पुलिस, प्रशासन और आलोचना
भाषण अक्सर उबाऊ होते हैं क्योंकि सुनने वालों को मालूम होता है कि बोलने वाला अपनी ही बातों पर यक़ीन नहीं करता.
अगर लिखित भाषण की कॉपी पढ़नी हो तो यह और भी बोझिल काम है मगर कुछ दिन पहले पुलिस की भूमिका पर केंद्रीय गृह मंत्री का पूरा भाषण पढ़ गया.
गृह मंत्री पी चिदंबरम की एक बात ने मेरी दिलचस्पी जगा दी, उन्होंने पुलिस वालों से कहा-'अपनी वर्दी गर्व से पहनिए.'
पता नहीं, कितने पुलिस वाले होंगे जिन्होंने गर्व और रौब का अंतर समझा होगा, कितने होंगे जिन्होंने दाग़दार वर्दी को गर्व करने लायक़ बनाने के बारे में सोचा होगा.
गर्व करने की वजह बताते हुए गृह मंत्री ने उनसे कहा--"भले ही आप लोगों को हर तरफ़ से आलोचना का सामना करना पड़ता है, आम नागरिक, वकील, जज, पत्रकार, टीवी एंकर, एनजीओ वाले सभी आपकी निंदा करते हैं लेकिन मुसीबत पड़ने पर हर किसी की पुलिस की ज़रूरत महसूस होती है".
उन्होंने कहा कि "पुलिस की मौजूदगी से ही लोग आश्वस्त हो जाते हैं, पुलिस की तैनाती से क़ानून-व्यवस्था क़ायम हो जाती है क्योंकि पुलिस वाले मददगार दोस्त और रक्षक हैं".
आम जनता गृह मंत्री से कितनी सहमत होगी इस पर शायद बहस की भी गुंजाइश नहीं है, न जाने कितने पुलिस वाले उनकी बातों को सच मान रहे होंगे.
उन्होंने पुलिस वालों से कहा-"आप आलोचनाओं से न घबराएँ, जो कई बार सही, लेकिन अक्सर ग़लत होते हैं."
गृह मंत्री का काम ही है पुलिस का मनोबल बढ़ाना, चिदंबरम साहब से उम्मीद भी नहीं की जा रही थी कि वे पुलिस की वैसी ही आलोचना करें, जैसी दूसरे करते हैं.
चिदंबरम चिंतित हैं कि देश में पुलिस वालों और थानों की भारी कमी है, उन्होंने ये भी कहा कि एक अरब से अधिक वाले देश की 'पुलिसिंग' बहुत कठिन काम है जबकि देश में माओवादी हिंसा जैसी बड़ी चुनौती सामने खड़ी है.
देश के गृह मंत्री को पुलिस से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि पुलिस उनकी बात मानती है, पुलिस के तौर-तरीक़ों में किसी बदलाव की ज़रूरत उन्हें नहीं महसूस हो रही है.
जो लोग पुलिस की मौजूदगी में सुरक्षित और आश्वस्त महसूस नहीं करते, यह उनकी निजी समस्या है, देश के गृह मंत्री उनके लिए कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनकी नज़र में तो ऐसी कोई समस्या है ही नहीं.

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राजेशजी आपने सच लिखा है. गृह मंत्री की बात से में तो सहमत नहीं हूँ कि पुलिस की मौजूदगी से हमें सुरक्षा का एहसास होता है. मुझे शोले फ़िल्म का डायलाग याद आ रहा है कि गब्बर से खुद गब्बर रक्षा करेगा न कि ये दो आदमी. अगर पुलिस करना शुरू किए जाएं तो जगह कम पड़ जाएगी.
चिदंबरम साहब ठहरे नेता, उन्हें ग़रीबों के दुख का क्या पता, पुलिस के जुल्मों का शिकार न जाने कितने निर्दोष हुए हैं. डीजीपी राठौर का उदाहरण ताज़ा है. हकीकत ये है कि पुलिस को जुल्मों के लिए ही जाना जाता है.
राजेशजी गृह मंत्री ने सही कहा है. गृह मंत्री का काम ही है पुलिस का मनोबल बढ़ाना, चिदंबरम से उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि वे पुलिस की आलोचना करें.
आपने बिल्कुल सही कहा है कि वे जिनको पुलिस के होते होए कोई सुरक्षा नहीं जो पुलिस की वजह से तंग हैं, उनके दर्द को कोई समझने को तैयार नहीं है, यह बात तो हम भी मानते हैं कि पुलिस का काम देश की आंतरिक सुरक्षा करना होता है, जनता की हिफ़ाज़त के लिए हज़ारों लाखों पुलिस बल भर्ती किए जाते हैं, पुलिस को ही देश की अंदरुनी सुरक्षा प्रणाली चलाना होती है, जहाँ अच्छी पुलिसंग होती है वहाँ जनता सुकून से रहती है, लेकिन ये कड़वा सच है कि पुलिस हमारे देशों में जनता की सेवा कम उनके लिए समस्याएँ ज़्यादा पैदा करती है, पाकिस्तान हो या भारत जैसे दोनों देशों की जनता की सोच एक है लगता है पुलिस की सोच भी एक है, मैं तो यहाँ तक कहने को तैयार हूँ कि पुलिस की सोच की वजह से कानून अब उस मकड़ी के जाल की तरह बन गया है जिसको ताक़तवर तो अपनी ताक़त के बलबूते पर तोड़ कर चला जाता है लेकिन मेरे जैसा ग़रीब तोड़ने की कोशिश करता है तो सारी उमर की लिए उन सुरक्षा बलों से परेशान होता रहता है, कहना चाहिए या नहीं लेकिन ये हक़ीकत है कि पुलिस की इस सोच की वजह से हमारा थाने के थाने बिक जाते हैं, क्या ये सच नहीं है कि हमारे देश में जहाँ ये मंत्री और नेता लोग कहते हैं कि पुलिस लोगों की सेवा और सुरक्षा के लिए है. वहाँ आम जनता पुलिस थाने जाते हुए घबराती है, हमारी पुलिस का आचरण भी तो ऐसा है कि लोग थाने की दीवार के नज़दीक से भी गुज़रने से डरते हैं. ये मंत्री भले पुलिस का का मनोबल बढ़ाएँ क्योंकि पुलिस इनकी सुरक्षा के लिए ही है, आम जनता तो घर से चोरी किए हुए सामान कि वापसी के लिए भी थानों का चक्कर काट काटकर, थक हार कर मायूस हो कर घर लौट आती है.
ये भी सच है कि सब पुलिस वाले एक जैसे नहीं होते लेकिन जब तक पुलिस को बदनाम करने वालों को निकाल कर बाहर नहीं फेंक दिया जाता पुलिस को जनता इस तरह ही देखती रहेगी. क्योंकि जनता के दिए हुए टेक्स के पैसे से ही पुलिस का सिस्टम भी चलता है इस लिए उन की धर्म केवल मंत्रियों या प्रधानमंत्रियों को सत्कार करना उनको सलाम करना उनकी ङी सुरक्षा करना नहीं है हम जैसे आम लोगों की भी देखभाल करना हैं।
राजेश जी, आपने बढ़िया ब्लॉग लिखा है. आपने चिदंबरम साहब के भाषण के बहाने पुलिस व्यवस्था की प्रासंगिक समस्याओं को उठाया है. यह सही है कि पुलिसवालों का मनोबल उठाए जाने की ज़रूरत है. उन्हें ज़रूरी सुविधाएँ, काम की बेहतर स्थितियाँ, अच्छे हथियार और सही प्रशिक्षण की ज़रूरत है. लेकिन उस भय का क्या होगा जो आम आदमी को पुलिस थानों की ओर जाने से बार-बार सोचने को मज़बूर करता है. उस व्यवस्था का क्या होगा जिसमें एक एफ़आईआर लिखवाने के लिए लोगों को काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं. उस मानसिकता का क्या होगा जिसमें एक पुलिसवाला अपनी वर्दी को रौब जताने का न जाने कितना बड़ा माध्यम समझता है. इन बातों पर भी उतनी ही शिद्दत से ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है जितना की उनका मनोबल बढ़ाने के लिए.
यह ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. लगा कि किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया है. भारत में पुलिस वालों से सुरक्षा मिलना तो दूर उनसे बात करना भी कठिन है. अपने घमंड में रहने वाले ये पुलिसवाले किसी की भी इज्जत उतार सकते हैं. हमेशा गाली देकर बात करना और चमचागिरी पसंद ये लोग बिना रिश्वत के सहायता भी नहीं करते हैं. यह एक ऐसा विभाग है जो क़ानून का सहारा लेकर आम लोगों का खून चूसते हैं. किसी ने सच ही कहा है कि पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी.
हम लोग बहस कुछ इस तरह करने लगे हैं जैसे एक पक्ष बिल्कुल उजला है और दूसरा काला. आज पुलिस जैसे भी है, उसपर आम लोगों विश्वास नहीं करते हैं. इसके पीछे कारण हज़ार हैं. लेकिन इसके दो प्रमुख कारण है, एक है नेता और दूसरी ख़ुद जनता. शायद आपको मालूम हो कि नेता पुलिस के लिए धन उगाही का टॉरगेट तय करते हैं. वहीं जनता घूस के रूप में प्रलोभनदेती है. ऐसे में कौन है जो पैसे और पॉवर को ना कहे. मुझे लगता है कि ऐसे लोग बहुत कम होंगे.लेकिन क्या इससे सचमुच कुछ फर्क पड़ेगा. बदलाव चाहिए तो हर एक को बदलना पड़ेगा. सोच और कर्म दोनों में ईमानदारी की जरूरत है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा.
राजेश जी आपने जो व्यंग किया है, वह सौ फ़ीसदी सही है. गृहमंत्री ने पुलिसवालों को बधाई दी है. वह ठीक भी है. अब पुलिस वालों को चाहिए कि वे अपनी छवि बदल लें. ग़रीबों को पेट पालने के लिए छोटी-मोटी चोरियाँ करनी पड़ती हैं. पुलिस उन ग़रीबों को बहुत अधिक यातनाएँ देती है. मैं पुलिस वालों से अपील करता हूँ कि वे उनकी समस्याओं को दूर करने की कोशिश करें. जब इन ग़रीबों को जेल भेजा जाता है तो जेल में बंद बड़े अपराधी उनकी जमानत करवाकर उन्हें शातिर चोर और अपराधी बना देते हैं. पुलिस महकमें को इस बात पर विचार करना होगा कि कोई ग़रीब अपराधी न बनने पाए.
वास्तव में पुलिस का काम बहुत संजीदा होता है, जब हम विश्व के अन्य देशों की पुलिस से तुलना करें तो मालूम होगा कि वहाँ पुलिस से लोग डरते हैं और सुरक्षित भी महसूस करते हैं, जब की यहाँ पुलिस को डर और शंका की नज़र से देखते है,क्योंकि कई बार शिकायत से लेकर तहकीकात और केस के दौरान भ्रष्टाचार और ऊपरी दबाव पुलिस की आगे की दिशा तय कराती है, गाँव और छोटे शहेरों में तो इससे भी बुरा हाल है, ज़रूरत किसी सिस्टम में बदलाव की नहीं है, गृहमंत्री को चाहिए की कड़े कदम भ्रष्टाचार के खिलाफ और नौकरशाही के खिलाफ उठे बाकि चाहे कितना भी करलो,सब बेकार है.
नागरिक समाज को बचाए रखने के लिए पुलिस और सेना जरूरी तत्व हैं. पुलिसवाले भी भारतीय समाज के हिस्सा हैं.वे किसी दूसरे ग्रह से नहीं आते हैं. उनमें भी वे सभी बुराइयां है जो कि एक आम आदमी में होती हैं. पुलिसवालों का नेता दुरुपयोग करते हैं. पुलिस में भ्रष्टाचार और व्यवस्था का एकमात्र कारण राजनीतिक दबाव है. एक आम आदमी क़ानून की इज्जत करता है. इसे हम रोज ही अपने आसपास देखते हैं. लोग अपने फ़ायदे के लिए पुलिस पर दबाव बनाने के लिए नेताओं के पास जाते हैं और वे अपने वोट बैंक के लिए पुलिस पर दबाव बनाते हैं. वोट बैंक की इस राजनीति ने सभी संस्थाओं को भ्रष्ट बना दिया है. पुलिस इसमें कोई अपवाद नहीं है.
राजेश जी नमस्कार, मैं चिदंबरम साहब की आलोचना नहीं करना चाहता हूँ. क्योंकि आज देश का भविष्य उन पर निर्भर है. गृहमंत्री होने के नाते भी वे अपनी पुलिस की आलोचना नहीं कर सकते हैं. जहाँ तक पुलिस का सवाल है लोग उसकी इज्जत नहीं करते हैं. पुलिस अपनी इज्जत खो चुकी है. उन्हें अपनी खोई हुई इज्जत को वापस पाने के लिए घूस लेना बंद करना पड़ेगा.
हम सब जानते हैं कि भारत में पुलिस की ज़रूरत नहीं है. यह भारत सरकार की सबसे भ्रष्ट संस्थाओं में से एक है. मैंने बंगलूर में दिसंबर 2009 में अपनी गाड़ी से सानान चोरी होने की शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन आज तक मेरी शिकायत पर कुछ नहीं हुआ. मुझे विश्वास है कि अगर पुलिस अपना काम ईमानदारी से करने लगे तो भारत में बहुत सी चीजें बदल जाएँगी. मैं यह भी जानता हूँ कि पुलिस पर नेताओं का दबाव होता है लेकिन मुझे आप यह बता दें कि किस विभाग में नेताओं का दबाव नहीं है. हम आज भी अंग्रेज़ों की पुलिस प्रणाली उपयोग कर रहे हैं. इसलिए मेरा गृहमंत्री को सुझाव है कि बदलाव के लिए पूरी पुलिस व्यवस्था भंग कर नए तरीके से उनका गठन करें. इस बीच आम प्रशासन की ज़िम्मेदारी सेना को सौंप दी जाए.
राजेश जी, यद्यपि गृहमंत्री ने अपनी ओर से ठीक वही कार्य किया है जो उनको गृहमंत्री होने के नाते करना चाहिए था, परंतु अगर हम वास्तविकता के धरातल पर देखे तो पायेगें कि पुलिस अभी तक अपनी पुरानी मानसिकता से उबर नही पाई है. अगर पुलिस वालों को गृह मंत्री जी द्वारा वर्दी पहनने पर गर्व करने की बात कही गई तो उनको साथ में यह भी कहना चाहिए था कि सभी पुलिस कर्मचारी स्वयं को भी इस प्रकार से ढाले कि विभाग, जनता और सरकार सभी उन पर गर्व कर सके.
भारत के कानून अंगरेज़ों के बनाए कानून हैं, भारत का कोई अपना कानून नहीं है. किसी वाहन से किसी तरह की दुर्घटना होने पर हाथों हाथ ज़मानत मिल जाती है, इसकी वजह यही है कि 1832 का कानून अभी तक लागू है, ऐसा कानून इसलिए था क्योंकि तब के ज़माने में सिर्फ़ अँगरेज़ों के पास ही वाहन थे और दुर्घटना हो जाने पर उन्हें तत्काल ज़मानत दिए जाने का प्रावधान था. पुलिस वाले भी करें क्या, उन्हें अपने पद पर बने रहने के लिए अपने अधिकारियों को भेंट चढ़ानी पड़ती है और यह भेंट आम जनता से ही वसूल की जाती है. असर रसूख वाले अपना काम आसानी से करवा लेते हैं लेकिन ग़रीब आदमी की सुनवाई बिना भेंट चढ़ाए नहीं होती. गृह मंत्री की फ़जीहत नक्सलवादियों के कारण हो रही है इसलिए वे ऐसी बयानबाज़ी कर रहे हैं.
राजेश जी
कितना आसान है किसी के उपर अंगुली उठा देना, बहुत आसानी के साथ आपने भी ....
खैर , मै बस इतना ही कहना चाहुंगा कि कोई अपने दिल पे हाथ रख के कह दे कि उसने अपनी पूरी जिन्दगी मे कभी कोई गलत कार्य नही किया है ?
देखिये जनाब , सकारात्मक सोच नही रहेगी तो कुछ भी नही बदलेगा , और जिस नकारात्मक तरीके से आप लिखे है उससे तो यही लगता है की बस अंगुली दिखा दो काम खतम.
पुलिस वाले हवाई जहाज से नही आते है , वो भी आपके और हमारे घर से आते है लेकिन उन्हे करप्ट कौन बनाता है ?
अपना काम निकलवाने के लिये हम टी टी को पैसा देते है , हम खुद गलत करते है और मुहमाँगा पैसे पर अधिकारियो की खरीद फरोख्त करते है, हम दहेज के लिए लडकियाँ जलाते है , हम ड्राईविंग लाईसेंस के लिये घूस देते है , हम नौकरी के लिये घूस देते है और ऐसे कई उदाहरण हैं.
चिदम्बरम को भी पता है कि पुलिस क्या है लेकिन उनका काम है उनके मनोबल को बढाना , उन सभी पुलिस मे वालो मे से बहुत सारे ऐसे है जब कसाब जैसे लोग हमला करते है तो उनकी एक 47 के सामने भी आ जाते है लेकिन आपको वो नही दिखाई देगा,
नकारात्मक सोच को त्यागिये राजेश जी, सकारात्मक पहल कीजिए.
क्षमा प्रार्थी हुँ अगर बुरा लगा होगा तो ।
धन्यवाद !
आपका
नवीन भोजपुरिया
आपने बिलकुल सही लिखा है. हमारे देश की पुलिस का हाल ये है कि ये चोर, डाकुओं, लुटेरों और पैसे वालों की सुनती है. आम आदमी को कोई नहीं पूछता. पुलिस का हर दो-नंबर के काम में हिस्सा होता है. कोई भी पुलिस वाला ये नहीं कह सकता कि मैं ईमानदार हूं. पुलिस वाले एक रिपोर्ट लिखने से लेकर आगे हर जगह नोट मांगते हैं-- एक छोटे सिपाही से लेकर बड़े से बड़े अफ़सर तक. यही तो मेरे देश में कमी है नहीं तो आज भारत अमरीका की तरह नहीं बन जाता.
मैं श्री नवीन भोजपुरिया की बात का पूरा समर्थन करता हूं. ये आजकल लोगों का टाइम पास बन गया है. सारे दिन बस नेता को या पुलिस को कोसते रहना... पुलिस, फ़ौज, नेता, या सरकारी अधिकारी सभी आते तो इसी देश की जनता से ही हैं, या क्या उन्हें कहीं से आयात किया जाता है? अरे जैसा दूध होगा वैसा ही तो मख्खन निकलेगा. सबसे पहले इस देश की जनता को सुधरना होगा. ये लोकतंत्र है जैसी जनता वैसे नेता और वैसा ही प्रशासन......
बिहार में पुलिस का जनता के प्रति जो रवैया है उसे देखकर कई बार मैं सोचता हूँ कि पुलिस की ज़रूरत ही क्या है? इस संस्था को समाप्त ही क्यों न कर दिया जाए? पुलिस जनता की मदद के लिए होती है लेकिन यहाँ की पुलिस को तो मानों जनता को तंग करने का लाईसेंस ही मिला हुआ है. जब आप परेशानी के समय प्राथमिकी दर्ज करवाने जाते हैं तो यहाँ की पुलिस आपके साथ ऐसा व्यवहार करेगी जैसे आप ही अपराधी हों. इस विभाग में भ्रष्टाचार का कहना ही क्या. बिना घूस दिए आपका कोइ काम नहीं होनेवाला. जितनी रंगदारी जनता को गुंडों को नहीं देना होता है उससे ज्यादा कहीं पुलिस उनसे वसूलती है, वर्दीवाला गुंडा जो ठहरी. संक्षेप में अगर कहूं तो हालत ये है कि लोग थाने की तरफ़ से गुज़रने से भी डरते हैं.
पुलिस और समाज के रिश्तों पर काफी कुछ लिखा गया है. आज भी पुलिस अच्छा काम कर सकती है अगर नेताओं के इस्तेमाल से इसको बचाया जा सके. इसके अलावा पुलिस और प्रेस के रिश्तों की भी पड़ताल की जानी चाहिए.
पुलिस के नाम से ही आम आदमी घबराता है. देश को आजाद हुए इतने बरस हो गए लेकिन हमें अभी भी पुलिस से डर लगता है. आखिर इनके बर्ताव में फ़र्क क्यों नहीं आ रहा है और सरकार इनके खराब व्यवहार पर चुप्पी क्यों साधी रहती है.
वास्तव में हमारा समाज बिना पुलिस के बिलकुल अधूरा है. यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही है कि पशु व मानव एक ही डंडे से हांके जाते हैं. माननीय मंत्री जी का पुलिस का मनोबल बढ़ाना अपरिहार्य है. लोग कहते हैं कि खाकी का खौफ होता है लेकिन अगर आज के परिवेश में झांक कर देखा जाए तो खादी और सफ़ेद चोले का ज्यादा खौफ है. आखिर पुलिस ऐसी क्यों है? कहीं न कहीं पुलिस के कामों में दखलंदाजी, कुर्सी का रौब और नेताओं द्वारा पुलिस को अपने मन मुताबिक इस्तेमाल करना ही पुलिस के इस रवैये को जन्म देता है.
पुलिस का नाम आते ही मन में सुरक्षा का भाव आना चाहिए लेकिन होता इसके उलटा ही है. आज पुलिस की छवि उस मुज़रिम की तरह हो गई है जिससे कोई भी शांतप्रिय नागरिक उलझना नहीं चाहता. सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अगर किसी आम नागरिक को अपने अधिकारों को पाने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़े तो वह उससे वंचित होना ही पसंद करता है.
अपने बच्चे की गलती पर हर माता-पिता का कर्तव्य है कि उसे समझाया जाय, न कि माननीय गृहमंत्री की तरह प्रोत्साहित किया जाय. हम एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं इसलिए पुलिस के व्यवहार पर आलोचना करने का अधिकार भी हमारे पास सुरक्षित है.
बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश की पुलिस संगठित आपराधिक गिरोह की तरह काम करती है. नेता, पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ देश को खोखला कर रहा है. दुःख तो तब होता है जब पुलिस अपराधी पर जुल्म करती है. पुलिस का मनोबल बढ़ाने की जरूरत तो है ही साथ ही, उनका नैतिक बल भी बढ़ाने की उससे भी अधिक जरूरत है.
पुलिस को आम जनता वर्दी वाला ग़ुंडा समझती है क्योंकि जब थाने जाओ तो एफ़आईआर बिना पैसा लिए या बिना राजनीतिक दबाव या सिफ़ारिश के नहीं लिखती. पुलिस वालों की आम जनता में छवि अच्छी नहीं है. पुलिस आम जनता से बिना गाली बात नहीं करती और जनता के पैसे को अपना पैसा समझती है. मामले की ठीक से जांच नहीं करती इसलिए आम जनता पुलिस को सहयोग नहीं करती. और भारत का क़ानून भी बहुत बेकार है. अगर किसी गवाही के लिए जाओ तो पूरा दिन लग जाता है और बार-बार परेशान किया जाता है.
देश में क़ानून - व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की व्यवस्था की गई है इस बात का देश की जनता संतोष कर सकती है. लेकिन यह मानना कि पुलीस जनता की रक्षक है इस बात को देश की जनता शायद ही अपने गले उतार पाए. शायद चिदंबरम जी को भारतीय पुलिस से एक आम आदमी की तरह पाला नहीं पड़ा है. वर्ना इस तरह की बात वह नहीं करते. चिदंबरम जी को आम आदमी का भेस ले कर कभी पुलिस थाने का एक-दो बार चक्कर लगा ही लेना चाहिए तब उनकी ग़लतफ़हमी दूर हो जाएगी कि मीडिया और अन्य क्यों पुलीस की आलोचना करते है. पुलीस के पक्ष में बयान बाज़ी करने और पुलिस की पीठ थपथपाने से अच्छा है वे पुलीस व्यवस्था में सुधर लाएं तो ज़्यादा अच्छा होगा.
यह ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. लगा कि किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया है. भारत में पुलिस वालों से सुरक्षा मिलना तो दूर उनसे बात करना भी कठिन है. अपने घमंड में रहने वाले ये पुलिसवाले किसी की भी इज़्ज़त उतार सकते हैं. हमेशा गाली देकर बात करना और चमचागिरी-पसंद ये लोग बिना रिश्वत के सहायता भी नहीं करते हैं. ये एक ऐसा विभाग है जो क़ानून का सहारा लेकर आम लोगों का ख़ून चूसता है. किसी ने सच ही कहा है कि पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी.
यह अच्छी बात है कि लोग सोच रहे है पर इतना ही काफी नही, हमें कारणों पर थोड़ी और गहराई से सोचना चाहिए.
गृह मंत्री जी ने जो कहा है, उनको और साफ कहना चाहिए था. भारत में संपूर्ण तंत्र का जैसा चरित्र है उसमें पुलिस का चरित्र अधिक बुरा नहीं है. एक घंटे के लिए भी पुलिस न रहे तो हमारी समस्या गंभीर हो जाती है. पुलिस को यथार्थ से अधिक बदनाम करना फैशन बन गया है. यदि एक न्यायाधीश को एक महीने के लिए थानेदार बना दिया जाए तो वो कितने अपराधियों को सजा दिलवा पायेगा-यह विचारणीय है. यदि पुलिस इतनी ही ख़राब है तो नए नए कानून बना कर पुलिस को अधिकाधिक शक्ति देने की बात करने का क्या औचित्य है.
भारतीय राजनीति का काम सिर्फ़ गरीबों और बेबस लोगों का शोषण करना है. वे ऊंचे रसूख के लोगों की मदद करते हैं. अपराधी बेखौफ पुलिस स्टेशन में घुसते हैं जब कि आम लोग हमेशा ही पुलिस से हिचकिचाते हैं.
पुलिस पर लोगों का भरोसा नहीं है. वारदात होने के बाद ही वे घटनास्थल पर पहुंचते हैं.