बिहार के रास्ते पर झारखंड
टूटा हुआ हाईवे...... आती जाती ट्रकें......घुप्प अँधेरा.....और पास में ट्रक वालों से पैसा वसूलते नौजवान.....
हाइवे का ढाबा.....तेज़ आवाज़ में बजता संगीत...कारों में नशा करते अधेड़ उम्र के लोग (हथियारों से लैस)......
ये दो चित्र किस राज्य के हो सकते हैं......बिहार कहने से पहले ज़रुर सोचें.. ये नज़ारा बिहार का नहीं बल्कि बिहार से सटे झारखंड का है. वहां लंबे समय से पत्रकारिता में रहे लोग कहते हैं कि अब राज्य में इस तरह के नज़ारे आम हो गए हैं.
पिछले दिनों झारखंड से बस के रास्ते बिहार गया. क़रीब 14 घंटों के सफ़र में जो देखा जो सुना और जो समझा वो दुखद और परेशान करने वाला था.
पहले जब मैं इसी रास्ते पर बस से बिहार जाता था तो रात में ख़राब सड़कों पर नींद टूटती थी तो बस के लोग कहते थे. अरे चलो बिहार की सीमा में आ गए. इस बार बिहार की सीमा में प्रवेश करने के बाद ही सड़कें ठीक मिलीं.
कहते हैं 2004 के बाद सड़कों का निर्माण और रख रखाव ठप्प पड़ता जा रहा है याद आया पश्चिमी सिंहभूम के एक इलाक़े में सड़क के ठेके को लेकर मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा काफ़ी परेशान हुए थे.
ढाबों पर नशा करते लोग संभवत: छोटे ठेकेदार थे जो हथियारों से लैस भी थे यानी जान माल सुरक्षित नहीं. इनमें से एक भी आदिवासी नहीं था. महिलाओं के प्रति इन लोगों की भावना को घटिया ही कहा जा सकता था.
रास्ते में बस ख़राब हुई और अंधेरे में पांच घंटे रहने पड़े. बगल में नौजवान ( अधिकतर ग़रीब आदिवासी) ट्रक वालों से लूटपाट करने में लगे थे. इन पाँच घंटों में कभी पुलिस का कोई वाहन दिखाई नहीं दिया.
सड़कें नहीं.....क़ानून व्यवस्था नहीं और शायद रोज़गार भी नहीं. यह नवगठित राज्य जा कहां रहा है...
शायद बिहार के साथ भी यही हुआ होगा सालों पहले जब उसका गठन हुआ होगा. बर्बाद होते होते बिहार की यह हालत हो गई है कि अब थोड़ा सा भी विकास लोगों को बहुत अच्छा लगता है.
वैसे बिहार बदला है. झारखंड से बाहर निकलते ही सड़कें पहले से बहुत अच्छी हालत में मिलीं. समस्तीपुर से दरभंगा की सड़क इतनी अच्छी तो मैंने 30 वर्ष में कभी नहीं देखी थी.
दरभंगा जो पहले बहुत ही गंदा शहर था.. इस बार थोड़ा साफ-सुथरा लगा.. सच में यह सुखद आश्चर्य था.
ख़राब सड़कों के कारण दरभंगा से मुझे अपने गांव की दूरी तय करने में हमेशा तीन-साढ़े घंटे लगते थे लेकिन इस बार यह दूरी बस सवा घंटे में पूरी हो गई.
मेरे गांव में बिजली का कनेक्शन है लेकिन बिजली आती नहीं थी. पिताजी कहते हैं अब दिन में दो चार घंटे बिजली रहती है. शाम के कुछ घंटे लोग जेनरेटर की बिजली से काम चलाते हैं.
मेरा रिश्ता दोनों राज्यों से बराबर का है. किशोरावस्था से ही बिहार के बारे में बुरा सुनता रहा और बिहार में बुरा देखा भी लेकिन अब बिहार में स्थितियां बदल रही हैं और झारखंड बिहार (कुछ साल पहले) के रास्ते पर चल पड़ा है.
अगर किसी को ये शोध करना हो कि कोई राज्य कैसे बर्बाद होता है उसे झारखंड आना चाहिए. ये राज्य उदाहरण है कि कोई राज्य कैसे धीरे धीरे बर्बाद किया जाता है.

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आज बिहार अच्छी स्थिति में है लेकिन झारखंड में अभी भी पूरी तरह अव्यवस्था है. लालची नेता अपने हिस्से के लिए लड़ रहे हैं.
सुशील जी, बिहार के रास्ते झारखंड तो आपने ठीक कहा लेकिन नेपाल के रास्ते भारत के सीमावर्ती क्षेत्र जहाँ माओवादी पैर पसार रहा है, क्या यह कहना ग़लत है. मुझे तो यही लगता है कि नेपाल में जिस तरह माओवादी हावी हुए और सत्ता तक पहुँचे. कुछ इसी तरह का सपना भारत के माओवादी भी संजोए बैठे हैं. इसे देशहित में नासूर कहना ज्यादा मुनासिब होगा. झा जी यह भी तो बताइए कि ऐसे में सरकार जान-बूझकर कबतक अंजान बनी बैठी रहेगी. क्या सरकार माओवादियों को नेपाल की तरह सत्ता में शामिल कर देश के विकास में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करेगी. क्या झारखंड का भी अब बिहार की तरह विकास होने जा रहा है.
मैंने ब्लॉग पढ़ने के बाद फिर से इसका शीर्षक पढ़ा, क्योंकि मैं सोचता था कि आप बात कर रहे हैं बिहार के झारखंड के रास्ते पर बढ़ चलने की लेकिन आप बात कर रहे हैं झारखंड के बिहार के रस्ते पर बढ़ने की. इसका कारण यह था कि मेरे दिमाग में माओवाद प्रभावित झारखंड कि छवि है, इसलिए मैं सोचने लगा कि आप बिहार में बढ़ रहे माओवाद कि बात कर रहे हैं. इसलिए मैं विकास में आई गिरावट के बारे में सोच ही नहीं पाया. वैसे भी अब झारखंड को बरबाद होने के लिए कोई कारण नहीं बचा, अगर जल्द न संभला तो वह भारत का "स्वात" बन जाएगा. क्योंकि हमे शक है हमारी ओर से ही चुन कर भेजे हुए लोगों पर न की वहाँ कि जनता पर.
इस तरह का नकारात्मक बदलाव निसंदेह चिंताजनक है. वैसे भी सर जिस राज्य में मधु कोडा जैसा युवा नेता लालच में फंस कर क्या क्या कर जाता है, उसके भविष्य के बारे में तो सोचना ही होगा. आप समाज में इतने अंतर के साथ नही जी सकते कि एक के पास 100 नहीं और एक करोड़ों में खेले. अंतत: या तो चोरी चकारी होगी, लूटपाट, बेइमानी या फिर कोई नया आंदोलन. अच्छा प्रयास. थोड़ी और गंभीरता चाहिए थी.
सुशील जी, आपका ब्लॉग पढ़ कर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. आपने बिहार और झारखंड का सही चित्रण किया है. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ.
सुशील जी बदलता बिहार और टूटे झारखंड का जो चित्रण आपने किया है, निसंदेह ध्यान आकर्षित करने वाला है. आज झारखंड के साथ जो कुछ भी हो रहा है एक समय बिहार इसका साक्षी रहा है. मैंने स्वंय वो सब कुछ अपनी आंखों से सामने होते देखा है कि कैसे बिहार गर्त में चला गया था और उसे ले जाने वालों को क्या हाल हुआ. बिजली, सड़क और अपराध एक बड़ी समस्या बन चुकी थी.
सुशील जी आपने सच कहा है. सड़क नहीं, कानून व्यवस्था नहीं, रोज़गार नहीं. आख़िर झारखंड कहां जा रहा है. तरक़्क़ी के किस रास्ते पर क़दम बढ़ा रहा है ये राज्य. बिहार और झारखंड की तुलना में एक बात सामने आती है कि दोनों राज्य में राजनीतिक स्थिरता की स्थिति अलग-अलग है. झारखंड राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है और इसका विकास पर प्रभाव पड़ रहा है.
शीर्षक ही पूर्वाग्रही है। बिहार को हर बुरी चीज के लिए उदाहरण के तौर पर पेश करने की मानसिकता हमें बदलनी पड़ेगी। इसतरह की भाषा शैली से ऐसा लगता है कि तमाम बुराईयां बिहार की धरती से पैदा हुई और बाद में वो दूसरे प्रदेशों को भी अपने चपेट में ले रही है। दूसरे प्रदेश दूध के धुले नहीं हैं, लेकिन हम जैसे मीडियाकर्मियों ने बिहार को कुछ ज्यादा बदनाम कर दिया है। बात दूसरे प्रदेशों की भी करनी हो.. तो बिना किसी वजह के बिहार को शामिल कर लेते हैं। राजधानी दिल्ली में सरेआम चलती कार पर लड़की से बलात्कार हो जाता है, सरेआम तेजाब फेंकने की कई घटनाएं हो जाती है.. सबसे ज्यादा पुलिस सुरक्षा वाली राजधानी में तमाम चीजें हो रही हैं, लेकिन पत्रकारिता की कथित धारदार कलम बिहार के खिलाफ ही चलती है। बिहार में अब भी एक मामला ऐसा नहीं दिखता कि कोई सरेराह किसी लड़की के छेड़ दे और पास वाले तमाशबीन बने रहें, दिल्ली में हर चौक-चौराहे पर,बसों में ये चीजें दिख जाएंगी। बिहार में कई ऐसी चीजें थी और अब भी हैं, जिसे नहीं होनी चाहिए.. लेकिन इसकदर महज एक प्रदेश को बदनाम करने की मुहिम से कुछ नहीं होने वाला है। सिर्फ बुराई का जाप करने भर से बुराई खत्म होने वाली नहीं। अच्छा होता- आप लिखते- क्राइम की राह पर झारखंड.......सबसे तकलीफदेह बात ये है कि हम बिहार के लोग ज्यादा ही बिहार को बदनाम करने में आगे रहते हैं। सुपर-30 दुनिया भर में नाम कर रहीं है.. तो कुछ लोगों पचा नहीं पा रहें हैं, तो फेसबुक से लेकर तमाम कम्युनिटी वेबसाइटों पर उसके खिलाफ मुहिम छेड़ दी गई है। बिहार के नाम के साथ उन्हें सिर्फ बदनामी का दाग की रास आता है। बख्श दो बिहार को !
मैं धीरज वशिष्ठ जी की बात से शत् प्रतिशत सहमत हूँ. मीडिया वालों ने बिहार की छवि को बर्बाद करने की कोशिश की है. मानसिकता ही ऐसी हो गई है. बिहारवासी को किन चीजों की आवश्यकता है उसपर कभी किसी ने गौर नहीं किया. जो आने वाले दिनों के लिए सबसे खतरनाक साबित हो सकती है. अगर लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा तो वह क्या नहीं करेगा, माओवादी, आतंकवादी को साथ देगा. उसे जीने के लिए धन चाहिए, चाहे किसी भी तरह से आए. अगर ऐसी ही मानसिकता रही तो देश का भगवान ही भला कर सकता है. बहरहाल पत्राकारों को बिहार की सच्ची तस्वीर पेश करनी चाहिए. विकास का उपायों का सुझाव देना चाहिए.
मित्र, कहने की बात है,
झारखण्ड की बुनियाद जिन पत्थरों से बनी
राज्य के सफल होने की उम्मीद काफी थी,
लेकिन, मुहाफ़िज़ों के हाथों ये राज्य लुट गया . . .
अब ये असफल राज्य है. . .
बिहार अपनी पहचान बदल रहा है. . .
कोइ शक!
बिहार और झारखंड का चित्रण बहुत ही अच्छा है. पिछले हफ़्ते मैं भी बिहार और झारखंड के दौरे पर था और आप जैसा ही अनुभव मिला, लेकिन उसमें थोड़ा फ़र्क़ था. इस समय लोगों की सोच बदल रही है और वो सकारात्मक सोच बढञी है. लोग मामूली परिवर्तन के साथ बदल रहे हैं.
जो कुछ समय पहले तक बिहार का ही हिस्सा था, उसके बारे में ऐसा कैसे कह सकते हैं? ये कहा जा सकता है कि दोनों राज्यों के पुनर्गठन के बाद बिहार तो तरक्की की राह चल पड़ा है जबकि झारखंड अभी जस का तस है या उससे भी खराब स्थिति कि तरफ़ उन्मुख है.
बिहार और झारखंड का आज जो हाल है, वो सिर्फ और सिर्फ सरकारों का ही दोष है. वरना हर व्यक्ति चाहता है कि वो तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़े. जब रोजगार नहीं मिलेगा, शहर-गांव में बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी, तो अव्यवस्था तो फैलेगी ही.
सुशील जी, आपकी कलम वर्दी वालों पर क्यों नहीं लिखती है जो खुलेआम अपराधियों की तरह जनता से पैसा और धन वसूल करते हैं.
सुशील जी, मेरा भी झारखंड और बिहार से संबंध बहुत कुछ आपके जैसा ही है. अभी पिछले ही हफ़्ते मैं भी इन दोनों राज्यों से होकर आया हूं. आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं. जहां बिहार में हो रहे बदलाव सुखद लगे वहीं झारखंड ने हताश किया.
अपने सफर में जिस हाइवे का जिक्र आपने किया है उसे सिर्फ टूटा हुआ कहकर वहां के कर्ताधर्ताओं का आपने सम्मान बढ़ाया है. दरअसल कुजू इलाके में हाइवे के नीचे की भूमिगत कोयला खदान धंसने से पिछले डेढ़ साल से वहां कोई सड़क ही नहीं है. जी हां, राज्य के सबसे व्यस्त हाइवे पर तकरीबन एक किलोमीटर का हिस्सा नदारद है. वहां से किसी तरह गाड़ियां सुरक्षित निकाल ले जाने वाले ड्राइवरों के लिए मैं बीबीसी के माध्यम से सरकार से परमवीर चक्र जैसी किसी वीरता पुरस्कार की मांग करता हूं.
यह समस्या सिर्फ़ बिहार की ही नहीं बल्कि यूपी की भी है. मैं जीएलए इंजीनियरिंग कॉलेज, मथुरा का छात्र हूं. रात में जब भी मैं रात में आटो पकड़कर कॉलेज कैम्पस में आता हूं, तो मैं अक्सर देखता हूं कि नेशनल हाइवे-2 पर कई पुलिसकर्मी बिना किसी वजह के पैसा वसूल रहे हैं. मैंने देखा कि आटोरिक्शा वाले के पास गाड़ी के सभी जरूरी कागजात मौजूद थे, बावजूद इसके पुलिस वाले ने 100 रुपए लेने के बाद ही उसे जाने दिया. इस शर्मनाक स्थिति से निपटना ही होगा.
आपको इस बात को भी देखना होगा कि बिहार में अफसरों में रिश्वतखोरी कितनी तेज बढ़ रही है. इसके अलावा, बिहार के माननीय मुख्यमंत्री को बिहार की सड़कों पर भी ध्यान देना होगा.
सुशील जी, बिहार बंगाल से 1912 में ही अलग हो गया था. जब देश को आज़ादी मिली उस समय बिहार प्रति व्यक्ति आय में देश में दूसरे स्थान पर था. चीनी उत्पादन में दूसरा और लाह में इसका पहला स्थान था. और भी कई क्षेत्रों में इसका योगदान काफी महत्वपूर्ण था. समस्या तब शुरू हुई जब योजनाओं में बिहार की हिस्सेदारी काफी कम कर दी गयी. यह पहली पंचवर्षीय योजना से ही शुरू हो गया. सबसे ज्यादा दुर्गति लालू-राबड़ी के शासन में देखने को मिली. इन्होंने बिहार का ऋणात्मक विकास शुरू किया और राज्य बर्बाद हो गया.
एक लोकतंत्र की यही विडंबना है कि एक चुना हुआ नेता किसी तानाशाह की तुलना में कहीं अधिक नुकसान कर सकता है. बिहार में लालू, झारखंड में कोड़ा, मध्य प्रदेश में दिग्विजय और उत्तर प्रदेश में माया को घड़ी की सुइयों को पीछे लेना में महारत हासिल है.
इस समय तो यही कथनी याद आती है कि "एक ने कही दूसरे ने मानी दोनों का ज्ञान दोनों ज्ञानी "! वो कहते हैं न कि अतीत पीछा नहीं छोड़ा करता भले ही कोई लाख कोशिश कर ले. अगर अतीत स्याह हो तो और भी काली परछाई बनकर पीछा करता है ! दुखद पहलू है कि हीरे मोतियों से पटी माटी की यह दुर्दशा. वाह रे राजनीति!
बिहार सच में बदला है और झारखंड पुराने वाले बिहार की ओर रुख कर रहा है.
प्रिय सुशील जी, आपके ब्लॉग से ऐसा लगता है कि आप बिहार के अपने बुरे अनुभव से अभी तक बाहर नहीं आ सके हैं. मुझे आशा है कि विकास के रास्ते सोच में विस्तार आएगा और उससे बिहारी अपने आपको आत्मसम्मान और गर्व के साथ पेश कर सकेंगे. आशा करता हूं कि मीडिया वाले सामाजिक स्तर पर फैली नज़ाकत और संवेदनशीलता को समझ कर ही उसपर टिप्पणी करेंगे.
ये हक़ीक़त है. भला हो उन लोगों का जिन लोगों को कम से कम शर्म तो आती है और अपनी टिप्पणियों में उसका विरोध भी दर्ज कराया है, लेकिन क्या ऐसा करने भर से ही झारखंड की छवि सुधर जाएगी. सभ्य सभी को होना पड़ेगा. और न केवल झारखंड या बिहार बल्कि पूरे देश को ये मानना पड़ेगा कि हम भले इंसानी सभ्यता से लबालब हैं लेकिन "इंसानियत और ईमानदारी वाली सभ्यता से कोसों दूर हैं.... मानना सीखें और सुधार करें."
आपके इस स्तंभ का शीर्षक ग़लत है इसे इस तरह होना चाहिए..."बिहार सच में बदला है और झारखंड पुराने वाले बिहार की ओर रुख़ कर रहा है."
इस स्थिति को सुधारने के लिए हमें कुछ गंभीर क़दम उठाने की ज़रूरत है. लेकिन दुख की बात यह है कि केंद्र सरकार भी इस पर ध्यान नहीं दे रही है. इसके लिए केवल राजनीतिज्ञों को ही दोष नहीं दिया जा सकता है. वे सबके सब अनपढ़ हैं और उनसे किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति जैसे व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते हैं. जनता को जागरूक बनाने की भी ज़रूरत है.
सुशील जी, आपका आंकलन सही है. बिहार को अब जाकर शासन-प्रशासन मिला है. झारखंड राज्य तो बन गया लेकिन अभी तक वह शासन-प्रशासन से वंचित है. बिहार को बर्बाद करने वाली शक्तियाँ बिहार में तो कमज़ोर हुई हैं लेकिन झारखंड में वे बरक़रार हैं.
यह बुरी राजनीति का नतीजा है. अगर कोई युवा राजनीति में आना चाहे तो उसका बूढ़े नेता स्वागत नहीं. वे सिर्फ़ अपने परिवार के लोगों को राजनीति में लाना चाहते हैं. या वे उसी युवक को बढ़ावा देते हैं जिनसे उनका लाभ हो. जब हमारे नेता अपने लाभ के बारे में सोचते रहेंगे उस वक़्त तक देश की तरक़्क़ी कैसे होगी.
पिछले दिनों मैं झारखण्ड और बिहार के दौरे पर था .आपने सच ही लिखा है की झारखण्ड पुराने वाले बिहार के रास्ते पर है.१००% सच मानिये इसका सारा दोष यहाँ के राजनीतिक नेताओं का ही है .किसी भी राजनीतिक दल के नेता को झारखण्ड की फिक्र नहीं है सिर्फ अपने स्वार्थ की फिक्र है. इसी कारण पिछले दिनों झारखण्ड में सरकार बनते बनते रह गयी .किन लोगों ने सरकार बनने में रोड़े अटकाए इसका अंदाजा तो है लेकिन सबूत के आभाव में मैं दावा नहीं कर सकता. यदि इस बात की पड़ताल की जाये तो राजनीतिक क्षेत्र में हंगामा खड़ा हो सकता है.
पिछले दिनों मैं बिहार भी गया था, वहां तो बदलाव के बयार बह रहे हैं. जहाँ कुछ भी नहीं था वहां अब कुछ दिखने लगा है जैसे--- जहाँ कच्ची सड़कें थीं वहां अब मक्खन जैसी चिकनी पक्की सड़कें नज़र आ रही हैं.जहाँ सालों से प्राथमिक स्वास्थ्या केंद्र लगभग खंडहर जैसी हालत में थे वो प्राथमिक स्वास्थ्या केंद्र पुरे साजो सामान के साथ काम कर रहे हैं. लेकिन यह बात भी लोगों से सुनने को मिली कि बिहार में उच्च स्तर पर अफसरों का भ्रष्टाचार बढ़ा है. बीबीसी ने भी अपनी एक रिपोर्ट में यह बात उजागर की है.
आज बिहार कोई पिछड़ा राज्य नहीं रहा. एक अच्छा मुख्यमंत्री सीमित संसाधनों से भी समाज में बदलाव ला सकता है. बिहार में आज हर कोई बदलाव का बयार महसूस कर रहा है.
मैं आपके विचारों से सहमत हूं. मैं समस्तीपुर का रहने वाला हूं और पिछले 15 वर्षों में हमने यहां कोई विकास नहीं देखा है. लेकिन राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री ने काफी सराहनीय काम किया है.
जहां साल भर सरकार नहीं चल पाती है, वहां सड़क की बात करना भी हास्यास्पद है.
झारखंड की समस्या अलग है. ये इस बात का संकेत है कि आदिवासी समाज के साथ इस देश में कैसा व्यवहार किया जाता है. ऊंची जाती के साथ-साथ ओबीसी और दलितों ने राजनीति करने के हथियार तैयार कर लिए हैं लेकिन आदिवासी आज भी इससे दूर है. लेकिन दुख की बात यह है कि आदिवासी नेताओं ने भी अपने समाज और क्षेत्र को बढ़ाने के लिए कोई ख़ास काम नहीं किया.
यह कहना सही नहीं होगा कि बिहार अपनी तरक्की बरकरार रख पाएगी.
जब झारखंड का गठन हुआ था तो लोगों में एक बदलाव की आशा थी. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और माओवादियों के प्रकोप ने राज्य का बंटाधार कर दिया है.