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खेल भावना या बीसीसीआई का दबदबा

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|गुरुवार, 19 अगस्त 2010, 02:27 IST

श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने सूरज रंदीव और तिलकरत्ने दिलशान के विरुद्ध तुरत-फुरत कार्रवाई करके क्या वास्तव में खेल भावना को बरक़रार रखने की दिशा में क़दम उठाया है.

वीरेंदर सहवाग का शतक पूरा नहीं हो सके उसके लिए नो बॉल फेंक देना काफ़ी कुछ गली क्रिकेट की याद दिला गया था जहाँ हार की चिढ़ मिटाने के लिए बल्लेबाज़ को विजयी रन बनाने का मौक़ा नहीं देने पर कोई आश्चर्य नहीं होता.

वैसे रंदीव ने जो किया वो सिर्फ़ उस समय भावावेश में उठाया गया क़दम ज़्यादा लगता है. उनके पास अभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का उतना अनुभव भी नहीं है ऐसे में शायद तिलकरत्ने दिलशान का उकसावा उन्हें इस क़दम की ओर ले गया.

मगर श्रीलंका बोर्ड ने मामले को गंभीरता से लिया और तुरंत जाँच करते हुए दो दिनों के भीतर कार्रवाई कर दी और उस पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने श्रीलंका बोर्ड की पीठ भी थपथपा दी.

रंदीव पर एक मैच का प्रतिबंध और भारत के विरुद्ध हुए मैच की उनकी फ़ीस ज़ब्त कर ली गई जबकि उकसाने की वजह से दिलशान की भी मैच फ़ीस काट ली गई.

इस बात में कोई शक नहीं कि मैदान में जो कुछ हुआ वो दुर्भाग्यपूर्ण था और खेल भावना के विपरीत भी इसलिए ये देखकर लगा कि श्रीलंका बोर्ड खेल भावना को लेकर गंभीर है.

मगर फिर दूसरे पक्ष की ओर भी ध्यान गया, क्या ये वास्तव में खेल भावना को ध्यान में रखकर उठाया गया क़दम है या भारतीय क्रिकेट बोर्ड के दबदबे का असर.

किसी भारतीय क्रिकेटर की जगह अगर यही काम रंदीव ने किसी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर के विरुद्ध किया होता तो भी क्या उनकी इसी तरह आलोचना हो रही होती और बोर्ड ऐसी ही कार्रवाई करता.

क्या उन हालात में भी इतनी चीख-पुकार मचती.

यहाँ बस ये याद दिला दूँ कि लगभग ढाई साल पहले श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष
अर्जुन रणतुंगा ने बीसीसीआई से आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी और इस मदद पर बीसीसीआई की सकारात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आई थी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:49 IST, 19 अगस्त 2010 Bhavesh Gaur:

    मुकेश जी, आज आपको और हम सबको बीसीसीआई के आर्थिक रुतबे का अनुमान है. मैदान पर उस दिन ये जो कुछ भी हुआ वो शर्तिया ग़लत था, खेल भावना के विपरीत था लेकिन क्रिकेट के कानून के मुताबिक था. खेल के बाद मीडिया ने और बीसीसीआई के रुतबे ने राई का पहाड खड़ा कर दिया. यहाँ पर खेल से ज्यादा पैसा हावी हो गया और इसलिए श्रीलंका क्रिकेट को भी खेल भावना याद आ गई. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड पिछले कुछ साल से खस्ता हाल में है और भारत से सहायता की उम्मीद कर रहा है. आज तक भारत और श्रीलंका के बीच कुल 126 एक दिवसीय मैच हुए है जिसमे से एक चौथाई या 31 मैच 2008 से लेकर अब तक हुए है. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड का माफ़ी मांगने का कदम दबाव में उठाया हुआ क़दम है.

  • 2. 13:09 IST, 19 अगस्त 2010 ABHISHEK TRIPATHI:

    रंदीव को उनकी गलती की सज़ा मिली है. इसमें बीसीसीआई के दबदबे की बात गलत है.

  • 3. 13:35 IST, 19 अगस्त 2010 राकेश शर्मा:

    क्रिकेट की हर घटना को बीसीसीआई के रूतबे से जोड़ने की बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखता. और अगर ऐसा है तो विश्व क्रिकेट के हित में इस प्रकार की रुतबेदारी को रोकना चाहिए, चाहे वो किसी भी क्रिकेट बोर्ड की हो. इस खेल का अपना संविधान है जो हर देश पर समान रुप से लागू होना चाहिए. सहवाग की जगह संगकारा होते और रंदीव की जगह अगर भज्जी होते तो भी मैं क्रिकेट में इस प्रकार की हीन-कृत्य की भर्त्सना करता. जीत-हार के लिए नैतिकता तो हर कोई ताक पर रख आता है पर किसी के व्यक्तिगत रिकार्ड के प्रति भी इतनी कलुषित भावना समझ से परे है. क्रिकेट में स्लेजिंग, नस्लवाद जैसी आस्ट्रेलियाई बीमारी अब एशियाई मुल्कों में भी देखने को मिल रही है.

  • 4. 15:30 IST, 19 अगस्त 2010 संदीप शुक्ल :

    यहाँ पर खेल भावना और पैसा दोनों का साथ दिखता है.

  • 5. 16:45 IST, 19 अगस्त 2010 mukesh kumar:

    सूरज रंदीव ने जो किया वह गलत था. अच्छी खबर यह है कि श्रीलंकाई क्रिकेट बोर्ड ने इसके खिलाफ कदम उठाया.

  • 6. 19:04 IST, 19 अगस्त 2010 braj kishore singh:

    मैं समझता हूँ कि जब सूरज ने सहवाग से मिलकर अपनी गलती को मानते हुए माफ़ी मांग ली थी तब उसे दण्डित नहीं किया जाना चाहिए था. उसके साथ जरूरत से ज़्यादा सख्ती की गई. माना कि उसने जो कुछ भी किया वो गलत था लेकिन उसके साथ जो कुछ भी किया गया वह और भी गलत है.

  • 7. 20:22 IST, 19 अगस्त 2010 pramod jain:

    यह बात सही है कि श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड को पैसे की ज़रूरत है. अगर बीसीसीआई खुश रही तो उसे और भी वित्तीय मदद मिलेगी. लेकिन इस मामले को बढ़ा चढ़ा दिया गया.

  • 8. 21:13 IST, 19 अगस्त 2010 सत्यकाम अभिषेक:

    बीसीसीआई काफ़ी पैसे और रूतबे वाला बोर्ड है और इसमें किसी को कोई शक नहीं है. लेकिन क्रिकेट को बेहतर बनाने के लिए कोई कदम उठाया जा रहा है तो उसका दोष भी बीसीसीआई से सिर मढ़ देना सही नहीं होगा. कोई भी खिलाड़ी शतक से एक रन दूर नहीं रहना चाहता है. रंदीव ने दिलशान के उकसावे पर गलती की और उन्हें इसकी सजा मिली. श्रीलंका बोर्ड ने अपने खिलाड़ियों के खिलाफ कार्रवाई करके एक मिसाल कायम की है.

  • 9. 22:33 IST, 19 अगस्त 2010 Abhishek Anand:

    आपने एक उदाहरण देकर बीसीसीआई की पीछे की एक सच्चाई को समझाने की कोशिश की है. आज ऐसे एक नहीं बल्कि तमाम दूसरे उदाहरण हम सबको मिल जायेंगे. यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक क्रिकेट के सबसे मशहूर बोर्ड बीसीसीआई के साथ यह बात जुड़ी हो और साथ ही बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष भी हों. मुझे तो डर इस बात का भी है कि तमाम भारतीय भ्रष्टाचारियों की तरह आईसीसी में भी किसी भारतीय का नाम भ्रष्टाचारी में न जुड़ जाए.

  • 10. 23:11 IST, 19 अगस्त 2010 प्रतीक जैन:

    निश्चय ही यह बीसीसीआई के दबाव में उठाया गया क़दम है।

  • 11. 23:51 IST, 21 अगस्त 2010 sanjay:

    रंदीव ने जो कुछ भी किया वो गलत तो था, लेकिन साथ में यह आज के क्रिकेट का हिस्सा भी है.

  • 12. 00:48 IST, 22 अगस्त 2010 samim khan:

    दिलशान एक अनुभवी खिलाड़ी हैं, बावजूद इसके उसने रंदीव को उकसावा. रंदीव के साथ-साथ दिलशान भी इस मामले में शामिल हो गए.

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