इस विषय के अंतर्गत रखें मई 2010

पागल दोनों तरफ हैं

शनिवार को कराची प्रेस क्लब गया तो वहाँ मेरे कुछ पत्रकार मित्र हिंदी और उर्दू भाषा के बीच हुए विवाद पर चर्चा कर रहे थे. मैंने कहीं पढ़ा था कि अमरीका में हिंदी पढ़ाने वाले एक अध्यापक घूमते घूमते दिल्ली से सड़क के रास्ते लाहौर पहुँच गए थे.

जब वो वाघा सीमा पार कर पाकिस्तान पहुँचे तो किसी व्यक्ति ने उनसे कहा, "आप तो ज़बरदस्त उर्दू बोल रहे हैं." "अच्छा! यह तो हिंदी है." अध्यापक ने कहा. उस व्यक्ति ने कहा, "नहीं यह उर्दू है." अध्यापक जी ने सोचा कि सीमा के उस पार यह भाषा हिंदी बन जाती है जबकि सीमा के इस पार यानी पाकिस्तान में उन्नीस बीस के अंतर के साथ उर्दू.

लेकिन लरकाना (सिंध प्रांत का शहर) के एक मेरे मित्र हमेशा कहते हैं कि हिंदी और उर्दू के विवाद ने वास्तव में ही हिंदुस्तान पर बंटवारा कर दिया था. टोबा टेक सिंह के सरदार भूपेंद्र सिंह जो आजकल अमृतसर में रहते हैं, उन के अनुसार वह बंटवारा तो पहला था और अब कुछ और बंटवारे भी शेष हैं.

सच बात तो ये है कि 62 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी बात से बात बनती नहीं बल्कि बिग़ड़ती ही चली जाती है. इतिहास भी कमाल की चीज़ है जिसकी गंगा उलटी बह निकली है. कल तक वह लोग जो युद्ध की बात करते थे वह आज अमन की आशा की माला जपना चाहते हैं. पाकिस्तान में कई लोग अमन की आशा को आशा भोसलें समझते हैं.

फेसबुक के माध्यम से बनी मेरी एक मित्र है. वो ऐसी पागल हैं कि आने वाले दिनों में कराची से दिल्ली तक शांति मार्च करना चाहती हैं. न केवल शांति मार्च बल्कि इस मार्च में वो भारत और पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के अंत के ख़िलाफ नारा भी लगाना चाहती हैं.

अब हुआ क्या है, जो यहाँ आईएसआई वाले हैं न, वह अपने सारे काम छोड़ कर उस महिला के पीछे लगे हुए हैं. न तालिबान, न अल-क़ायदा, न मुल्ला उमर, न हाफिज़ सईद और न ही ओसामा बिन लादेन बस एक महिला के पीछे लगे हुए हैं.

सीमा के उस ओर भी कुछ पागल रॉ वाले होंगे जो शांति के कबूतर या कबूतरी के पीछे लगे होंगे.

किसी कवि ने क्या ख़ूब कहा था
"बताना है कि सब पागल अभी पहुँचे नहीं अपने ठिकानों पर
बहुत से इस तरफ हैं और बहुत से उस तरफ भी हैं."

पत्रकारिता के मानदंड

अभी दो दिन पहले कानपुर गया था, आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सफल एक ग़रीब मोची के बेटे से साक्षात्कार करने. लेकिन वहाँ मुझे एक और सच्चाई से साक्षात्कार करना पड़ा.

अपना काम खत्म करके चलने लगा तो एक सज्जन सकुचाते हुए आए अपनी समस्या बताने.

वो कोई डिप्लोमा होल्डर डॉक्टर हैं और उसी ग़रीब बस्ती में प्रैक्टिस करते हैं. मोहल्ले के लोग उनकी बड़ा आदर करते हैं.

उनकी समस्या ये है कि किसी लोकल चैनल के एक पत्रकार आए. उनकी क्लीनिक की तस्वीरें उतारीं, फिर डराया कि वो झोलाछाप डाक्टर हैं और अगर उनसे लेन देन करके मामले में कुछ समझौता नहीं कर लेते तो वह अफसरों से कहकर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करा देंगे.

पत्रकारों के इस तरह के ब्लैकमेलिंग के किस्से काफ़ी दिनों से सुनाई दे रहे हैं. लेकिन दूसरों के मुंह से. पहली बार किसी भुक्तभोगी के मुंह से यह बात सीधे सुनने को मिली.

रविवार को हिंदी पत्रकारिता दिवस है और इस मौक़े पर यही किस्सा मेरे दिमाग में गूंज रहा है. लोग पत्रकार क्यों बनते हैं. जन सेवा के लिए या फिर जैसे- तैसे पैसा कमाने के लिए.

यह बात केवल लोकल चैनल के पत्रकारों पर लागू नहीं होती. कई बड़े बड़े चैनलों और अख़बारों के पत्रकारों, संपादकों और मालिकों के बारे में भी यही बातें सुनने को मिलती हैं.

कई अखबार और चैनल रिपोर्टर बनाने के लिए अग्रिम पैसा लेते हैं.

अनेक अपने संवाददाताओं से नियमित रूप से विज्ञापन एजेंट का काम करवाते हैं, जो बिजनेस बढ़ाने के लिए ख़बरों के माध्यम से दबाव बनाते हैं. फिर कई चैनल और अख़बार बाकायदा पेड न्यूज़ छापते या दिखाते हैं.

प्रेस काउन्सिल है मगर वह भी कुछ कर नही सकती.

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर जब हम लोग गोष्ठियों में गणेश शंकर विद्यार्थी और पराडकर जी का गुणगान करेंगे, शायद हमें सामूहिक रूप से इस समस्या पर भी आत्मचिंतन करना चाहिए.

माना कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं, यह एक प्रोफेशन और बिजनेस है. मगर क्या हर प्रोफेशन और बिजनेस का कोई एथिक्स नही होता?

जया और माया...

उत्तर प्रदेश में दो नई, अप्रत्याशित घटनाएँ घटीं. समाजवादी पार्टी ने जया बच्चन को दोबारा राज्य सभा के लिए उम्मीदवार बनाया तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री मायावती ने विधान परिषद के लिए अपना नामांकन दाखिल करते हुए बतायाकि उनकी सम्पत्ति बढ़कर 87 करोड़ हो गई है.

दरअसल जया बच्चन को लेकर तभी से अटकलें लगाई जा रही थीं, जब अमर सिंह को समाजवादी पार्टी से निकाला गया था. समाजवादी पार्टी ने उस समय रामपुर से सांसद जया प्रदा को तो पार्टी से निकाल दिया था, लेकिन अमर सिंह से घनिष्ठता के बावजूद जया बच्चन को नहीं छुआ था.

तब जया बच्चन ने कहा था कि वह राज्य सभा का अपना छह महीने का बचा कार्यकाल पूरा करना चाहेंगी, मगर पार्टी चाहे तो उससे पहले उन्हें दल से निकाल सकती है.

इस बयान को देखते हुए प्रेक्षकों का अनुमान था शायद समाजवादी पार्टी जया बच्चन को दोबारा प्रत्याशी न बनाए.

कुछ लोगों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव ने अमिताभ बच्चन और उनके परिवार को अमर सिंह से अलग करने के लिए यह दांव चला है, जबकि अन्य लोगों का कहना है कि अमर सिंह ने चालाकी से जया बच्चन को समाजवादी पार्टी से दोबारा राज्य सभा भेजने का इंतजाम कर दिया है.

उधर मायावती की घोषित संपत्ति लगभग 87 करोड़ है जो अब से तीन साल पहले उनकी घोषित संपत्ति 52 करोड़ थी.

आने वाले कुछ समय में जया और माया मीडिया में छाई रहेंगी, हालाँकि अलग-अलग कारणों से...

राहुल की अमानत सुरक्षित है

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|सोमवार, 24 मई 2010, 18:18

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मनमोहन सिंह कम बोलने और विवादित बयानों से दूर रहने के लिए मशहूर हैं और भारत में प्रेस से खुलकर कभी-कभी ही बात करते हैं. सोमवार की प्रेस कॉंफ़्रेंस में भी पत्रकारों को एक सवाल के बाद उससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल पूछने की इजाज़त नहीं दी गई.

उम्मीद के मुताबिक़ प्रेस कॉंफ़्रेंस में उनसे अलग-अलग विषयों पर सवाल पूछे गए लेकिन ज़्यादातर सवालों को वो या तो टाल गए या बहुत ही संक्षिप्त जवाब दिए और ज़्यादातर वही बातें दुहराईं जो वह विभिन्न फ़ोरमों में पहले भी कहते रहे हैं.

विदेश नीति पर सिर्फ़ पाकिस्तान से बात-चीत के हवाले से प्रश्न हुए लेकिन उन प्रश्नों में वह तीव्रता नहीं थी जो शर्मल-शैख़ घोषणा के बाद देखने में आए थे.

पाकिस्तान से बात-चीत पर उन्होंने विश्वास की कमी ख़त्म करने की बात की, माओवादियों को उन्होंने हमेशा की तरह सबसे बड़ा ख़तरा बताया, दूरसंचार मंत्री के कॉंट्रैक्टों में वह मंत्री डी. राजा को क्लीन चिट देने से कतराते नज़र आए, लेकिन गृह मंत्री पी चिदंबरम और पार्टी के अन्य नेताओं के बीच असहमति की ख़बरों के बारे में उन्होंने कुछ कहने से इनकार कर दिया.... "मेरे लिए इस बारे में कुछ कहना मुनासिब नहीं होगा, जब मौक़ा मिलेगा इन पर संसद में बहस होगी... मेरे पास फ़िलहाल पूरी जानकारी नहीं है...." ये बात बार बार सुनने को मिली.

शायद इसीलिए प्रेसकॉंफ़्रेंस की हाइलाइट किसी गंभीर विषय के मुक़ाबले सोनिया गांधी और उनकी पत्नी के बारे में एक प्रश्न रहा.

जवाब में मनमोहन सिंह ने कहा, मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मुझे सोनिया गांधी और मेरी पत्नी गुरशरण कौर से लगातार सलाह मिलती रहती है. दोनों का विषय अलग-अलग होता है. और मैं दोनों की सलाह की क़द्र करता हूं.

और हमेशा की तरह राहुल गांधी के राजतिलक का सवाल भी उठा और उन्होंने फिर वही इम्प्रेशन दिया जिसे वह अब तक ख़त्म करने में विफल रहे हैं और वह यह है कि इस कुर्सी पर वे सिर्फ़ उस वक़्त तक बैठे हैं जब तक राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं हो जाते.

"मुझे कभी कभी लगता है कि नौजवानों को ये ज़िम्मेदारी संभालनी चाहिए. जब भी पार्टी ये फ़ैसला करेगी मैं ख़ुशी से कुर्सी छोड़ दूँगा."

मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों के बारे में पत्रकारों के जो सवाल थे वो तो अभी भी बने हुए हैं लेकिन राहुल गांधी को ये संदेश ज़रूर गया होगा कि उनकी अमानत प्रधानमंत्री के हाथों में सुरक्षित है.

मैं अफ़ज़ल की फ़ाइल हूँ!

रेणु अगालरेणु अगाल|गुरुवार, 20 मई 2010, 15:08

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मैं अफ़ज़ल की फ़ाइल हूँ. पिछले चार सालों से मैं दिल्ली के गृह मंत्रालय में आराम से सो रही थी. धूल की चादर ओढ़े. मेरे आस पास घुप्प अंधेरा था, कहीं कोई हलचल नहीं.

मैं और केवल मैं, साथी के नाम पर मेरे सपने थे. कभी अच्छे तो कभी दिल दहलाने वाले. अच्छों में मेरे दिन बदलने वाले थे. मुझे आस थी कि मेरे पन्नों पर लिखा होगा कि आप सुरक्षित है. आप जा सकती है. और बुरों में नज़र आता था काली स्याही से लिखा पैग़ाम--- अब बस काम तमाम.

फ़ाइल बंद की जा रही है. सर्वोच्च न्यायालय के फ़रमान का पालन होने जा रहा है. सोच के ही नींद टूट जाती है. पर अपनी दुनिया में अच्छे बुरे दिन समेटे मैं आराम से जी रही थी. बीच-बीच में बंद कमरे के बाहर से आवाज़ सुनाई देती थी. राजनीति छोड़ो. अफज़ल को फांसी दो.

कभी कभी अफज़ल के मानवाधिकारों की चर्चा भी सुनाई देती थी. पर इस सबको भी एक अर्सा हो गया. फिर लंबे समय तक सब कुछ शांत हो गया. मुझे लगा कोई ख़बर न होना ही अच्छी ख़बर है. पर फिर मई के शुरु में मेरे आसपास हलचल तेज़ हो गई. अजमल कसाब को 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों के लिए फांसी की सज़ा सुनाई गई. और तब से अब तक मानो भूचाल ही आ गया है.

मेरी धूल की चादर मुझ से खींच ली गई. मुझे नींद से जगा कर तेज़ रोशनी के कमरे में पहुंचाया गया. मैं दिल्ली की सड़को को लंबे समय बाद देख पाई. मेरे बारे में हर ओर बात होने लगी. मुख्यमंत्री और लेफ़्टिनेंट गवर्नर के दफ़्तरों के बीच पिंग-पांग की गेंद की तरह मुझे भेजा जाने लगा.

मुझे लगा कि मुझे छूने भर से लोग डर रहे थे. मैं एक मुसीबत बन गई थी जिसे कोई पालना नहीं चाहता था. दिल्ली की गर्मी को मेरी चर्चा और बढ़ा रही है तो लोग कश्मीर के अफ़ज़ल गुरु की फांसी की बात से बढ़ने वाले तापमान की बात कर रहे थे.

मैं प्राइम टाइम टीवी पर नज़र आ रही थी. पर मन ही मन सोच रही थी. क्यों रे कसाब तू क्यों आया? क्यों पकड़ा गया? तू न होता तो मैं कहीं किसी कमरे के किसी कोने में कई साल और चैन से रह सकती थी.

मन में ग़ुस्सा भी आ रहा है कि सबको फ़ाइल क्लोज़ करने की इतनी जल्दी क्यों हो रही है. क्यों अब कोई मेरे मानवाधिकारों की चिंता नहीं कर रहा... क्यों?

क्या इसलिए कि पाकिस्तानी कसाब को फांसी पर लटका देखने की जल्दी है? और उस इच्छा के सामने अफ़ज़ल गुरु के फांसी के फंदे पर लटकने में हो रही देरी खटक रही है. फांसी पर चढ़ने वालों की लाईन तो बहुत लंबी बताई गई थी. फिर मुझ पर ही क्यों सबकी नज़र है.

मैं फिर बंद कमरे में रहना चाहती हूँ. पर क्या कोई मेरी सुनेगा? शायद नहीं! शायद फ़ाइल बंद होने का समय आ गया है! पर शायद कोई चमत्कार हो जाए! आशा तो मैं कर ही सकती हूँ. वैसे भी और क्या है मेरे पास इसके अलावा...!

एक मुलाक़ात: एक अनोखा अनुभव

अमित बरुआअमित बरुआ|सोमवार, 17 मई 2010, 15:20

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वह एक अजीब और न भूलने वाला अहसास था.

बीबीसी में मेरे सहयोगी भारत के कुछ इलाक़ों में हिंदी सेवा की लोकप्रियता और उससे गहराई से जुड़े श्रोताओं के बारे में अब तक मुझे बताते आ रहे थे.

लेकिन हाल ही में गोरखपुर के एक होटल में श्रोताओं और कुछ तादाद में हिंदी ऑनलाइन के पाठकों से मिलना और उनकी प्रतिक्रियाएँ जानना इतना सुखद अनुभव था कि मैंने उसकी कल्पना भी नहीं की थी.

वहाँ युवा श्रोता भी मौजूद थे और बुज़ुर्ग भी. वहाँ ऐसे भी थे जो हमारे प्रसारणों की सराहना कर रहे थे और ऐसे भी जो आलोचक थे. कुछ ऐसे भी लोग थे जो अपनी पसंद-नापसंद दोनों के बारे में बता रहे थे. लेकिन लोग जो भी कह रहे थे उसकी तह में उनका बीबीसी हिंदी से जुड़ाव और उसकी साख पर भरोसा साफ़ झलक रहा था.

एक सज्जन हमें पिछले 60 वर्ष से सुन रहे थे तो कुछ ऐसे भी थे जो दो या तीन दशकों से बीबीसी से जुड़े हुए थे. गोरखपुर विश्विद्यालय का एक ऐसा छात्र भी मौजूद था जिसने हमें दो साल पहले ही सुनना शुरू किया.

वहाँ मौजूद लोगों में से एक ने कहा, "मैं बीबीसी का दीवाना हूँ. आपके प्रसारण सुने बिना मैं सो नहीं पाता हूँ".

कुछ लोग 200-300 किलोमीटर की यात्रा कर के आए थे तो कुछ गोरखपुर के आसपास के गाँवों से वहाँ पहुँचे थे. चिलचिलाती धूप में, तापमान जबकि चालीस का आंकड़ा पार कर चुका था, उनकी वहाँ उपस्थिति बीबीसी के प्रति उनकी निष्ठा साफ़ ज़ाहिर कर रही थी.

वहाँ वकील थे, छात्र थे, एक पूर्व मंत्री थे और एक पूर्व विधायक भी.

एक श्रोता का कहना था कि वह अपने विचार खुल कर प्रकट नहीं कर पा रहे हैं, उन्होंने हमें काग़ज़ का एक पर्चा दिया जिस पर कुछ पंक्तियाँ लिखी हुई थीं. कुछ अन्य इसी बात से ख़ुश थे कि वे अपने जानेपहचाने उत्तर प्रदेश संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी और दिल्ली से गए रेहान फज़ल को 'साक्षात' देख पा रहे हैं.

गोरखपुर में श्रोताओं से मिलने पर यह स्पष्ट हो गया कि बीबीसी हिंदी सेवा की लोकप्रियता की वजह क्या है. जबकि भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसे विषयों की रिपोर्टिंग में व्यस्त है जो उनके लिए महत्वहीन है, बीबीसी से उन्हें वह मिलता है जो वे चाहते हैं, यानी ठोस, सटीक समाचार और गहन विश्लेषण.

हमारे कुछ कार्यक्रमों की भारी आलोचना हुई-जैसे फ़िल्मों पर आधारित 'टेक वन'. इसके साथ ही श्रोताओं के सवालों के जवाब उपलब्ध कराने वाले कार्यक्रम 'हमसे पूछिए' को दोबारा शुरू करने की मांग भी उठी. लेकिन साथ ही, इस बात को भी स्वीकार किया गया कि बीबीसी हिंदी को समय के साथ स्वयं को बदलना होगा.

यह एक यादगार और कभी न भूल पाने वाला अनुभव था. अब जबकि मैं दिल्ली लौट कर यह सब कुछ लिख रहा हूँ, बस इतना ही कह सकता हूँ कि श्रोताओं के प्रति मेरी और मेरी टीम की ज़िम्मेदारियों में कई गुना की बढ़ौतरी हो गई है.

ग़रीब के माथे पर तख़्ती

आपको 'दीवार' फ़िल्म का अमिताभ बच्चन याद है, जिसके हाथ पर लिखा होता है, मेरा बाप चोर है.

उसमें सलीम-जावेद ने एक ऐसे ग़रीब परिवार के साथ समाज में होने वाले व्यवहार की एक कहानी रची थी जिसका दोष सिर्फ़ ग़रीबी था.

लेकिन देश की सरकारों ने ग़रीबों को ज़लील करने का एक नया तरीक़ा ढूँढ़ निकाला है. मानों ग़रीबी की ज़लालत कम थी.

कम से कम दो राज्य सरकारों ने ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों के घरों से सामने एक तख़्ती लगाने का फ़ैसला किया है जिससे कि पहचाना जा सके कि वह किसी ग़रीब का घर है.

छत्तीसगढ़ की सरकार पहले से ऐसा कर रही थी और अब राजस्थान की सरकार ने भी इसी तरह का फ़ैसला किया है. सरकारों का तर्क है कि इससे लोग जान सकेंगे कि कौन सा परिवार सरकार की दो या तीन रुपए किलो चावल की योजना का लाभ उठा रहा है. उनके अनुसार इससे यह पहचानने में भी आसानी होगी कि टीवी,फ़्रिज और गाड़ियों वाले किन घरों के मालिकों ने अपने को ग़रीब घोषित कर रखा है.

लेकिन उन ग़रीबों का क्या जो आज़ादी के 63 साल बाद भी सिर्फ़ इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि इस देश की और प्रदेशों की कल्याणकारी सरकारों ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई? क्या सरकार को हक़ है कि वह ग़रीब रह गए लोगों का इस तरह से अपमान करे?

इन ग़रीबों ने सरकारों से जाकर नहीं कहा था कि उन्हें दो या तीन रुपए किलो चावल दिया जाए. एक तो वह राजनीतिक दलों का वोट बटोरने का तरीक़ा था. दूसरे वे जब ग़रीबी दूर करने का उपाय नहीं तलाश कर सके तो ग़रीब को ग़रीब रखते हुए सरकारी खजाने से अस्थाई राहत देने का तरीक़ा निकाल लिया. और अब इस बात पर सहमति भी बन रही है कि सरकारें ग़रीबों के माथे पर लिखवा दे कि वह ग़रीब है.

इससे दो बातें तो साफ़ है, एक तो यह कि चाहे वह भाजपा के रमन सिंह की सरकार हो या फिर कांग्रेस के अशोक गहलोत की सरकार, ग़रीबों के प्रति दोनों का नज़रिया एक जैसा ही है.

दूसरा यह कि जिन सरकारों को शर्मिंदा होना चाहिए कि वह ग़रीबी दूर नहीं कर पा रही हैं इसलिए मुआवज़े के रुप में दो या तीन रुपए किलो में चावल दे रही हैं, वही सरकारें ग़रीबों पर अहसान जता रही हैं.

जिस समय योजना आयोग के आँकड़े कह रहे हैं कि ग़रीबों की संख्या वर्ष 2004 में 27.5 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 37.2 प्रतिशत हो गई है, देश में किसानों की आत्महत्याएँ रुक नहीं रही हैं और जिस समय ख़बरें आ रही हैं कि ग़रीबी उन्मूलन का पैसा राष्ट्रमंडल खेलों में लगा दिया गया है.

उसी समय सरकारी आंकड़ों में यह भी दर्ज है कि देश के उद्योगपतियों और व्यावसायियों ने बैंकों से कर्ज़ के रूप में जो भारी भरकम राशि ली उसे अब वे चुका नहीं रहे हैं. यह राशि, जिसे एनपीए कहा जाता है, एक लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है. देश की सौ बड़ी कंपनियों पर बकाया टैक्स की राशि पिछले साल तक 1.41 लाख करोड़ तक जा पहुँची थी.

बैंकों का पैसा और टैक्स अदा न करने वालों में देश के कई नामीगिरामी औद्योगिक घराने हैं और कई नामधारी कंपनियाँ हैं. इन कंपनियों के मालिक आलीशान बंगलों में रह रहे हैं और शानदार जीवन जी रहे हैं. इनमें से कोई भी ग़रीब नहीं हुआ है. अपवादस्वरूप भी नहीं.

क्या किसी राज्य की सरकार में यह हिम्मत है कि वह किसी बड़े औद्योगिक घराने या किसी बड़ी कंपनी के दफ़्तर के सामने या फिर उसके मालिक के घर के सामने यह तख़्ती लगा सके कि उस पर देश का कितना पैसा बकाया है?

जिस तरह सरकार को लगता है कि ग़रीबों का घर पहचानने के लिए तख़्ती लगाए जाने की ज़रुरत है उसी तरह देश के आम लोगों का पैसा डकारने वालों के नाम सार्वजनिक करने की भी ज़रुरत है.

लेकिन सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं क्योंकि यही उद्योगपति और व्यवसायी तो राजनीतिक पार्टियों को चंदा देती हैं और यही लोग तो मंत्रियों और अफ़सरों के सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं.

अगर एक बार कथित बड़े लोगों से बकाया राशि वसूल की जा सके तो इस देश में ग़रीबी दूर करने के लिए बहुत सी कारगर योजना चलाई जा सकती है.

लेकिन साँप के बिल में हाथ कौन डालेगा और क्यों डालेगा?

शरद पवार जी के नाम पत्र!

ट्वेन्टी-20 विश्व कप में भारत की हार पर हो रही हाय-तौबा को देखते हुए मैंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के उपाध्यक्ष और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई में प्रभाव रखने वाले माननीय शरद पवार जी को एक खुला पत्र लिखने का फ़ैसला किया है.

आदरणीय शरद पवार जी,

आप जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की कमान सँभालने वाले हैं और क्रिकेट में.... नहीं-नहीं क्रिकेट के प्रशासन में जिस तरह का भारत का रुतबा है उसे देखते हुए मैं खेल में कुछ बदलाव की ज़रूरतों की ओर आपका ध्यान खींचना चाहूँगा.

भारत की एक अरब से अधिक की आबादी क्रिकेट के प्रति दीवानी है और अपना सब काम-धाम छोड़कर क्रिकेट में लगी रहती है, ऐसे में उसकी भावनाओं का ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए.

- भारत के खिलाड़ियों को आईपीएल के तुरंत बाद हो रही प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने पिछले साल इंग्लैंड और इस साल वेस्टइंडीज़ जाना पड़ा. इस तरह की यात्राओं से टीम थक जाती है. इसके अलावा इन देशों से कहीं ज़्यादा दर्शक स्टेडियम में भारत में पहुँचते हैं इसलिए विश्व कप जैसी प्रतियोगिताएँ अब से सिर्फ़ भारत में ही कराई जाएँ तो अच्छा रहेगा.

- उन देशों में जाने में एक और परेशानी है कि वहाँ कि कई पिचें उछाल वाली होती हैं इसलिए भारत हार जाता है और टूर्नामेंट से रुचि लोगों की ख़त्म हो जाती है.

- इसके अलावा उन देशों के मैचों के टाइम भारतीय टाइम से बिल्कुल मेल नहीं खाते और लोगों को देर रात तक जगकर मैच देखना पड़ता है.

- भारत के मैचों में बाउंड्री आईपीएल की ही तरह छोटी रखी जाए क्योंकि भारतीय खिलाड़ी उस तरह के मैदानों पर लोगों का अच्छा मनोरंजन कर सकते हैं.

- अन्य देशों के खिलाड़ियों को भारतीय खिलाड़ियों को शॉर्ट पिच गेंद डालने पर रोक लगा दी जानी चाहिए.

- आईपीएल के मालिकों को एक दिशानिर्देश जारी किया जाए. उन्हें अपनी टीमों में खेलने वाले खिलाड़ियों से एक और कॉन्ट्रैक्ट साइन कराना होगा. इसके तहत उनकी टीमों में खेलने वाले विदेशी खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मैचों में भारत के विरुद्ध नहीं खेलेंगे. इससे लसिथ मलिंगा, शेन वॉटसन, क्रिस गेल जैसे खिलाड़ियों से भारत को कुछ राहत मिल सकती है.

- फ़ील्डिंग में भारत पर शुरुआती ओवरों के जो नियम-क़ानून हैं वो लागू नहीं होने चाहिए.

भारत की वजह से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को और भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड को जितना आर्थिक फ़ायदा हुआ है उसके बाद कम से कम इतना तो भारत के लिए किया ही जा सकता है.

इसके बाद आप भी निश्चिंत होकर अपने मंत्रालय पर ध्यान लगा सकेंगे क्योंकि शायद तब भारत में हार जैसे विषय पर कोई हंगामा नहीं होगा और न ही आपको इस बारे में चिंता करनी पड़ेगी.

धन्यवाद-
मुकेश

नई पेशकश-पाकिस्तान का पन्ना

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|मंगलवार, 11 मई 2010, 18:18

टिप्पणियाँ (29)

बीबीसी हिंदी की सत्तरवीं सालगिरह. सोचा अपने पाठकों को कुछ नया दिया जाए. लेकिन क्या?

कुछ नए कार्यक्रम तो हाल ही में शामिल किए गए हैं. बीबीसी इंडिया बोल का आपने दिल खोल कर स्वागत भी किया है. हमारे श्रोता लगातार बड़ी तादाद में उससे जुड़ भी रहे हैं. ऑनलाइन के पाठक फ़ोरम के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं और सुझाव दे रहे हैं.

फिर ख़्याल आया हमारी साइट पर आने वाले कुछ ऐसा चाहते हैं जो औरों से अलग हो. अंतरराष्ट्रीय ख़बरों का गहन विश्लेषण और अगर वह विश्लेषण पड़ोसी देश की ख़बरों का हो तो कहना ही क्या.

बीबीसी के वरिष्ठ सहयोगियों को लगा कि हमारी वेबसाइट पर एक ऐसा पन्ना हो जो पूरी तरह पाकिस्तान पर केंद्रित हो और वहाँ के समाचारों और रिपोर्टों की गहराई से पड़ताल कर सके.

हिंदी सेवा प्रमुख अमित बरुआ विशेष तौर पर इसको लेकर उत्सुक थे. उन्होंने इस बारे में गहरी रुचि दिखाई और हम सब को लगा कि यह पन्ना हमारी साइट पर आने वालों को कुछ ऐसा दे पाएगा जिसकी वे बीबीसी से अपेक्षा करते हैं.

बीबीसी हिंदी की परंपरा रही है कि उसने हमेशा अपने श्रोताओं और पाठकों की रुचि और उनकी इच्छा का सम्मान किया है.

तो चलिए, मामले को और ज़्यादा उलझाए बग़ैर आपको सूचित कर देती हूँ कि हम अब एक नया पाकिस्तान का पन्ना आपके लिए ले कर आए हैं.

यानी अब पहले पन्ने, भारत, खेल, मनोरंजन, कारोबार, विज्ञान, ब्लॉग-फ़ोरम और बीबीसी विशेष के साथ आप पाकिस्तान पर विस्तृत सामग्री भी देख पाएँगे.

हमसे कहा जाता था कि भारत के पड़ोसी देश की कला-संस्कृति, वहाँ के तौर-तरीक़ों से पाठकों को परिचित कराया जाए. तो आपकी मांग को ध्यान में रखते हुए हम यह एक नया प्रयोग कर रहे हैं.

हमारा यह प्रयास आपको कैसा लगा और इस पन्ने पर आप और क्या चाहते हैं, लिखिएगा ज़रूर.

जूते की महिमा

यूँ तो जूता पैरों का परिधान है मगर इंसान के हाथों में पत्थर के बाद शायद ये पहला हथियार रहा होगा.

इसीलिए जब वह ग़ुस्से की अभिव्यक्ति करता है तो उसे जूता याद आता है.

प्रगति के साथ हथियार नए आ गए, फिर भी जूते का यह रुतबा न क्लाशनिकोव छीन सका और ना कोई बम-पिस्टल ऐसा कर सका. गाँव-देहात में जब कोई पंचायत जुड़ती है तो लोग अपनी औकात को नापने के लिए जूते का सहारा लेते हैं. अपने विरोधी को हैसियत को ये कहकर छोटा किया जाता है कि हम उसे जूते की नोंक पर रखते हैं या ये तो मेरे जूते बराबर भी नहीं हैं.

इंसान के दिल में जब किसी के प्रति नफ़रत होती है तो जूता उसके भावों को अभिव्यक्त करने में मदद करता है. इंसान कहने लगता है -"मैं उसके साथ जूते से पेश आऊंगा."

यानी इंसान के ज़हन में किसी को आँकने का पैमाना जूता हो गया.

जूता धमकी में भी सिरमौर है. लोग किसी के प्रति अपनी नाराज़गी व्यक्त करने के लिए भी जूते की मदद लेते हैं. कहेंगे- "मैं उसे भरी पंचायत में जूते से ज़लील करूँगा."

जूते और इंसान का रिश्ता शायद एक अरसे से रहा है. इसिलए जूते ने हमारे समाज में एक मुहावरे का रूप ले लिया और जूता गाहे-ब-गाहे लोक शब्दावली में ऐसे उतरा कि वो हालात बयाँ करने का सटीक ज़रिया बन गया. किसी की परेशानी को बयान करने लिए के ये कहना काफ़ी होता है कि अपने काम के लिए घूमते-घूमते उसकी जूतियाँ घिस गईं.

पर हाल के वर्षों में जूता हमारे राजनीतिक जीवन और सियासत की सभाओ में अपनी हाजिरी दर्ज करने में कामयाब हो गया है. हाल के दिनों में जूता कई बार सियासी जलसों में जम कर उछला. पत्रकार भी अपनी खबरों में लिखने लगे कि फलाँ दल के समारोह बैठक में जूतमपैजार हो गई. फिर इससे काम नहीं चला तो वे जूता चलाने भी लगे. एक पत्रकार साहब ने इराक़ में जूता चलाया तो हीरो बन गया और एक ने दिल्ली में चलाया तो नौकरी से हाथ धो बैठा.

जूता सभा-महफ़िलों के साथ रसोई तक भी पहुँच रखता है. तभी तो कहते हैं कि हमारा प्रिय आहार दाल जूतों में जगह पाने लगा है. दाल ने इसका कभी ऐतराज नहीं किया, यानी उसे जूते की सोहबत भा गई.

जूता हमारी बोलचाल से गली बनाता हुआ बॉलीवुड तक गया. तभी ये नगमा बना, 'मेरा जूता है जापानी...'

जॉर्ज बुश पर जैसे ही जूता उछला, तो जूते को एक बड़ा मंच मिल गया. लेकिन आज जूता हालत से लड़ते-लड़ते शायद ख़ुद कमज़ोर हो गया है.

मैंने चमड़े का जूता बनाने वाले एक कारीगर से जब जूते के कमज़ोर होने जिक्र किया तो वो ख़ुद जूते का दर्द बयाँ करने लगा, "जानवर को भी आज कल खाने को क्या मिलता है, उसकी ही चमड़ी से तो ये जूता बना है. कमज़ोर तो होगा ही."

लगता है कि इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर चप्पल ने जूते की जगह लेने की कोशिश शुरु कर दी है. तभी तो हाल ही में एक नेता पर जूते की जगह चप्पल उछाली गई.

कैसे समाज में रहते हैं हम

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 04 मई 2010, 03:40

टिप्पणियाँ (47)

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा ! ( आलोक धन्वा की कविता का अंश)

निरुपमा पाठक से मेरा कोई नाता नहीं था लेकिन उसकी मौत ने झकझोर कर रख दिया है. इसलिए नहीं कि वो पत्रकार थी. इसलिए भी नहीं कि वो आईआईएमसी में मेरी जूनियर थी और इसलिए भी नहीं कि वो अलग जाति में शादी करना चाहती थी.

मेरे दिलो दिमाग को ये बात परेशान किए जा रही है कि क्या सचमुच इज्जत के नाम पर निरुपमा की हत्या कर दी गई. पुलिस इस बात को मानती है और इसी आधार पर जांच भी चल रही है. निरुपमा हरियाणा के खाप पंचायतों के कोप का शिकार नहीं हुई. वो अशिक्षित नहीं थी. उसके परिवार को मध्ययुगीन रुढ़ियों में जकड़ा हुआ भी मानना संभव नहीं.

ये मुद्दा कुलीन हिंसा का है. निरुपमा का परिवार पढ़ा लिखा और तथाकथित संभ्रांत परिवार है. पिता राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी हैं. वो अपनी बेटी को पढ़ने के लिए दिल्ली भेजते हैं लेकिन बेटी जब अलग जाति में शादी करना चाहती है तो उसे सनातन धर्म का हवाला देते हुए कहते हैं, 'अपने धर्म एवं संस्कृति के अनुसार उच्च वर्ण की कन्या निम्न वर्ण के वर से ब्याह नहीं कर सकती. इसका प्रभाव हमेशा अनिष्टकर होता है.'

कुलीन हिंसा ख़तरनाक होती है खाप पंचायतों की हिंसा से. क्योंकि वो ख़ुद को सही साबित करने की पूरी कोशिश करती है और कई बार सफल भी होती है. ये मध्य वर्ग है जो आगे भी बढ़ना चाहता है लेकिन अपनी पुरानी सड़ी गली रुढ़ियों की जंज़ीरें तोड़ना नहीं चाहता है.

वो अपने बच्चे को पढ़ाता लिखाता है. आईएएस बनाना चाहता है लेकिन दूसरी बिरादरी में शादी नहीं करने देना चाहता. समझ में नहीं आता कैसा प्रगतिशील देश है हमारा जहां बाप अपनी बेटी की मौत पर आंसू नहीं बहाता और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को झुठलाते हुए कहता है कि बेटी ने आत्महत्या की है.

निरुपमा पत्रकार थी इसलिए उनके मित्रों ने मामले को ख़त्म नहीं होने दिया. वरना न जाने हर दिन बिहार, बंगाल, झारखंड, राजस्थान और पूरे देश में कितनी निरुपमाओं को जाति-बिरादरी के नाम पर बलि कर दिया जाता है.

हां ये ज़रुर है कि इसकी जानकारी कम मिल पाती है क्योंकि तथाकथित सभ्य समाज इस पर पर्दा डाल देता है.

आज निरुपमा की मां अपनी बेटी की हत्या के सिलसिले में गिरफ़्तार है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट साफ़ कहती है निरुपमा का गला घोंटा गया है. कहीं न कहीं कोई अपना ही ज़िम्मेदार है लेकिन लगता नहीं कि उन्हें इसका ज़रा भी अफ़सोस हैं क्योंकि उनके चेहरों पर जाति का दंभ साफ़ दिखता है.

निरुपमा ने और उसके अजन्मे बच्चे ने विजातीय प्रेम की बड़ी क़ीमत चुकाई है. निरुपमा ने तो जीवन के 23 साल देखे. प्रेम भी किया लेकिन उस बच्चे का क्या कसूर था जो उसके गर्भ में था. अगर निरुपमा के गर्भ में बेटी थी तो अच्छा हुआ वो दुनिया में आने से पहले ही चली गई क्योंकि ऐसे समाज में लड़की होकर पैदा होना ही शायद सबसे बड़ा गुनाह है.

मुझे घिन आती है ऐसे समाज में जिसमें हम ख़ुद को जन्म देने वाली नारी को भी मार डालने से नहीं चूकते हैं वो भी एक ऐसी पहचान ( जातिगत) जिसका कोई अर्थ नहीं.

अगर निरुपमा की हत्या हुई है तो उसके हत्यारों को सज़ा मिलनी ही चाहिए चाहे ये हत्यारे उसके अपने ही क्यों न हों..

जादूगोड़ा की याद दिलाता है दिल्ली का मामला

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 03 मई 2010, 13:41

टिप्पणियाँ (3)

कोबाल्ट 60 पर आजकल बड़ा बवाल है. रेडियोऐक्टिव पदार्थ है जो दिल्ली विश्वविद्यालय के लैब से मायापुरी कबाड़ी मार्केट पहुंचा. इस कोबाल्ट 60 ने एक की जान ले ली और कुछ को प्रभावित किया.

बड़ी ख़बर बनी और केंद्र सरकार ने संज्ञान भी लिया लेकिन रेडियोऐक्टिविटी का ये भारत में पहला मामला नहीं है.

झारखंड के जमशेदपुर से तीस किलोमीटर दूर जादूगोड़ा में यूरेनियम की खदान है और वहां पिछले चालीस सालों से लोग यूरेनियम कचरे के साथ जीवन यापन करने को मजबूर हैं.

शायद दिल्ली से दूर है जादूगोड़ा इसलिए वहां रेडियोऐक्टिव विकिरणों के प्रभाव पर कोई बवाल नहीं होता है.

जादूगोड़ा आदिवासी बहुल पहा़ड़ों से घिरी एक छोटी से कॉलोनी है जहां भारत की एकमात्र सक्रिय यूरेनियम की खान है. यूरेनियम निकालने के बाद बचे हुए कचरे को कारखाने के पास में ही फेंक दिया जाता है.

इस हज़ारों टन कचरे के पास बड़ी संख्या में लोग रहते हैं. चूंकि विकिरणों का प्रभाव धीरे धीरे गुणसूत्रों पर पड़ता है इसलिए यहां के बच्चों में अजीब तरह की बीमारियां पाई जाती हैं और गौर से देखने पर इन बीमारियों और हिरोशिमा के बच्चों में पाई गई बीमारियों मे समानता देखी गई है.

ये बात मैं नहीं कह रहा बल्कि न्यूकलियर साइंस से जुड़े वैज्ञानिक ऊर्जा नियामक बोर्ड से जुड़े पूर्व वैज्ञानिक इसे मान चुके हैं.

ग्रीनपीस ने इस पर रिपोर्ट लिखी है और कुछ वर्ष पहले ( जब झारखंड बिहार का अंग था) राज्य विधानसभा की पर्यावरण कमेटी ने जादूगोड़ा का दौरा करने के बाद भी यह बात मानी थी.

आज जादूगोड़ा की लड़कियों से जल्दी कोई शादी नहीं करना चाहता क्योंकि यहां मरे हुए बच्चे पैदा होने, गर्भ गिर जाने और आनुवंशिक रुप से विकलांग बच्चे होने की समस्या आम होती जा रही है.

ज़ाहिर है यूरेनियम खनन करने वाली कंपनी यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड इस मामले को दबाती हैं और आवाज़ उठाने वालों को धमकाती भी हैं.

दिल्ली से दूर का मामला है और शायद तथाकथित राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है तो केंद्र सरकार भी इस मुद्दे पर बहस से बचती है

कुछ समय पहले भारत सरकार ने न्यूकलियर बिल पर बहस की थी लेकिन वो पास नहीं हुआ.

इस बिल के तहत प्रावधान थे कि अगर किसी परमाणु संयंत्र के आसपास कोई घटना होती है तो लोगों का कैसे ख्याल रखा जाएगा.

इस बिल के विरोधियों का तर्क यह भी था कि विकिरणों का प्रभाव कई पीढ़ियों तक रहता है इसलिए मुआवज़े की व्यवस्था उसी प्रकार की होनी चाहिए.

ये बिल अभी पास नहीं हुआ है. मैं तो बस इतना जानना चाहता हूं कि जब सरकार पहले से भी विकिरणों से प्रभावित लोगों का ख्याल नहीं रख रही है तो किसी घटना के बाद कैसे ख्याल रखेगी ये तो भगवान ही जाने.

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