भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट
बात कई सप्ताहों से चर्चा में है लेकिन मैं भी कहने से ख़ुद को रोक नहीं सका. राष्ट्रमंडल खेल तो अक्तूबर में शुरू होंगे लेकिन एक बड़ी प्रतियोगिता तो पहले से ही चल रही लगती है. ये प्रतियोगिता उन कुछ नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच चली है जिसमें भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट बनने की होड़ लगी हुई है.
लगता है कि इन खेलों से जुड़ा एक बड़ा अमला लूटखसोट में एक दूसरे को पीछे छोड़ने पर तुला हुआ है और इसी के आधार पर उन्हें पदक (सोना,चाँदी) मिलेंगे.
ब्रिटेन के एक अख़बार ने ख़ाका दिया है कि दिल्ली में प्रस्तावित राष्ट्रमंडल खेल भारतीय भ्रष्टों के लिए ही नहीं, बल्कि कुछ विदेशी कंपनियों के लिए भी बेहतरीन अवसर साबित हो रहे हैं. ब्रिटेन की एक कंपनी ने जिस एक टॉयलेट पेपर के लिए 64 पाउंड यानी क़रीब 4600 रुपए लिए वही पेपर दूसरी कंपनी से सिर्फ़ नौ पाउंड यानी क़रीब 650 रुपए में उपलब्ध था. ऐसे 360 टॉयलट पेपर इस कंपनी ने राष्ट्रमंडल खेलों के लिए सप्लाई किए.
एक और बानगी देखिए, इसी कंपनी ने एक कूड़ेदान के लिए 104 पाउंड यानी लगभग साढ़े सात हज़ार रुपए लिए जोकि दूसरी कंपनी सिर्फ़ 16 पाउंड यानी 1150 रुपए में देने को तैयार थी. एक नज़र और डालें, टॉयलेट में हाथ धोने के लिए इस्तेमाल होने वाले तरल साबुन का एक डिस्पैंसर 129 पाउंड यानी क़रीब साढ़े नौ हज़ार रुपए में ख़रीदा गया जबकि यही डिस्पेंसर स्विट्ज़रलैंड की एक कंपनी सिर्फ़ ढाई पाउंड यानी लगभग 170 रुपए में देने को तैयार थी. लिक्विड सोप डिस्पेंसर से ही ब्रिटेन की इस कंपनी ने क़रीब 62 हज़ार पाउंड यानी क़रीब 45 लाख रुपए कमा लिए. 
ये तो सिर्फ़ एक कंपनी से ख़रीदे गए सामान की कहानी है. अगर परतें खोली जाएँ तो पता चलेगा कि राष्ट्रमंडल खेलों में न जाने कितनी देसी-विदेशी कंपनियों और लोगों ने अपना बुरा वक़्त संवार लिया है. शायद लूट-खसोट की इसी साँठ-गाँठ की वजह से राष्ट्रमंडल खेलों का बजट पाँच गुना ज़्यादा हो गया है.
विडंबना ये है कि दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति ने जो इस तरह का सामान विदेशों से ख़रीदा है वो सामान यूरोपीय देशों में बहुत सी बड़ी कंपनियाँ भारत जैसे विकासशील देशों से मंगाती है जो सस्ता पड़ता है और उसे फिर इन देशों में मुनाफ़ा लेकर बेचा जाता है. ये उल्टी गंगा भारतीय आयोजकों ने भला क्यों बहाई है, ये जानने की ज़िम्मेदारी किस पर है, हमें तो नहीं पता.
ये तो हम जानते ही हैं कि ग़रीबी उन्मूलन के लिए मिला बहुत सारा अंतरराष्ट्रीय धन भी इन खेलों की ही भेंट चढ़ गया है. जिस दिल्ली को सँवारने का दम भरा जा रहा है वही दिल्ली बरसात का मौसम आने पर बेबस नज़र आती है. जहाँ-तहाँ पानी जमा हो जाता है और फिर जब डेंगू फैलता है तो अस्पताल और प्रशासनिक ढाँचे की असलियत सामने आ जाती है.
कोई ग़रीब महिला किसी नर्सिंग होम की सीढ़ियों पर ही बच्चे को जन्म देती है क्योंकि उसके पास डॉक्टर की फ़ीस नहीं होती है. अब ये तो आयोजक ही जानें कि इन खेलों के आयोजन के बाद क्या दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ियों की क़िस्मत बदलेगी? दिल्ली के बाहर रहने वाले ग़रीबों को वैसे भी उम्मीद कम ही रहती है.
लेकिन इससे भी ज़्यादा रोना इस बात पर आता है कि भारत में ना तो प्रतिभाशाली लोगों की कमी है और ना ही धन की लेकिन भारत का कोई स्टेडियम एक ऊसेन बोल्ट नहीं तैयार करता. चिंता की बात यही है कि इसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया गया है और अगर ये खेल हो भी गए तो बाद में सब रफ़ा-दफ़ा करने में कितनी देर लगती है.
एक सवाल और, आर्थिक मंदी के दौर में जब लोगों की जीविका ही ख़तरे में पड़ी हुई है तो क्या ये खेल स्थगित नहीं किए जा सकते थे? या देश का दीवाला निकालना और बदनाम कराना ज़रूरी था? बदले समय के अनुसार प्राथमिकताएँ बदलना समझदारी होती है. उस पर भी तुर्रा ये है कि देश के आम लोग ख़ामोशी से निरीह होकर सबकुछ देख रहे हैं, जो लोग चुनाव में सरकार बदल सकते हैं तो देश धन की लूट को रोकने के लिए कोई पत्थर आसमान में क्यों नहीं उछाल सकते?
लेकिन इस बार कुछ उम्मीद करना अनुचित नहीं होगा क्योंकि इतना बेतहाशा धन लगाकर अगर इन खेलों का आयोजन हो रहा है तो भारत के कुछ अति प्रतिभावान खिलाड़ी को सामने आने ही चाहिए, लेकिन अभी तो संकेत यही हैं कि ये खिलाड़ी खेल के मैदान में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और लूट-खसोट के मैदान में तैयार होंगे यानी भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट.

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एक शेर है
बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है,
हर शाख पे उल्लू बैठे हैं अंजाम गुलिस्ताँ क्या होगा
ग़ुलामों की दशा को क्यों भूल रहे है यह खेल ग़ुलामों के देश में है तो "लूट और भ्रष्टाचार" अब नहीं करेंगे तो कब करेंगे, इसका कुछ हिस्सा तो इन्हें मिल रहा होगा, आपको याद होगा ऐसी ही लूट इमरजेंसी से पहले चल रही थी. और ये सब जानते है कि इनके भाई भतीजे जब इन खेलों की टीम में होंगे यदि उन्हें मेडल न मिला तो पहले ही मार लो . यही तो मौक़ा है - लूट सको तो लूट लो ..........|
राष्ट्रमंडल खेल में भ्रष्टाचार यह साबित कर देता है कि नेता खेल संघों के अध्यक्ष क्यों बनना चाहते हैं? दरअसल खेल संघ लूट का एक जरिया है. इससे नेताओं में खेल संघों के अध्यक्ष बनने की होड़ लगी रहती है जिससे वे खिलाडियों को यह मौका न देकर वे अपनी खुद की तिजोरी भर सकें.
महबूब साहब, आपने इस लंबी चर्चा में अपनी कुछ वाकयों के सहारे आप भी अपनी जगह तो पक्की कर ही ली है क्योंकि आपने हमें कुछ और बातों से रुबरु कराया है. हम तो आपके सहारे ही यह जान पा रहे हैं कि हमारे देश में इतने बड़े आयोजन को लेकर जो कुछ हो रहा है उसके बारे में जान पा रहे हैं. अब आप ही सोचिए कि आप लोगों के होते हुए किसी भी नेता, अधिकारियों और ठेकेदार ने अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल नहीं किया और भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और परमभ्रष्ट बनने की होड़ में लग गए. ख़ैर जो भी हो खेल तो भारत में हो रहे हैं हमें गर्व तो करना होगा अपने देश पर जो इतने बड़े भ्रष्टाचार के बाद भी हर तरह के नेता खेल को लेकर निश्चिंत है, अगर शंका है तो वह हममे है. आशा करते हैं कि इतना सब कुछ होने के बाद भी पदक तालिका में भारत सबसे आगे होगा.
बहुत बढ़िया कहा महबूब साहब आपने, यह भ्रष्ट, महाभ्रष्ट, और परमभ्रष्टों की प्रतियोगिता है. इस बात के कई उदाहरण है जिसमें इन लोगों ने केवल अपनी जेब भरी है. एक सच्चे भारतीय होने के नाते मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि इन खेलों को सफल नहीं होना चाहिए.क्योंकि इससे भारत को भविष्य में किसी और खेल के आयोजन का मौका नहीं मिलेगा और इस तरह ग़रीबों का पैसा बच जाएगा. अगर ये खेल सफल हो गए तो भ्रष्टाचार के आरोप किनारे रख दिए जाएँगे और भ्रष्टाचारियों को इसे आगे होने वाले खेलों में दोहराने का मौक़ा मिल जाएगा.
वाह महबूब साहब, क्या शानदार और सच ब्लॉग लिखा है आपने. पहली बार बीबीसी पर बेबाक और सच पढ़ने को मिला है. अगर अगर भारत की अदालतों में कुछ करने को है तो आपके इस लेख को जनहित याचिका मानकर तुरंत कार्रवाई करन चाहिए. आपके इस लेख को मैंने एक बार नहीं कई बार पढ़ा है फिर भी दिल नहीं भरा है और बार-बार पढ़ने का मन कर रहा है.
भारत में कोई भी काम देशहित की जगह निजी हित को ध्यान में रखकर किया जाता है. राष्ट्रमंडल खेल भी देश के विकास की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने का जरिया है.इससे जुड़े लोगों में घोटाला करने की होड़ लगी है. इनको देश की छवि की चिंता नहीं है. यह भ्रष्ट लोगों के लिए यह एक सुनहरा मौक़ा है. मुझे आज इस इस खेल का आयोजन देश में किए जाने पर अफशोश होता है. जबकि हमारा देश इस तरह के आयोजन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. इस मुद्दे पर मुझे अब बहस करने में शर्म आने लगी है. दूसरे का हिस्सा ये भ्रष्ट लोग सीना ठोककर अपने में मिला रहे हैं.
महबूब साहब, भगवान ने भारत को बहुत महान बनाया है लेकिन इस तरह के बुरे लोग यहाँ क्यों पैदा होते हैं. ऐसे सब लोग पैसा बनाने में लगे हुए हैं और हमारी सरकार आँखें बंद करके बैठी हुई है. लोकतंत्र के लिए यह बहुत बुरा है. ऐसा मैं अपने जीवन में पहली बार देख रहा हूँ. युवाओं को अपने देश में रोज ब रोज बुरी परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है. दूसरी ओर देश की इतनी खराब छवि बन रही है. हमारे नेता अपनी तनख्वाह के लिए तो चिल्ला रहे हैं लेकिन उन्हें देश की आम जनता के बारे में पता ही नहीं है. चुनाव के समय वे आम आदमी की बात करते हैं और बाद में केवल जेड प्लस सुरक्षा की बात करते हैं. देश का भविष्य क्या होगा. यह केवल भगवान ही जानता है.? मुझे उम्मीद है कि इस बुराई को अच्छाई में बदलने के लिए कोई क्रांति ज़रूर होगी.
महबूब साहब, अब भगवान ही बचाएगा मेरे देश को.
राष्ट्रीय स्वाभिमान का परचम लहराने की जिम्मेदारी हमने जिनको दे रखी है, वही आज उसको टुकड़ों-टुकड़ों में बेच रहे हैं. क्या यह सामंती आतंकवाद नहीं है? ऐसे लोग देश की आत्मा पर हमला कर रहे हैं.
एक जवाबी शेर अर्ज़ है
बस एक ही मक्खी काफ़ी है, दाल को काला करने को
यहां मक्खी की ही दाल है, अंजामे दावत क्या होगा
यहां सभी लोग अपने-अपने स्वार्थ को पूरा करने में लगे हैं.
महबूब साहब, आपने जो मुद्दा उठाया है, वह सौ फ़ीसदी सही है. जिन लोगों के हाथ में सत्ता है, उनकी जिम्मेदारी बनती है कि जो लोग गैरक़ानूनी तरीके से पैसा बना रहे हैं, उनकी नकेल कसी जाए. देश के स्वाभिमान को बचाने के लिए जनता को भी आगे आना होगा.
कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर भ्रष्टाचार की सारी हदें पार हो गईं हैं.
ये तो वही बात है कि अंधा बांटे रेवड़ियां.
ये उन लोगों के मुंह पर कालिख है जो गरीबों की गरीबी को मुद्दा बनाकर झुग्गी झोपड़ियों में जाकर नेतागिरी की कुलांचें भरते हैं. इन खेलों का आयोजन हमारे देश की प्रतिष्ठा पर ऐसा बदनुमा दाग बनकर उभरा है कि मिटाए न मिटेगा. गरीब महिलाएं सड़कों पर, नावों पर और अस्पताल के बाहर कहीं भी प्रसव पीड़ा सहती रहेंगी पर ये भ्रष्टाचारी फिर भी अपनी अवैध कमाई करते रहेंगे.
अरे साहब, नेताओं, ठेकेदारों की दिवाली आ गई, रोज़ उठकर नाचते होंगे, “कॉमन वेल्थ आयो रे”
ये कोई नई बात नहीं है. भ्रष्ट्राचार तो हमारे देश की रगों में खून बन कर दौड़ता है. यह सवाल कि भ्रष्ट कौन हैं, बेमानी है.
मेरा तो मानना है कि भारत के सारे नेता भ्रष्ट हैं.
श्रीमान, आपने तो सब कुछ नकारात्मक दृष्टि से वर्णन किया है.
धिक्कार है ऐसे लोगों पर, देश की छवि धूमिल करने में लगे हैं.
इसमे नया क्या है? ये तो रोज की बात है.
यह कॉमनवेल्थ खेल नहीं बल्कि पर्सनल वेल्थ खेल हैं.
जहाँ तक मैंने देखा है और समझा है, यही लगता है कि यहाँ ब्रिटेन के अख़बार की बात करने की कोई बात नहीं. हम और आप पहले से ही ये जानते हैं कि भारतीय राजनीति भ्रष्टाचार की सीमाएँ पार कर चुकी है. यह तो बड़ा मामला है राष्ट्रमंडल खेल? ज़मीनी स्तर पर देखिए भारत में भ्रष्टता छोटे से बड़े सभी विभागों में अपनी जड़ बना चुकी है, यदि आप कहेंगे तो मैं आपको इसका प्रमाण विडियो सहित पेश कर दूँगा.
कॉमनवेल्थ का मतलब है साझी संपत्ति, तो इस लूट की रेवड़ियों को भी मेरे अंधे प्रजातंत्र के अंधे कर्णधारों ने अपने अपनों में बहुत प्रेम से बांटा है. ट्रकों के पीछे लिखा देखा था की 'दस में से नौ बेईमान، मेरा भारत महान' वो दसवां व्यक्ति कहाँ है पता नहीं...
ये इंडिया है मेरी जान.
हमारे देश में कोई भी भ्रष्ट एक क़दम भी पीछे हटने को तैयार नहीं. वे मौक़े के इंतिज़ार में रहते हैं. वे भूल जाते हैं कि मामला क्या है. वे सिर्फ़ लाभ उठाना जानते हैं. राष्ट्रमंडल में भ्रष्टाचार से हमारे देश की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिगड़ेगी. लगता है कि इस खेल के पीछे लोगों का धन लग रहा है और यह इन कुछ गिने चुने लोगों के ज़रिए इस्तेमाल होगा.
सब लोग सिर्फ़ आरोप लगाते रहते हैं. कोई सामने आकर इनके ख़िलाफ़ कोर्ट क्यों नहीं जाता?
आपको धन्यवाद सच को सामने लाने के लिए. हमें लगता है कि हम नवयुवकों को देश की कमान संभालनी चाहिए.
अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा. पाँचवी कक्षा में पढ़ा था, प्रत्यक्ष प्रमाण भी देख लिया.