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एक पत्र पीएम के नाम

सुशील झासुशील झा|रविवार, 22 अगस्त 2010, 07:39 IST

माननीय प्रधानमंत्री जी,

मेरा नाम xyz है. संघ लोक सेवा आयोग में इस वर्ष मेरा भी चयन हुआ है. रिज़ल्ट देखकर मेरे मां पिता दोस्त सभी खुश हुए. मैं भी लेकिन जब से मुझे ट्रेनिंग का पत्र मिला है मेरी खुशी क़ाफूर नहीं तो कम से कम आधी हो गई है.

इसमें ट्रेनिंग के लिए ज़रुरी सामानों की एक सूची है. दो सूट, एक कोट, जूते, सूटकेस इत्यादि इत्यादि..कुल मिलाकर सस्ता भी हो तो इसकी क़ीमत तकरीब 35 हज़ार रुपए से कम नहीं बैठती है. इसके अलावा एक महीने का खर्च भी लेकर जाना है. खाने के पैसे भी पहले देने है क्योंकि वेतन ट्रेनिंग शुरु होने के अगले महीने मिलता है.

मैंने दोस्तों से उधार लेकर यह पैसा जमा किया है क्योंकि मेरे पास एकमुश्त इतनी बड़ी राशि नहीं थी.

मेरे जैसे कई और लोग होंगे जिनके पास इतने पैसे नहीं होंगे. हां ऐसे भी होंगे जिनके लिए ये राशि कोई मायने नहीं रखती है.

मैं पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा हूं और ट्यूशन के ज़रिए अपनी आजीविका चलाता हूं. मैंने यूपीएससी के लिए कोई कोचिंग सिर्फ़ इसलिए नहीं की क्योंकि वो बहुत मंहगी होती है.

नौकरशाह बनने की मेरी इच्छा कभी नहीं रही. मै आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करके लेक्चरर बनना चाहता था और ये चाहत अभी भी है.

मेरे माता पिता चाहते थे कि मैं आईएएस बनूं. क्योंकि बिहार के हज़ारों मां बाप की तरह उनका भी सपना था कि उनका बेटा बड़ा अधिकारी बने. मैंने आयोग की परीक्षा सिर्फ़ इसलिए दी ताकि मेरे मां पिता बाद में पढ़ाई के मेरे फ़ैसले को मानें.

लेकिन इससे मेरे जैसे ग़रीब छात्रों की समस्या सुलझ नहीं जाती है. मेरे दोस्तों ने मेरी समस्या सुलझा दी लेकिन न जाने कितने ऐसे होंगे जिनकी क़िस्मत में ऐसे दोस्त नहीं होंगे.

प्रधानमंत्री जी...मैं बस ये कहना चाहता हूं कि भारत जैसे देश में ये क्यों ज़रुरी है कि एक नौकरशाह कोट टाई और ब्लेज़र पहन कर ही क्लास करने के लिए जाए.. क्या इस मानसिकता को नहीं बदला जा सकता कि कोट और टाई सभ्य होने की निशानी है. क्या शर्ट और पैंट पहनने वाला सभ्य नहीं हो सकता है.

क्यों नौकरशाहों को एक बने हुए सांचे में ढालने की कोशिश की जाती है ताकि वो तथाकथित रुप से अभिजात हो जाएं.जब देश की अधिसंख्य जनता ग़रीब है तो क्या नौकरशाह ऐसा न हो जो सिर्फ़ गरीबी उन्मूलन की योजना न बनाए बल्कि ग़रीबी के दर्द को समझे भी.

बस मैं इतना ही कहना चाहता हूं. मैं जानता हूं कि मेरी एक चिट्ठी से व्यवस्था नहीं बदलेगी लेकिन मैंने कहीं पढ़ा था ...

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

आपका ही...xyz

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:06 IST, 22 अगस्त 2010 Abhishek Anand:

    सुशील जी, क्या लिखा है आपने. सामान्य सी बात को ही आपने बीबीसी ब्लॉग पर अपने अंदाज में रखा, बहुत अच्छा लगा. पर अफसोस इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है किसी को.

  • 2. 02:18 IST, 23 अगस्त 2010 imran:

    जनाब आपने बिल्कुल सही लिखा है. पुरानी कहावत है कि बूंद बूंद से ही घड़ा भरता है और आप जैसे लोगों के छोटे छोटे प्रयासों से ही व्यवस्था बदलेगी.

  • 3. 09:47 IST, 23 अगस्त 2010 Deep narayan mitra:

    सुशील जी, आपने बिलकुल सही लिखा है. मेरा भी मानना है कि इंसान को सभ्य दिखने के लिए कोट-टाई पहनना जरूरी नहीं है. आशा है किसी आला नेता कि नज़र इस ब्लॉग पर पड़ेगी और आपकी बातों पर गौर किया जाएगा.

  • 4. 11:19 IST, 23 अगस्त 2010 Amit Kumar:

    सही कहते हैं कि चाहो तो क्या नहीं हो सकता. हर मंजिल को पाया जा सकता है और शुरूआत को छोटे से ही होती है.

  • 5. 12:05 IST, 23 अगस्त 2010 Amit Kumar Jha, Gandhi Vihar, New Delhi:

    नौकरशाह ऐसा हो जो सिर्फ़ गरीबी उन्मूलन की योजना न बनाए बल्कि ग़रीबी के दर्द को समझे भी, सुशीलजी आपके ब्लॉग की यह पंच लाइन काफी कुछ कह गई. वाकई अगर देश का समुचित विकास करना है, जिसका रास्ता गांवों और गरीबों से होकर गुजरता है. तो क्यों नहीं प्रशासक वर्ग अपने को उस ग्रामीण जनता से जोड़ने की कोशिश करते हैं?

  • 6. 14:38 IST, 23 अगस्त 2010 avishek kumar:

    सुशील जी, आपने बिलकुल ठीक लिखा है.

  • 7. 15:30 IST, 23 अगस्त 2010 ashutosh pandey:

    सुशील भाई, जो आपने लिखा है बिलकुल ठीक लिखा है. लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि इसका पालन कितने लोग करते हैं. भारत में नौकरशाहों का दबदबा हर तरफ दिखता है.

  • 8. 16:35 IST, 23 अगस्त 2010 pawan:

    सुशील जी, बिलकुल सही बात है. हम आपसे सहमत हैं.

  • 9. 17:45 IST, 23 अगस्त 2010 prince:

    बहुत ख़ूब सुशील जी, बिलकुल सही लिखा है आपने.

  • 10. 17:50 IST, 23 अगस्त 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सुशील जी, बहुत शानदार लिखा है लेकिन क्या बिहारी माँ-बाप का सपना सिर्फ यही है? ये सोच ग़लत है.

  • 11. 17:58 IST, 23 अगस्त 2010 Shailesh Jha:

    आपने जो लिखा वो सही है. भारत में ग़रीबी की वजह से कई प्रतिभावान छात्र पिछड़ जाते हैं. हमें आशा करनी चाहिए कि एक दिन पूरी व्यवस्था में बदलाव होगा और सभी को समान अवसर मिलेगा.

  • 12. 20:03 IST, 23 अगस्त 2010 himmat singh bhati :

    सुशील जी, ये बात महामहिम तक पहुँचे तब ना. मैं भी महामहिम और कई मंत्रियों को पत्र लिख चुका है लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.

  • 13. 21:20 IST, 23 अगस्त 2010 सत्यकाम अभिषेक :

    सुशील जी, सबसे पहले आपके उस xyz काबिल मित्र को बहुत बधाई हो. लेकिन मुझे लगता है गरीबी को अभिशाप के तौर पर नहीं परोसना चाहिए. न जाने ऐसे कितने लोग हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद सफलता के झंडे गाड़े हैं. आपके मित्र भी उसी में शामिल हैं. वैसे भी जब आप अधिकारी बनते हैं तो आपसे कुछ डेकोरम मेंटेन करने की उम्मीद की जाती है. यूपीएससी के इंटरव्यू में भी ड्रेस कोड होता है. वहां कोई आपसे से यह नहीं पूछता है कि आप गरीब है कि अमीर हैं. यूपीएससी परीक्षा में बैठने वाले लगभग सभी अभ्यर्थियों को यह पता होता है कि अंतिम रूप से सफल होने के बाद उन्हें क्या पहनना होगा. वैसे भी कोई भी यह नहीं कहता कि पदस्थापन होने के बाद भी आप कोट टाई पहने. लेकिन अगर ट्रेनिंग के दौरान आपको कुछ दिन के लिए यह पहनना भी पड़ता है तो इसमें किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए. आप छोटे से स्कूल में जब बच्चे को एडमिशन दिलाते हैं तो वहां भी स्कूल का ड्रेस कोड होता है और माता पिता खुशी खुशी अपने बच्चों के लिए ड्रेस खरीदते हैं. आईआईएम, आईआईटी और अन्य बड़े संस्थानों में भी खास समारोह के लिए ड्रेस कोड होता है. मुझे लगता है कि इस मुद्दे को बेवजह तूल देने की जरूरत नहीं है. अखिल भारतीय सेवा में चुना जाना अपने आप में बड़ी बात होती है. यहां मैं लोक प्रशासन और उसकी खामियों को परे रखकर बात कर रहा हूं. आपके मित्र जब ट्रेनिंग करके निकलेंगे तो उनके पास काफी पावर और अमला होगा. तब उन्हें अपनी बातों को लागू करने की कोशिश करनी चाहिए. वैसे भी छठे वेतनमान लागू होने के बाद अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की सैलरी काफी बढ़ गई है. लेकिन ड्रेस कोड को लेकर इतनी हायतौबा मचाना मुझे तो उचित नहीं लगता है.

  • 14. 22:31 IST, 23 अगस्त 2010 kaushal kishor singh:

    सुशील जी, मैं उम्मीद करता हूँ कि आपकी ये सोच नौकरी करते समय भी बनी रहेगी.

  • 15. 22:32 IST, 23 अगस्त 2010 shyam kr. sinha:

    ये पत्र व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाता है, ये सरकारी मानसिकता पर प्रश्नचिह्न है.

  • 16. 23:28 IST, 23 अगस्त 2010 abhishek khare:

    बहुत सही लिखा है आपने.

  • 17. 01:11 IST, 24 अगस्त 2010 kanchan:

    ये कोई नई बात नहीं है. हमारी सरकार हमेशा दिखावा करती है.

  • 18. 03:53 IST, 24 अगस्त 2010 Serweshwer Mathur:

    मैं समझता हूँ कि भारत को यदि विकसित देश की श्रेणी में शामिल होना है तो प्रशासनिक सेवा को ख़त्म कर देना चाहिए.

  • 19. 03:56 IST, 24 अगस्त 2010 MUZZAMMIL HAYAT:

    ऐसा नहीं है कि देश में ईमानदार अफसर या राजनेता नहीं है. लेकर भ्रष्ट व्यवस्था के सामने वे मजबूर हो जाते हैं. उन्हें अपने जी जान के खातिर खुद को इसी व्यवस्था के हवाले करना पड़ता है.

  • 20. 04:40 IST, 24 अगस्त 2010 AAMIR:

    हमें यह व्यवस्था बदलनी होगी. खुद को बदलना होगा.

  • 21. 04:56 IST, 24 अगस्त 2010 Sandeep Singh:

    इस सवाल को उठाने के लिए शुक्रिया. यूपी-बिहार के कई लोग प्रशासनिक सेवा में जाने की कोशिश कर रहे हैं पर कितने लोग सफल होते हैं. ऐसे में जो लोग इस परीक्षा में सफल नहीं हो पाते उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाती है. बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग इससे अलग क्यों नहीं सोच पाते. इस बारे में भी विचार की जानी चाहिए.

  • 22. 08:13 IST, 24 अगस्त 2010 Rajeev Ranjan Prasad:

    आशा है यूपीएससी प्रशासन इस बात को गंभीरता से लेगी. आईआईटी में गरीब लड़के पढ़ ले रहे हैं. यूपीएससी यह दोहरा मापदण्ड क्यों अपनाए है? उम्मीद है, आपके संवेदनशील पोस्ट से व्यवस्था बदलेगी.

  • 23. 09:29 IST, 24 अगस्त 2010 aniruddh dwivedi:

    मैंने ये पत्र प्रधानमंत्री को भेज दिया है.

  • 24. 12:12 IST, 24 अगस्त 2010 Abhay Singh:

    सुशील जी, कड़वी बात कह दी है आपने यह बात उन लोगों को नहीं पचेगी जो इस तथाकथित आभिजात्य वर्ग की इस मानसिकता को ढो रहे हैं. मुझे नहीं पता कि प्रधानमंत्री तक ये बात पहुँची या नहीं. बस मैं ये जानना चाहूँगा कि क्या हमारे प्रधानमंत्री जी हिंदी पढ़ते हैं?

  • 25. 12:59 IST, 24 अगस्त 2010 Suhail Allahabad:

    सुशील जी आपने जो भी लिखा है उससे मैं ज़रा भी सहमत नहीं हूँ.ठीक है सिर्फ कपड़ों से ही सभ्यता की पहचान नहीं होती. लेकिन अब उसका ये भी मतलब नहीं है की इस तरह के गरिमामय पद के लिए हम कैसे भी कपडे पहन ले. लिबास पहन के भी गरीबों के बारें में सोचा जा सकता है. और इसमें कोई बुराई नहीं है. और आज के दिन में 35 हज़ार रुपयों की व्यवस्था करना इतनी बड़ी बात नहीं है उसके लिए जिसने इस पद के लिए अपनी काबिलियत साबित की हो.

  • 26. 13:34 IST, 24 अगस्त 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    अगर ये व्यवस्था बदल भी दी जाए तो भी कुछ ख़ास बदलने वाला नहीं. क्योंकि कुछ विशेष राज्यों से थोक के हिसाब से संघ लोक सेवा आयोग द्वारा नौकरशाह बनते हैं और ये ज्यादातर गरीब घरों से ही आते हैं. लेकिन देखने में यह आया है कि इन राज्यों में गरीबी जस के तस बनी हुई है? तो क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि कुछ नौकरशाहों को छोड़कर बाकी सब अपना अतीत भूलकर कुर्सी और ताकत के मद में खो जाते हैं? आपका सवाल बिलकुल वाजिब है? हम अभी तक भी अपनी व्यवस्था के प्रति न्यायपूर्ण रवैया नहीं अपनाते हैं.

  • 27. 20:14 IST, 24 अगस्त 2010 PRACHI:

    मैं बस्तर में पल बढ़ कर अब अमरीका में काम करता हूं. कलेक्टर कमीशनर जो टाई सूट पहन कर गांव का दौरा करते थे तो वो मुझे हमेशा लोगों से दूर लगते थे. कभी नहीं लगा कि वो मिट्टी से जुड़ पा रहे हैं. कैसे हो सकता है भूखे नंगे लोगों को समझना सूट टाई में बंद होकर...

  • 28. 08:46 IST, 25 अगस्त 2010 Prashant sengar:

    मैं इस बात से बिलकुल सहमत नहीं हूँ कि केवल कोट-पैंट वाले ही सभ्य होते हैं.

  • 29. 20:48 IST, 25 अगस्त 2010 Dr.Lal Ratnakar:

    मूलतः जिस बात से तकलीफ आपके आईएएस.दोस्त को है, वह है गुलामों का लिबास जिसमें शासक होने की बू आती है जबकि उनका मकसद जनसेवा का है 'प्रशासनिक सेवा' भारतीय लिबास में भी हो सकती है, जब इस देश का गृह मंत्री 'लुंगी और कमीज़' पहन सकता है तो बिहार का एक 'गरीब नौजवान प्रशासनिक सेवा की ट्रेनिंग' अंग्रेजी लिबास में क्यों करे, यह हिम्मत भी बिहार का ही 'नौजवान' वह भी जो अपनी पूरी पढ़ाई ट्यूशन पढ़ाकर की हो, बिना किसी कोचिंग के आईएएस बना हो कर सकता है, उसी में तो आत्मसम्मान होगा और राष्ट्र सम्मान भी. आशा है सुशील जी यह एक्सवाईजेड जीवन में इस संकल्प को भूलेगा नहीं. उनके इस आत्मसम्मान और राष्ट्र की गरिमा को बनाए रखने की हिम्मत बची रहे.

  • 30. 01:59 IST, 26 अगस्त 2010 Farid Ahmad khan :

    अच्छा लिखा है. कोशिश होनी चाहिए. व्यवस्था बदल सकती है.

  • 31. 17:42 IST, 27 अगस्त 2010 Gurmender Singh:

    ये ब्लॉग बहुत ही अच्छा है. पूरी कहानी बिलकुल सही हैं. बहुत से विद्यार्थी ऐसे भी हैं जो ग़रीबी के कारण अध्ययन नहीं कर पाते हैं

  • 32. 21:14 IST, 07 सितम्बर 2010 Anupam Singh:

    सुशील जी, आपकी चिंता बहुत जायज है.

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