साफ़गोई और बड़बोलेपन के बीच कैमरन
ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कपिल देव की गेंद पर छक्का जड़कर अपने बचपन की दबी इच्छा को तो पूरा किया ही, वो पाकिस्तान पर भी छक्का जड़ने से बाज़ नहीं आए. मेज़बान के सामने भी वो वही बोले जो वो सुनना चाहते थे....शायद कोहिनूर को छोड़कर.
कंज़रवेटिव कैमरन के उदगार पाकिस्तान और ब्रिटेन में उनके 'लेबर' प्रतिद्वंदियों को ज़रूर नागवार गुज़रे लेकिन भारत में उनको सरल और स्पष्टवादी कहकर हाथों हाथ लिया गया. राजनैतिक टीकाकारों में ये बहस छिड़ी कि कैमरन के इन विचारों को उनकी 'अनुभवहीनता' का तकाज़ा माना जाए (वो सिर्फ़ 43 साल के हैं) या कूटनीति के प्रति उनके निर्भीक रवैये का.
मज़े की बात ये है कि कैमरन ने अपने वक्तव्यों से फिरने की कोशिश नहीं की बल्कि मनमोहन सिंह की उपस्थिति में उन्हें बार-बार दोहराया. कोहिनूर के मुद्दे पर भी कैमरन ने किसी लाग-लपेट से काम नहीं लिया. जब उनसे पूछा गया कि भारत उनसे कब इस हीरे को पाने की कोशिश कर सकता है, कैमरन ने कहा कि अगर वो इस मांग को हां भी कर दें, तो ऐसा सिलसिला शुरू हो जाएगा कि कुछ दिनों में पूरा का पूरा ब्रिटिश म्यूज़ियम खाली हो जाएगा. इसलिए कोहिनूर को वहीं रहने दीजिए, जहां वो इस समय मौजूद है.
कैमरन की ये साफ़गोई लेबर नेता डेविड मिलिबैंड के भी गले नहीं उतरी. उन्होंने कहा कि स्पष्टवादिता एक चीज़ है और बड़बोला होना दूसरी चीज़. वो इस हद तक गए कि बोले कि कैमरन को ये पता होना चाहिए कि हमारे पास एक मुंह और दो कान हैं और हमें उसी अनुपात में उनका इस्तेमाल करना चाहिए.
मिलिबैंड जो कुछ भी कहें, लेकिन कैमरन के शब्द उनके मेज़बानों के कानों को बहुत सुरीले लगे. उन्होंने कश्मीर में मध्यस्थता की बात नहीं की, दिल्ली के नेशनल स्टेडियम को विश्व स्तर का स्टेडियम बताया और भारत की ज़बर्दस्त विकास दर की तारीफ़ की.....बदले में भारत ने 57 हॉक्स ख़रीदने के समझौते पर दस्तख़त किए और ये वादा भी किया कि पांच सालों में वो भारत-ब्रिटेन व्यापार को दोगुना कर देंगे.
हां, कैमरन को सोनिया गांधी और राहुल गांधी से न मिल पाने का अफ़सोस ज़रूर रहा क्योंकि दोनों को अचानक सोनिया की मां पाओलो मेनो को देखने न्यूयॉर्क जाना पड़ा जोकि वहां अपना इलाज करा रही हैं.

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इंग्लैंड के प्रधानमंत्री कैमरन ने जो भी कहा है शायद वही कहने में उनका लाभ था.कोई भी देश पहले अपने देश के हितों की चिंता करता है बाद में अपने मित्र देशों के हितों का. अभी यही बोलने में कैमरन के देश का लाभ निहित था. भारत को किसी भी अन्य देश के समर्थन की जरूरत नहीं है. वह धर्मं के पक्ष में है और अंत में जीत उसी की होगी.
मैं चाहता हूँ कि भारत का कोहिनूर हीरा, ब्रिटेन में ही रहे, अगर भारत को मिल जाएगा तो, यहाँ के भ्रष्ट नेता, या फिर स्मगलर चोरी करके बेचकर खा लेंगे. भारत में तो लोग गुरुदेव रविन्द्र नाथ जी की नोबेल मेडल भी चोरी करके खा गए. ऐसे देश के पास कोहिनूर जैसी चीजें न ही हो तो अच्छा है. कम से ब्रिटेन में वहाँ सुरक्षित तो हैं.
रेहान साहब सही कहा आपने. डेविड कैमरन ने वही कहा जो सभी भारतीय सुनना चाहते थे. वे टोनी ब्लेयर की ही तरह चतुर और गॉर्डन ब्राउन की तरह विनम्र दिखते हैं. उम्मीद करें कि उनके नेतृत्व में ब्रिटेन को इराक़ जैसे युद्ध में नहीं उलझना पड़ेगा. आप ब्लॉग लिखते रहें.
कैमरन साहब ने जो कुछ पाक के बारे में कहा उसमे कोई गलत बात तो नहीं है, लेकिन उन्होंने ये बाते केवल भारत को फ़ौरी तौर पर खुश करने के लिए की है वह ठीक नहीं. पाक की दोहरे मापदंड वाली नीति के बारे में सारी दुनिया जानती सब कुछ है, लेकिन बोलने से कतराती है. पाक के बारे में जो दस्तावेज सार्वजनिक हुए है उससे इसकी पुष्टि स्वतः हो जाती है. अमेरिका पाक पर करोड़ों डॉलर ख़र्च कर रहा है फिर भी पाक की हरकतों पर लगाम नहीं लगा पाया है. अमेरिका और सहयोगी देश पता नहीं किस दुश्मन से लड़ रहे हैं जिसमे पाक उनकी मदद कर रहा है. जबकि इसकी जड़ तो पाकिस्तान में ही मोजूद है.
डेविड कैमरन ने कुछ गलत नहीं कहा. यूरोप और अमरीका को भारत की अहमियत समझ में आ चुकी है. ये सभी देश भारत को बड़ा बाजार मानकर यहां अपनी संभावनाएं देख रहे हैं.
रेहान साहब ब्लॉग लिखने पर आपका स्वागत है. असल में, दुनिया कैमरन की तरह ही बेबाक विचारों को सुनना चाहती है. कैमरन का यह भी कहना सही है कि वे पहले अपना हित सोचते हैं, फिर दोस्तों का.
यह वैश्विक आर्थिक मंदी से उबरने की छटपटाहट और यूरोप में एक बार फिर वित्तीय संकट गहराने की आशंका ही है जिसकी वजह से डेविड कैमरन को वही कहना पड़ रहा है, जो भारत सुनना चाहता है. दरअसल मौजूदा दौर में आर्थिक हित कूटनीति हितों पर हावी हो गए हैं और भारत की सबसे बड़ी ताकत विशाल बाजार और अरबों उपभोक्ता हैं. इसके चलते ब्रिटेन जैसे देश भारत के साथ मधुर संबंध बनाए रखना चाहते हैं.
हम पिछले दस सालों से ये ही सुनते और मानते आए हैं कि ब्रिटिश विदेश नीति और युद्ध नीति अमेरिका की नीतिओं के साए की तरह रही है. और हो सकता है इसमें काफ़ी सच हो. पर हमें याद रखना होगा कि इसी साल टोरी पक्ष जीत के आया है. उसकी नीति और शासन को जानने के लिए अगर आप इतिहास देखें तो वो हमेशा अपनी नीति खुद तय करते हैं. वो सलाह देते ज्यादा हैं और लेते कम हैं. आगे भी उनकी विदेश नीति और बाकी नीतियों में फर्क साफ़ देखने को मिलेगा. तो ये कोई बडबोलापन नहीं, सरकार बदलने का असर है.
रेहान फज़ल साहब, आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. आज इन देशों को भारत के रूप में एक अच्छा बाजार मिल गया है. कैमरन साहब को चाहिए कि वो हमारे देश का कोहिनूर वापस कर दें और मिलजुलकर हमारे देश के साथ व्यापार करें.
कैमरन साहब ने जो कुछ कहा उसे न तो अनुभवहीनता और न ही बड़बोलेपन के तराजू में तौला जाना चाहिए. चाहे कैमरन साहब हों या और कोई नामी-गिरामी राजनीतिक हस्तियाँ किसी भी देश में यात्रा करने से पहले वे खूब सारा होमवर्क करते हैं. उनको किन-किन सवालों से जूझना पड़ेगा, वे उन सवालों के ज़वाब पहले से ही तैयार करके आते हैं. और जैसा देश वैसा वेश का नुस्खा अपनाकर सबको खुश करके अपना आर्थिक/राजनीतिक फायदों का टोकरा भरकर अपने साथ ले जाते हैं. अत: उनके बयानों से हैरान होना उचित न होगा.
पहले दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था ‘यह दूनिया गजब की’ जिसमें एक गीत होता था ‘तेरे मुंह पर यह तेरी सी कहेगी, मेरे मुंह पर यह मेरी सी कहेगी’...इंग्लैंड या अमरीका वाले जब भी भारत/पाकिस्तान आते हैं तो यही तो करते हैं. दोनों लड़ती बिल्लियों के हाथ में मीठे लड्डु पकडा़ कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं. इतनी बड़ी महाशक्ति बन रहा देश ब्रिटेन के आगे कोहिनूर की भीख मांगे,यह हज़म नहीं होता. हम कोई खैरात नहीं मांग रहे, वो भारत की संपत्ति है और भारत को मिलनी ही चाहिए, उससे तुम्हारा म्युजियम खाली हो जाए तो अपनी बला से. (लूट-खसोट का समान जमा किया हुआ है तो खाली होगा ही कभी न कभी) . अब भारत को चाहिए कि जरा तने-अकड़े, जड़ पकडे़...अमरबेल की तरह हा-हा न करे.
ये तो बहुत कम है यदि हम अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करें तो अमरीका तक को हमारी बात माननी पड़े.
रेहान साहब अगर गलत को गलत कहना अनुभवहीनता है तो ठीक है हमें भविष्य में ऐसे ही लोग चाहिए जो गलत को गलत कहने की हिम्मत रखते हैं. आपके इस लेख से ये साफ पता चलता है कि आप भी दूसरों की तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं.
फज़ल साहब ब्रिटेन या अमरीका की नीति हमेशा दूसरों से छीनने की रही है. यहाँ जो भी राजनेता आएँगे वे ऐसा ही बयान देंगे. वहीं भारत झुका हुआ राष्ट्र. अपनी ही वस्तु को मांगने के लिए हम गोरों की तीमारदारी कर रहे हैं. इससे ज़्यादा शर्मनाक बात और क्या होगी?
रेहान साहब, कैमरन साहब ने ग़लत क्या कहा है. इसे तो सारी दुनिया जानती है, आपको या किसी भी पाकिस्तानी को इतना तिलमिलाने की ज़रूरत नही है.