खेलों से भला किसका
राष्ट्रमंडल खेलों के सिलसिले में कहाँ तक तो इस समय ये चर्चा होनी चाहिए थी कि भारत की किस टीम की तैयारी कहाँ तक पहुँची, कौन सी टीम कहाँ अभ्यास कर रही है और स्टेडियम कितने ख़ूबसूरत दिख रहे हैं- मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है.
हर रोज़ अख़बार उठाकर देखिए तो भ्रष्टाचार के आरोप और टेलीविज़न खोलिए तो आयोजन स्थल में कमियों की जीती-जागती तस्वीरें दिखाई पड़ती हैं.
बीते दिनों जिस तरह इन खेलों का बजट 17 गुना तक पहुँच जाने और आयोजन में भ्रष्टाचार की ख़बरें आई हैं अब एक डर बैठ रहा है.
हर ओर लोग इसी आशंका पर बात कर रहे हैं कि खेल समय पर हो पाएँगे या नहीं.
खेलों से जुड़े लोगों के लिए दिल्ली के वसंत कुंज इलाक़े में जो फ़्लैट्स बन रहे थे उसके इंजीनियर्स ने कह दिया कि एक महीने में काम ख़त्म करने की समय सीमा वास्तविक नहीं है.
मुख्य सतर्कता आयुक्त ने स्टेडियम के निर्माण में इस्तेमाल हुई सामग्री की गुणवत्ता और कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने के तरीक़ों पर सवाल उठाया है.
इन सब मसलों के बीच ख़बर आई कि खेल मंत्रालय ने भारतीय ओलंपिक समिति को 2019 के एशियाई खेलों के आयोजन की होड़ में शामिल होने की हरी झंडी नहीं दी है.
जितना धन इन खेलों के आयोजन में ख़र्च हो रहा है उतना अगर देश में खेल से जुड़े बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा देने में ख़र्च होता तो भारत ओलंपिक में न जाने कितने पदक बटोर लाता.
ये सही बात है कि खेलों का आयोजन लेना चाहिए था या नहीं, इस बात पर चर्चा का ये ठीक वक़्त नहीं है मगर खेलों के समापन के बाद इस बात पर नज़र ज़रूर डालनी चाहिए कि इस आयोजन से भला किसका हुआ- खिलाड़ियों का या आयोजकों का.

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अब तक जो स्थितियां हैं उससे तो यही लग रहा है कि इन खेलों के आयोजन से भारत में खेलों के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं होने जा रहा है.क्योंकि सरकारी महकमे का सारा ध्यान स्टेडियम और परिसर बनाने पर केन्द्रित है.खेलों की तैयारी पर जिस तरह का ध्यान दिया जाना चाहिए नहीं दिया जा रहा है.कहने का मतलब यह है कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से जो भी लाभ हुआ है वो सिर्फ खेल अधिकारियों और ठेकेदारों को हुआ है जो निर्माण कार्य से जुड़े हुए हैं.सरकार ने अपने खजाने का मुंह खोल दिया है और जिसमें जितना पैसा बनाने की क्षमता है बना रहा है.
जो लोग भी भ्रष्ट्राचार में लिप्त हैं उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए. हम भारतीय है और यह सब पढ़-सुन कर हमें दुख होता है.
क्या बात है...
मेरी समझ से राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होना चाहिए.
नमस्कार जनाब, मै एक मीडिया स्टूडेंट हूँ और आपकी बात से बिलकुल भी इत्तेफाक नहीं रखता. चूकी अगर दुनिया के बाकी देशों के सामने जब हम भारत की बात करते हैं तो बड़ी-बड़ी बाते करते हैं, चाहे संयुक्त राष्ट्र का मंच हो या जी-20 देशों का सम्मलेन, या फिर संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता का सवाल. आप या आपके जैसे तमाम लोग क्यूँ इस पर आज सवाल उठा रहे हैं या ऐसे आयोजन पर सवाल तब उठाते हैं जब हमें हर हाल में इसे सफल बनाना चाहिए, क्योंकि यह भारत की बात है न कि सिर्फ राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजनकर्ताओं की. आनेवाले दिनों में भारत क्रिकेट विश्व कप का आयोजन करने जा रहा है, तो अभी तक किसी ने इस पर सवाल उठाया क्या? रही बात भ्रष्टाचार की और तैयारियाँ समय पर नहीं होने की तो भारत के लिए शर्म की बात है, क्योंकि यहाँ भ्रष्टाचार तो हर जगह हैं, आपके जैसे पत्रकार अगर स्टिंग ऑपरेशन न भी करें तो भी हर कार्यालय, हर मंत्रालय से लेकर हर चौराहे पर भ्रष्टाचार दिख जाएगा. कुछ ही दिन पहले हमने आईपीएल में भ्रष्टाचार कितने बड़े पैमाने पर देखा था आप याद कीजिए, तो आप राष्ट्रमंडल खेलों पर क्यूँ सवाल उठा रहे है? हमारे यहाँ भ्रष्टाचारी तो कफ़न में से भी पैसा चुराने का ख्वाब देखते हैं.
राष्ट्रमंडल खेलों से भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों की जेब भर रही है. भारत को काम पूरा करने के लिए बाहर की कंपिनयों को बुलाना चाहिए क्योंकि भारतीय कंपनियों के पास काम के बारे में सोचने का समय नहीं है वे केवल घटिया सामग्री का प्रयोग कर अपना मुनाफा बढ़ाना चाहती हैं.
यह बहुत दुख की बात है कि इतने समय बाद देश को यह मौका मिला और सिवाए भ्रष्टाचार के इसमें कुछ नज़र नहीं आ रहा है. हो सकता है कि राष्ट्रमंडल खेलों का सही आयोजन हो भी जाए लेकिन जिस तरह इसका बजट बढ़कर 17 गुना हो गया, सरकार को सोचना चाहिए कि क्या वह ऐसे खेलों का आयोजन कर सकती है. अगर हाँ तो आखिर किन शर्तों पर? एक हज़ार करोड़ की जगह 17 हज़ार करोड़ खर्च कर. यह पैसा उस देश में खर्च हो रहा है जहाँ करोड़ लोग 20 रुपए प्रतिदिन पर जीवन-यापन करते हैं.
हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि राष्ट्रमंडल खेल ठीक से हो जाएं. कहीं देश की इज्जच भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ जाए.
राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर जो घोटाला चल रहा है वह बहुत ही शर्मनाक है! हकीकत यह है कि अगर मीडिया का दखल न होता तो अब तक 17 गुना बढ़ा हुआ बज़ट और कितना बढ़ सकता था इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता. एक ओर तो सरकार आम आदमी और नौकरी पेशा लोगों से गले में अंगूठा कर कर वसूल रही है और उसी कमाई से सरकार में बैठे लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. दुखद विषय है कि ये लोग कितनी बेशर्मी से कैमरों के सामने भी ढिठाई से एक दूसरे पर कीचड उछाल रहे हैं? आखिर आम आदमी के पैसे के दुरुपयोग की जिम्मेदारी किसकी बनती है? अभी पिछले सप्ताह ही खबर आई थी कि जजों ने कर्मचारियों के पीएफ के पैसे का घोटाला किया? आखिर ये सब चल क्यों रहा है? क्या राष्ट्रमंडल खेलों के कर्ताधर्ता इसी बात का इंतजार कर रहे थे कि कब इन खेलों का आयोजन हो और अगली सात पीढ़ियों के लिए अवैध पैसा संचित कर लिया जाए?
मैं आपके विचार से सहमत हूँ. भारत एक ग़रीब देश है और इतने पैसों में देश के कितने स्कूलों की बिल्डिंग बन जाती.
मुकेश जी ऐसा लगता है कि बीबीसी के पास भी कोई दूसरी ख़बर नहीं है इसलिए बीबीसी और मुकेश जी आप खाली बैठे हैं.
अब 33 करोड़ देवी-देवता ही इस खेल का सफल आयोजन कर सकते हैं.
झूठी शान के लिए इतना करने की जगह अगर यह पैसा देश में अनाज के भंडारण और वितरण व्यवस्था पर खर्च किया जाता तो कितने ही भूखों तक अनाज पहुँचता. लेकिन केवल लूट मची है.
नेताओं और मंत्रियों के बिना इतना बड़ा घोटाला नहीं हो सकता है. देश का पैसा वापस लाना ज़रूरी है. जाँच में भ्रष्ट लोग पकड़े जाएंगे लेकिन पैसा वापस नहीं मिलेगा.
आश्चर्य है कि ईमानदार प्रधानमंत्री, समदर्शी सोनिया, भावी प्रधानमंत्री राहुल बाबा, चिदंबरम, प्रणब, अहलुवालिया सब देख-देख कर चुप्पी साधे हुए हैं.
खेलों से भला किसका, ये प्रश्न अगर आप भारत के परिप्रेक्ष्य में पूछ रहे हैं तो इसका सीधा सा एक ही जवाब है कि इस खेल से केवल और केवल "नेताओ का" भला होगा. देश के झूठे स्वाभिमान के लिए करदाताओं की मेहनत के अरबों रूपए बिना किसी सबूत के डकार लिए गए है और जाएँगे.
मुकेश जी आपका विचार सौ फ़ीसदी सही है क्योंकि यह दुनिया को अपनी खेल की शक्ति दिखाने का समय है लेकिन यहाँ स्थिति तो बिल्कुल ही अलग है. हर जगह केवल भ्रष्टाचार दिखाई दे रहा है. कोई भी खेल और देश के बारे में नहीं सोच रहा है. सब अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं. यह भ्रष्ट राजनीति का चरम है. एक तरफ तो वे आधुनिक और युवा भारत की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर वे अपना दूसरा ही चेहरा दिखाते हैं. मेरी भगवान से प्रार्थना है कि खेल सफलतापूर्वक आयोजित हो जाएँ.
अगर आयोजन नहीं होता है तो सरकार को कितना पैसा जुर्माने के तौर पर देना होगा?
भ्रष्टाचार का दूसरा नाम भारत रख देना चाहिए.
आप ऐसे आयोजन को फिजूलखर्ची बता रहे हैं जिसको सफलतापूर्वक आयोजित करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान और प्रतिष्ठा बढेगी.
हमारी आम जनता किसी ज़रूरी काम से सो रही है, इन्हें कृपया मत जगाइए. देश के युवाओं से मेरी गुज़ारिश है कि समय रहते अपनी आंखें खोलें और अपनी ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करें.
अगर गरीबी की बात करें तो एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अफ़्रीकी देशों से भी ज्यादा गरीब है. अगर शक हो तो बुंदेलखंड के किसी गाँव में जाकर देख लें. गरीबी रो पड़ेगी! लेकिन इस नज़र से तो हमें सभी वैश्विक आयोजनों को बंद कर देना चाहिए. हम हर बार भ्रसटाचार का पर्दाफाश और नष्ट करने के बजाय पूरे आयोजन पर ही सवाल खड़े करते हैं. ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए.
इस तरह के भ्रष्टाचार होते रहेंगे, इसलिए आम आदमी को जाग जाना चाहिए कि कभी भी आपका भला नहीं होने वाला है. आज देश को स्वतंत्र हुए 64 वर्ष हो गए हैं, कितने घोटाले हुए, क्या हुआ? मेडल के लिए झूठे एनकाउंटर, भ्रष्टाचार में शामिल जज. इसलिए हमें उम्मीद तो नहीं है कि हालात बदलेंगे.
भारत में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है. लेकिन एक बड़ी आबादी के बावजूद यहां खेलों में पदक नहीं मिल पाते हैं. इस पर गहराई से सोचने की ज़रूरत है.
यह बड़े दुख की बात है कि इतने समय बाद देश को यह मौका मिला और सिवाए भ्रष्टाचार के इसमें कुछ नज़र नहीं आ रहा है, केवल लूट मची है. आम जनता समय रहते अपनी आंखें खोलें. सब अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं. यह भ्रष्ट राजनीति का चरम है. एक तरफ तो वे आधुनिक और युवा भारत की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर वे अपना दूसरा ही चेहरा दिखाते हैं.
राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में जो लोग भ्रष्ट्राचार में लिप्त हैं उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए. ये लोग देश के पैसे को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.
और आप उम्मीद ही क्या कर सकते हैं. क्या आप सोचते हैं कि इनको यह नहीं पता है कि देश में कितने लोग भूख से मर जातें है? कितने लोग इलाज के अभाव में या डॉक्टर की लापरवाही से अकाल मौत के गाल में समा जाते हैं. आपको जान कर हैरत होगी कि एक डॉक्टर दवा के नाम पर मरीज से तो लूटता ही है दवा कंपनी (जो आपने कमीशन के मुताबिक़ दवा बनाती हैं) भी इनकी झोली भी भरती रहती है. अब मेरा सवाल है, जब धरती का भगवान पैसे के आगे अपना ईमान बेच रहा है तो राजनेता जो न ज्यादा शिक्षित होता है और न वह कोई संत-महात्मा है. ऐसे में आप क्या उम्मीद करते हैं, कम से कम इनके कारनामों से किसी कि जान तो नहीं जा रही है. अधिक की उम्मीद किए बगैर इतने से ही संतोष करिए.
खेल को लेकर इतना ही कहना सही है कि नेता अपनी नेत सही करें और देश के बारे में सोचें जिससे देश से ही उनकी पहचान है. देश की इज़्ज़त के साथ ना खेलें ऐसा करना देश की शान में किचड उछालना है.