समर्थकों का मुँह बंद क्यों
अभी कुछ ही दिनों पहले चैनल बदलते हुए दूरदर्शन पर रुक गया. मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों के समापन कार्यक्रम में भारत की प्रस्तुति दिखाई जा रही थी.
'दिल्ली चलो' के नारे के साथ हिंदी फ़िल्म अभिनेता सैफ़ अली ख़ान, रानी मुखर्जी, पार्श्व गायिका सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल और श्यामक दावर स्टेज पर थे. रंग-बिरंगी प्रस्तुति थी और देखकर लगा था कि भारत में काफ़ी रंगारंग कार्यक्रम के साथ भव्य खेल होंगे.
भारतीयों का ये सपना शायद अब भी सच हो जाएगा मगर भारत को जब ये राष्ट्रमंडल खेल मिले थे तब से लेकर अब तक भारतीयों का एक बड़ा वर्ग इन खेलों के विरुद्ध हो चुका है.
पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रमंडल खेलों के मुखर विरोधियों के सुर ज़्यादा तेज़ सुनाई दे रहे हैं वहीं एक खेमा है जो ये कहता है कि सिर्फ़ कुछ भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से इन खेलों को तो छोड़ा नहीं जा सकता.
आख़िर ऐसा क्या हुआ कि खेलों के समर्थक रहे कई लोग अब उतने खुलकर समर्थन नहीं व्यक्त कर पा रहे.
ऐसी नौबत आई ही क्यों.
सही बात है कि जब बारात दरवाज़े पर खड़ी हो तब आप अब क्या करेंगे पर अगर इन खेलों की सारी तैयारियाँ समय से पूरी कर ली गई होतीं तब शायद इतनी हाय-तौबा न मचती.
जल्दी-जल्दी में काम ख़त्म करने के नाम पर कॉन्ट्रैक्टर ज़्यादा दाम भी नहीं वसूल पाते और क्वालिटी पर भी आसानी से नज़र रखी जा सकती थी.
एथलीट्स को तैयारी का सही समय मिल जाता और भारतीय खिलाड़ियों को अपने देश में हो रहे खेलों का फ़ायदा भी मिलता.
उस सूरत में जो भी बहस होनी थी वो सब समय रहते पूरी हो सकती थी और लोग खेलों पर ध्यान लगा सकते थे.
खेलों से लगभग दो महीने पहले लोगों में राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर उत्साह भरने की बात होती और चमचमाती दिल्ली में लोग उसकी बातें भी कर रहे होते.
मगर खेलों के इतने नज़दीक़ तक उठ रहे ये विवाद खेलों का रंग फीका कर रहे हैं और खेलों के आयोजन का समर्थन करने वाला एक बड़ा वर्ग खुलकर सामने नहीं आ पा रहा है.

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भारत की जनता जान चुकी है कि इन खेलों में पैसा बनाने का खेल कुछ ज्यादा ही चल रहा है. खेलों के आयोजन में बस कुछ ही दिन शेष हैं और लोग संयम रख रहे हुए हैं कि दुनिया भारत को कपड़ा फाड़ लड़ाई में नंगा न देखे. बस यही कसर बाकी है इसके अलावा कुछ बचा नहीं है. आप और हम सभी जानते हैं कि जितनी जगहंसाई होनी थी हो चुकी और अब और नंगे न हों. इससे भारत की गरिमा गिरती है.
मुकेश जी कोई भी भारतीय राष्ट्रमंडल खेलों का विरोधी नहीं है. हमें विरोध और नाराज़गी है तो इसके माध्यम से भ्रष्टाचार के ज़रिये पैसों की बर्बादी से. खेल व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक हैं. यह हम भी जानते हैं लेकिन राष्ट्रमंडल खेलों से भारत के खेल जगत को कोई लाभ नहीं होने जा रहा लाभ हो रहा है कांग्रेस के भ्रष्ट नेताओं को. आप जिन्हें इन खेलों का समर्थक बता रहे हैं वे बोलें भी तो क्या बोलें, कुछ बोलने के लिए होना भी तो चाहिए.
गरिमा के नाम पर क्या रेशम के दुपट्टे के नीचे कोढ़ पालें. यह विशुद्ध रूप से अपनी झोली भरने का आयोजन मात्र है और कुछ नहीं. सब बेपर्दा हो चुका है. कलमाड़ी का स्विस बैंक एकाउंट तो जरा चेक करो, पैरों तले जमीन खिसक जाएगी. बाबा मनमोहन की चुप्पी बड़ी रहस्यात्मक और खौफ़नाक है. अगर कोई स्वाभिमानी और अपने असली हितों की रक्षा करने वाला राष्ट्र होता तो इन खेलों का आयोजन तुरंत रुकवाकर भ्रष्टमंडल की भ्रष्टमंडली को पहले फांसी पर चढ़ाता.
समर्थक क्या करें बेचारे? अब नकाब उतर चुका है. सवाल यह नहीं है कि कुछ तुच्छ मानसिकता के लोगों ने खेलों के नाम पर जेबें भरीं बल्कि राष्ट्र के स्वाभिमान का ही सौदा कर डाला? ऐसे लोग देश प्रेम का उपदेश देते नज़र आते हैं तो बहुत दुख होता है. क्वींस बैटन के बाघा बॉर्डर पर आगमन के समय ऐसे लोगों की राष्ट्र भक्ति देखने लायक थी. तभी तो आस पास बुजर्गों को कहते सुनता हूँ कि इससे तो अंग्रेजों का ज़माना अच्छा था? कम से कम आदमी इस कद्र बेख़ौफ़ होकर आम जानता के गड़े पसीने की कमी से अपनी जेबें तो नहीं भरता.सचमुच इस खेल घोटाले ने साफ़ कर दिया है कि लोग अपने देश की गरिमा को भी बेच खा सकते हैं? धिक्कार है ऐसे देशद्रोहियों की मानसिकता पर?
अभी मीडिया के जरिए जो भी जानकारी हमें मिल रही है, उससे तो यही लगता है कि इस खेल के आयोजन में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा हुआ है. लोग इसी बात पर नाराज हैं. दूसरी बात यह कि जब हमारे सरकारी विभाग जैसे एमसीडी, डीडीए और पीडब्ल्यूडी में समय पर काम करने की क्षमता ही नहीं थी तो उसे ज़िम्मेदारी क्यों दी गई. फिलहाल लोग खेल शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं. यकीन मानिए इसके बाद जनता का जो विरोध सामने आएगा वह राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को भारी पड़ेगा.
मुकेश जी, लगता है कि आपने इस लेख में बेईमान नेताओं का खुला पक्ष लेने का प्रयास किया है. आप इन खेलों के बारे में लिख कर लंदन की महारानी को ख़ुश करना चाहते हैं. लगता है इन दिनों आपने इन खेलों के बारे में लिखने का ठेका ले रखा है. देश और भी मुद्दे हैं आपका ध्यान उनकी ओर क्यों नहीं जाता है? कम से कम कलम से तो इन बेईमान नेताओं का समर्थन न करें.
बहुत अच्छा लिखा है.
मैं तो आज भी राष्ट्रमंडल खेलों का समर्थन करता हूँ. इन खेलों के आयोजन की वजह से कई खेलों और खिलाडियों को वह सुविधा और स्तर मिलेगा जो वे पिछले कई सालों से चाहते थे. इतना रुपया इन खेलों में सीधे तौर पर कभी नहीं आया जिसकी ज़रूरत थी. वो इस खेल आयोजन की वजह से आया है बाकि भ्रष्टाचार किन खेलो में नहीं है? क्रिकेट के आईपीएल का तमाशा तो देखा ही होगा पर आज भी हम इतने मज़े से क्रिकेट देखते हैं,सब कुछ भूल कर. तो इन खेलों को भ्रष्टाचार से अलग क्यों नहीं देखते? मेरे पिता कहेते हैं कि भ्रष्टाचार को जनता और सरकार ने मौन रूप से सामाजिक स्वीकृति दे दी है. मैं इन खेलों के आयोजन से खुश हूँ.
इन खेलों की मेजबानी एनडीए के शासनकाल में मिली थी. तब से लेकर अबतक यमुना में काफी पानी बह चुका है. आज जो भी दल इन खेलों में भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं वे केवल राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं. मणिशंकर अय्यर कलमाडी को कोस रहे हैं लेकिन क्या वे ये बताने की जहमत उठाएंगे कि जब वो खेल मंत्री थे तो उन्होंने इन खेलों के सफल आयोजन के लिए क्या क्या किया. राष्ट्रमंडल खेलों में भी भ्रष्टाचार मुझे तो कम से कम नहीं चौंकाता क्योंकि इसकी शुरूआत तो खेलों की मेजबानी मिलने के साथ ही शुरू हो गई थी.
हालांकि एक भारतीय होने के नाते हम सब यही मना रहे हैं कि ये खेल सफलता पूर्वक संपन्न हो जाएं. पूरे देश की यही दुआ होगी. मेरी भी है.
भारत में मीडिया का एक बड़ा तबका ब्लैक मैलिंग और बिकने वाली ख़बरों की तलाश में दुनिया भर में भारत की फजीहत करवा रहा है. सरकारी व्यवस्थाएं जैसे काम करती आई हैं वैसे ही कर रही हैं. भ्रष्टाचार हमारी नस नस में है, हाँ इन खेलों को इनसे वंचित रखा जा सकता था जो शायद नहीं हुआ. लेकिन देशवासियों को एकजुट हो इन खेलों को सफल बनाना चाहिए, ये देश की इज्ज़त का सवाल है, बाकी बातें बाद में गंभीरता के साथ की जा सकती हैं.
राष्ट्रमंडल खेलो को लेकर हमारे यहाँ जो टांग खिचाई चल रही है यह कोई नई बात नहीं है. ये हमारी राजनीति की परम्परा रही है. मीडिया का भी रोल निष्पक्ष नहीं है जो मीडिया खेलो को लेकर हाय तौबा अभी मचाया है उसे भी तो और पहले करना चाहिए था. बहरहाल इस समय हम सभी लोगों को मिलकर खेलों को कामयाब बनाने के लिए कोशिश करनी चाहिए ताकि भारत की छवि दुनिया के सामने और खराब न हो.
मैं पूरी तरह से इस आयोजन के खिलाफ हूँ.