दक्षिण अफ्रीका के भारतीय
वैसे तो देश-दुनिया में भारतीय लोगों को ढूँढ़ निकालना मुश्किल काम नहीं होता और जब बात दक्षिण अफ़्रीका की आती है, तो इस देश के इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं भारतीय.
रंगभेद के ख़िलाफ़ आंदोलन में खड़े हुए भारतीय और आज इस देश की अर्थव्यवस्था में भी वे अहम भूमिका निभा रहे हैं. नेल्सन मंडेला के साथ जेल भी गए भारतीय और दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेट टीम का हिस्सा भी रहे हैं भारतीय.
कहने की बात नहीं कि यहाँ भारतीयों की उपस्थिति किसी स्थानीय लोग की उपस्थिति से कम अहम नहीं. वैसे तो आबादी के हिसाब से सबसे ज़्यादा भारतीय डरबन में रहते हैं, लेकिन आर्थिक केंद्र होने के कारण जोहानेसबर्ग में उनकी उपस्थिति कम नहीं.
किसी भारतीय इलाक़े में जाने की ललक मुझे जोहानेसबर्ग के मेफ़े इलाक़े में खींच ले गई. ऐसा लगा दिल्ली में आ गए हों. हर ओर चहल-पहल. वातावरण में भारतीय मसाले से युक्त खाने की सुगंध. भारतीय कपड़ों की दूकाने, भारतीय फ़िल्मों की सीडी और भी बहुत कुछ.
लंबे समय से भारतीय खाना न मिलने की भड़ास निकालने मैं भी एक रेस्तरां में घुस गया. खाना खाया, लोगों से बात की और चलने को हुआ. तभी कुछ भारतीय युवकों को देखा..लगा कुछ बात करनी चाहिए.
उनके पास पहुँचा और पहला सवाल यही किया- क्या आप भारतीय हैं? दुआ-सलाम तक तो बात ठीक थी, लेकिन जवाब टका सा मिला- नहीं हम भारतीय नहीं. मैंने अपने को दुरुस्त किया और पूछा- आप भारतीय मूल के तो होंगे....बोले- पता नहीं, हमारे दादे-परदादे होंगे....हम तो दक्षिण अफ़्रीकी हैं.
मन में एक टीस सी उठी. अपने मूल देश के प्रति इतनी अनभिज्ञता...लेकिन फिर सोचा....वे ग़लत कहाँ हैं. जिन लोगों की पैदाइश वहाँ हुई है, जो वहाँ की मिट्टी में खेलना-कूदना सीखे हैं और ख़ालिस वहीं के हैं....तो इसमें बुरा क्या.
हम जहाँ रहते हैं....वहाँ के होने में कोई बुराई तो नहीं...

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मैं समझता हूं कि इस धरती पर रहने वाले व्यक्ति का तरीक़ा ऐसा ही होना चाहिए, जहां आप रहें वहां की मिट्टी से अपना प्यार जताएं.
अपने आबाई वतन से भी कुछ तो प्यार होगा?
पंकज जी आपने बात को बिल्कुल सही लिखी है लेकिन मतलब समझ में नहीं आया. आप अफ़्रीक़ा की बात करते हैं, दिल्ली में कितने बिहार के रहने वाले आपको उत्तर प्रदेश का बताते फिरेंगे. मैं भी बिहार से हूं और मुझे इसका गर्व है, क्योंकि मैं अपनी मातृ भूमि को नहीं भूलता.
मैं बिहार से हूँ और अब दुबई आ गया हूँ. मैं बिहारी होने पर गर्व महसूस करता हूँ. लेकिन कई बिहारी यह तक नहीं बताते कि वे बिहार के रहने वाले हैं.
वे सही कह रहे हैं. वे भारतीय नहीं हैं, दक्षिण अफ़्रीकी हैं.
इन्सान जिस देश में रहता है और स्वयं को वहां का बताए, यह बात उसकी उसके देश के प्रति वफादारी और आत्मिक जुड़ाव दर्शाती है.
पर ये भी सच है कि इन्सान कभी भी अपने मूल से दूर नहीं हो सकता. वो बाहरी रूप से भले ही कह दे कि वो इसी देश का है जहाँ वो रहता है पर उसके अंतर्मन में ये बात हमेशा जिन्दा रहती है कि उसका मूल कहाँ है, उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी वो लगभग उसी तरीके से जीता है जिस तरीके से उसके दादे परदादे जीते आए, उसकी संस्कृति, आचार विचार, सुबह से शाम तक वो जो भी करता है उसमे कहीं न कहीं उसका पुरातन झलकता है, इन्सान भले ही दूर चला जाये, उसकी जड़ें उसे पकडे रहती है, उसकी संस्कृति, रिवाज, आहार विहार, उसे हरदम उसके मूल से जोड़े रखते हैं, जो इन्सान ये कहता है कि वो यहीं का है, वो झूठ बोलता है क्योंकि हर इन्सान का एक गाँव और शहर होता है, एक इतिहास होता है.
महमूद साहब आपने जो लिखा है वह सौ फ़ीसद सही है. मैं उन बिहारियों से पूछना चाहता हूँ आप सब अपनी पहचान क्यों छुपाते हैं? आपको गर्व होना चाहिए कि बिहार ने कैसे महान पुरुषों को जन्म दिया है. आख़िर में जब हम आज़ाद हुए तो देश का पहला राष्ट्रपति बिहार ने दिया और आज पूरे भारत में बिहार के आईएएस-आईपीएस भरे पड़े हैं. मैं सभी बिहार वासियों से अनुरोध करता हूं कि अपनी पहचान को न छुपाएं साथ-साथ जो हम में कमियाँ हैं उसको सब मिल-जुल कर दूर करें और बिहार को अपने में सब भेद भाव को भुला कर बिहार के विकास के लिए क़दम बढ़ाएं और एक मिसाल क़ायम करें. धन्यवाद.
मुझे नहीं लगता कि आप जहां रहते हैं वहीं के हो जाने में कोई बुराई है.
पंकज जी मेरे ख़्याल से वो लोग सच्चे हैं जो अपने आपको भार्तीय नहीं बताते हैं. जिस देश में ग़रीबी, भूख, बेईमानी, भ्रष्टाचार, जातिवाद, इंसानियत के नाम पर कलंक हो किन शब्दों में महान भारत की तारीफ़ लिखें. अच्छा है वो ऐसे देश के होने का दावा नहीं करते हैं. राजेश जी आपको बहुत दुख हुआ उनके नहीं कहने पर, ज़रा उनपर दुख कीजिए जिन्होंने सभी कुछ भारत के नाम पर और भारत में रहते हुए खोया है लेकिन नतीजा कुछ नहीं है. आप इतना दुख न करें ताकि आपकी सेहत अच्छी रहे.
वैसे तो जब आपको ये बात समझ में आ गई कि "हम जहाँ रहते हैं....वहाँ के होने में कोई बुराई तो नहीं..." तो फिर इस ब्लॉग का कोई मतलब नहीं है. मगर आपके अन्तर्मन की पीड़ा को समझा जा सकता है. दिल्ली में एक बिहारी अगर अपनी पहचान छुपाना चाहता है तो इसका ज़िम्मेवार वह बिहारी नहीं बल्कि किसी न किसी रुप में हम सभी भारतीय हैं जो किसी को अपनी पहचान छुपाने पर मजबूर करते हैं और यही वह कारण है जो विदेशों मे बस चुके भारतीय अपने को मूल भारतीय होने से भी मना करते हैं.
ये तो अच्छी बात है कि कोई पीढ़ियों से जहाँ पर रहे ख़ुद को वहीँ का बताए इसमें कुछ भी बुरा नहीं है लेकिन अपनी जड़ को भी नहीं भूलना चाहिए. अन्यथा आप अपनी संस्कृति, अपनी पहचान को बचाकर नहीं रख पाएंगे और मुख्य धारा में विलीन हो जाएंगे. एक और बात दक्षिण अफ़्रीका में रहने वाले अधिकतर लोगों के पूर्वज व्यापारी थे और व्यापारियों को चूंकि व्यापार के सिलसिले में दूर-दूर तक जाना होता है इसलिए उनका घर से ज़्यादा लगाव नहीं होता. जब इनके पूर्वजों का लगाव ही काफ़ी क्षीण रहा होगा तो बच्चों से हम कैसे ज़्यादा की उम्मीद कर सकते हैं.
मैं लेखक से सहमत हूँ. जो जिस देश में पैदा हुआ, पला बढ़ा उसे उसी देश का सझना चाहिए, पूर्वज चाहे किसी देश के क्यों न हों. ये बात अजीब है कि जब आप भारत में रहने वाले भारतीय को देखते हैं तो ज़्यादातर भारतीय अपने आपको भारतीय नहीं समझते वे अपने आपको किसी ख़ास राज्य का समझते हैं. जब भारत में पैदा होने और बसने वाले लोग देश से ऊपर अपने राज्य को रखते हैं ऐसे में आप एक भारतीय मूल के विदेशी को भारतीय कैसे समझ सकते हैं?
पंकज जी, अगर आप किसी भारतीय मुसलमान से पूछें कि वह पाकिस्तानी है क्या तो आप कैसे जवाब की अपेक्षा रखते हैं. वे दक्षिण अफ़्रीकी भारतीय मूल के लोग भारत से प्यार करते हैं इसलिए आपको भारतीय इलाक़े में मिल गए... लेकिन सच ही है कि वो वहां पैदा हुए और पले-बढ़े और वही उनका देश है. इसमें ग़लत कहां है?
लेखक ने अपना अनुभव लिखा है. बढ़िया उपसंहार भी दिया. लेकिन कमेंट्स देखने के बाद मन में एक सवाल उठा है जो लेखक से पूछना चाहता हूं.. "भैया, अफ़्रीका में बिहारी रहते हैं क्या?"
इसी का नाम वफ़ादारी और देशभक्ति है! वरन लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने से भी नहीं चूकते हैं! वैसे भी दक्षिण अफ़्रीका के भारतीय कई पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं और दक्षिण अफ्रीका के कुछ लोग भारत में रह रहे भारतीयों की तरह ही उसी लग्न से हिन्दू धर्म को अपनाए हुए हैं! ऐसे में दक्षिण अफ्रीका के भारतीय अपनी जगह बिलकुल सही हैं! यहाँ तक देखा गया है कि कुछ अप्रवासी भारतीय वैसे तो अपने देश की बुराई करते नहीं थकते और कभी भारत की याद नहीं आती! लेकिन अप्रवास वाले देश में प्रतिकूल परिस्तिथियाँ उत्पन्न होने पर भारत देश याद आता है तब गुहार लगाते फिरते है कि सरकार मदद नहीं करती? इसलिए जो लोग कई सदियों से एक देश को अपना माने हुए हैं वहां की मिट्टी में अपने संस्कारों का दीपक जलाए हुए हैं यह कोई कम बात नहीं है?
पंकज जी, आपके ब्लॉग की आख़िरी लाइन सब कुछ कह गई "हम जहां रहते हैं वहां के होने में कोई बुराई नहीं." लेकिन यहां ये बात भी ध्यान रखने लायक़ है कि भले ही हम दुनिया के किसी हिस्से में बस जाएं लेकिन अपनी जड़ों को भूल जाना, अपने दादा-परदादा की मातृभूमि के बारे में अनजान होना भी कोई अच्छी बात नहीं बल्कि उन्हें तो इस पर गर्व होना चाहिए कि जिस देश में वो पले-बढ़े उसके अलावा भी कोई देश ऐसा है जिसे वह अपना कह सकते हैं.
पहचान पाने के बाद भारतीय अपनी मिट्टी को भूल जाते हैं.
पंकज जी, यदि जहां हम रहते हैं, वहां का होने का विचार सबके मन में आ जाए तो क्षेत्रवाद समाप्त हो जाएगा. हां, वहां के मूल निवासियों को भी इस बात को स्वीकार करना हगा.
पंकज जी आपका ब्लॉग काफी अच्छा लगा.