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बिलावल भुट्टो की ताजपोशी?

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शुक्रवार, 13 अगस्त 2010, 14:22 IST

पिछले दिनों ऑक्सफोर्ड से इतिहास की डिग्री ले चुके 21 वर्षीय बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के ग्रामीण आवास 'चेकर्स' में उनके साथ तस्वारें खिंचवाईं. इससे पहले वो फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोज़ी और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ भी इसी तरह की तस्वीरें खिंचवा चुके हैं.

आम तौर से किसी देश में जाने वाले शासनाध्यक्ष औपचारिक मौकों पर अपने बच्चों को ले जाने से परहेज़ करते हैं लेकिन राष्ट्रपति ज़रदारी इसका अपवाद हैं.

पिछले दिनों जब ज़रदारी बीजिंग में राष्ट्रपति हू जिन ताओ से मिलने गए थे तो उनके साथ उनकी दोनों पुत्रियां बख़्तावर और आसिफ़ा भी थीं.
1972 में जब जुल्फ़िकार अली भुट्टो शिमला आए थे, तो अपनी पुत्री बेनज़ीर को भी अपने साथ लाए थे.

इस समय पाकिस्तान में ज़रदारी की लोकप्रियता ऊंचाइयों को नहीं छू रही है, इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि इस तरह के भाव प्रदर्शन से वो बाहरी दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि वो जो कुछ भी हों, वो मारी गई पाकिस्तानी नेता के बच्चों के पिता भी हैं.

ज़रदारी के आलोचक उन पर फ़ब्तियां कस रहे हैं कि उन्हें पाकिस्तान के बाढ़ पीड़ितों की कोई परवाह नहीं है और वो इस मौके का इस्तेमाल अपने लड़के को बढ़ावा देने के लिए कर रहे हैं.
शायद यही वजह थी कि बिलावल ने बर्किंघम में अपनी पूर्व निर्धारित रैली रद्द कर दी और लंदन में पाकिस्तानी उच्चायोग द्वारा बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए आयोजित किए गए समारोह में भाग लिया.

इस तरह के भी संकेत मिल रहे हैं कि बिलावल की एक साल छोटी बहन बख़्तावर भी राजनीति में आने के बारे में सोच रही हैं. उन्होंने महिलाओं और पिछड़े हुए लोगों के लिए काम करना भी शुरू कर दिया है.
भाई-बहनों के बीच इस तरह की प्रतिद्वंदिता कोई नई बात नहीं है. बेनज़ीर और मुर्तज़ा भुट्टो के बीच भी अपने पिता की राजनैतिक विरासत लेने की होड़ हुआ करती थी.
लेकिन बिलावल और बख़्तावर के राजनीति में असली कदम रखने में अभी देर है क्योंकि बिलावल मात्र 21 साल के हैं और उनकी बहनें उनसे भी छोटी हैं. पाकिस्तान में किसी भी सदन का सदस्य बनने के लिए 25 साल की उम्र ज़रूरी है.

एक सोच ये भी है कि शायद बिलावल और उनकी दोनों बहनें राजनीति में आने के लिए इतने तत्पर न हों लेकिन उनके पिता उनका सहारा लेकर अपनी गिरती हुई छवि को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं.

बहरहाल बिलावल, बख़्तावर और आसिफ़ा में से कौन बेनज़ीर की विरासत ले पाएगा, उस पर आखिरी मोहर पाकिस्तान की जनता लगाएगी.

भारत में भी इंदिरा गांधी की लाख कोशिशों के बावजूद संजय गांधी को लोगों ने पसंद नहीं किया था. हां, जब मौका आया तो उन्होंने राजीव गांधी को ज़रूर सिर आंखों पर बैठाया था.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:53 IST, 14 अगस्त 2010 manoj:

    कोई भी सियासी नेता यह तो चाहता है कि उसके बच्चे भी सियासत में आगे बढ़ें. ऐसे में ज़रदरी यदि ऐसा कर रहे हैं तो गलत नहीं है. अलबत्ता इतना जरूर है कि ज़रदारी को अपनी छवि की ओर जरूर ध्यान देना चाहिए. क्योंकि जहां तक मैं ज़रदारी को जानता हूं उनकी छवि बहुत अच्छी नहीं है. शायद वे पहले सियासी नेता है जो अपनी पत्नी के नाम पर राजनीति कर रहे हैं.

  • 2. 13:26 IST, 14 अगस्त 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेहान साहब! भुट्टो खानदान को लेकर आपकी समझ तारीफ के काबिल है. लेकिन ऐसा ही विश्लेषण अगर किसी भारतीय नेता को लेकर भी करें तो ठीक होगा. आज के दौर में तकरीबन हर नेता अपने पत्नी-बच्चों को राजनीतिक फायदा पहुंचाना चाहता है. स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री इसका अपवाद थे.

  • 3. 23:54 IST, 14 अगस्त 2010 Dr.Lal Ratnakar:

    आज दुनिया में एक ही तरह की बात ख़बर बन रही है कि फ़लाँ के पुत्र-पुत्रियाँ अमुक राजनितिक पार्टी के 'उभरते' हुए सितारे हैं और अवाम उन पर अपनी जान छिड़क रही है, पर भारत में जिस क़दर ऐसे नवजवान भारतीय राजनीति में आ रहे है वह इस मुल्क और उनके लिए जो इस क्षेत्र को अपना पेशा बनाना चाह रहे है, कहीं घातक न हो जाए, भारत जैसा मुल्क पाकिस्तान के तौर तरीक़ों पर कितना अमल करता होगा यह खोज का सवाल है, पर सल्तनत की जगह बनाने का जो खेल फिर शुरू हुआ है उससे कौन नेता बनेगा यह तो भविष्य में पता चलेगा.

  • 4. 08:24 IST, 15 अगस्त 2010 braj kishore singh:

    चाहे जिस किसी को भी राजनीति में लाओ और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनाओ लेकिन असली सत्ता तो सेना के हाथों में ही रहनी है.

  • 5. 02:26 IST, 14 सितम्बर 2010 rajesh modi:

    योग्यता या लोकप्रियता के कोई मायने नहीं होने से राजनीति में आम आदमी का काम मुश्किल होता जा रहा है.

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