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पीपली लाइव बनाम असली भारत

सुशील झासुशील झा|शनिवार, 14 अगस्त 2010, 15:08 IST

'पीपली लाइव' फ़िल्म को देखकर लगता है कि यह पत्रकारिता पर चोट करती है, फिर लगता है कि शायद अफ़सरशाही इसके निशाने पर है या फिर राजनीति.

सच कहें तो यह फ़िल्म पूरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है.

ऐसी व्यवस्था जिसके पास मरे हुए किसान के लिए तो योजना है लेकिन उसके लिए नहीं जो जीना चाहता है.

ये उन पत्रकारों पर तमाचा है जो लाइव आत्महत्या में रुचि रखते हैं तिल-तिल कर हर रोज़ मरने वाले में नहीं.

फ़िल्म न तो नत्था किसान के बारे में है और न ही किसानों की आत्महत्या के बारे में. ये कहानी है उस भारत की जहां इंडिया की चमक फीकी ही नहीं पड़ी है बल्कि ख़त्म हो गई है.

उस भारत की जो पहले खेतों में हल जोतकर इंडिया का पेट भरता था और अब शहरों में कुदाल चलाकर उसी इंडिया के लिए आलीशान अट्टालिकाएं बना रहा है.

जहां तक नत्था के मरने का सवाल है जिसे केंद्र में रख कर आमिर ख़ान ने पूरा प्रचार अभियान चलाया है...उसके बारे में इतना ही कहूंगा कि नत्था मरता नहीं है उसके अंदर का किसान ज़रुर मरता है जो आज हर भारतीय किसान के घर की कहानी है.

अनुषा बधाई की पात्र हैं जो उन्होंने ऐसे मुद्दे पर फ़िल्म बनाई. अंग्रेज़ी में जिसे ब्लैक ह्यूमर कहते हैं...उसकी भरमार है और यही इसकी थोड़ी कमज़ोर स्क्रिप्ट का अहसास नहीं होने देती.

यह फ़िल्म एक बार फिर इस बात का अहसास दिलाती है कि हम कैसे भारत में रह रहे हैं. वो भारत जो न तो हमारे टीवी चैनलों पर दिखता है और न ही हमारे नेताओं की योजनाओं में.

अगर जाने माने फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रहात्मज के शब्द उधार लूं तो फि़ल्म शानदार है जो रोंगटे खड़े कर देती है.

मुद्दा ग़रीबी नहीं है...मुद्दा जीने का है..चाहे वो मिट्टी खोदकर हो या मर कर. क्या फ़र्क पड़ता है गांव की मिट्टी खोद कर मरें या कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए मिट्टी खोदते हुए.

फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय सर्किट में पसंद किया जा रहा है और किया जाएगा. हो सकता है लोग कहें कि इसमें भारत की ग़रीबी को ही दिखाया गया (जैसा कि स्लमडॉग मिलियनेयर के बारे में कहा गया था) मैं तो यही कहूंगा कि यही सच्चाई है..

पत्रकार, अफ़सर और राजनेता ये फ़िल्म ज़रुर देखें और अपनी कवरेज योजना और व्यवहार में थोड़ी सी जगह इस असली भारत को दें तो अच्छा होगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:31 IST, 14 अगस्त 2010 Sunil Kumar:

    मैंने यह फ़िल्म देखी है. मैं बताना चाहूंगा कि मीडिया के व्यवसायीकरण की वजह से पत्रकारिता भटक चुकी है. मसालेदार ख़बरें और गासिप्स किसे पसंद हैं? असल में, मध्य वर्ग की अब यही पसंद है. इसके लिए मीडिया के अलावा ये लोग भी जिम्मेदार हैं.

  • 2. 17:51 IST, 14 अगस्त 2010 Kapil Btra:

    एक अच्छे लेख के लिए साधुवाद.

  • 3. 19:13 IST, 14 अगस्त 2010 Ankit :

    फ़िल्म अच्छी है और संगीत भी अच्छा है. पर जहां तक मुद्दे की बात है तो एक हद तक तो ठीक है, पर बाद में सब कुछ "अति" दिखाया गया है. काश! सच में कभी एक किसान की आत्महत्या पर इसका 10 प्रतिशत भी प्रचार हुआ होता,तो इतनी जानें न जाती. ऐसे कई हिस्से हैं भारत के जहां इंडिया की हवा तक नहीं पहुंची है.

  • 4. 19:26 IST, 14 अगस्त 2010 Harish Chandra Nainwal:

    सुशील जी, उम्मीद है कि आप भारतीयों और भारतीय कार्य संस्कृति से अच्छी तरह से वाकिफ होंगे. यहां कोई भी काम नहीं करता, फिर भी काम चलता रहता है. इट हैपंस ओन्ली इन इंडिया. पीपली लाइव एक तरफ भारत की असल जिंदगी को छूती है तो दूसरी तरफ यह अलग तरह के लोकतंत्र का चेहरा दिखाती है.

  • 5. 00:15 IST, 15 अगस्त 2010 Jawed hasan:

    काश ये लेख टीवी पत्रकार पढ़ते.

  • 6. 02:35 IST, 15 अगस्त 2010 Farid Ahmad khan :

    आपने ठीक लिखा है. लिखते रहिए. धन्यवाद.

  • 7. 08:44 IST, 15 अगस्त 2010 braj kishore singh:

    आमिर खान निश्चित रूप से प्रशंसा के पात्र हैं जो उन्होंने ऐसे साहसिक विषय पर फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया.लेकिन तब तक स्थितियां नहीं बदलने वाली जब तक हम अपने व्यक्तिगत,धार्मिक और जातीय स्वार्थ से ऊपर उठकर नहीं सोंचेंगे और मतदान करते समय उम्मीदार की योग्यता को केंद्र में नहीं रखेंगे. अभी जनता में जागरूकता पैदा करने के लिए बहुत सारे समन्वित प्रयास करने की जरूरत है सिर्फ आमिर खान भारत को नहीं बदल सकते.

  • 8. 10:52 IST, 15 अगस्त 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPU PUNJAB :

    अगर कम शब्दों में कहूँ तो इंडिया का मतलब भ्रष्टाचार, भाई भातीजावाद की राजनीती एवं कुल मिलाकर जिसकी लाठी उसकी भैंस से है. दूसरी तरफ भारत अभी भी दरबदर हर रोज़ सरकारी दफ्तरों में ठोकरें खाता खेतों में दुर्दशा का शिकार होता मिल जाएगा. हम आज़ादी की 64 वीं सालगिरह पर जय हिंद और भारत माता की जय के नारे लगाते नहीं थकेंगे. पर क्या वास्तव में हमने आज़ादी के मूल्य को अब तक पहचाना है ?

  • 9. 11:01 IST, 15 अगस्त 2010 Kolambas:

    यह पिक्चर बहुत खास है.

  • 10. 13:40 IST, 15 अगस्त 2010 सत्यकाम अभिषेक :

    फिल्म देखकर क्या पत्रकार, नेता या फिर अन्य लोग खुद में बदलाव लाएंगे? शायद नहीं. उनके लिए किसान तो आज मनोरंजन का विषय बन गया है. अनाज सड़ रहे हैं तो किसानों की बाइट ले आओ और फिर टीवी पर चला दो या अखबारों में लिख दो. लेकिन जमीनी हकीकत से कोई रू ब रू नहीं होना चाहता है. आज दूसरी हरित क्रांति की बात की जा रही है लेकिन ये कैसे आएगी, इस पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है. बहरहाल अनुषा ने देश की खोखली व्यवस्था और हमारी खोखली राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है और वे बधाई की पात्र हैं.

  • 11. 14:52 IST, 15 अगस्त 2010 Anuj:

    फ़िल्म के गाने ठीक थे जबकि फ़िल्म के बाकी हिस्से से बहुत निराशा हुई. पहले तो मीडिया और अन्य सामाजिक घटनाओं ऊपर पक्षपाती दृष्टिकोण पेश किया है. और एक ऐसे संवेदनशील विषय, जिस पर वास्तव में सोचने और कुछ करने की ज़रूरत है, उसका भद्दा मजाक उडाया गया है. ये अमीर इंडिया का गरीब भारत पर उसकी गरीबी और लाचारी पर अशोभनीय मजाक है

  • 12. 14:58 IST, 15 अगस्त 2010 Ram:

    अच्छा लिखा है.

  • 13. 00:39 IST, 16 अगस्त 2010 Dushyant Solanki:

    मेरी समझ में आपकी सोच एकतरफा और नकारात्मक है. यह ठीक नहीं है.

  • 14. 02:14 IST, 16 अगस्त 2010 pokar Ram :

    आमिर ने देश को पहले भी अच्छी फिल्म दी है. आशा करता हूँ कि इस तरह भविष्य में भी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर फिल्म बनाते रहेंगे.

  • 15. 11:54 IST, 16 अगस्त 2010 शशि सिंह :

    चोला माटी के राम, ऐकर का भरोसा.. आजाद भारत! हम्म्म... ठगा हुआ महसूस कर रहा हूं. खुद को भारतीय मानने वाले वाले अंग्रेज पत्रकार मार्क टूली सा’ब को कहीं कहते सुना था- , “भारत में काम करते हुये दिनों दिन भगवान में मेरी आस्था गहरी होती गई, क्योंकि यह देश भगवान भरोसे चल रहा है.”


  • 16. 12:19 IST, 16 अगस्त 2010 Amit Kumar Jha, Gandhi Vihar, New Delhi:

    वाकई पीपली लाइव एक अच्छी मूवी बन बड़ी है जो बड़े ही साफगोई से राजनीति, अफसरशाही और पत्रकारिता के यथार्थ को नुमाया करती है. कागजो पर दौड़ने वाली योजनाओं का जमीनी सच, नेताओं की अवसरवादिता और पत्रकारिता बनाम व्यवसायिकता की हकीकत बयां करती मूवी का ग्रामीण परिवेश सहज ही आकर्षित करता है, साथ ही सोचने को मजबूर भी कि आखिर नत्था होना दुर्भाग्य कि बात क्यों है! 10 फीसदी से अधिक की सालाना विकास दर भी अगर हमारे कृषकों, मजदूरों को आत्महत्या/ भूखमरी से न रोक सके, तो आखिर ये किसका विकास है और कैसा विकास है.

  • 17. 13:47 IST, 16 अगस्त 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सुशील जी, आपने जो लिखा है उससे हज़ार गुणा ज्यादा मजबूरी, लाचारी, ग़रीबी मौजूद है भारत में.

  • 18. 17:56 IST, 16 अगस्त 2010 राकेश शर्मा:

    यह फिल्म देखे बिना ही मैं इसके मजमून को भांप सकता हूं. नत्था, जो गोदान के होरी की याद दिलाता है, आज के शाइनिंग इंडिया में उसके लिए कोई खास स्पेस नहीं है. मीडि़या को सिर्फ़ और सिर्फ़ सनसनी चाहि. इसकी भूख इसमें इतनी है कि वो किसी आत्महत्या को प्रायोजित भी करवा सकता है. देश में जो भी विसंगतियां हैं उनसे हमारी सत्ता, नौकरशाही कैसे निपटती उसको अनावृत्त करती है यह फिल्म. आमिर बधाई के पात्र है जो घोर व्यावसायिकता के इस युग में ऐसे विषय पर फिल्म बनाने का हौसला रखते हैं, हां यह बात और है कि इससे देश की भ्रष्ट और निक्कमी व्यवस्था पर कोई खास असर पड़ेगा.

  • 19. 17:58 IST, 16 अगस्त 2010 Gaurav Shrivastava:

    मैंने आपका लिखा पढ़ा. आज की रात जो किसान आत्महत्या करने की सोच रहे हैं उनके लिए हम क्या कर रहे हैं. आप कुछ नहीं करेंगे क्योंकि आप को लिखने के लिए पैसे मिलते हैं. मैं कुछ नहीं कर सकता क्योंकि मेरे पास ना पावर है ना सुविधा. अब राजनेता चाहे तो कुछ कर सकते हैं पर वे हमारा लिखा नहीं पढ़ते. क्या आपके पास कोई ऐसी सोच है जिससे हम राजनेताओं को काम करने के लिए प्रेरित कर सकें.

  • 20. 18:47 IST, 16 अगस्त 2010 राम मुरारी:

    बेशक पीपली लाइव अच्छी फिल्म है... लेकिन इससे जुड़े कुछ सवाल भी हैं... सवाल फिल्म से कम इसे बनाने के सरोकारों से ज्यादा हैं.

  • 21. 22:23 IST, 16 अगस्त 2010 दीपक पाण्डेय :

    सुशील जी आप ने बहुत अच्छे तरह से फिल्म के बारे मे लोगो को बताने की कोशिश की है. लेकिन मेरी समझ से फिल्म का मतलब है लोगो को गुमराह करना. पीपली लाइव की बात में भारतीय किसानों का मजाक उड़ाया गया है.

  • 22. 11:09 IST, 17 अगस्त 2010 कृष्णा तर्वे, मुंबई:

    कहते हैं कि अंग्रेजों ने भारत को लूटा. लेकिन आज अपने लोग ही भारत को लूट रहे हैं. जिसकी वजह से ही किसानो की यह दुर्दशा आज है. आज़ादी के पवित्र शब्द और उसकी भावनाओं को नेताओं और व्यवस्था ने अपवित्र कर दिया है.

  • 23. 11:35 IST, 17 अगस्त 2010 Krishna:

    आपने बहुत अच्छा लिखा है. लेकिन कृपया किसानों की सहायता कीजिए, उन्हें इसकी जरूरत है. मैं गाँव से आता हूँ और वहाँ की एक नदी अपना रास्ता बदल दी है, किसान भयभीत हैं.

  • 24. 15:33 IST, 17 अगस्त 2010 Abhijit:

    ...फिर भी मेरा भारत महान.

  • 25. 21:24 IST, 17 अगस्त 2010 himmat singh bhati:

    मैंने अभी तक यह फ़िल्म नहीं देखी है. लेकिन जिस तरह लोगों की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, उससे लगता है कि आमिर ख़ान ने साहस कर पहली बार भारत की कमियों पर फ़िल्म बनाकर अच्छी शुरुआत की है. जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं. उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे भारत के ग़रीबों पर हो रहे अत्याचार को लेकर इस तरह की फ़िल्में बनाते रहेंगे. यहाँ हर इंसान मरने से पहले कई बार मर कर जीता है. इसे जीना नहीं कहा जा सकता है. भारत आज कुरुतियों का भंडार बना हुआ है. इससे लोग अपनी जिंदगी में कई बार मरते हैं.

  • 26. 21:44 IST, 17 अगस्त 2010 himmat singh bhati:

    सुशील झा जी, यह फ़िल्म एक कड़वा सच है. आप जैसे खोजी पत्रकार भारत में बहुत हैं और नामी-गिरामी भी. यहाँ बड़े से बड़े नेता भी हैं और अधिकारी भी. न्यायालय भी हैं और न्यायाधीश भी हैं, सभी जानते हैं लेकिन अनजान बने हुए हैं. क्यों? भारत को बेचा सकता है खरीदार चाहिए. यहाँ फर्जी कागजात बनवाकर कोई किसी का भी घर बेच सकता है. पंजीयन विभाग यह नहीं देखता है कि कागजात सही हैं या ग़लत. उसे केवल पंजीकऱण शुल्क से मतलब है. कमर फूटे उसके जिसका ज़मीन या घर बिक गया है. बेचने वाले मजे कर रहे हैं क्योंकि इसमें सज़ा का कोई प्रावधान नहीं है. यह है मेरे महान भारत की दास्तान. आमिर ख़ान बधाई के हकदार हैं क्योंकि उन्होंने एक अच्छे सच को उजागर किया है.

  • 27. 00:20 IST, 18 अगस्त 2010 ASHOK BAJAJ RAIPUR:

    इन दिनों फ़िल्म “ पिपली लाइव ” का यह गीत खूब चल पड़ा है, ठीक वैसे ही जैसे कि एक दो साल पहले से “ सास गारी देवे...” वाला गीत चल रहा है. फिल्म “ पिपली लाइव ” का भविष्य तो मै नहीं जानता, शायद आक्टोपस पॉल बाबा ही बता पाएँ लेकिन इतना तय है कि यह गीत जरूर हीट हो जाएगा. इसके गायक रघुवीर यादव और उनकी मंडली को इस गीत से प्रसिद्धि तो मिल ही रही है, ऊपर से स्वर कोकिला लता मंगेश्कर ने इस गीत की तारीफ़ कर सोने पर सुहागा कर दिया है. छत्तीसगढ़ के लोकगीत यहाँ की जान है. अपने ब्लॉग में इस गीत का जिक्र करने के पीछे पहला कारण तो यह है कि यह गीत लोकधुनों पर आधारित है. हमारे देश में लोकगीतों का काफी महत्व है. वास्तव में लोकधुनों में काफ़ी मिठास होती है. प्रत्येक प्रांत या क्षेत्र में अलग-अलग मौसम या तीज त्योहारों में बजाए या गाए जाने वाले लोकगीतों का अपना अलग ही आनंद है. “ महंगाई डायन खाए जात है.“ भी लोकधुन पर आधारित है. गायक रघुवीर यादव और सहायक कलाकारों ने परंपरागत वाद्य यंत्रों में इस गाने को लय और ताल दिया है. सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस गीत में कही भी अत्याधुनिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल नही किया गया है.ऐसे गीत पीढ़ी दर पीढ़ी बजाए जा रहे है, लेकिन उचित अवसर के अभाव में इन गीतों का धुन क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पाता है.फिल्म अभिनेता आमिर ख़ान ने इसे प्लेटफार्म दिया यह हिट हो गया. छत्तीसगढ़ के विभिन्न तीज त्योहारों और संस्कारों में गाए जाने वाले गीतों को बार-बार सुनने का जी करता है. छत्तीसगढ़ के लोकगीत यहाँ की जान हैं. समस्या यह है कि इन गीतों की मौलिकता कैसे बरकरार रहें. पाश्चात्य और बंबइया संगीत की खिचड़ी का दुष्प्रभाव छत्तीसगढ़ी लोक गीतों पर नहीं पड़ना चाहिए. आम आदमी की पीड़ा की अभिव्यक्ति,
    इस चर्चा को ब्लॉग में शामिल करने का दूसरा प्रमुख कारण यह है कि इस गीत में “ महंगाई ” जैसे ज्वलंत मुद्दे को शामिल किया गया है. वास्तव में यह गीत आम आदमी की पीड़ा की अभिव्यक्ति है. आज हर व्यक्ति महँगाई से ग्रस्त है. निम्न और मघ्यम वर्ग के लोगों का तो बड़ा बुरा हाल है. इस गीत में आम आदमी की दशा का चिंतन बहुत ही खूबसूरत ढंग से किया गया है. इसके आगे और कहे नही जात है. महंगाई डायन खाए जात है...”

  • 28. 13:38 IST, 18 अगस्त 2010 susheelmishra:

    सुशील जी आपने फ़िल्म को पूरी तरह खोलकर रख दिया है.

  • 29. 19:11 IST, 18 अगस्त 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    सुशील जी, आप जैसे पत्रकार बंधुओं को ऐसा लिखता देखकर अच्छा लगता है. लेकिन इसके साथ ही आज इस तरह के ज्वलंत मुद्दों पर सच्चाई और पूरी ईमानदारी के साथ सोचने और ठोस पहल की ज़रूरत है. क्या हम इन मुद्दों पर वाकई कुछ नहीं कर सकते हैं? या हम सब कुछ जानते हुए और हाथ में पॉवर होते हुए भी कुछ नहीं करना चाहते हैं? आज आमिर ख़ान जैसे अभिनेता की ज़रूरत हैं जो ऐसे ज्वलंत मुद्दों पर पूरी ईमानदारी और मेहनत से फ़िल्में बनाएँ और लोगों का ध्यान दिलाया. सिर्फ़ लोगों का ध्यान दिलाने से कुछ नहीं होता है. इसमें नेता-अभिनेता और पत्रकारों को मिलकर काम करना होगा. हमें अपनी टीआरपी और व्यक्तिगत फ़ायदे को छोड़कर काम करने की सख़्त ज़रूरत है जिससे हमारे देश में फिर नत्था जैसा कोई दूसरा किसान पैदा न होने पाए. मैं तहे दिल से आमिर ख़ान साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जिन्होंने व्यावसयिकता के इस दौर में भी इस तरह की फ़िल्म बनाने का जोखिम उठाया. उनका यह साहस तारीफ़ के काबिल है.

  • 30. 23:55 IST, 27 अगस्त 2010 SALMAN HAIDER:

    इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद यवतमाल के किसानों ने प्रदर्शन किया और एक चैनल ने उसे जोर शोर से दिखाया.

  • 31. 16:17 IST, 06 सितम्बर 2010 Soumya Jha:

    दुख इस बात का है कि टीवी चैनल पर भी इन बातों का कोई असर नहीं हुआ होगा. उनके लिए तो फिल्म आई और गई.

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