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बराक ओबामा मुसलमान नहीं हैं!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शुक्रवार, 20 अगस्त 2010, 14:33 IST

दुनिया के सबसे ताक़तवर व्यक्ति बराक ओबामा मुसलमान नहीं हैं. अगर अमरीका में हुए एक सर्वेक्षण में शामिल हर पाँच में से एक व्यक्ति ऐसा मानता है तो यह उसकी एक बहुत बड़ी भूल है.

सर्वेक्षण होते रहते हैं और कई बार नतीजे चौंका देने वाले आते हैं.

अकसर लोग पढ़ते हैं और भूल जाते हैं.

लेकिन इस सर्वेक्षण ने जिस तरह अमरीकी अधिकारियों को चौकन्ना किया वह शायद आमतौर पर नहीं होता.

अगर सर्वेक्षण यह होता कि ओबामा सैर-सपाटे के लिए कहाँ जाना पसंद करते हैं, या उन्हें खाने में क्या भाता है, या फिर उनके कुत्ते का नाम क्या है, तो भी उसे दरगुज़र किया जा सकता था.

लेकिन ओबामा और मुसलमान? यह तो हद ही हो गई.

उनके सलाहकारों ने इसे विरोधियों का दुष्प्रचार कहा. इतनी सफ़ाइयाँ दी गईं कि लगने लगा कि जैसे ओबामा का बहुत बड़ा अपमान हुआ हो और यह सब उसकी भरपाई के लिए किया जा रहा है.

प्रशासन की मशक़्क़त को देखकर यह अहसास होने लगा कि अगर मैं अमरीकी मुसलमान होती तो शर्म से पानी-पानी हो गई होती. राष्ट्रपति मेरे मज़हब को मानने वाले कैसे हो सकते हैं. यह तो डूब मरने वाली बात है.

ओबामा ने अभी पिछले हफ़्ते ही इफ़्तार की दावत दी और वहाँ ग्राउंड ज़ीरो के पास बनने वाली मस्जिद का खुल कर समर्थन किया. उन्हें एक क्षण को भी नहीं लगा कि इससे उन पर मुसलमानों का हिमायती होने का ठप्पा लग सकता है.

हालाँकि यह सर्वेक्षण उससे पहले की बात है. बाद में होता तो शायद नतीजे और भी चौंकाने वाले होते.

ओबामा के ऊपर से मुसलमान होने का ठप्पा तो हट जाएगा. लेकिन वे मुसलमान क्या करें जो अमरीका में इस बार खुल कर ईद भी नहीं मना पाएँगे क्योंकि उसकी तारीख़ 11 सितंबर है.

वैसे, अगर इस सब से ऊपर उठ कर सोचा जाए तो सवाल यह भी है कि मुसलमानों को शक की नज़र से देखने या यह मज़हब इतना संवेदनशील मामला होने के लिए असल में ज़िम्मेदार कौन है?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:41 IST, 20 अगस्त 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    आज का जो माहौल है उसके लिए हम चंद सिरफिरे मुसलमानों को ही उसका ज़िम्मेदार मान सकते हैं. क्योंकि चंद लोगों की करनी का फल आज हर मुसलमान भुगत रहा है चाहे वह किसी भी मुल्क का क्यों न हो. आज अगर हम सिर पर टोपी लगा कर निकलते हैं या हमारी माँ-बहनें हिजाब में निकलती हैं तो लोग उन्हें शक की नज़र से देखते हैं. हम किस तरह सुबूत दें कि हम मुल्क के वफ़ादार बाशिंदे हैं. मुझे लगता है कि आज की तारीख़ में मुसलमान होना गाली बन गया है. आज पूरी दुनिया में इस्लाम को बदनाम करने की ज़बरदस्त साज़िश चल रही है. अभी हाल ही में पढ़ा था कि आतंकवाद का शिकार भी ज़्यादातर मुसलमान ही हो रहा है. तो आख़िर इसमें किसकी चाल है?

  • 2. 15:44 IST, 20 अगस्त 2010 Mohd. Muddassir:

    ज़ाहिर सी बात है अमरीका ही ज़िम्मेदार है.

  • 3. 15:58 IST, 20 अगस्त 2010 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    इतनी सफाई दी जा रही है जैसे मुसलमान होना कोई अपराध है और ओबामा पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है. जब ये कहा गया था की ओबामा अपनी जेब में हनुमान की मूर्ति रखते हैं, तब कोई सफाई नहीं दी गयी थी. हमेशा इस्लाम को ही निशाना बनाया जाता है. हिंदू धर्म ग्रंथो में भी युद्ध की प्रेरणा दी गयी है, शस्त्रों की पूजा की जाती है और देवी देवताओं की मूर्तियां शस्त्र धारण किये रहती हैं लेकिन कोई ये नहीं कहता कि इनसे हिंसा की प्रेणना मिलती है. जबकि इस्लाम को हिंसा कि प्रेणना देना वाला प्रचारित किया जा रहा है. इससे लोगों के मन में इस्लाम कि नकारात्मक छवि बन रही है.

  • 4. 16:08 IST, 20 अगस्त 2010 Ismail:

    असली दोषी यहूदी हैं.

  • 5. 16:45 IST, 20 अगस्त 2010 Arvind Agarwal:

    सलमा जी, एक बात आपको यहां बताना चाहूंगा कि अमरीका में ओबामा का मुसलमान होना उतना चिन्ता का विषय नहीं है जितना कि उनका कट्टर ईसाई नहीं होना, क्योंकि अमरीकन लोगों के लिये अमरीकी धर्म ईसाई ही है. दूसरा उदाहरण हैं भारतीय मूल के बाबी जिंदल, जिन्होंने राजनीति को अपना पेशा बनाने के लिये हिन्दू धर्म त्याग कर ईसाई धर्म अपनाया क्योंकि वे ये जानते थे कि लूज़ियाना प्रांत के रूढ़िवादी अमरीकन कभी किसी गैर ईसाई को अपना गवर्नर नहीं चुनेंगे. मैं 13 वर्ष अमरीका में रहा हूं और ओबामा का चुनावी अभियान भी मैंने देखा है, उसमें यही एक खास बात मैंने वहां देखी कि किस तरह पूरे अभियान में एक बार भी ओबामा के मुसलमान होने या कट्टर ईसाई नहीं होने का बड़े पैमाने पर जिक्र तक नहीं आया. वैसे, अगर इस सबसे ऊपर उठ कर सोचा जाए तो सवाल यह भी है कि मुसलमानों को शक की नज़र से देखने या यह मज़हब इतना संवेदनशील मामला होने के लिए असली में ज़िम्मेदार कौन है?

    आपकी हिम्म्त की दाद दूंगा कि मुस्लिम होने के बावजूद भी आपने यह प्रश्न पूछा. इसी संदर्भ में एक और प्रश्न, "ये मुसलमान राष्ट्रपति होने पर ही सवाल क्यूं उठा? उनके काले होने पर क्यों नहीं या आज तक किसी राष्ट्रपति के ईसाई होने पर क्यों नहीं?

  • 6. 16:48 IST, 20 अगस्त 2010 Harish Chandra Nainwal:

    सलमा जी, सवाल यह नहीं है कि ओबामा मुसलमान हैं या नहीं हैं. खास बात है कि वे एक महान देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और उन्होंने सभी धर्मों को समान हक़ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अमरीका के मुसलमान वहां के विकास के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. सो, ज़रूरी है कि हर किसी का सम्मान किया जाए और हर किसी को बराबरी का हक़ मिले.

  • 7. 17:01 IST, 20 अगस्त 2010 Ibrahim kumbhar pakistan :

    सलमा जी, ये सच है कि अमरीका में 11 सितंबर के बाद के हालात मुसलमानों के लिए बेहतर नहीं रहे, लेकिन सच तो ये भी है कि इस तरह के सर्वेक्षण को ही अंतिम नहीं माना जाए. बराक ओबामा मुसलमान हैं कि नहीं लेकिन इस तरह के सर्वेक्षण का इस समय आना कुछ गड़बड़ ज़रुर लगता है. ओबामा ने तो शायद अपना पद संभालने से पहले ही बता दिया था कि वो मुसलमान नहीं हैं, बल्कि उनका कहना था कि उनके पिता मुसलमान हैं. ये बात भी ज़ेहन में रखनी चाहिए कि धर्म हर एक का निजी मामला है. किसी भी हालत में किसी पर धर्म थोपने की इजाज़त नहीं है, दुनिया का कोई धर्म इसकी इजाज़त भी नहीं देता.
    ओबामा के मुसलमान होने से क्या फर्क़ पड़ जाता अगर वो खुले आम ये भी कह देते तो क्या अमरीका में मुसलमानों की हालत बदल जाती.

  • 8. 17:17 IST, 20 अगस्त 2010 rahis saifi:

    मोहम्मद अतहर खान से मैं बिल्कुल सहमत हूँ. ये सब एक साजिश के अनुसार हो रहा है, एक खास मजहब के खिलाफ. इस्लाम के बारें में दुनिया भर में काफ़ी गलत बातें फैलायी गईं हैं.

  • 9. 18:21 IST, 20 अगस्त 2010 Jitender:

    धर्म का उद्देश्य विध्वंश बिल्कुल ही नहीं होना चाहिए. धर्म जोड़ता है न कि लोगों को तोड़ता है. आप जिस देश में रहें, उसके प्रति देशभक्ति दिखाएं, न कि धर्म के आधार पर फूट की बुनियाद बनें.

  • 10. 18:23 IST, 20 अगस्त 2010 संजीव द्विवेदी :

    इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि कौन व्यक्ति किस जाति का है. मतलब इस बात से है कि वो कैसा काम कर रहा है देश के लिए. तो फिर इस बात से क्या मतलब है कि बराक ओबामा मुसलमान हैं. ये तो एक सर्वे है जो कि हर किसी भी जगह होता है. ये सब बेकार की बातें हैं कि बराक ओबामा मुसलमान हैं.

  • 11. 19:32 IST, 20 अगस्त 2010 Devendra:

    इसके लिए कई मुसलमान देश ही जिम्मेदार हैं. पड़ोसी देश पाकिस्तान की ही मिसाल लें. आजादी के बाद वहां के संस्थापकों ने घोषणा की कि वह एक धर्म निरपेक्ष देश होगा. लेकिन कुछ समय के भीतर ही उसने खुद को इस्लामिक रिपब्लिक घोषित कर दिया. और कुछ समय के भीतर ही दसियों लाख गैर मुसलमान वहां से लगभग अदृश्य हो गए.

  • 12. 20:52 IST, 20 अगस्त 2010 michale:

    सलमा जी,
    अच्छा हुआ कि आपने यह बात छेड़ी. अगर मुसलमान को छोड़कर कोई और इसे छेड़ता तो इस्लाम खतरे में आ जाता. असल बात यह है कि मुसलमान को हमेशा पढ़ाया जाता है कि असली कानून तो इस्लाम ही है. सऊदी अरब जैसे देश में तो आप दूसरा कोई धर्मग्रंथ भी लेकर जा नहीं सकते. अधिकतर इस्लामी देश फौजी शासनवाले हैं. क्या आपको अपने अंदर झांकने की जरूरत नहीं है?

  • 13. 00:56 IST, 21 अगस्त 2010 गुंजन:

    आपकी लेखनी का व्यंग्य तो समझ में आया पर ये समझ में नहीं आया कि आप क्यों उस जमात में शामिल हो रही हैं जो मुसलमानों को पूरी दुनिया में सताए हुए की तरह बताते फिर रहे हैं.

  • 14. 11:00 IST, 21 अगस्त 2010 himmat singh bhati:

    जनता की ओर से चुना गया कोई भी प्रतिनिधि जब सम्मानित पद पर बैठता है तो उसके लिए लोगों का कल्याण करना ज़्यादा अहम हो जाता है, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो.

  • 15. 13:41 IST, 21 अगस्त 2010 Pitamber:

    यह सब कुछ मानव की सोच और समझ पर निर्भर करता है.

  • 16. 13:45 IST, 21 अगस्त 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, काफ़ी शानदार लिखा है आपने. कुछ स्वार्थी तत्वों ने इस कौम के प्रति नफ़रत को बढ़ावा दिया है और उनको काफ़ी हद तक कामयाबी भी मिली है. सच्चाई यह है कि किसी भी इंसान का मजहब इंसानियत होनी चाहिए, जो अब नहीं है.

  • 17. 14:49 IST, 21 अगस्त 2010 mohd. sekh:

    सलमा जी, इसके लिए दोषी खुद मुसलमान है. जहां भी विस्फोट होता है, या आतंकवादी घटना होती है, उसमें मुसलमान का नाम सामने आता है. हमारी कौम इतनी बदनाम हो चुकी है कि किसी और को दोष नहीं दे सकते.

  • 18. 17:38 IST, 21 अगस्त 2010 braj kishore singh:

    यह घटना पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की पोल खोलने के लिए काफी है. इससे साबित होता है कि अमरीकी धर्मनिरपेक्षता सतही है. भारत में आज एक अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री हैं और उन्हें इसके लिए कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ा. एक नहीं कई-कई मुस्लिम हमारे देश के राष्ट्रपति हो चुके हैं और इससे इस पद का सम्मान और गरिमा बढ़ी है.

  • 19. 17:42 IST, 21 अगस्त 2010 Dr.Lal Ratnakar:

    सलमा जी, ओबामा ही नहीं हर चतुर राजनेता की जाति, धर्म संप्रदाय नहीं होता, यह सब आमजन का होता है,(जाति न पूछो राजा की). सर्वे कराने वाले क्या बताना चाहते हैं वह तो आपको भी पता है. ओबामा के माध्यम से अमरीका कहना चाहता है कि उसे मुसलमान से नफ़रत नहीं है. हिंदुस्तान में "दलितों की दशा" से तो आप वाकिफ ही है, उत्तर प्रदेश में दलितों की महारानी किसके कन्धों पर बैठी है. जब 'अवसर' आएगा कंधे झटक लेंगे. कहीं ऐसी ही तैयारी अमरीका में तो नहीं?

  • 20. 18:23 IST, 21 अगस्त 2010 rajinder singh kasail :

    इंसान को धर्म नहीं कर्म से पहचानना चाहिए.

  • 21. 18:52 IST, 21 अगस्त 2010 Devesh:

    कोई किसी धर्म का हो उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन ख़ास बात ये है कि उसको देश के हित में काम करना चाहिए. रही बात मुसलमानों को शक की निगाह से देखने की तो कुछ सालों से जहाँ कहीं भी चरमपंथी घटनाएं होती है, तो मुस्लिम लोग किसी ना किसी रूप में लिप्त पाए जाते हैं. जब कि सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं. इसके लिए आम मुसलमान ज़िम्मेदार नहीं हैं. ख़ास बात ये है की कभी कभी आम मुसलमान भी अतिवादी मुस्लिम संगठनों की चपेट में आ जाते हैं.

  • 22. 03:45 IST, 22 अगस्त 2010 gyan:

    मैं बताना चाहता हूं कि बॉबी जिंदल ने राजनीति के लिए अपना धर्म नहीं छोड़ा था. इसकी जानकारी विकीपीडिया से ले सकते हैं. जिंदल एक हिंदू परिवार में पैदा हुए थे. जब वे हाई स्कूल में थे तभी इन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था.

  • 23. 12:07 IST, 22 अगस्त 2010 Asif Khan:

    ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो!

  • 24. 19:54 IST, 22 अगस्त 2010 यूसुफ किरमानी:

    यकीनन आपने जिन बातों की तरफ इशारा किया है, उन पर इस कम्युनिटी को सोचना ही चाहिए। लेकिन अमेरिका में काफी कुछ सोची समझी रणनीति के तहत काफी कुछ किया जाता है। ओबामा अगर मुसलमान होते तो क्या अमेरिका की नीतियां मिडिल ईस्ट के लिए बदल जातीं, शायद नहीं।

  • 25. 20:23 IST, 22 अगस्त 2010 Vijay:

    ऐसा क्यों है कि मुसलमान लोग गरीबी और अशिक्षा को दूर करने के बजाय दुनिया के मामलों में अधिक रूचि दिखाते हैं?

  • 26. 21:18 IST, 25 अगस्त 2010 sonam jha:

    यह तो हद है.

  • 27. 20:49 IST, 29 अगस्त 2010 madhulika khan:

    मैं कहूंगा कि हमारे समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग ही इसके लिए जिम्मेदार है. सोचिए वे कौन लोग हैं, जो हर रोज बेतुके फतवे जारी करते हैं. क्या वे कथित विद्वान लोग नहीं है. हमारे समाज के पढ़े- लिखे लोग ही हमारे समाज को पीछे ले जाने और उसे कट्टर बनाने के लिए जिम्मेदार हैं. पता नहीं क्यों पढ़े-लिखे और विद्वान लोग हमेशा कट्टरपंथी भावना को बढ़ावा देते हैं.

  • 28. 13:23 IST, 02 सितम्बर 2010 simran khanna:

    ऐसा क्यूं होता है कि किसी एक को उसके धर्म के पर समाज से अलग किया जाता है?

  • 29. 17:19 IST, 02 सितम्बर 2010 rahul kumar sada:

    सलमा जी,क्यों पढ़े-लिखे और विद्वान लोग हमेशा कट्टरपंथी भावना को बढ़ावा देते हैं.

  • 30. 00:15 IST, 03 सितम्बर 2010 sahar ahmed:

    जो व्यक्ति अमरीका का प्रेसिडेंट है उसका तो कोई मज़हब ही नहीं होना चाहिए, उसके लिए तो सारे धर्म बराबर हैं जैसा कि ओबामा के व्यक्तित्व में देखा गया है. वो जेब में हनुमान चालीसा भी लेकर चलते हैं तो इफ्तार भी करवाते हैं, वही ईसाई धर्म को भी मानते हैं. ऐसे व्यक्ति का इस तरह का सर्वेक्षण ही गलत है.

  • 31. 20:21 IST, 06 सितम्बर 2010 RAKESH RANJAN VERMA:

    मैं समझता हूँ कि मुसलमानों को दुनिया में पाकिस्तान की वजह से लोग नापसंद करते हैं, उनसे घृणा करते हैं. इस देश में चरमपंथ फल-फूल रहा है. दूसरे देशों से आए चरमपंथियों की शरण स्थली भी पाकिस्तान है.

  • 32. 16:28 IST, 19 जनवरी 2011 ARSH:

    नेताओं का कोई ईमान धर्म नहीं होता है.

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