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परेशानी यहाँ भी वहाँ भी...

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 09 अगस्त 2010, 13:00 IST

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर दो चित्र नज़र आ रहे हैं.

एक में एक लड़का अपने बूढ़े पिता को पीठ पर उठा कर गहरे पानी से गुज़र रहा है तो दूसरी तस्वीर एक महिला की है जो अपने छोटे बच्चे को सीने से लगाए बिलख रही है.

इनमें से एक तस्वीर पाकिस्तान में जानोमाल को भारी नुक़सान पहुँचाने वाली बाढ़ की है तो दूसरी भारतीय कश्मीर के लेह में बादल फटने से मची तबाही की.

दोनों में से कोई भी चित्र कहीं का भी हो सकता है. क्योंकि दोनों चित्रों में दिखाई दे रहे लोगों की शक्ल-सूरत, रंग एक जैसे हैं. मुसीबत की घड़ी में अपनों को खोने का शोक मना रहा या फिर उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा कौन व्यक्ति भारतीय है और कौन पाकिस्तानी बताना मुश्किल है.

दोनों देशों के संबंधों में खटास है, यह उनके राजनीतिज्ञ बताते हैं या फिर मीडिया से पता चलता है.

आम जनता के बीच हमेशा एक रिश्ता रहा है-दर्द का रिश्ता.

ग़रीब यहाँ भी ग़रीब है और वहाँ भी. मजबूर यहाँ भी मजबूर है और वहाँ भी. और लाचार और बेबस लोग भी दोनों ही जगह मौजूद हैं.

जब दोनों देशों के नेता शर्म-अल-शेख़ में या फिर आगरा में या फिर लाहौर में विदेश नीति की चर्चा कर रहे होते हैं तो उनकी बहुसंख्यक जनता रोटी का जुगाड़ कर रही होती है.

रोटी के जुगाड़ के लिए मज़दूरी करती, सर पर पत्थर ढोती यह जनता आप को दोनों जगह नज़र आएगी, एक से कपड़े पहने, एक ही तरह का पसीना बहाती.

क्या यह कहना सही होगा कि तकलीफ़ में दोनों देशों के लोग एक ही तरह सोचते हैं, उस समय उनके मन में एक दूसरे के लिए कटुता नहीं होती, हमदर्दी होती है, भाईचारे का भाव होता है.

कौन सा भारतीय है जो पाकिस्तान की बाढ़ के दृश्य टीवी पर देख कर ख़ुश हो रहा होगा. या फिर कौन सा पाकिस्तानी लेह में मारे गए लोगों के परिजनों के विलाप का आनंद ले रहा होगा.

ऐसे मौक़े पर निदा फ़ाज़ली की पंक्तियाँ याद आती हैं:

अल्लाह निगहबान
यहाँ भी है वहाँ भी,
इंसान परेशान
यहाँ भी है वहाँ भी!

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:51 IST, 09 अगस्त 2010 Mohammad Alamgir:

    सलमा जी, आपने बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है. इंसान कहीं का भी हो इंसान होता है. किसी के दुख-दर्द में सभी को शामिल होना चाहिए. दुख-तकलीफ़ मिल जुल कर बांटना चाहिए, न कि ख़ुश होना चाहिए. हिंदुस्तान की जनता हमेशा पाकिस्तान के अवाम को चाहती है और वहाँ के अवाम भी चाहते हैं कि किसी तरह से दोनों देशों की लड़ाई रुक जाए. पर राजनीति ऐसा होने नहीं देती.

  • 2. 14:39 IST, 09 अगस्त 2010 Intezar Hussain:

    पहले मैं दोनों देशों के पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना जताता हूँ. अल्लाह से दुआ करता हूँ कि उनकी मदद करें. शायद ही कोई होगा जो इस आपदा को देख-सुन कर दुखी नहीं होगा. हाल ही में पाकिस्तान के एक समाचार चैनल पर देखा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बाढ़ ग्रस्त इलाक़े का दौरा किया और वहाँ के राहत शिविरों में चेक बांटे. लेकिन उनके जाने के बाद वहाँ ना तो कोई शिविर था ना हीं कोई मरीज. ऐसे लोग इंसान नहीं हो सकते जो मुसीबत के समय अपना जेब भरने की फिराक में रहते हैं. ऐसे लोगों से सख्ती से निपटना होगा.

  • 3. 15:50 IST, 09 अगस्त 2010 akendra singh:

    इस तरह के विचार ही इंसानियत को कायम रख सकते हैं, वरना दुनिया में सबसे ख़तरनाक जानवर इंसान ही है.

  • 4. 16:59 IST, 09 अगस्त 2010 Bhim Kumar Singh:

    सलमा जी, विदेश नीति, राजनीति और कूटनीति से आम जनता का अक्सर लेना-देना नहीं होता. मैं यह भी नहीं समझता कि भारत और पाकिस्तान के लोग एक-दूसरे से नफरत करते होंगे. जहां तक तबाही और तकलीफों की बात है, यह मंजर दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो, जानने पर दिल तो पसीजता ही है. फिर हम तो पड़ोसी हैं, बल्कि एक ही सभ्यता-संस्कृति के दो हिस्से. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक-दूसरे के दु:ख-दर्द में शामिल न हों. हां, यह जरूर है कि सतही राजनीति में सौहार्द के लिए जगह नहीं होती.

  • 5. 17:14 IST, 09 अगस्त 2010 Dr.Lal Ratnakar:

    इसको इस तरह कहें - दो जिस्म और एक जान है, दोनों के आका बेईमान है .
    क्योंकि बटवारे से लेकर अब तक गरीबों के खूं के प्यासे इस देश में भी और उस देश में भी. इनकी नियति एक है और नीति एक है. गरीबों को लूटना उनके नाम पर खाना. रोज़ ब रोज़ ये जनता को मार और मरवा रहे है, कही नक्सली के रूप में कहीं सैनिक के रूप में.
    प्राकृतिक विपदा के शिकार भी तो यही होते है, इधर भी और उधर भी.

  • 6. 18:11 IST, 09 अगस्त 2010 Amit Kumar Jha, New Delhi:

    बाढ़ की विभीषिका के बहाने सच को नुमायाँ करता आपका ब्लॉग अच्छा लगा. दरअसल, सरहद के दोनों ही ओर, चाहे वह हिन्दुस्तानी हो या पाकिस्तानी, आम जनता के हिस्से में दुःख, दर्द, गरीबी और ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के हाथों तबाही ही लिखी है. वो तो हमारे राजनेता और सेना के हुक्मरान कभी दोस्ती करते तो कभी एक-दूसरे पर दोषारोपण करते नजर आते हैं, वरना आम आदमी तो इन सब से परे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों में ही इतना मशगूल होता है कि उसे इन तथाकथित गंभीर विषयों पर मगजमारी का वक़्त ही नहीं मिलता. खैर, फिर भी अगर दोनों ही देशों की जनता की राय ली जाये, तो इतना तो लगता है कि बहुमत अमन-चैन की बहाली के साथ भाईचारे से रहने की ख्वाहिशमंद होगा.

  • 7. 19:14 IST, 09 अगस्त 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    सलमा जी, ये वाकई अफसोसजनक है कि भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ के लोग दर्दनाक हादसों को झेल रहे हैं. पाकिस्तान के बारे जितनी खबर आ रही है उससे कहीं ज्यादा तबाही वहाँ हुई है. जरदारी जिम्मेदारी से मुँह छिपा कर विदेश दौरे पर हैं. गरीबों का दर्द एक जमीन से जुड़ा नेता ही समझ सकता है.

  • 8. 10:21 IST, 10 अगस्त 2010 आर. के. सुतार :

    सलमा जी, एक बहुत ही मर्मस्पर्शी आलेख के लिए आपको ह्रदय से आभार. निदा फाजली साहब की पंक्तियों ने बखूबी आपकी सोच को और अधिक स्पष्टता दी है. दुर्भाग्य से ये भाव स्थायी न होकर घटनाओं के मोहताज रहते हैं और यही बड़ी समस्या है. इसीलिए कहा गया है, "आदमी जब सोता है, तो आदमी होता है, या फिर आदमी जब रोता है, तब आदमी होता है." उम्मीद करता हूँ कि आपके शब्द शायद कुछ लोगों के दिल में स्थायी रौशनी का कारण बनेंगे.

  • 9. 12:22 IST, 10 अगस्त 2010 BALWANT SINGH PUNJAB:

    बिलकुल सही लिखा है आपने सलमा जी. इंसानियत जात-पात और धर्म से परे है. दर्द सरहदों की सीमा में नहीं बंधा होता लेकिन नेता और सरकारें दर्द को भी दीन - धर्म की बेड़ियों में बांधना चाहते हैं.

  • 10. 15:05 IST, 10 अगस्त 2010 AbdulRashid (Journalist):

    बेहद ख़ूबसूरती से लिखा है आपने.

  • 11. 16:27 IST, 10 अगस्त 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, बहुत बेहतरीन लिखा है आपने. लेकिन यह दर्द दोनों तरफ के केवल ग़रीबों का है बेईमान नेताओं का नहीं. दुनिया माने या न माने यह सब अल्लाह का अज़ाब है. रहा सवाल शर्म-अल-शेख़ का या आगरा का तो वहाँ ग़रीबों ने नहीं नेताओं ने मौज किया था और करते रहेंगे. आपके लेख में दर्द है और तड़प है दोनों तरफ़ की जनता के लिए. हम सब केवल दुआ ही कर सकते हैं.

  • 12. 08:20 IST, 11 अगस्त 2010 braj kishore singh:

    पाकिस्तान भले ही राजनीतिक तौर पर हमसे अलग हो गया हो लेकिन वह भूगोल को तो नहीं बदल सकता. भारत और पाकिस्तान एक ही कटिबंध के देश हैं. दोनों की जलवायु भी एक जैसी है. दोनों देशों में प्राकृतिक रूप से सिर्फ समानताएं हैं. अगर असमानताएँ हैं तो इसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वे हैं दोनों के बीच खींची गई कृत्रिम सीमा-रेखा.

  • 13. 15:21 IST, 11 अगस्त 2010 himmat singh bhati:

    सलमा जी, आप एक नारी हैं और आपसे अधिक दर्द कौन महसूस कर सकता है. आपने हृदय छूने वाली दास्तान बयान की है. देखा जाए तो लोग चाहें वे काले हों या गोरे, सबका ख़ून तो लाल ही है. इस ख़ून में लाल-सफ़ेद दोनों तरह के जीवाणु पाए जाते हैं, यह सबके खून में पाए जाते हैं, तीसरा कोई जीवाणु नहीं होता है. जिसको भरपेट खाना मिलता है वही बेईमानी और भेदभाव की राजनीति अपनाता है. मुसीबत पड़ने पर वह सभी भेदभाव भूल जाता है. यह भेदभाव किसी तरह भी आम लोगों के बीच नहीं आता है. इस भेदभाव के लिए राजनीतिक और धर्म के ठेकेदार ही ज़िम्मेदार रहे हैं और रहेंगे. लेकिन समय बदलेगा इसमें कोई शक नहीं है. मीडिया में आप जैसे लोगों के होने के कारण जनता जागरूक हो रही है.

  • 14. 20:50 IST, 11 अगस्त 2010 manoj:

    यह बात कम से कम नेताओं को समझानी चाहिए।

  • 15. 14:23 IST, 13 अगस्त 2010 Gurmender Singh:

    यह सब कुछ प्रकृति पर निर्भर है. ईश्वर उन सभी पीड़ित लोगों की रक्षा करे!

  • 16. 16:20 IST, 03 सितम्बर 2010 subhash kukreti:

    एअरकंडिशन कमरों में रहने वाले लोगों को आम आदमी के दर्द से क्या वास्ता?

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