पागल दोनों तरफ हैं
शनिवार को कराची प्रेस क्लब गया तो वहाँ मेरे कुछ पत्रकार मित्र हिंदी और उर्दू भाषा के बीच हुए विवाद पर चर्चा कर रहे थे. मैंने कहीं पढ़ा था कि अमरीका में हिंदी पढ़ाने वाले एक अध्यापक घूमते घूमते दिल्ली से सड़क के रास्ते लाहौर पहुँच गए थे.
जब वो वाघा सीमा पार कर पाकिस्तान पहुँचे तो किसी व्यक्ति ने उनसे कहा, "आप तो ज़बरदस्त उर्दू बोल रहे हैं." "अच्छा! यह तो हिंदी है." अध्यापक ने कहा. उस व्यक्ति ने कहा, "नहीं यह उर्दू है." अध्यापक जी ने सोचा कि सीमा के उस पार यह भाषा हिंदी बन जाती है जबकि सीमा के इस पार यानी पाकिस्तान में उन्नीस बीस के अंतर के साथ उर्दू.
लेकिन लरकाना (सिंध प्रांत का शहर) के एक मेरे मित्र हमेशा कहते हैं कि हिंदी और उर्दू के विवाद ने वास्तव में ही हिंदुस्तान पर बंटवारा कर दिया था. टोबा टेक सिंह के सरदार भूपेंद्र सिंह जो आजकल अमृतसर में रहते हैं, उन के अनुसार वह बंटवारा तो पहला था और अब कुछ और बंटवारे भी शेष हैं.
सच बात तो ये है कि 62 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी बात से बात बनती नहीं बल्कि बिग़ड़ती ही चली जाती है. इतिहास भी कमाल की चीज़ है जिसकी गंगा उलटी बह निकली है. कल तक वह लोग जो युद्ध की बात करते थे वह आज अमन की आशा की माला जपना चाहते हैं. पाकिस्तान में कई लोग अमन की आशा को आशा भोसलें समझते हैं.
फेसबुक के माध्यम से बनी मेरी एक मित्र है. वो ऐसी पागल हैं कि आने वाले दिनों में कराची से दिल्ली तक शांति मार्च करना चाहती हैं. न केवल शांति मार्च बल्कि इस मार्च में वो भारत और पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के अंत के ख़िलाफ नारा भी लगाना चाहती हैं.
अब हुआ क्या है, जो यहाँ आईएसआई वाले हैं न, वह अपने सारे काम छोड़ कर उस महिला के पीछे लगे हुए हैं. न तालिबान, न अल-क़ायदा, न मुल्ला उमर, न हाफिज़ सईद और न ही ओसामा बिन लादेन बस एक महिला के पीछे लगे हुए हैं.
सीमा के उस ओर भी कुछ पागल रॉ वाले होंगे जो शांति के कबूतर या कबूतरी के पीछे लगे होंगे.
किसी कवि ने क्या ख़ूब कहा था
"बताना है कि सब पागल अभी पहुँचे नहीं अपने ठिकानों पर
बहुत से इस तरफ हैं और बहुत से उस तरफ भी हैं."

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बहुत बढ़िया कहा है.
हफ़ीज़ साहब आपका शीर्षक पढ़ते ही लगा मैंने आपका पूरा लेख पढ़ लिया. आपने जिस तरह से हिंदी और उर्दू व्यंग किया है और साथ में पागल शब्द का जो प्रयोग किया है वह बहुत अच्छा लगा. जैसे दायां हाथ बिना बाएं हाथ के कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार बायां हाथ बिना दाएं हाथ के कुथ नहीं कर सकता उसी प्रकार हिंदी और उर्दू है. रहा सवाल भारत और पाकिस्तान का तो दोनों देश की जनता और सरकारें आतंकवाद के खिलाफ़ एक-जुट संघर्ष करें तो अमन और शांति उर्दू और हिंदी की तरह क़ायम हो सकती है.
उम्मीदों के चिराग़ बुझे नहीं, अमन की आशा अभी बाक़ी है.
वजह वे कुछ पागल, जो इस तरफ़ हैं और उस तरफ़ भी हैं.
आपकी बात कुछ हद तक सही है.
हफ़ीज़ सर, आप कुछ भूल रहे हैं, देश का विभाजन उर्दू या हिंदी की वजह से नहीं हुआ था बल्कि धर्म के नाम पर दो देश बने थे, जहां तक उर्दू या हिंदी का सवाल है तो उर्दू भारत की ही पैदाइश है जो हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब के नाम से जानी जाती है. जय हिंद
हफ़ीज़ साहब बहुत शानदार लिखा आपने लेकिन काश आप अपनी उस दोस्त का नाम भी लिख देते जो आपको फ़ेसबुक पर मिली तो बेहतर होता. रहा सवाल दोनों देशों की भाषा का तो मेरा दावा है कि जबतक दुनिया रहेगी ये दोनों देश कभी भी शांति से नहीं रहेंगे क्योंकि दोनों तरफ़ से दिल साफ़ नहीं है, चाहे सरकार हो चाहे जनता.
आपने अच्छा ब्लॉग लिखा है,जब आप हिंदी और उर्दू की बात करते है, तो में कहना चाहता हूँ कि आज भारत में काफी लोग जिसकी भाषा उर्दू न हो ने के बावजूद इसे कुछ हद तक समज पाते है, इसका श्रेय हमें पुरानी हिंदी फिल्मे और गानों को देना होगा. जिसमें उर्दू का हिंदी के साथ इस्तेमाल होता था, रही बात पागलपन की, तो ये दोनों बाते पागलपन की ही है, युद्ध और शांति..में चाहता हूँ की शांति चाहने वालों का पागलपन ही जीते,क्यूंकि इसी में दोनों का भविष्य है,बाकि विनाश तो मुँह खोल के बैठा ही है...
हिंदी और उर्दू मेरे विचार में सिक्के के दो पहलू ही हैं.
चाचड़ भाई जहाँ तक सीमा के इस पार की बात है तो हमने तो कभी शांतिवादी के पीछे किसी को पड़ते हुए नहीं देखा. दिल्ली से लाहौर तक अगर शांति यात्रा निकलती है तो निकले हम भी उसमें शामिल होना चाहेंगे. हमारा देश अमनपसंद है. यह गाँधी का देश है. बीच-बीच में उन्माद के क्षण भी आये हैं लेकिन सचमुच क्षण भर के लिए. पाकिस्तान कोई दूसरा नहीं हम तो ऐसा ही मानते हैं लेकिन ताली एक हाथ से बजती नहीं. हमारे प्रधानमंत्री बस से लाहौर जाते हैं और उनकी कोशिशों को पाक सेना कारगिल में ले जाकर दफ़न कर देती है. अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है. बस पाकिस्तान हिंदुस्तान को खंडित करने का सपना त्याग दे हम तो फिर से एक देश बनने तक के लिए तैयार हैं.
कमाल की बात है कि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग भी उर्दू-हिंदी की समानता की बात करते हैं. ऐसा लगता है कि शुतरमुर्ग़ जैसी हालत है कुछ लोगों की, दुनिया जानती है कि उर्दू बनी है हिंदी और फ़ारसी के मिलने से और हिंदी से ही उर्दू पैदा हुई है तो फिर उनके मिलने पर इतना बवाल क्यों?
हफ़ीज़ भाई, सुंदर ब्लॉग लिखा है आपने, पर आपके ब्लॉग से ऐसा क्यों लग रहा है कि दोनों भाषाएं आमने-सामने आ गई हैं. देश के बटवारे का दोष दोनों ज़बानों पर डालना न्याय संगत नहीं लगता. आपने ठीक ही लिखा कि कुछ पागल हैं जो दोनों देशों में अमन और शांति चाहते हैं, मगर हफ़ीज़ भाई ये भी सच्चाई है कि दोनों देशों में अनेक पागल हैं जो न अमन चाहते हैं न एकता. फिर भी नफ़रतों के रेगिस्तान में इन पागलों का मिलना स्वाति की बूंद सा सकून देती है. बेहतरीन ब्लॉग के लिए कोटि कोटि मुबारकबाद.
कोई भी भाषा हो चाहे उर्दू या हिंदी इनमें लेन-देन चलता रहता है ये अपने पड़ोस की भाषा से शब्द लेते हैं और कुछ दिनों के बाद इनमें बहुत कम ही भेद रह जाता है जिस प्रकार सारी यूरोपीय भाषाएं आपस में काफ़ी समान हैं.
आ ग़ैरियत के पर्दे इक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिलादें, नक़्शे दुई मिटा दें
सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक न्या शिवाला इस देश में बना दें.
शक्ति भी शांति भी, भक्तों के गीत में है
धरती के बासियों की मुक्ति प्रीत में है.
हफ़ीज़ साहब मैं आपसे सहमत हूं.
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आपकी ओर पागलों की ज़्यादा संख्या है और हमारी ओर ऐसे कम लोग हैं. कृपया सेब की तुलना सेब से करें. भारत से पाकिस्तान का कभी मुक़ाबला नहीं हो सकता. अगर आपको ऐसा करने में अच्छा लगता है तो आप शौक़ से ऐसा करें, कोई आपको रोकेगा नहीं.
बात ये है कि आदमी को लड़ने के लिए कुछ चाहिए. मिसाल के तौर पर जब अफ़ग़ानिस्तान से रूसी चले गए तो वे आपस में ही लड़ पड़े. अब पाकिस्तान की ही बात लीजिए, पंजाबी मुहाजिर, सिंधी और बलूची या फिर शिया सुन्नी (अहमदी भी) नहीं तो सुन्नी में ही वहाबी, बरेलवी वग़ैरह वग़ैरह. लगता है कि आदम के ख़मीर में ही कुछ गड़बड़ है.
ज़बर्दस्त हवाई क़िला है. हफ़ीज़ साहब हम दो अलग अलग राष्ट्र हैं. आपने यह समझने में काफ़ी समय ले लिया है कि पागल दोनों ओर बस्ते हैं. आपके यहां चरमपंथी पैदा करने वाले वाक़ई पागल हैं. और भारतीय नेता जो शांतिपूर्ण ढंग से बात करते हैं और हत्यारों के ख़िलाफ़ कोई गंभीर क़दम नहीं ले पाते हैं वे सबसे बड़े पागल हैं.
भाई हफ़ीज़ चाचड़ जी, हिंदी में बावजूद के बाद भी नहीं लगता है. आपने लिखा है 62 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी.......। भविष्य में ख़्याल रखिएगा.
किसी ने लिखा है कि पाकिस्तान को भारत को तोड़ने का ख़्वाब देखना छोड़ देना चाहिए. उसे यू-ट्यूब पर तोगड़िया और एक आचार्य (शायद आचार्य नरेंद्र) का वीडियो देखना चाहिए. एक कहते हैं कि पाकिस्तान के 40 टुकड़े कर देंगे दूसरे कहते हैं कि जो हिंदू हित की बात करेगा वही इस्लामाबाद पर राज करेगा. यह मनुष्य की प्रवृति है कि वह अपनी बुराई नहीं देख पाता है और यह भावना हम भारतीयों में बहुत ज़्यादा है.
हिंदू भी मजे में हैं, मुसलमान भी मजे में हैं,
पर इंसान परेशां यहां भी है और वहां भी.
चाचड़ साहब ,
जिस अध्यापक की चर्चा आपने अपने लेख में की है , इसे यदि मैं आज से दो तीन साल पहले पढ़ता तो शायद यकीन नहीं करता. पिछले तीन साल से मैं यहाँ अमरीका में हूँ , मेरा जन्म राजस्थान के एक छोटे से जिले में हुआ
और उर्दू से मेरा दूर दूर तक कोई संपर्क नहीं रहा, पर दर्जनों पाकिस्तानी दोस्तों से ये सुन चूका हूँ कि मैं बहुत अच्छी उर्दू बोल लेता हूँ.
तो शायद आपका यह लेख काफी तर्कसंगत है, शायद हम लोग ही हैं जो इस तरह के विभाजन करने में लगे हैं जबकि मूल रूप से हमारी भाषा, भूषा और भोजन में कुछ भी अंतर नहीं.
काफी अच्छा लिखा है आपने.
हफ़ीज़ सर, आपकी टिप्पणी काफी जबर्दस्त है और यह सौ फ़ीसदी सही है. मैं आपकी बात से पूरी तरह से इत्तेफाक रखता हूं. लेकिन इस स्थिति के लिए दोनों ही देश दोषी हैं. हर कोई सिर्फ़ अपने ही फायदे की बात सोचता है.
पागलों ने कैसे-कैसे ख़्वाब देखें हैं,
जकड़ों बेड़ियों में इन दीवानों को,
कहीं पूरा करने की ज़िद न कर दें.
हफ़ीज़ साहब, बहुत सही लिखा है आपने. केवल एक बात मैं जोड़ना चाहता हूँ कि अमन पसंद आदमी, वहशियों को क्यों झेल रहे हैं? क्यों दोनों तरफ उनका विरोध नहीं हो पा रहा है?
भारत-पाकिस्तान का मूल तो धर्म रहा है, भाषा नहीं. यही वजह है कि भारत में आज भी उर्दू को मुसलमानों की भाषा नहीं माना जाता है. सारे लोग ज्यादा से ज्याद उर्दू बोलने की कोशिश करते हैं, लेकिन धर्म के नाम पर आज भी दरार है, दंगे होते हैं.
प्रिय चाचड़ साहब, काफी सुना था आपको रेडियो पर, आज रू-ब-रू भी. वाह जनाब देर आए दुरुस्त आए. चाचड़ साहब, अखंड भारत-पाकिस्तान पर एक सम्मेलन बुलाया जाना चाहिए. इसमें दोनों देशों, दुनिया और सभी विश्वविद्यालयों के नेताओं को आमंत्रित किया जाना चाहिए और उन्हें अपनी बात कहने का मौक़ा दिया जाना चाहिए. मुझे आज भी इस बात का यकीन है कि अखंड भारत-पाकिस्तान को अधिकांस लोग पसंद करेंगे. लोग साथ रहना पसंद करेंगे. अगर ऐसा हुआ तो अखंड भारत-पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में एक शक्ति होगा. दुनिया का कोई भी देश हमारी ओर बुरी नज़र से नहीं देखेगा. लेकिन हमारे पुराने नेता अपनी-अपनी खिंचड़ी अलग-अलग पका रहे हैं और पकाते रहेंगे. वे हमें केवल मरने और रोने के लिए छोड़ जाएँगे. मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.
आपने मेरे दिल की बात कह दी. आप जिएँ हज़ारों साल और साल के दिन हों 50 हज़ार.कभी सुना था कि सत्य और अहिंसा महफ़िल की जान हुआ करते थे. आजकल ये और इसके कवि पत्थर के बुत हो गए हैं. न हंसते हैं न रोते हैं.आंसू में दामन भिंगोते हैं. अब तो बापू के प्राण भी रोते हैं.
हफ़ीज़ चाचड़ जी, अबतक मैंने बीबीसी पर जितने भी ब्लॉग पढ़ें उनमें से यह सबसे अच्छा है. हफ़ीज़ जी मेरा आपसे अनुरोध है कि कट्टरवाद और समस्याओं की परवाह किए बिना आगे बढ़ें और दुनिया के युवा नेताओं की शांति संसद बुलाए. जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में हम एक साथ बैठेंगे.वहाँ से हम पूरी दुनिया के लिए संदेश देंगे कि हम एक हैं और एक रहेंगे. विश्वास कीजिए जिस दिन आप शांति संसद बुलाएँगे लोग और छात्र क्रांति कर देंगे.वे भ्रष्ट नेताओं को बाहर फेंक देंगे और यह शांति के लिए कुर्बानी देने लोगों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी. मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.
चाचड़ साहब, आपने यह नहीं बताया कि पागलों की परिभाषा क्या है? वे किस तरह के होते हैं? आपने एक तरह के पागलों की बात कही है, जो दिखने में पागल नहीं हैं. उन्हें समझदार पागल कहना ज्यादा उचित होगा. ऊर्दू और हिंदी के मिलन को कोई भी ताक़त अलग नहीं कर सकती है. यह तो उन मूर्खों वाली बात है जो कहते हैं, यह आबो हवा मेरी है, तेरी नहीं. लेकिन क्या कोई आबो हवा को अपनी बपौती बनाकर रख सकता है.
हफ़ीज साहब आपकी कोशिश सराहनीय है. आप जैसे लोगों को आगे आना चाहिए.
वाह चांचड़ साहब क्या ख़्यालात हैं आपके. अभी न पाकिस्तान में और न हिंदुस्तान में एसा कोई 'मसीहा' पैदा हुआ है. काश वह ख्वाब पूरा होता जो वो लोग देखते हैं जिसमें पूरा भारतवर्ष नज़र आता है.