खेलों का आयोजन और जवाबदेही
गु़स्सा, लालच और ज़िम्मेदारी दूसरे पर डालना. ये सब राष्ट्रमंडल खेलों में इन दिनों दिखाई पड़ रहा है.
दिल्ली में ये खेल आयोजित होने में अब ढाई महीने से कम का समय बचा है मगर हर रोज़ इससे जुड़ी परेशानियों की ख़बरें मीडिया में चर्चा हैं.
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अब खेलों से जुड़े निर्माण कार्य में लगे इंजीनियरों को लॉलीपॉप थमाया है कि अगर समय से काम पूरा हो जाए तो उन्हें एक महीने का वेतन अलग से दिया जाएगा.
वहीं दूसरी ओर दिल्ली के सार्वजनिक निर्माण कार्य मंत्री राजकुमार चौहान सड़क पर लगे पत्थर हाथ से निकालने में क़ामयाब रहे. काम का स्तर कैसा है ये इसी से पता चलता है.
दिल्ली की सड़कों पर फ़ुटपाथ कई जगह खुदे पड़े हैं और कई जगह तो आपको उसके इर्द-गिर्द कोई काम होता भी नहीं दिखता जिससे लगे कि चलो कुछ दिन में सब सही हो जाएगा.
काम पूरा हो जाए तो इंजीनियरों को एक महीने का वेतन अतिरिक्त मिलेगा मगर उस काम का स्तर कैसा होगा इस पर पता नहीं कैसे नज़र रखी जाएगी.
कदरपुर शूटिंग रेंज और यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में परेशानियों की ख़बरें पहले ही अख़बारों में आ चुकी हैं.
कहाँ तक तो इसे लेकर अधिकारियों को चिंतित होना चाहिए तो उस पर प्रतिक्रिया ये है कि चलिए अभी परेशानियाँ सामने आ गईं, हम उन्हें ठीक कर लेंगे और खेलों के समय सब सही हो जाएगा.
खेलों का बजट सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता ही चला जा रहा है. पैसा 'देश की प्रतिष्ठा' के नाम पर पानी की तरह बहता दिख रहा है और उसकी जवाबदेही कब तय होगी इसका कोई अंदाज़ा भी नहीं.
पैसा वापसी का एक ज़रिया था कि बड़ी संख्या में खेलों के प्रायोजक मिलें. मगर प्रायोजक पाने की स्थिति ये है कि सरकारी उपक्रमों से कहा जा रहा है कि वे प्रायोजन करने आगे आएँ.
ये बात मेरी समझ से अब भी बाहर है कि ये सारी तैयारी कुछ और पहले क्यों नहीं शुरू की जा सकती थी.
मैं मानता हूँ कि अब इस पर बहस करके काम को रोका नहीं जा सकता मगर इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों की ज़िम्मेदारी तय करके कम से कम आगे के लिए एक सही संकेत तो दिया ही जा सकता है.

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ِइसके लिए हम भारतवासी ही जिम्मेदार हैं. अगर कामनवेल्थ खेल सफल भी हो जाएं तो भी ये सवाल बने रहते हैं. हम ऐसे लोगों को क्यों चुनते ही हैं जो एक काम भी ठीक से नहीं कर सकते हैं?
कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियों ने स्थिति को और भी खराब कर दिया है. कम समय और काम के दबाव में कोई भी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दे रहा है. हो सकता है कि सरकार इस समय इन बातों को लेकर परेशान न हो, लेकिन बाद में रस्मी अदायगी के तौर पर इस पर समिति बैठाई जाएगी और वह अपनी वही घिसी पिटी रिपोर्ट पेश करके लोगों को भ्रम में डालने की कोशिश करेगी. इस तरह की चीजों ने आम जन को और भी प्रभावित किया है.
मुकेश जी, यही तो त्रासदी है इस देश की, यहाँ किसी की कोई जवाबदेही नहीं बनती और अगर बनती भी है, तो कोई उसे ईमानदारी से निभाने को तैयार नहीं. अगर कोई वाकई कोशिश करता भी है, तो व्यवस्था के अन्तर्निहित दांव-पेंच उसके हाथ बांध देते हैं. लेकिन , एक बात तो अब तक आयोजकों के सामने साफ हो जानी चाहिए कि राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन यदि देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा है, तो इसे सफल बनाने के लिए पानी की तरह बहाए जा रहे पैसे इस देश की आम जनता के हैं जिनका सही उपयोग होना ही चाहिए.
हमारे यहां राजनीति में जवाबदेही तय नहीं होती और अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.
तैयारी को देखते हुए ऐसा लगता है कि कॉमनवेल्थ खेलों में भारत की फ़जीहत होने वाली है. बावजूद इसके कि इन तैयारियों में कई लोगों के वारे-न्यारे हो गए हैं.
जवाबदेही तय तो होनी चाहिए लेकिन जहाँ भ्रष्टाचार की गंगा बह रही हो और लोकतंत्र के सभी स्तम्भ उसमें डुबकियाँ लगाने में लगे हों वहां कौन जवाबदेही तय करेगा और दोषियों को दण्डित करेगा?
पैसा आम जनता का लग रहा है, सरकारी महकमे को किसी बात की चिंता नहीं है. सरकारी लोगों के लिए फिर से एक वेतन आयोग बिठाया जाएगा और नेता लोग अपनी कमी घोटाले करके पूरा कर लेंगे.
मुकेश जी, आपको धन्यवाद एक सही तस्वीर पेश करने के लिए. कामनवेल्थ गेम्स से जुड़े लोगों में जवाबदेही और नैतिकता की कमी है. हम अब ईश्वर से ही इसकी सफ़लता की दुआ कर सकते हैं.
हम ऐसे ही कार्य करने के आदी हैं ! तो अब क्यों लीक से हटकर कुछ नया कर बैठें ? ज़रा कल्पना करें कि यही आयोजन आज से 10-15 साल पहले होता तब भी इसी गति से होता और आयोजन भी सफल होता ! फर्क इतना होता कि उस समय सरकार के कंधे पर आज जैसा कुशल मीडिया सवार नहीं होता जो इस बार सरकार को बार बार नींद से जगाता आया है. ठीक ही कहा गया है कि हमारे यहाँ पशु और जानवरों को हांकने के लिए बस डंडा चाहिए.
प्रशासन की सबसे बड़ी जवाबदेही है. जरूरी है कि वे अपना काम ईमानदारी से करें न कि दोष को दूसरों के ऊपर थोपें.
राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन देश के विकास के लिए या नाम से ज्यादा भ्रष्ट लोगों का जेब भरने के लिए किया जा रहा है. भ्रष्ट लोगों के लिए देश की इज्जत का कोई मतलब नहीं है. जो होना है वहीं होगा, हम बेकार ही चिंतित हो रहे हैं. हमारे यहाँ लोगों की आदत रही है कि जब तक उन्हें उनकी जिम्मेदारियों से बार बार अवगत नहीं करवाया जाता वे सोये ही रहते हैं.
भारतीय लाल फीताशाही के रेशमी ताने-बाने में उलझने से जो बच जाए उसी की गनीमत है. कामनवेल्थ तो बहुत कामन चीज़ है. अपने नेता और बाबुओं की चले तो वे कबूतरखाने में ओलंपिक करवा कर दिखला दे . देश की नाक तो भई अपने मंत्री रूपी कास्मेटिक सर्जनों के हाथ का खिलौना है, गर कट भी गई तो जुगाड़ी गोंद से जोड़ ही देंगें. निजीकरण की बात करें हो-हल्ला मच जाता है पर निजी हाथों में आईपीएल के सफ़ल आयोजन हम सभी ने देखें हैं . चीन में ओलंपिक का भव्य आयोजन हो या दक्षिण अफ्रीका जैसे सीमित संसाधनों वाले देश में फुटबाल वर्ल्ड कप का शानदार आयोजन, हम भला कब किस नजी़र से सीखने लगे . सीधी सी बात है, अगर अपने पास वो संसाधन ही नहीं तो बस सिर्फ दुनिया-दिखावे के लिए इतने बड़े आयोजन का जिम्मा लेना कहां की होशियारी है . राष्ट्रमंडल का मैडल गले में घालने के लिए जितने करोड़ डालर दिल्ली की रंगाई-पुताई में लग रहे हैं उतने में तो दिल्ली का आधारभूत ढ़ांचा ही नए सिरे से खड़ा जा सकता है.
मुकेश जी भारतीय लोकतंत्र में न तो कोई जिम्मेदार होता है और न ही किसी की जिम्मेदारी होती है. यह तो ऐसी खिचड़ी है जो बस पकती रहती है. लेकिन एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि आप जरूरत से ज्यादा आशावादी हैं, गोया रेगिस्तान में झील की कल्पना कर लेते हैं.