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कुछ तो सीखिए

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 27 जुलाई 2010, 14:13 IST

मुझे दुख होता है कि जब किसी देश में यह ख़बर आती है कि फ़लां सेनाध्यक्ष को नौकरी से निकाल दिया गया या फ़लां जनरल का कोर्ट मॉर्शल हो गया.

अब बांगलादेश को ही लीजिए. आज़ादी के 39 बरस में 15 जरनलों को सेनाध्यक्ष का पद दिया गया. सेनाध्यक्ष रहते हुए उन में से तीन के कान पकड़ कर राजनैतिक सरकार ने नौकरी से निकाल दिया और दो सेनापतियों की हत्या हो गई. उस का नुक़सान यह हुआ कि शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया आपस में लड़ती रहती हैं और कोई बीच बचाव कराने वाला नहीं होता.

भारत में भी वर्तमान कुछ अच्छा नहीं है. 63 साल में मजाल है किसी एक चीफ़ को भी इस क़ाबिल समझा गया हो कि उन्हें फुल एक्सटेन्शन दे दी जाए. केवल एक ऐसा उदारहण है कि जब उदारता का सुबूत देते हुए श्रीमती गाँधी ने फ़ील्ड मॉर्शल मानेक शाह को छह महीने की एक्सटेन्शन दी थी. वह भी इसलिए कि उन्होंने बांगलादेश बनवा कर दिया था.

बाद में आने वाली सरकारों ने तो इतनी मुर्रवत भी न दिखाई. 1998 में वाजपेयी सरकार ने चेयरमैन ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी चीफ ऑफ़ नेवल स्टाफ़ को केवल इस बात पर घर भिजवा दिया कि उन्होंने सरकारी फ़ैसले पर अमल न करते हुए एक एडमिरल को अपना डिप्टी बनाने से इंकार कर दिया था.

मनमोहन सरकार तो इस मामले में वाजपेयी सरकार से भी दो हाथ आगे निकल गई. 2008 में एक मेजर जनरल की नौकरी इस बात पर तेल हो गई कि वे एक महिला कैप्टेन को योगा सिखाते सिखाते गोया कुछ ज़्यादा ही सिखा गए.

फिर 2009 में दार्जिलिंग में फौजी ज़मीन के तीन एकड़ अपने दोस्त को अलॉट करने के आरोप में एक लेफ़्टिनेंट जनरल और एक मेजर जनरल का कोर्ट मॉर्शल कर उन्हें निकाल दिया गया.

एक लेफ़्टिनेंट जनरल के ख़िलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई और एक अन्य की बतौर डिप्टी चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ की नियुक्ति रोक दी गई.

भला यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ नेता जो चाहे कर गुज़ारें और बच निकलें. और एक बेचारे जनरल से ज़रा भी ग़ल्ती हो जाए या कोई ऊंधी सीधी बात मूँह से निकल जाए तो उसे घर भेज दिया जाए.

इस से पाकिस्तान अच्छा है जहाँ कई चीफ़्स ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ ने सिविलयन सरकार की नीतियों की आलोचना की लेकिन सरकारों ने उफ़ न ही. क्योंकि उन का मानना था कि जनरल और नेता एक ही सिक्के के दो रुख़ हैं और दोनों ही जनता के विकास और रक्षा को प्रीय रखते हैं.

इसलिए एक दूसरे के साथ साथ बराबरी से चलना चाहिए. इस सफर में कभी कोई आगे पीछे भी हो जाए तो बुरा नहीं मानना चाहिए.

इसलिए पाकिस्तान में चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ से कभी ज़बरदस्ती नहीं की जाती. उन से तीन साल बाद पूछा जाता है कि हुज़ूर रिटायर होना पसंद करेंगे या जनता की ओर सेवा करने के लिए पदे पर रहेंगे. यही रवैया है असल में लोकतंत्र का.

इसी मिसाली तालमेल के कराण पाकिस्तान में 63 सालों के भीतर केवल 14 चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ आए और भारत को 63 सालों में 26 चीफ़्स ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ लाने पड़े.

अगर भारतीय सरकारें भी अपने चीफ़्स को नेताओं के बराबर सम्मान देतीं और उन्हें अपने बराबर बिठातीं तो आज उसे यह दिन न देखना पड़ता कि यही फैसला नहीं हो पा रहा कि माओवादियों से कैसे निपटा जाए. राजैनिक तरीक़े या बमबारी करके....

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:20 IST, 27 जुलाई 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    आपका शुक्रिया वुसतसाहब कि आपने हमें तीन देशों के जनरलों की हक़ीक़त हमें बताई.

  • 2. 16:08 IST, 27 जुलाई 2010 nick:

    मैंने पाया है कि आप अपने सारे ब्लाग में भारत की राजनीति के ख़िलाफ़ लिखते हैं और पाकिस्तान के पक्ष में.

  • 3. 16:42 IST, 27 जुलाई 2010 सुहैल अहमद, हैदराबाद:

    पाकिस्तान में जनरल कियानी को एक्टेनशन क्या दे दी गई, भाई वुसतउल्लाह ने दुनियाभर में जरनैलों के साथ होने वाले सुलूकों पर काफ़ी मवाद जमा कर कर लिया और फिर क्या था उन्होंने एक दिलचस्प और शानदार ब्लॉग भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश पर हम पाठकों को परोस दिया. भाई वुसतउल्लाह मैं अक्सर अपने पाकिस्तानी दोस्तों से कहा करता हूं कि वो अपनी तुलना भारत से नहीं करें, भारत में लाख कमी सही, लेकिन वो पाकिस्तान से कोसों दूर आगे निकल चुका है. इसका कारण साफ़ है पाकिस्तान का धर्म आधारित देश का होना. भारत और पाकिस्तान में वैसे तो कोई अंतर नहीं है लेकिन पाकिस्तान में केवल एक धर्म की बहुलता है जिसके कारण उन्मादी मुसलमानों के सामने सरकारें नतमस्तक हो गईं जबकि भारत में ऐसे ही उन्मादी हिंदू अपनी पूरी ताक़त में नहीं आ सकें, क्योकि यहां की परिस्थितियां अलग थीं और फिर क्या था देश धर्म के ठेकेदारों की चपेट से जाने से बच गया और जब बच गया तो पाकिस्तान और भारत की तुलना कैसी.

  • 4. 16:42 IST, 27 जुलाई 2010 subu:

    पाकिस्तान का हाल तो हम बखूबी जानते हैं लेकिन यदि भारत में कोई नेता बेईमानी करें तो हमें उन्हें पाँच साल बाद बदल सकते हैं. पाकिस्तान में तो वर्षों लग जाएँ..

  • 5. 17:07 IST, 27 जुलाई 2010 pankaj:

    आपको दुख ही होगा वुसतउल्लाह साहब क्योंकि पाकिस्तान में किसी ने भी अपने जीवन में दस साल से अधिक लोकतंत्र नहीं देखा है. आपके यहाँ सेनाध्यक्ष को नौकरी से निकाला नहीं जाता है, सेनाध्यक्ष तख्तापटल कर देता है. भारत से जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, उसमें पाकिस्तान को हार ही मिली है और तो और पाकिस्तान के दो टुकड़े भी करवा लिए आपके बहादुर सेनाध्यक्षों ने.

  • 6. 17:46 IST, 27 जुलाई 2010 Gaurav Shrivastava:

    मुझे नहीं पता कि आप भारत सरकार की आलोचना कर रहे हैं या पाकिस्तानी जनरलों की तारीफ़. हमने अपने विकास से यह साबित कर दिया है कि हमारी नीतियाँ पाकिस्तान से अच्छी है.

  • 7. 17:55 IST, 27 जुलाई 2010 sanjay bengani:

    आपकी माने तो अनुशासनात्मक कार्यवाई न करते हुए पाकिस्तानी रास्ते पर चलें? सरकार में इच्छाशक्ति नहीं है, इसलिए माओवादी हावी है न कि आपके बताए कारण से.

  • 8. 19:30 IST, 27 जुलाई 2010 UN KNOWN:

    यह बहुत आश्चर्यजनक है कि आप पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं. क्योंकि आप पाकिस्तानी हैं. आपको यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि भारत एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र देश है. मुझे लगता है कि पाकिस्तान के लोगों को सैन्य शासन अच्छा लगता है. पाकिस्तान में सभी बातें सेना ही तय करती है.ऐसे में आप भारत पाकिस्तान की तुलना कैसे कर सकते हैं? आप एक बात यह भी जान लें कि पाकिस्तान की सेना सबसे भ्रष्ट है.

  • 9. 20:31 IST, 27 जुलाई 2010 Ankit :

    आपका विश्लेषण बहुत अच्छा है, बांग्लादेश के बारे में मुझे कुछ भी पता न था, पाकिस्तान में फ़ौज ज़रूरत से ज्यादा दखल देती है, अगर भारत की बात करें तो अनुशासन तोड़ने पर या कुछ ग़लत या गैर क़ानूनी कामों में लिप्त होने पर नौकरी जाना सही है, नेता जो ग़लत करता है वह सही नहीं, पर इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरे भी ग़लत करें, किसी भी नेता को दंड न मिलाना बहुत दुखद और अलग मुद्दा है. सेना का सम्मान होना चाहिए, उसकी मांगें पूरी होनी चाहिए पर सेना को बहुत सी सत्ता नहीं होनी चाहिए. कहावत है कि सोने की कटार मजबूत और तेज़ होनी चाहिए, वे कमर पर हो तो सम्मान बढाती है, पेट में घुसे तो जान लेती है. रही माओवाद की बात तो वह सरकार और पुलिस की ज़िम्मेदारी है, सेना की नहीं. वहाँ ग़लत रणनीति हावी हो रही है. उसकी समीक्षा की ज़रूरत है.

  • 10. 21:05 IST, 27 जुलाई 2010 Kumud B Mishra:

    यह अच्छा होगा कि आप भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की पाकिस्तान से तुलना न करें. अगर कोई समस्या है तो लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार इसके लिए ज़िम्मेदार हैं और फ़ैसले लेने के लिए संवैधानिक रूप से सक्षम है. भारत में इसी तरह की व्यवस्था है. यही कारण है कि भारत ने कभी सैन्य शासन का सामना नहीं किया. आज दुनिया को पता है कि पाकिस्तान में सेना की स्थिति क्या है और उसके चरमपंथियों से कैसे संबंध हैं. आप इस विषय पर एक दूसरा ब्लॉग लिख सकते हैं कि पाकिस्तान की सेना ने 26/11 जैसी घटनाओं और काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए हमले में हाथ है. वे दुनिया से आतंकवाद से लड़ने के लिए पैसे लेते हैं लेकिन आतंकवाद का वित्त पोषण भी करते हैं.

  • 11. 21:09 IST, 27 जुलाई 2010 Saagar:

    शक्रिया आपका, हमें ऐसे ही बताते रहें कि पाकिस्तान हमसे और कितना अच्छा है, क्योंकि उसकी अच्छाई से हम रोज रु-ब-रु होते हैं. हमें यह भी पता है कि पाकिस्तानी जनरल देश की कि सेवा करते हैं कि उनके गोल्फ कोर्स नहीं है, रिश्वत देकर या लेकर हथियार की सौदेबाजी नहीं करते या फिर दिखाने के लिए नज़रबंद नहीं होते फिर माफ़ी नहीं मिलती. वहीँ हमारे जनरल कुछ नहीं करते...शुक्रिया. ‘कुछ तो सच में सीखना चाहिए’ क्योंकी “इससे पाकिस्तान अच्छा है”

  • 12. 21:17 IST, 27 जुलाई 2010 Dev:

    आप जैसे लोग जितनी जल्दी ये समझ लें कि पाकिस्तान की तुलना भारत के साथ नही की जा सकती उतना आपके लिए और पाकिस्तान के लिए अच्छा होगा. दूसरी बात आप किसी सेना अध्यक्ष की तुलना किसी नेता से नही कर सकते. नेता लाख बुरा हो, वो देश की जनता का प्रतिनिधि होता है और जनता के प्रति जवाबदेह होता है, बाकी सब जनता के नौकर हैं और नौकरों के लिए नियम क़ायदे बनाए गए हैं, उन्हें बिना मतलब सेवा विस्तार देने का कोई अर्थ नही है, उसकी जगह जो भी आएगा वो ज़्यादा यंग होगा और अपवादों को छोड़कर उससे अच्छा नही तो उसके बराबर काम अवश्य करेगा. हमारे देश में सच्चा लोकतंत्र है और देश की बागडोर देश की कार्यपालिका और न्यायपालिका में हाथों में है, सेना के हाथों में में नही. सेना का काम सिर्फ़ देश की सीमाओं की रक्षा करना है शासन करना नही.

  • 13. 21:45 IST, 27 जुलाई 2010 Shaheer A. Mirza Sanaa-Yemen:

    वुसत साहब, आपका व्यंग शायद ज्यादातर लोगों की समझ में नहीं आया. पहली नजर में तो मुझे भी अजीब सा लगा कि आपकी कलम से कैसी बातें निकल रही हैं. वैसे महज जनरल कि गिनती इस बात को समझाने के लिए काफी है कि हिंदुस्तान में व्यवस्था है और जनरल साहब उसके तहत काम करते हैं और पाकिस्तान में एक जनरल साहब होते हैं जिनके तहत व्यवस्था काम करती है. यहाँ भारत की बड़ाई और पाकिस्तान की कमियों को गिनाना मेरा मकसद नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा कि क्या बुराई थी जनरल मुशर्रफ़ में जो इतनी हाय-तौबा मचा रखी थी आपकी मीडिया और राजनीतिक दलों ने. अमरीका की खुशी के लिए आप लोकतांत्रिक तो हो गए लेकिन लोक तो आज भी मर रहे हैं और तांत्रिक मौज कर रहे हैं.

  • 14. 21:49 IST, 27 जुलाई 2010 गुंजन:

    मुझे समझ में नहीं आया कि यह हास्य प्रसंग था या वाकई एक गंभीर विश्लेषण. आप मजाक कर रहे हैं, है ना.

  • 15. 21:56 IST, 27 जुलाई 2010 Bhupendra Patidar:

    मुझे समझ में नहीं आया कि यह व्यंग है या गंभीर सलाह. अगर हम भारत में आंतरिक आतंकवाद की बात करें तो इसका केवल राजनीतिक रूप से समाधान किया जा सकता है न कि सेना के जरिए. अगर सेना ही फ़ैसले लेने लगे तो लोकतंत्र पीछे चला जाएगा. इसलिए आप अपनी सलाह अपने पास रखें.

  • 16. 21:57 IST, 27 जुलाई 2010 Mukesh Sakarwal:

    दोस्तों, मुझे लगता है कि आपने वुसतउल्लाह ख़ान के पिछले ब्लॉगों को नहीं पढ़ा है, वे हमेशा से ही घुमा-फिराकर ही पाकिस्तान की व्यवस्था पर कटाक्ष करते रहते हैं. इस ब्लॉग को व्यंग के रूप में देखें, वे अपनी ही सेना पर व्यंग कर रहे हैं और भारत के लोकतंत्र की तारीफ़ कर रहे हैं. जहाँ लोकतंत्र से बड़ा कोई नहीं है, सेना भी नहीं. अच्छा व्यंग है, मुझे आपके ब्लॉग पसंद हैं.
    .

  • 17. 23:54 IST, 27 जुलाई 2010 Amritanshu Mishra:

    वुसतुल्लाह साहब, हमारे देश भारत में योग्य सेनाध्यक्षों चीफ़ की कोई कमी नहीं है. एक जाते हैं तो सैंकड़ों इस पद के योग्य पाए जाते हैं. इसलिए आवश्यकता नहीं पड़ी की पुराने सेनाध्यक्ष को ही एक्सटेंशन देकर काम चलाना पड़े. आप क्या चाहते हैं कि पाकिस्तान के ही तरह सेना को इतना सिर चढ़ा लिया जाए कि जब मन चाहे वह सत्ता ही हथिया ले. और जहाँ तक माओवाद से संघर्ष की बात है तो सेना को पाकिस्तान में इतने अधिकार देने के बाद भी वह आतंकवादियों का सफाया करने में लोहे के चने चबा रही है.

  • 18. 00:20 IST, 28 जुलाई 2010 Nitish Biswas:

    वुसतउल्लाह ख़ान साहब, किसी को किसी से तुलना मत किया करिए. आपने जैसा किया है वैसा तो बिल्कुल भी नही.

  • 19. 00:54 IST, 28 जुलाई 2010 Rajnit Kumar:

    जी हाँ, लेकिन यही एक महत्वपूर्ण कारण है कि आज तक पाकिस्तान में पिछले 63 साल में चार जरनलों ने बैरकों से निकलकर लोकतंत्र का गला घोंटा है और सत्ता का सुख पाया है. लेकिन भारत में ऐसा एक बार भी नहीं हुआ है. क्योंकि भारत की सेना अनुशासित है और पाकिस्तान में ऐसा नहीं है. बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान में सेना सरकार को चलाती है जबकि भारत में सरकार सेना को. जनरल कियानी को सेवा विस्तार देना जरदारी साहब की मजबूरी थी. वे अगर ऐसा नहीं करते तो उन्हें मालूम था कि नवाज़ शरीफ़ के साथ क्या हुआ था. रही बात माओवादियों की तो भारत अपने अंदर बलूचिस्तान और नार्थवेस्ट फ्रंटियर नहीं बनाना चाहता है इसलिए वह राजनीतिक हल के तलाश में है.

  • 20. 01:14 IST, 28 जुलाई 2010 J Dave:

    आपकी बात में दम तो है पर पाकिस्तान से तुलना करके आपने गलती कर दी. यह सही है कि नेता अगर भ्रष्टाचार के आरोपों से छूट सकता है तो सेना का अधिकारी क्यों नहीं? पर दो ग़लत काम एक दूसरे को सही साबित नही कर सकते हैं? जो पाकिस्तान में हो रहा है. पाकिस्तान की जनता को न तो आर्मी से चैन मिलता है ना नेताओ से करार. दो ग़लत मिल के तिसरी गलती करने जा रहे है. एसे में तो पाकिस्तान के अस्तित्व पर ही अभी खतरा मंडरा रहा है. पाकिस्तान को हरदम भारत के साथ तुलना करने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा.

  • 21. 03:09 IST, 28 जुलाई 2010 neeraj nayyar:

    ख़ान साहब आपने जो कुछ भी कहा वह आपके निजी विचार हो सकते हैं. विचारों में तो हम अमित साहब को भी प्रधानमंत्री बना सकते हैं, इससे वे प्रधानमंत्री तो नहीं बन जाएँगे. जहाँ तक मुझे लगता है आप चाहते हैं कि वर्दी में सेना वाले कुछ भी करें, उन्हें माफ़ कर दिया जाए. मेरे परिवार में भी लोग सेना में हैं इसके बाद भी मैं कहूँगा कि जो ग़लत करे उसे सज़ा देना ज़रूरी है. नहीं तो नेताओं और सेना में क्या अंतर रह जाएगा. आप नेताओं को गाली दे सकते हैं लेकिन आप इतनी ही सहजता से किसी सैन्य अधिकारी के लिए गाली निकाल सकते हैं. मेरी राय में शायद नहीं. वह भी केवल इसलिए कि वहाँ अनुशासन है. अगर एक सेना वाला किसी महिला के साथ दुष्कर्म करे तो भी क्या उसे छोड़ देना चाहिए. जिस जनरल साहब की आप बात कर रहे हैं, क्या उन्हें किसी महिला के साथ छेड़छाड़ का अधिकार है, नहीं. अगर ऐसा हुआ तो सब ख़त्म हो जाएगा. आप पाकिस्तान का उदाहरण दे रहे हैं, आज पाकिस्तान कहाँ खड़ा है और हम कहाँ हैं. ख़ान साहब तुलना उसी के साथ अच्छी लगती है जो काबिल हो. पाकिस्तान शायद इसलिए बरबाद है क्योंकि वहाँ सेना का अधिक दख़ल है. क्या आप भारत में भी वही सब देखना चाहते हैं. अगर हाँ तो आपने इतनी स्वतंत्रता से यह नहीं लिख पाते. अब गेंद आपके पाले में है.

  • 22. 04:20 IST, 28 जुलाई 2010 Amit:

    मैंने आपका पूरा ब्लॉग पढ़ा, बहुत बढ़िया व्यंग है. जब मैंने कुछ टिप्पणियाँ पढ़ीं तो मुझे लगा कि आप पाकिस्तान की तारीफ़ नहीं कर रहे हैं बल्कि उस पर कटाक्ष है. मुझे लगता है कि यह एक बहुत अच्छा व्यंग है.


  • 23. 05:24 IST, 28 जुलाई 2010 Ajay:

    ख़ान साहब, क्या शानदार व्यंग किया है. मुझे शरद जोशी की याद आ गई. कई पाठकों ने आपकी इसलिए आलोचना की कि आपने पाकिस्तान की तरफ़दारी की है. उन्हें शायद आपका व्यंग समझ में नहीं आया. आप लिखते रहिए, पॉलिटिकली करेक्ट होने के चक्कर में मत पड़िए, आप बहुत अच्छा लिखते हैं.

  • 24. 17:25 IST, 28 जुलाई 2010 braj kishore singh:

    ख़ान सर, आपका यह व्यंग्य भी पिछले व्यंग्यों की तरह लाज़वाब है. भारतीय लोकतंत्र में चाहे हज़ार खामियाँ हो लेकिन हमारे यहाँ वास्तविक सत्ता जनप्रतिनिधियों के हाथों में रही है जबकि पाकिस्तान में लोकतंत्र देश के बनाने के समय से ही संक्रमण का शिकार है. अब तो पाकिस्तान के अस्तित्व पर ही तालिबानी ख़तरा मंडरा रहा है. हम भारतीय नहीं चाहते कि पाकिस्तान में लोकतंत्र कमजोर हो लेकिन हम सिवाय दुआ करने के कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं.

  • 25. 18:30 IST, 28 जुलाई 2010 Amit Kumar Jha, New Delhi:

    ख़ान साहब, फौजी जनरलों के बहाने आपने पाकिस्तान और बांग्लादेश के कमजोर और बदहाल राजनीतिक नेतृत्व पर अच्छा निशाना साधा है, जिन्हें अक्सर इन फौजी हुक्मरानों के आगे मुँह की खानी पड़ती है. जब-तब सत्ता की बागडोर भी नेताओं के हाथों से निकलकर इन जनरलों के हाथों में पहुँच जाती है. इस मामले में हमारा रेकॉर्ड बहुत ही अच्छा रहा है, जहाँ सेना और उसके नेतृत्व ने अपने को राजनीतिक रस्साकशी से दूर ही रखा है और न की कभी किसी निर्वाचित सरकार का कोई तख्ता-पलट ही किया है. रही बात, तथाकथित छोटी-छोटी ग़लतियों के लिए भी वरिष्ठ सेना अधिकारियों को दंडित किए जाने की, तो इसकी अनिवार्यता से इनकार नहीं किया जा सकता. आखिर भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारीयों से ओछी हरकतों की अपेक्षा कोई कैसे रख सकता है! हाँ, ये अलग बात है कि हमारे लोकतंत्र में ये विशेषाधिकार नेताओं ने अपने लिए जरूर सुरक्षित कर रखा है.

  • 26. 19:18 IST, 28 जुलाई 2010 Surjeet Rajput:

    ख़ान साहब, आप कहना क्या चाहते हैं कि भारत भी पाकिस्तान के नक्शे क़दम पर चले और जो इज़्ज़त पाकिस्तान की दुनिया में है वैसी ही भारत की भी हो. अगर आप भारत के नागरिक हैं तो मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि आप जैसे लोगों को वे बुद्धि दें.

  • 27. 19:50 IST, 28 जुलाई 2010 Girish:

    वाह वुसत साहब, क्या खूब व्यंग लिखा है आपने! सच कहें तो मुझे तो आप सच्चे देशभक्त लगते है जो अपने देश कि कामियाँ सामने ला कर उसके सुधार कि कामना कर रहा हो. आपकी कलम ऐसे ही फलती-फूलती रहे और आपकी अपने देश के प्रति जो कामनाएँ हैं वे पूरी हों! कृपया ऐसे हि शानदार लिखते रहें और हमे आनंद देते रहें!

  • 28. 21:29 IST, 28 जुलाई 2010 Narayan Choudhary:

    बात कुछ जमी नहीं जनाब! इन तीनों देशों के जनरलों की तुलना तो कतई नहीं हो सकती! ये आप भी बाखूब जानते हैं. भारत में क़ानून और व्यवस्था को सबसे ऊपर रखा जाता है. अगर आप नेताओं की बात करें तो हाँ कुछ नेता हैं जो क़ानून के दायरे में आने से बच जाते हैं. लेकिन वह भी कानून की ही आड़ में. फिर कई सारे ऐसे भी उदाहरण हैं जिसमें कई सारे नामी-गिरामी नेता सालों जेल की सलाखॊं के पीछे भी रहे हैं और अभी भी हैं. अगर आपने यह लेख व्यंग के तौर पर लिखा है तो हम कहेंगे कि आपका व्यंग बहुत ही खतरनाक है और अदूरदृष्टि से भरा है. कुछ पिछला इतिहास भी देख लिया होता आपने इस तुलना करने से पहले.

  • 29. 02:14 IST, 29 जुलाई 2010 vivek kumar pandey:

    मुझे मेरे देश के देशभक्त दोस्तों से निवेदन है कि वे वुसतउल्लाह ख़ान साहब के लेख में जो व्यंग छिपा है उसे समझने की कोशिश करें. लेखक एक उच्च कोटी का पत्रकार है और उन्हें किसी देश की सीमा में न बाधें. जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है तो वह बंटवारे के बाद से भी नहीं बंटा है. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अंतर सिर्फ यही है कि कहीं सिर्फ़ एक लोग सत्ता का सुख भोग रहे हैं और कहीं दो लोग.अब जरा यह बताइए कि ये जो तीसरे लोग हैं जिन्हें इन तीनों देशों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है (भारत में इन्हें माओवादी कहते हैं) इनका क्या कसूर है? क्या इन्हें सत्ता का सुख भोगने का अधिकार नहीं है.

  • 30. 12:26 IST, 29 जुलाई 2010 Ajeet S Sachan:

    ब्लॉग बहुत शानदार लिखा है, इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन लगता है कि पाठकगण इतने परिपक्व नहीं हैं और वे ब्लॉग को समझ नहीं पाए हैं. आपका ब्लॉग पढ़ते हुए शुरू में क़रीब एक साल पहले मेरे साथ भी यही हुआ था. मैं आपके ब्लॉग को समझ नहीं पाया था और वैसी ही प्रतिक्रिया दी थी, जैसे यहाँ पर लोगों ने दी है. लेकिन मेरी आपसे गुजारिश है कि आप ऐसे ही लिखते रहें और सही बात को बिना झिझक सामने लाते रहे.

  • 31. 13:27 IST, 29 जुलाई 2010 Abdul Karim.S.Aybani:

    वुसतउल्लाह साहब आप पाकिस्तान अपनी बुराइयों को इतनी अच्छी तरह से अपनी खूबी बना लेते हैं. आपकी सरकार सेना से डरती है इसलिए उसे पूछने जाना पड़ता है कि आप आगे काम करेंगे कि रिटायर्ड होंगे. हमारी सरकार को अपने लोकतंत्र पर यकीन है कि हमारी सेना कभी तख्ता पटल नहीं कर सकती है. जहाँ तक रही माओवाद की बात तो वे हमारे लोग और हम उन्हें मना ही लेंगे. आपके यहाँ जो स्वात और बलूचिस्तान का जो विवाद चल रहा है उसका जिक्र तो करें. अगर आपकी सेना अच्छी है तो वह समस्या का समाधान नहीं कर रही है. अगर इसी तरह से आपके देश में सेना की चली तो पाकिस्तान दुनिया के नक्शे से मिट जाएगा. ऐसा ब्लॉग लिखने से बेतरह है कि आप अपने देश को बचा लें.

  • 32. 15:15 IST, 29 जुलाई 2010 Arvind Agarwal:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब, यदि यह आपका व्यंग्य लिखने का प्रयास था तो बड़े दुख के साथ कहूंगा कि आप कतई सफल नहीं हुए. क्या आप ये कहना चाहते हैं कि पाकिस्तान में सेना के अफसरों का सत्ता हथियाना भारतीय लोकतंत्र से बेहतर है या फिर ये कह रहे हैं कि चूंकि नेता भ्रष्ट हैं इसलिये सेना को भी भ्रष्ट हो जाने दें और उन पर कार्यवाही ना करें?

  • 33. 15:53 IST, 29 जुलाई 2010 himmat singh bhati:

    बीबीसी निष्पक्ष समाचार के लिए जानी जाती है लेकिन आपका ब्लॉग पढ़कर हमारा भ्रम टूट रहा है.

  • 34. 17:04 IST, 29 जुलाई 2010 indrajeet:

    यह निराशाजनक है कि अधिकतर पाठक खान साहब के लेखन को समझ नहीं पाते. वो सिर्फ़ इतना कह रहे हैं कि पाकिस्तान की सरकार भारत और बांग्लादेश से सबक ले कि जनरल से कैसे सीखें. उनका कहना है कि भारत या बांग्लादेश की सिविल सरकार में हज़ारों में गलतियां हो सकती हैं लेकिन वो समस्याओं को लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाते हैं.

  • 35. 22:11 IST, 29 जुलाई 2010 dev:

    मुझे तो ये ब्लॉग किसी भी तरह से पाकिस्तान की सरकार और सेना की स्थिति पर व्यंग्य नहीं लगता, जैसे यहाँ कुछ पाठक दावा कर रहे हैं.

  • 36. 22:23 IST, 29 जुलाई 2010 राम बिलाश यादव :

    पाकिस्तान में सैन्य शासक हमेशा ही लोकतंत्र को अंगूठा दिखाते रहे हैं और लोकतंत्र पर हावी रहे हैं. पाक राजनेता जानते हैं कि उनकी सरकार कैसे चलती है. वहां मुशर्रफ को आम माफ़ी दी जाती है जबकि भारत में पांच साल में जनता उन्हें इंडिया शाइनिंग जैसे मुद्दे पर बाहर कर देती है. लालू, कोड़ा, बाल ठाकरे जैसे नेता जेल भी जाते हैं. रही बात बांग्लादेश की तो वह अभी भी लोकतंत्र और धर्मतन्त्र के बीच की लड़ाई लड़ रहा है.

  • 37. 23:30 IST, 29 जुलाई 2010 Umesh yadav:

    आप ऐसा लिखते हैं कि सबको (भारतीय और पाकिस्तानी और यहाँ पर बांग्लादेशी भी) अच्छा लगे, और इसके लिए मैं आपकी सराहना करता हूँ .
    लिखते रहिए.

  • 38. 00:46 IST, 30 जुलाई 2010 umesh gosar:

    काफ़ी अच्छा ब्लॉग लिखा है.

  • 39. 22:59 IST, 31 जुलाई 2010 मुकेश कुमार 'किनार':

    आपने काफी विचारोत्तेजक जानकारी प्रदान की है.धन्यवाद.

  • 40. 08:51 IST, 04 अगस्त 2010 hind:

    आपको मालूम है कि आपके यहाँ लोकतंत्र को सेना जब चाहे अपने जूतों तले रौंद देती है. आपकी मजबूरी है कि आपको सेना की तारीफ करनी पड़ रही है. क्योंकि आप पानी में रहकर मगर से बैर नहीं कर सकते हैं. यही है आपकी मजबूरी.

  • 41. 05:41 IST, 05 अगस्त 2010 s.lal:

    आप जनरल नियाजी के बारे में भी लिखिए कि क्या उन्हें सेवा विस्तार दिया गया था.

  • 42. 22:46 IST, 06 अगस्त 2010 sanjay kumar:

    अगर हमारे यहां नक्सलवाद है, तो आपके यहां आतंकवाद और तालिबान हैं जो नक्सलवाद से अधिक खतरनाक हैं.

  • 43. 21:51 IST, 07 अगस्त 2010 Anil:

    यह एक अच्छा ब्लॉग है लेकिन अधिकतर पाठकों ने आपकी बात को शायद समझा ही नहीं है.

  • 44. 12:42 IST, 17 अगस्त 2010 Vinod:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब, संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पाकिस्तान की ख़राब छवि की वजह से उसे मदद मिलने में मुश्किलें आ रही हैं. दानकर्ताओं को डर है कि पैसा लोगों तक नहीं बल्कि तालिबान तक पहुँचेगा. संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि दूसरे देशों की सरकारों को यक़ीन नहीं है कि पैसा आम लोगों तक पहुँचेगा. उन्हें भ्रष्टाचार की चिंता है और ये डर भी है कि पैसा तालिबान के ख़ज़ाने में चला जाएगा.
    वहीं पाकिस्तान सरकार ने चेतावनी दी है कि यदि बाढ़ पीड़ितों को जल्द ही मदद नहीं मिलती तो लाखों जानें जाएँगी और चरमपंथ में तेज़ी आएगी. पाकिस्तान का क़रीब 20 फ़ीसद हिस्सा पानी में डूबा हुआ है. विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा है कि ये तबाही इतनी बड़ी है कि पाकिस्तान अकेले इसका मुक़ाबला नहीं कर सकता. बीबीसी के साथ एक बातचीत में क़ुरैशी का कहना था, “अंतरराष्ट्रीय मदद जल्द ही नहीं पहुँची तो लाखों लोगों के सामने भुखमरी की नौबत पैदा हो जाएगी और चरमपंथी इस मौक़े का पूरा फ़ायदा उठाएंगे.” ख़ान साहब इस पर आपका क्या कहना है.

  • 45. 15:34 IST, 17 अगस्त 2010 shekhar giri:

    वुसत साहब, आप अपनी कमल का इस्तेमाल हमारी सेना को अस्थिर करने के लिए कर रहे हैं आप यह विष वमन बंद करें.

  • 46. 03:03 IST, 19 अगस्त 2010 Farid Ahmad khan:

    वुसहत साहब, मैं आपके ब्लॉग का नियमित पाठक हूं. यह मुझे काफ़ी पसंद है.

  • 47. 12:31 IST, 20 अगस्त 2010 chandar:

    बिल्ली के आँख बंद कर लेने से अंधेरा नहीं हो जाता वुसत साहब...
    अल्लाह हाफ़िज़....

  • 48. 21:35 IST, 22 अगस्त 2010 सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी:

    पाकिस्तान में लोकतंत्र?
    लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करते जनरल?
    राजनेता बनाम सेना?

    ऐसा मूर्खतापूर्ण आलेख बीबीसी पर देखकर दंग रह गया।

  • 49. 21:53 IST, 24 अगस्त 2010 rama kant singh:

    जब कियानी साहब अगले राष्ट्रपति होंगे तो ख़ान साहब को सूचना और प्रसारण/जनसंपर्क मंत्रालय मिलना तय है. पाकिस्तान के अगले सूचना और प्रसारण/जनसंपर्क मंत्री के रूप में मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ.

  • 50. 16:28 IST, 25 अगस्त 2010 rajesh mandhotra:

    ख़ान साहब कृपया बीबीसी का दुरुपयोग न करें. मुझे लगता है कि भारत को इस दयनीय सलाह की ज़रूरत नहीं है.

  • 51. 15:40 IST, 26 अगस्त 2010 Hidaytullah Ahamad:

    दोस्तों, मुझे लगता है कि आपने वुसतउल्लाह ख़ान के पिछले ब्लॉगों को नहीं पढ़ा है, वे हमेशा से ही घुमा-फिराकर ही पाकिस्तान की व्यवस्था पर कटाक्ष करते रहते हैं. इस ब्लॉग को व्यंग के रूप में देखें, वे अपनी ही सेना पर व्यंग कर रहे हैं और भारत के लोकतंत्र की तारीफ़ कर रहे हैं. जहाँ लोकतंत्र से बड़ा कोई नहीं है, सेना भी नहीं. अच्छा व्यंग है, मुझे आपके ब्लॉग पसंद हैं.

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