारे गए लोगों के परिजनों के विलाप का आनंद ले रहा होगा.

ऐसे मौक़े पर निदा फ़ाज़ली की पंक्तियाँ याद आती हैं:

अल्लाह निगहबान
यहाँ भी है वहाँ भी,
इंसान परेशान
यहाँ भी है वहाँ भी!

खेलों से भला किसका

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|मंगलवार, 03 अगस्त 2010, 13:59

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राष्ट्रमंडल खेलों के सिलसिले में कहाँ तक तो इस समय ये चर्चा होनी चाहिए थी कि भारत की किस टीम की तैयारी कहाँ तक पहुँची, कौन सी टीम कहाँ अभ्यास कर रही है और स्टेडियम कितने ख़ूबसूरत दिख रहे हैं- मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है.

हर रोज़ अख़बार उठाकर देखिए तो भ्रष्टाचार के आरोप और टेलीविज़न खोलिए तो आयोजन स्थल में कमियों की जीती-जागती तस्वीरें दिखाई पड़ती हैं.

बीते दिनों जिस तरह इन खेलों का बजट 17 गुना तक पहुँच जाने और आयोजन में भ्रष्टाचार की ख़बरें आई हैं अब एक डर बैठ रहा है.

हर ओर लोग इसी आशंका पर बात कर रहे हैं कि खेल समय पर हो पाएँगे या नहीं.

खेलों से जुड़े लोगों के लिए दिल्ली के वसंत कुंज इलाक़े में जो फ़्लैट्स बन रहे थे उसके इंजीनियर्स ने कह दिया कि एक महीने में काम ख़त्म करने की समय सीमा वास्तविक नहीं है.

मुख्य सतर्कता आयुक्त ने स्टेडियम के निर्माण में इस्तेमाल हुई सामग्री की गुणवत्ता और कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने के तरीक़ों पर सवाल उठाया है.

इन सब मसलों के बीच ख़बर आई कि खेल मंत्रालय ने भारतीय ओलंपिक समिति को 2019 के एशियाई खेलों के आयोजन की होड़ में शामिल होने की हरी झंडी नहीं दी है.

जितना धन इन खेलों के आयोजन में ख़र्च हो रहा है उतना अगर देश में खेल से जुड़े बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने में ख़र्च होता तो भारत ओलंपिक में न जाने कितने पदक बटोर लाता.

ये सही बात है कि खेलों का आयोजन लेना चाहिए था या नहीं, इस बात पर चर्चा का ये ठीक वक़्त नहीं है मगर खेलों के समापन के बाद इस बात पर नज़र ज़रूर डालनी चाहिए कि इस आयोजन से भला किसका हुआ- खिलाड़ियों का या आयोजकों का.

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