मनमोहन सिंह नेताओं के नेता, लेकिन क्यों?
पिछले दिनों खुशवंत सिंह ने अपनी नई किताब में मनमोहन सिंह को भारत का महानतम प्रधानमंत्री क़रार दिया, नेहरू से भी महान.
और तो और जानी मानी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका-न्यूज़वीक ने भी लिखा कि वे नेताओं के नेता हैं. जिन्हें दुनिया के नेता सबसे ज्यादा पसंद करते हैं. उनकी ख़ूबियाँ गिनाई गईं कि वौ सौम्य और शांत हैं, ईमानदार हैं और भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने में उनका ख़ासा योगदान है.
लेकिन अब इसको दूसरे नज़रिए से भी देखिए. प्रधानमंत्री के रूप में उनके पद का तकाज़ा है कि भारत को बेहतर बनाने के लिए उनमें कुछ अलोकप्रिय फ़ैसले लेने की हिम्मत भी होनी चाहिए. निस्संदेह मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ख़ूबियाँ अपनी जगह हैं, लेकिन इससे भारत को कहाँ तक फ़ायदा पहुँचा है?
मज़े की बात ये है कि न्यूज़वीक के ही एक और सर्वेक्षण में भारत को दुनिया के बेहतरीन देशों की सूची में 78वीं पायदान पर रखा गया है.
छह साल तक लगातार प्रधानमंत्री रहने के बावजूद भारत की बेहतरी के मुहिम में उनके योगदान को साधारण ही कहा जा सकता है.
खाने की चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं. दो साल तक शांत रहने के बाद कश्मीर एक बार फिर पुराने दिनों की तरफ़ लौट चुका है. माओवादी क़हर बरपा कर रहे हैं.
राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले के कीचड़ की छीटें थोड़ा-बहुत मनमोहन सिंह पर भी पड़ी हैं- इसलिए नहीं कि वे ईमानदार नही हैं बल्कि इसलिए कि वो भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं.
मनमोहन सिंह के समर्थक ये कहते नहीं थकते कि भारत को बाज़ार अर्थव्यवस्था बनाने का श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है. लेकनि यह 20 साल पहले हुआ था वो भी एक ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जिसमें अलोकप्रिय फ़ैसले लेने की हिम्मत थी.
आज कांग्रेस में उन्हीं नरसिम्हा राव को बदनाम करने की होड़ सी लगी हुई है.
मनमोहन सिंह को ये अहसास होना चाहिए कि वो अपनी पिछली उपलब्धियों को हमेशा तो नहीं भुना सकते. उनकी सबसे बड़ी विफलता ये है कि नए आर्थिक सुधारों की तरफ़ उन्होंने कोई नया क़दम नहीं बढ़ाया है.
आख़िर दुनिया भर के नेता उनकी किस अदा पर फ़िदा हैं कि उन्हें 'लीडर ऑफ़ द लीडर्स' कहा जा रहा है?
उनकी नेहरु जैकेट पर...या उनकी क़रीने से बंधी आसमानी पगड़ी पर...या फिर उनके एक मील लंबे सीवी पर?
क्या इन लोगों को पता है कि मनमोहन सिंह चार साल में एक बार तो संवाददाता सम्मेलन बुलाते हैं और वहाँ पर जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं तो कहते हैं कि मैं इस पर अभी टिप्पणी नहीं कर सकता.
क्या ये विश्व नेता उनकी इस बात पर क़ायल हैं कि कि वो प्रधानमंत्री कार्यालय का हर काम प्रणव मुखर्जी और उनके पचासियों 'मंत्रियों के समूह' को आउटसोर्स कर देते हैं?
क्या उन्हें ये बात पसंद आई है कि उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार जो कि भारत है उनके लिए खोल दिया है?
शायद उनको ये बात भी जँची है कि मनमोहन सिंह ये सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि परमाणु दुर्घटना होने पर उनकी कंपनियों को मुआवज़े के रुप में अरबों रुपए न देने पड़ें!!!

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इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री जी एक पढ़े-लिखे इंसान हैं. उनके पास भारत के लिए अच्छे विचार हैं. उनके पास काम का अच्छा रिकॉर्ड है. वे लेकिन एक अरब 30 करोड़ लोगों और सांस्कृतिक विविधता वाले देश को चला भी रहे हैं. हम अपने पड़ोसी देशों को देखें तो चीन 2020 तक अमरीका को पछाड़ कर सुपर पॉवर बनने जा रहा है. यह दिखाता है कि भारत को एक योग्य और ऊर्जावान प्रधानमंत्री की ज़रूरत है.
जब किसी से कोई काम निकलवाना हो तो उसे चने के झाड़ पर चढ़ा दो...यहाँ यही हो रहा है.
मनमोहन सिंह काबिल हैं, लोकप्रिय हैं या उनका विरोध नहीं होता इसमें उनकी कोई महानता नहीं है, क्योंकि जो देश में होता है सभी उसका ज़िम्मेदार सोनिया गाँधी जी को मानते हैं और उन्हीं का विरोध भी करते हैं. मनमोहन सिंह साफ़ बच जाते हैं. जब वो बॉस हैं ही नहीं तो उनका विरोध क्यों होगा.
मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. अपनी क़लम की ताक़त बनाए रखिए.
इसमें समस्या क्या है...जब कोई अच्छा काम करता है तो लोगों को तकलीफ़ होती है. इज़्ज़त नहीं दे सकते तो छींटाकशी क्यों...किसी का नाम हो रहा है तो तकलीफ़ हो रही है. तुमने क्या किया देश के लिए...इसलिए चुप रहो...
बेहद सटीक टिप्पणी के लिए धन्यवाद. मनमोहन भारत की मज़बूरी के प्रधानमंत्री हैं. वे एक कुशल अर्थशास्त्री हैं लेकिन एक अयोग्य राजनीतिज्ञ और उससे भी अयोग्य मैनेज़र हैं. मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री बनना बिल्ली के भाग्य से छींका फूटने जैसा ही है. उनमें नेताओं वाली योग्यता नहीं है. हिंदी बोलने में उन्हें उतनी ही तकलीफ होती है जितनी की देश चलाने में. अच्छा होता कि उनकी जगह कोई और नेता आगे आता. मनमोहन सिंह निसंदेह एक ईमानदार इंसान हैं लेकिन इसके साथ-साथ उन्हें एक कुशल वक्ता और राजनीतिज्ञ होने की भी ज़रूरत थी. अगर प्रधानमंत्री बन सकने वाले नेताओं की सूची में से मनमोहन सिंह का नाम निकाल दिया जाए तो मुझे प्रधानमंत्री पद के लिए कोई और उपयुक्त व्यक्ति नज़र नहीं आ रहा है. इसलिए मुझे लगता है कि ऐसे में मनमोहन सिंह ही ठीक हैं.
रेहान जी, मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. वह कॉंग्रेस की कठपुतली की तरह हैं. हर फ़ैसला या तो मैडम करती हैं या चंद वरिष्ठ नेता जैसे प्रणब जी.
आपकी बात बिलकुल सही है।
रेहान साहब, आपने यह ब्लॉग लिख कर बहुत बढ़िया काम किया है. मैंने डॉक्टर मनमोहन सिंह का भारत के प्रधानमंत्री के रूप में इससे अच्छा आलोचनात्मक विश्लेषण और कहीं नहीं पढ़ा. इससे मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि भारत में 1990 की आर्थिक क्रांति के पीछे कौन था--पीवी नरसिम्हा राव या मनमोहन सिंह. बहुत बढ़िया. लिखते रहिए.
मनमोहन सिंह जी, साफ़-सुथरे और सुलझे हुए इंसान हैं. लेकिन आज देश को कठोर निर्णय लेने वाले प्रधानमंत्री की ज़रूरत है. मनमोहन सिंह जी कि सोनिया गांधी के पीछे रहने की मजबूरी है नहीं तो उनका भी नरसिंहा राव वाला हाल हो जाएगा.
हाथी के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं. कांग्रेस भी कुछ इसी तरह से सत्ता में बैठी हुई है. उसके दिखाने वाले दाँत हमारे प्रधानमंत्री हैं और खाने वाले दाँत तो अनगिनत हैं जिसे गिन पाना और लिख पाना शायद संभव नहीं है. हमारे प्रधानमंत्री अच्छे इंसान हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन अच्छे इंसान पर भी संगति का असर पड़ता है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है. अच्छे इंसान का काम ग़लती न करना और ग़लत करने वालों को सज़ा देना होता है. लेकिन वे अपने केवल एक फर्ज को निभाने के ज्यदा इच्छुक नज़र आ रहे हैं.
मैं मनमोहन सिंह के बारे में आपके विचारों से सहमत नहीं हूँ. आप किसी में भी बुराई खोज सकते हैं क्योंकि कोई भी इंसान पूरी तरह शुद्ध नहीं होता है. उनका प्रदर्शन अच्छा है. वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था ठीक से काम कर रही है. कोई भी नेता देश को नंबर एक नहीं बना सकता है. यह तो उस देश के नागरिक होते हैं जो उसे नंबर एक बनाते हैं और इसमें काफ़ी समय लगता है. अमरीका और अन्य देश भारत को कुछ भी मुफ्त में नहीं दे रहे हैं. देश की हर पार्टियों की राजनीतिक मज़बूरी है. इसलिए केवल मनमोहन सिंह को ही दोष क्यों दिया जा रहा है.
बस यूँ ही इस लेख को पढ़ा. मुझको यह अहसास नहीं था की मेरे दिल की बात लेखक ने पढ़ कर लिख दी. वह भी इतनी सटीक की मैं पहली बार टिपण्णी लिख रहा हूँ. यह सत्य है जो लिखा गया है.
सन 1990 में एक ने थप्पड़ मारा तो एक ने सहलाया है. बाकी बात रही विकास की तो अगर हिंदुस्तान में किसी ने विकास किया है तो वे हैं अटल जी. उनके शासनकाल में जीतनी तेजी से विकास ने रफ़्तार पकडी थी. मनमोहन जी के आते ही उतनी ही गति से विकास धीमा पड गया.
वाह रेहान साहब, बहुत शानदार लिखा है आपने. ग़रीब जनता को दो वक्त की रोटी नहीं और मनमोहन सिंह जी महान बताए जा रहे हैं. यह दुनिया को बेवकूफ बनाने की कोशिश है. मेरे खयाल से मनमोहन सिंह देश के सबसे कमजोर और ग़रीबों के दुश्मन प्रधानमंत्री साबित होने वाले हैं.
केवलविनम्र, ईमानदार छवि के बल पर किसी को महान नहीं कहा जा सकता है. मनमोहन की कठपुतली कार्यप्रणाली से सभी वाकिफ़ हैं. उन्हें कभी मैंने देश के हित में कठोर फ़ैसले लेते हुए नहीं देखा. चाहे मुद्दा महँगाई का हो या फिर राष्ट्रमंडल का. वे अच्छे कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री हो सकते हैं पर एक ठोस नेता कभी नहीं. खुशवंत सिंह ने उन्हें सदी का महानतम नेता घोषित कर दिया तो किस विला पर? क्या उन्होंने भारत को राष्ट्रसंघ में स्थाई सदस्यता दिला दी या कश्मीर का मुद्दा सदा-सदा के लिए सुलझा लिया. वह एक निश्चल छवि वाले मौनी बाबा हैं. उनकी कभी हिंदी ना बोलने की आदत भी मुझे बहुत खटकती है.
बहुत अच्छा विश्लेषण है.एक ऐसे इंसान का जो बहुत अच्छा है लेकिन बिना किसी काम का.
बहुत अच्छा, हम किन खूबियों की बात कर रहे हैं, ऐसे समय जब सभी मंत्री उनके सिर के ऊपर से कूद रहे हैं.
जितना ठीक आपने सवाल किया उतना ठीक जवाब इस प्रधानमंत्री के पास नहीं है. नेहरू जी के बनाए आधारभूत ढांचे को जितना मज़बूत बनाने का प्रयास वह करेंगे. यह देश उतना ही कमजोर होता जाएगा, पूरी दुनिया इनकी वाह वाह इसलिए कर रही है कि यह देश को जहाँ ले जा रहे हैं, वहाँ से गुलामी की दीवारें बनाना आसान है. महँगाई उनके लिए विकास लग रही है क्योंकि वह मूलतः अर्थशास्त्री जो हैं.
रेहान जी आपके विचार से मैं पूरी तरह सहमत हूँ. इस प्रकार के मुद्दे उठाने के लिए धन्यवाद. यह काम केवल बीबीसी ही कर सकता है.
रेहान फजल साहब, आपने बहुत बढ़िया और शानदार ब्लॉग लिखा है. इसके लिए आपको बधाई. मनमोहन सिंह जी सभ्य, शांत और ईमानदार व्यक्ति हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन वे नेता नहीं बन सकते हैं. क्योंकि वे भ्रष्ट नहीं है और उनपर कोई दाग नहीं है. यह भी सही है कि उनके संबंध नेहरू खानदान से रहे हैं. यही कारण है कि वे राजनीति में पिछले दरवाजे (राज्यसभा) में बने हुए हैं. यही कारण है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं और वे बने हुए हैं. रही बात भारत के आर्थिक सुधारों की तो, पीवी नरसिंहा राव जब प्रधानमंत्री थे तभी भारत ने अपने दरवाजे बुहराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिए थे. इससे भारत सरकार को कर के रूप में पैसे मिलने लगे जो आज बढ़ता ही जा रहा है. इसका कारण है कि दुनिया में कहीं भी नहीं बिकने वाला माल भारत में बिक जाता है. दूसरी बात यह कि भारत में जनता से विकसित देशों की तर्ज पर कर पर कर वसूला जा रहा है. उस पर सेवा कर का दायरा बढ़ाया जा रहा है. यही कारण है कि सरकार मालामाल होती जा रही है.
घर के सारे लोग चोर हों और मुखिया शरीफ और ईमानदार कहलाए तो कालिख पर सफेदी नहीं पोंछी जा सकती है. ऐसे में अगर मुखिया चुप्पी साधे रहे और कोई फ़ैसला न ले पाए तो उनकी योग्यता पर सवाल उठता है. मनमोहन जी और उनके सहयोगियों की आर्थिक नीति सिर्फ और सिर्फ 10 फीसदी लोगों के लिए है. ये लोग निवेशकों और पूंजीपतियों को लाभ पहुँचा रहे हैं. इससे अमीरी और ग़रीबी बढ़ती जा रही है. बढ़ती महँगाई, बेरोजगारी और ग़रीबी के सामने देश की आर्थिक तरक्की की बात करना अंधे को आइना दिखाना के समान है. मनमोहन जी को एक प्रोफ़ेसर तो मानजा जा सकता है लेकिन एक कुशल शासक या मैनजर नहीं जिसमें दूरदर्शिता और फ़ैसले लेने की ताक़त होती है.
दुनिया के खुदगर्ज नेताओं और भारतीय सरकारी नौकरों की नजरों में मनमोहन सिंह शायद बहुत अच्छे प्रधानमंत्री हों, जिनका छह साल में वेतन कहाँ से कहाँ पहूँचा दिया हैं इन्होंने लेकिन एक ग़रीब, मजदूर और किसान से पूछकर देखो मनमोहन सिंह जी की हकीकत.
रेहान जी, बीबीसी पर संभवत: मैंने पहली बार ऐसा सच पढ़ा. अब आप वापस पत्रकारिता करने लगे हैं, आप ऐसे ही लिखते रहिए. लेकिन लगता नहीं है कि आप ऐसा कर पाएँगे. आपके पिछले ब्लॉग कुछ ख़ास नहीं थे.
मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ. वास्तव में मनमोहन सिंह जी ईमानदार और साधारण इंसान हैं. लेकिन इंदिरा गांधी और वाजपेयी जैसा उनके पास नेतृत्व की क्षमता नहीं हैं. वे देश के बारे में कोई फ़ैसला ले पाने में सक्षम नहीं हैं. मैं समझता हूँ कि वे देश के एक कमज़ोर प्रधानमंत्री हैं.
सिर्फ़ सुर्खियां बटोरने से नहीं होगा. एक तरफ भारत भुखमरी से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर गोदामों में रखे अनाज सड़ रहे हैं. झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में माओवादियों से लोग डरे हुए हैं.
मनमोहन सिंह एक अच्छे व्यक्ति हैं. लेकिन मेरा मानना है कि जो व्यक्ति अपने राजनैतिक जीवन में लोकसभा का एक चुनाव नहीं जीत सकता, लोकतांत्रिक प्रणाली में वो नेता कैसा?
उनकी ईमानदारी देश को बहुत भारी पड़ रही है.
प्रधानमंत्री अच्छे हैं लेकिन अपने कैबिनेट पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है.
आदर्श पत्रकारिता अगर कहीं जीवित है तो वह बीबीसी में है. और यह हमेशा अपना धर्म निभाते आयी है.
मैं रेहान साहब की बात से पूरी तरह सहमत हूं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का प्रदर्शन काफ़ी साधारण रहा है. विडम्बना है कि कांग्रेस पार्टी नरसिम्हा राव की उपलब्धियों को नजरअंदाज करती है जबकि उनके क़दम काफ़ी दूरदर्शी थे.
मैं मानता हूँ कि मनमोहन सिंह अच्छे हैं लेकिन देश की प्रगति के लिए यह काफ़ी नहीं है. उन्हें आम लोगों के लिए काम करना होगा.
मैं आपकी बात से सहमत हूँ.
मनमोहन सिंह जी काबिल, सौम्य, शांत और लोकप्रिय हैं. कुछ हद तक आर्थिक प्रगति में उनका योगदान हैं. लेकिन यह एक पहलू हैं और दूसरा पहलू काफी निराशाजनक हैं कि इच्छाशक्ति और कठोर निर्यण लेने कि उनमें कमी हैं. प्रधानमंत्री के रूप में कुछ अलोकप्रिय फैसले लेने कि इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए जो दलगत राजनीति से ऊपर उठके हो. लेकिन प्रधानमंत्री के कोई भी फैसले एतिहासिक नहीं कहे जा सकते हैं. आप अगर बहुत दिमाग पर जोर डालते हैं तो शायद एक परमाणु कार्यकम को लेकर कुछ हद तक उसमे भी काफी संशोधन के बाद. कैबिनेट के मुखिया होने के नाते उनका कोई भी नियंत्रण नहीं है अपने मंत्रियो सब अपनी-अपनी राग अलापते रहते हैं. मनमोहन सिंह जी कि उपलब्धि यही है कि वह नौकरशाह और अर्थशास्त्री से एक परिपक्व नेता बन गए हैं. सच्चाई यही है कि इंदिरा गांधी जी और अटल जी जैसा उनके पास नेतृत्व और कठोर निर्यण लेने की क्षमता नहीं है.
मैं मानता हूँ कि प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह योग्य नहीं हैं.
कठोर निर्णय नहीं ले पाना मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी कमजोरी है, देश को एक उर्जावान प्रधानमंत्री चाहिए.
यदि कोई ईमानदार शख़्स दूसरों की गलतियों के वक्त आँख मूंद ले तो क्या वह वास्तव में ईमानदार कहलाने के लायक है?
डॉ. मनमोहन सिंह जी को कठपुतली के तौर पर कांग्रेस में इसलिए रखा गया है की 40 वर्षीय युवा कहे जाने वाले राहुल गाँधी को अनुभव से भरा जा सके. डॉ. मनमोहन सिंह जी का सौम्य और शांत रहना उनकी मजबूरी है क्योंकि वो गरीब जनता द्वारा किए गए सवालों के जवाब देने में असमर्थ हैं. भारत की जनता उनको प्रधान मंत्री बना के अपने पूर्व जन्म में किये गए पापों का प्रायश्चित कर रही है. आपका लेख पढ़ के हम सभी देश भक्त जनता को आत्म संतुष्टि हुई है देशहित में ऐसे लेख लिखने के लिए आपको कोटि- कोटि धन्यवाद.
हम भारतीय उन सभी लोगो को अच्छा मान लेते है जिन्होंने कोई बुरा काम नहीं किया हो. मनमोहन सिंह के साथ भी यही बात है उन्होंने देश की लिए कुछ किया ही नहीं, न अच्छा न बुरा. कांग्रेस और मनमोहन जी का काम करने का एक ही तरीका है. किसी भी आरोप पर अपनी प्रतिक्रिया मत दो बल्कि आरोप लगाने वाले पर ही आरोप लगा दो. शायद मनमोहन सिंह जी को विश्व का नेता इसलिए मान लिया गया है क्योकि उनके जैसे धैर्य वाला दूसरा नेता ही नहीं है जो देश का बेडा गर्क होने के बाद भी परेशान नहीं है.
मनमोहन सिंह जी तो सोनिया जी के रिमोट कंट्रोल हैं. जब वे चाहती हैं तो चैनल म्यूट कर देती हैं. जब चाहती हैं तो आवाज़ बढ़ा देती हैं और जब चाहती हैं तब घटा देती हैं. और सोनिया का फैवरिट विदेसी चैनल रहता है. देसी फ़िल्में, धारावाहिक उनकी समझ से बहुत दूर हैं.
मुझे भी कभी समझ में नहीं आता कि एक जनप्रतिनिधि के तौर पर मनमोहन जी की क्या विशेषताएं हैं? एक ऐसा जनप्रतिनिधि जो मौलिक रूप से अपने देशा की जनता से संवाद नहीं बनाता, जिसे अपना हर अनिवार्य भाषण डायस पर खड़े होकर पढ़ना पड़ता है, जिसकी भाषा देश की जनता को समझा नहीं आती. जिसकी राजनैतिक समझ और स्वीकृति लोगों के प्रति नहीं बल्कि तमाम उद्योगपतियों के लिए है. मेरी नज़र में मनमोहन सिंह एक नौकरशाह मात्र हैं जो दुनिया को लूटने वाली तमाम आर्थिक संस्थाओं की तरफ से भारत में नौकरी करते हैं. जो अपनी गुलामी के दिनों को स्वर्णयुग कहते हैं और ऑक्स्फ़र्ड जाकर यह इसरार करते हैं कि अगर आप न आए होते तो हम असभ्य रह जाते. जिसे उपनिवेश और साम्राज्यवाद मानवताविरोधी विचार नहीं लगते. कितना और क्या-क्या लिखें?