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बेड़ा ग़र्क़ होने का सुख

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 30 जुलाई 2010, 12:32 IST

मणिशंकर अय्यर भारत के खेल मंत्री रह चुके हैं. राज्यसभा के सदस्य हैं लेकिन कांग्रेस की ओर से नहीं. राष्ट्रपति ने उन्हें लेखक और बुद्धिजीवी के रुप में मनोनीत किया है. इस पर भी विवाद हुआ लेकिन वह ख़त्म हो गया.

लेकिन नया विवाद उनके बयान को लेकर है जो ख़त्म ही नहीं हो रहा है. इस बार उन्होंने कह दिया कि वे चाहते हैं कि राष्ट्रमंडल का बेड़ा ग़र्क़ हो जाए.

पहले सरकार सोच रही थी कि कुछ चरमपंथी संगठन ऐसा सोच रहे हैं लेकिन मणिशंकर अय्यर के बयान ने उसे सदमा दे दिया.

इसी सरकार की सिफ़ारिश से उन्हें 'मैन ऑफ़ लेटर्स' कोटे से राज्यसभा में मनोनीत किया गया है इसके लिए सरकार उनकी बातों की गुणवत्ता पर टिप्पणी नहीं कर पा रही है.

शायद सरकार ने उनकी पहले कही गई बातों से प्रभावित होकर उन्हें मनोनीत किया था. मंत्री रहते हुए एक बार उन्होंने कह दिया था कि 'यह सरकार आम आदमी की सरकार नहीं'. वे पहले भी कह चुके हैं कि 'खेलों का आयोजन पैसों की बर्बादी है'.

लेकिन इस बार तो हद हो गई. उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि राष्ट्रमंडल यानी कॉमनवेल्थ गेम्स विफल हो जाएँ क्योंकि यदि ये सफल हो गए तो सरकार एशियाड और ओलंपिक करवाने की बात करेगी.

इतनी बात सुनकर किसी को ग़ुस्सा आ सकता है कि ये आदमी कितना राष्ट्रविरोधी है, जैसा कि ओलंपिक एसोसिएशन के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी को आया.

लेकिन जब मणि कहते हैं कि इस आयोजन पर जितना ख़र्च हो रहा है उतने से कितने स्कूल बनवाए जा सकते थे, तो लगता है कि बात ग़लत नहीं है.

जब वे पूछते हैं कि उदघाटन और समापन समारोह में 'ऐश्वर्या राय को ठुमके लगवाने' में तीन सौ करोड़ रुपए ख़र्च करने की क्या ज़रुरत है, तो लगता है कि इस सवाल में थोड़ा तो दम है.

खेलों के आयोजन से देश की शान बढ़ती होगी पर यह पता नहीं कि इस बढ़ी हुई शान में आम लोगों को कितना हिस्सा मिलता है.

लेकिन देश में ग़रीबों की बढ़ती संख्या, कुपोषित बच्चों की बढ़ती संख्या पर संयुक्त राष्ट्र की चिंता, लोगों को पीने का साफ़ पानी न मिलने की वास्तविकता और बच्चों के लिए स्कूलों का अभाव देशवासियों को शर्मिंदा करता है यह सबको पता है.

जब शान बढ़ती है तो सरकारों और उसके कर्णधारों की शान बढ़ती है. लेकिन जब शर्मिंदगी की बारी आती है तो वह देशवासियों के हिस्से आती है. 1947 से अब तक का इतिहास गवाह है कि सरकारें इस शर्मिंदगी को अनदेखा कर देती हैं.

खेल मंत्री स्वीकार कर रहे हैं कि खेलों के आयोजन का ख़र्च अनुमान से दोगुना हो चुका है और अभी ख़र्च जारी है.

ऐसे में मणिशंकर की बातें यदि बहुत से लोगों को अपने दिल की बात की तरह महसूस होती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

शायद दिल्ली से बाहर रहने वाले लोगों को बहुत अंदाज़ा न हो लेकिन जो दिल्ली में रह रहे हैं वो जानते हैं कि मणिशंकर अय्यर तो सिर्फ़ चाह रहे हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों का बेड़ा ग़र्क़ हो जाए लेकिन देश के बहुत से हुक्मरान दिलोजान से कोशिश कर रहे हैं कि सच में इसका बेड़ा ग़र्क़ हो जाए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:55 IST, 30 जुलाई 2010 केशव:

    अय्यर ने शायद पहली बार कोई सही बात कही है.

  • 2. 14:04 IST, 30 जुलाई 2010 vivek kumar:

    मणिशंकर अय्यर ने जो पैसा स्विस बैंक में रख रखा है , उसको लेने की बात क्यों नहीं करते. सभी को पता है कि ये सब राजनीतिक ड्रामा है. जितना पैसा देश के नेताओं ने जमा करके रखा है, उतने में गरीबों का कब का कल्याण हो जाता और ये पैसे भी यदि गेम्स पर खर्च नहीं होते तो उन्हीं नेताओं के बैंक में जाते.

  • 3. 14:23 IST, 30 जुलाई 2010 Amit Kumar Jha, New Delhi:

    वर्मा जी, मणिशंकर जी को राष्ट्रमंडल खेलों का बेडा गर्क होने पर सुख प्राप्त हो या न हो, लेकिन पाठकों को, आपका ब्लॉग पढ़कर जरूर सुख प्राप्त होगा. वाकई, राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन अपने निर्धारित बजट की हदें पारकर किसी बरसाती उफनती नदी की तरह ना जाने कितनी अतिरिक्त धनराशि लील चुका है और जिस रफ़्तार, कुशलता और प्रतिबद्धता से खेलों के आयोजन संबंधी कार्यों को पूरा किया जा रहा है, उससे इस आयोजन की पूर्ण सफलता पर अभी से ही सवालिया निशान लगने शुरू भी हो गए हैं.

  • 4. 15:40 IST, 30 जुलाई 2010 कृष्णा तर्वे , मुंबई :

    आम आदमी की ओर से मणि शंकर अय्यर जी को बहुत-बहुत बधाई. आखिर आम आदमी के पैसे की बर्बादी पर किसी ने तो यह कहने की हिम्मत दिखाई. वैसे बीजेपी के नेता को यह बात कहने की हिम्मत दिखानी चाहिए थी.

  • 5. 17:28 IST, 30 जुलाई 2010 Bhim Kumar Singh:

    गरीबी और आधारभूत सुविधाओं की कमी झेल रही हमारे देश की ज्यादातर आबादी अब महंगाई की मार भी झेल रही है. आम जनता के जीवन स्तर के मामले में हमारी स्थिति कुछ अफ़्रीकी देशों से भी खराब है. शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए बजटीय आवंटन में लगातार गिरावट आ रही है और इनके निजीकरण की कोशिशें जारी हैं. ऐसे में राष्ट्रमंडल खेलों का महंगा आयोजन किया जा रहा है.

  • 6. 17:39 IST, 30 जुलाई 2010 ranjay kumar chaudhary:

    मणिशंकर अय्यर के बयान पर मुझे घोर आपत्ति है.

  • 7. 17:45 IST, 30 जुलाई 2010 sanjay kumar:

    मणिशंकर अय्यर अपने बयान से अक्सर सुर्खियों में रहे हैं. उनके बयान में जनहित की भावना भी दिखाई देती है. अब जब आयोजन शुरू होने में दो महीने का समय बाकी है, तो कोई ज़ादू की छड़ी ही लंबित कामों को पूरा कर सकती है.

  • 8. 17:56 IST, 30 जुलाई 2010 Sarfaraz Hajipur:

    मणिशंकर जी की बात सही है. आज हर किसी के मन में यही शंका हैं लेकिन कहने का साहस किसी में नहीं. जिस देश में इतनी ग़रीबी हो, उसे देखते हुए ऐसे आयोजन क्षोभ पैदा करते हैं.

  • 9. 18:46 IST, 30 जुलाई 2010 shiva:

    मणिशंकर जी इन खेलों की नाकामयाबी पर खुश होना चाहते हैं. परन्तु वे इस समस्या को बहुत पहले उठा सकते थे. जो कि उन्होंने नहीं किया. आज किसी और की खुन्नस खेलों पर निकाल रहे हैं देश में भ्रष्टाचार है, इसका मतलब ये नहीं कोई विकास का काम होना ही नहीं चाहिए. तथा खेल इनसे परे नहीं हैं देश से भ्रष्टाचार ख़त्म होना चाहिए. यदि ये काम सही समय पर हो जाते तथा ईमानदारी से काम होता तो जितने पैसे खर्च होंगे उससे ज्यादा पैसे प्रसारण अधिकारों और विज्ञापनों से आ जाते पर हम तो हेडलेस चिकेन हैं ना.?

  • 10. 18:54 IST, 30 जुलाई 2010 Arvind Agarwal:

    जहां एक ओर मणिशंकरजी के तर्क में (न कि बयान में) बहुत दम है और उससे यह प्रतीत होता है कि वे भारत की आम जनता के बारे में सोचते हैं, वहीं दूसरी ओर मेरे जेहन में ये सवाल भी उठता है कि यदि कामनवैल्थ गेम्स नहीं होते तो क्या वाकई में ये सारा पैसा गरीबों के कल्याण में काम आता? मेरे खयाल से नहीं. ये सरकार की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है कि वह किस काम को अंजाम देना चाहती है और किसे नहीं.

  • 11. 20:05 IST, 30 जुलाई 2010 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    बिल्कुल सही कहा है, अय्यर साहब ने. सिर्फ वाहवाही लूटने के लिए जनता के पैसे को पानी की तरह बहाया जा रहा है. नेता अभिनेता और अधिकारियों की जेबें भर रही हैं. आम आदमी की मुश्किलें जस की तस हैं. अब अगर खेलों का बेड़ा गर्क भी हो जाए तो भी नेताओं और अधिकरियों का कोई नुक़सान नहीं होगा. उनका वेतन नहीं कटेगा. नुक़सान होगा तो जनता का ही होगा. एक तरफ आम आदमी दिनभर मेहनत करके 100 रुपया भी नहीं कमा पाता तो दूसरी तरफ नाचने गाने पर करोड़ों लुटाए जा रहें हैं. और लुटाएं भी क्यों न, ये पैसा उनकी जेब से थोड़े जा रहा है.

  • 12. 20:16 IST, 30 जुलाई 2010 Fishan REHMAN:

    मैं मणिशंकर जी की बात से सहमत हूं. भारत जैसे देशों को पहले अपने यहां से गरीबी खत्म करने पर ध्यान देना चाहिए. भले ही मणिशंकर के कहने का ढंग गलत हो, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश पूरी तरह से सही है.

  • 13. 23:59 IST, 30 जुलाई 2010 roopendra kumar sao:

    मणिशंकर की आपत्ति सही है.

  • 14. 01:56 IST, 31 जुलाई 2010 diwakar:

    मणिशंकर जी की बात में तुक हो सकता है मगर इन बुद्धिजीवी महाशय को ये बुद्धि पिछले आठ साल में क्यों नहीं आई? और अब जब कोई आठ हफ्ते बचे हैं खेलों में तो इस समय गरीब जनता का मसीहा बनकर अपना कौन सा उल्लू सीधा करना है ये तो वो ही जानें. लेकिन खेलों के सफल आयोजन से बाहर दुनिया में देश और उसके कर्णधारों की साख में इज़ाफा ज़रूर होगा. इन 'मैन ऑफ़ लेटर्स' का घड़ियाली अरण्य रोदन सुन कर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पंक्तियाँ याद आती हैं: भैंस घुस गई संसद में, सब संविधान चट कर आई.

  • 15. 03:22 IST, 31 जुलाई 2010 vishal sharma:

    उनका कहना पूरी तरह से सही है.

  • 16. 10:48 IST, 31 जुलाई 2010 Akhilesh Upadhyaya:

    आम आदमी गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई से पीड़ित है. ऐसे में कॉमनवेल्थ खेलों पर पानी की तरह से खर्च किया जा रहा पैसा पूरी तरह से गलत है.

  • 17. 12:22 IST, 31 जुलाई 2010 shahid:

    अगर देश की शान ही बढ़ानी है तो किसानों की हालत में सुधार किए जाएं, संसद को ठीक से चलने दें. सिर्फ़ भाषणबाजी से काम नहीं चलने वाला.

  • 18. 12:51 IST, 31 जुलाई 2010 narendra singh:

    भारत की युवा पीढ़ी की ऊर्जा को एक दिशा देने के लिए खेल जरूरी हैं. मणिशंकर जी को गरीबी के बाकी कारणों पर अधिक काम करना चाहिए, मसलन-जनसंख्या नियंत्रण और भ्रष्टाचार.

  • 19. 13:14 IST, 31 जुलाई 2010 samir azad:

    विनोद जी, आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा.

  • 20. 14:17 IST, 31 जुलाई 2010 ajay rajpoot:

    मेरा मानना है कि खेलों से पैसा बर्बाद नहीं होता है, बल्कि युवाओं की रचनात्मकता बढ़ती है. पैसे की बर्बादी खराब प्रबंधन का नतीज़ा है, उसे रोका जाना चाहिए.

  • 21. 14:32 IST, 31 जुलाई 2010 vijai kumar:

    असल में कॉमनवेल्थ गेम गुलाम मंडल गेम का रूप धारण कर चुका है.

  • 22. 14:33 IST, 31 जुलाई 2010 Sudeep Sakalle:

    मणिशंकर अय्यर ने ये बात बिलकुल सही कही है, अधिकतर पैसा उन कामो में फ़िज़ूल खर्चा किया गया है जो सिर्फ एक बार उपयोग हो सकेगा. तीन घंटे के प्रोग्राम के लिए करोड़ों रुपए फूँक देना सामान्य समझदारी के परे है, वह भी उस समय जब महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा और गरीबी अपने चरम पर है ( या शायद अभी और बढेगी ) . मेरी भी प्रार्थना है कि ये समारोह सुपर फ्लॉप हो.

  • 23. 14:37 IST, 31 जुलाई 2010 Amit:

    विनोद जी, बीबीसी पर आपका यह ब्लॉग पढ़कर खुशी हुई. आपने स्थिति की काफ़ी सटीक समीक्षा की है.

  • 24. 14:46 IST, 31 जुलाई 2010 braj kishore singh:

    खेल मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए जरूरी है. लेकिन दिल्ली में खेल के नाम पर जो लूट का खेल चल रहा है उससे पूरे देश की जनता क्षुब्ध है. मणिशंकर अय्यर मंत्री होने के साथ-साथ देश के जिम्मेदार नागरिक भी हैं और अगर वे अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है. वैसे,महंगाई सहित और भी मुद्दे हैं जिनके बारे में उन्हें बोलना चाहिए. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो यही समझा जाना चाहिए कि उन्होंने महंगाई के मुद्दे से देश का ध्यान बांटने के लिए जान-बूझकर ऐसा बयान दिया है.

  • 25. 16:05 IST, 02 अगस्त 2010 sameer khan:

    नेता लोग अपने फ़ायदे के लिए ऐसे बयान दिया करते हैं. इस खेल के आयोजन से दुनिया में भारत का नाम होगा.

  • 26. 16:59 IST, 02 अगस्त 2010 sarwar :

    मैं समझता हूँ कि मणि शंकर अय्यर जो कहा ठीक कहा. सब नेता भारत में व्याप्त ग़रीबी की चर्चा नहीं करते. हम देखेंगे कि सरकार इस पर क्या कार्रवाई करती है.

  • 27. 17:03 IST, 02 अगस्त 2010 राकेश शर्मा:

    खेल के पीछे जो खेल चल रहा है वो धीरे धीरे सामने आ रहा है. पहली बात यह है कि भारत का अगर कोई स्वाभिमान है तो उसे राष्ट्रमंडल जैसे संगठन से खुद को अलग कर लेना चाहिए. दूसरी बात है कि दुनिया के सामने शान बघारने से कालाहांडी के भूखे बच्चों को खाना मिल जाएगा. जितनी चादर हो उतनी ही टांग पसारी जाए. बिला-बजह जो खर्चे किए जा रहे हैं उस पर कुछ तो जबाबदेही बने. भारत सरकार को चाहिए कि उसका पूरा ध्यान सिर्फ़ और सिर्फ़ गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और आधारभूत संरचना के विकास पर हो.

  • 28. 18:16 IST, 06 अगस्त 2010 Rajnish:

    अब पछताने से कोई फ़ायदा नहीं.

  • 29. 14:11 IST, 21 अगस्त 2010 Mukesh Chourase:

    मणिशंकर अय्यर ने ये बात बिलकुल सही कही है.

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