पानी काला, लोकतंत्र का बोलबाला
सात साल तक विश्व के सब से बड़े जनतंत्र कहे जाने वाले देश भारत में पत्रकारिता करने के बाद जब इस महीने मैं दुनिया के सब से कामयाब कहे जाने वाले लोकतंत्र में से एक, यानी अमरीका पहुंचा तो काफी उत्साहित था.
अमरीका के बारे में अखबारों में पढने या टीवी चैनलों पर निर्भर करने के बजाये अब मैं यहाँ की राजनीति को खुद महसूस कर सकता था, यहाँ के सत्ताधारी डेमोक्रेट और विपक्षी रिपब्लिकन नेताओं के बीच तीखी नोक झोंक देख सकता था और यहाँ के लोगों की प्रतिक्रियाएं और मीडिया की रिपोर्टिंग भी अपनी आँखों से देख सकता था.
जब मैं यहाँ आया तो उस समय देश की सब से बड़ी घटना थी मेक्सिको की खाड़ी में तेल के रिसने से होने वाली तबाही. मैं ने इस खबर की चर्चा अख़बारों और टीवी चैनलों पर ज़रूर देखी लेकिन सुर्ख़ियों में थी राष्ट्रपति ओबामा की गिरती हुई रेटिंग की खबर.
यहाँ मेरे एक भारतीय दोस्त से जब मैं ने कहा घर की याद आ रही है तो उसने सुझाव दिया यहाँ न्यूज़ चैनलों को देख लो पता ही नहीं चलेगा देश से बाहर हो.
दोस्त की बात कुछ अजीब लगी. लेकिन जब मैं ने यहाँ के कुछ लोकप्रिय चैनलों को देखना शुरू किया तो उसकी बात समझ में आई. वही हाव-भाव, सुर्ख़ियों की वही गूँज और वही ब्रेकिंग स्टोरी का सिलसिला.
हर दिन राजनीतिक रूप से घटनाएँ नया मोड़ ले रही थीं. कम से कम इन चैनलों पर. और यह भी देखा की भारत की तरह यहाँ भी नेतागण सुर्ख़ियों में रहना भी चाहते हैं और मीडिया के दबाव में आकर ही जागते हैं.
यहाँ के मीडिया ने एलान किया कि तेल के रिसने वाला मामला राष्ट्रपति ओबामा की अब तक की सब से बड़ी राजनैतिक चुनौती है.
आखिर दबाव ने असर दिखाया. ओबामा ने अपने ओवल ऑफ़िस से देश के नाम एक प्रसारण का एलान किया. यह किसी अमरीकी राष्ट्रपति का 11 सितंबर 2001 के चरमपंथी हमलों के बाद देश के नाम पहला संदेश था.
इस संदेश में राष्ट्रपति ओबामा ने तेल रिसने के लिए ज़िम्मेदार कंपनी बीपी को 20 अरब डॉलर मुआवज़ा देने के लिए राज़ी कर लिया. या कहें मजबूर किया.
इस के अगले दिन बीपी के एक उच्चाधिकारी टोनी हेवर्ड को कॉंग्रेस की एक कमेटी के सामने हाज़िर होना था और तिल रिसने के कारणों पर जवाबदेही करनी थी.
इस कमेटी के सदस्य चुनाव में चुन कर आते हैं और इस लिए कुछ विशेषज्ञों का कहना था कि कमेटी के सभी सदस्य इसमें दिलचस्पी नहीं रखते थे कि तेल के रिसने से नुक़सान कितना हुआ बल्कि वे इस प्रक्रिया से अपने क्षेत्र के लोगों को यह संदेश देना चाहते थे कि वे उनके लिए कितनी मेहनत से काम कर रहे हैं.
लोग भी खुश. नेता भी खुश और मीडिया भी ब्रेकिंग स्टोरी के सिलसिले के बाद ख़ुश. तेल के रिसाव से मेक्सिको की खाड़ी का पानी काला, लेकिन वाह रे लोकतंत्र तेरा फिर भी बोल बाला.

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ज़ुबैर साहब माफ़ कीजिए, मैं समझ नहीं पाया कि आप कहना क्या चाहते हैं.
ज़ुबैर साहब, आपका लेख पढ़ा अच्छा लगा. आपकी आख़री पंक्ति मुझे बहुत पसंद आई. आपने जो लोकतंत्र का नमूना पेश किया है उसी का नाम लोकतंत्र है. कौन नहीं चाहता सुरख़ियों में रहना. रहा लोगों का ख़ुश रहना तो ये उनकी मजबूरी है. मैं सिर्फ़ आप मीडिया वालों से आग्रह करता हूँ कि आप सब मिलकर पर्यावरण को जो ख़तरा पैदा हो रहा है उसके लिए विश्व के सभी लोगों को जागरुक करें ताकि अपनी धरती जो हमें पाल रही है वो पर्यावरण के दुशप्रभाव से मुक्त हो सके और स्वस्थ माहौल क़ायम रहे.
जुबेर साहब, आपका अमेरिका आख्यान पढ़कर एक बात जो समझ आई, वो यह कि नेता चाहे कहीं का हो, होता वो नेता ही है और इसी नाते शायद भारत और अमेरिका के नेताओं में बुनियादी समानताएं हैं. हाँ, लेकिन अमेरिका की अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली, हमारी संसदीय प्रणाली की तुलना में अधिक राजनैतिक स्थायित्व दे पाने में सफल रही है. और रही बात मीडिया की, तो विशुद्ध बाजारवाद से प्रभावित मीडिया आज तो सिर्फ चटपटी, मसालेदार और सनसनीखेज खबरों का ही माध्यम बनकर रह गया है- फिर चाहे वह अमेरिका मीडिया हो या भारतीय मीडिया.
ज़ुबैर साहिब शानदार लिखा है. दुनिया में थानेदारी ऐसे ही की जा सकती है इसमें कोई शक नहीं कि अमरीका दुनिया का इस समय बादशाह है और उसमें इतना दम है कि वो अपनी जनता के लिए जिससे चाहे अपनी बात मनवा लेता है. मेरे दावा है कि अगर भोपाल जैसा हादसा अमरीका में हो जाता तो भारत के नाक में दम कर एंडरसन जैसों को बुला लेता और अपना पुरा मुआवज़ा लेता. जनाब यही फ़र्क़ है भारत और अमरीका में.
किसी भी लोकतंत्र में दबाव समूह का अपना ही महत्त्व होता है.लेकिन अमरीका में ये दबाव समूह काफी मजबूत अवस्था में है भारत में स्थितियां उलटी हैं.चाहे आप जितना भी दबाव डाल इसकी कोइ गारंटी नहीं कि सरकार आपकी बात मान ही ले. कारण कई हैं. जहाँ अमरीका में अध्यक्षीय शासन प्रणाली है भारत में संसदीय शासन है. साथ ही भारत आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है अमरीका में ऐसी स्थिति नहीं है. राजतन्त्र में जहाँ यथा राजा तथा प्रजा सत्य था प्रजातंत्र में यथा प्रजा तथा प्रजा का नियम लागू होता है. शायद हम जनता का नैतिक स्खलन हो रहा है और इसलिए राजनीतिज्ञों का भी.
मैं समझता हूं कि आपने वहां बस कुछ समय ही बीताया है. इसलिए आपकी बात काफ़ी तकलीफ़दह है साथ ही लगता है कि आप लोकतंत्र के अर्थ को समझने में ग़लती कर रहे हैं. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि आप भारत में सात साल रहे लेकिन लोकतंत्र को नहीं समझ पाए. पहले आप तथ्यों को समझे फिर ब्लॉल की बात होगी.
ज़ुबैर साहिब अच्छा लिखा है. मैं समझता हूं कि भारत और अमरीका के लोकतंत्र में बहुत बड़ा फ़र्क़ है. अमरीका में राजनीतिक नेतृत्व बहुत ही पढ़ा लिखा है और उसमें कोई भी अपराधी पृष्टभूमि से नहीं है साथ ही उनकी सभी गतिविधियां लोगों और मीडिया के ज़रिए मोनिटर की जा रही होती हैं. वहां कोई अपनी मूर्ति नहीं बनवाता और अपने निजी फ़ायदे के लिए कोई नेता लोगों में नफ़रत नहीं पैदा करता.
भारत के राजनीतिक नेतृत्व में अधिकतर अपराधी, अनपढ़, भ्रष्ट और लालची हैं.
लगता है इसी कारण वश, किसी ने कहा है, 'जैसी जनता वैसा शासक.'
भारत हो या पाकिस्तान, अमरीका हो या जापान. दुनिया के सारे जगहों की कहानी एक जैसी है. सभी जगह दो तरह के लोग रहते हैं. एक शासित और दूसरा शोषित. शासित व्रग हमेशा समाज को मेनुपुलेट करता है और उनकी भागीजारी राजनीति, मीडिया और प्रशासन में होती है. आप चूंकि एक स्वायत संस्था के लिए काम करते हैं इसलिए आप उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं करते इसलिए आप इस पर बढिया लिख सकते हैं. लेकिन आपने ये दिल से लिखा है कितना सत्य है यह भी देखने लायक़ है.
जुबैर साहब आपने बड़े ही ज्वलंत मुद्दे की तंज को पकड़ा है ! मुझे भारत के लोकतंत्र पर कोई शक नहीं है, लेकिन जिस तरीके से लोकतंत्र का मजाक हमारे यहाँ उड़ाया जा रहा है अमरीका उस दर्जे तक पहुँचने में झिझक सकता है ! रही बात मीडिया के दवाब में सरकार के कामकाज करने की तो आज शायद यह एक दूसरे की आवश्यकता बन चुका है ! ब्रेकिंग न्यूज़ का प्रचलन भी हमारे यहाँ पश्चिम की तर्ज़ पर होता है ! मेरे ख्याल से बहुतायत विषयों की नक़ल हमारे यहाँ पश्चिम की देखादेखी में होती आयी है ! मुझे एक बात का आज तक मलाल है कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से कोई ऐसा चैनल सामने नहीं आया जो कि मीडिया के अन्दर फैले भ्रष्टाचार, दोगलेपन, पैसों के लिए ब्लैकमेल जैसी पत्रकारिता करना, सरकारों के आगे बिकाऊ पत्रकारिता का भौंडापन, भ्रमिक समाचार फैलाने का धंधा, अन्धविश्वाश को बढावा देने का काम करने और न जाने कैसे - कैसे किस्म की पत्रकारिता के सच्च को दुनिया के सामने लाये ! घटिया किस्म के मीडिया को दवाब में लाने के लिए न तो सरकार पहल करती है और न ही बेहतर दर्जे की पत्रकारिता करने वाले लोग खुलकर सामने आ रहे हैं ! मैं भाई चन्दन के विचारों से सहमत हूँ ! आपने अमरीकी कार्यप्रणाली से वाकिफ करवाया आपका बहुत बहुत शुक्रिया लेकिन भारतीय लोकतंत्र से अमरीकी लोकतंत्र की तुलना बेमानी है ! कभी -२ मैं सोचता हूँ कि क्या वाक्य में हम लोग देश के बारे में सोचते हैं ? अगर सोचते हैं तो छोटे से छोटा व् बड़े से बड़ा रसूख वाला व्यक्ति भ्रष्टाचार के दल दल में क्यों डूबा है ? क्यों हम देश के नाम पर अपनी जेबों में दूसरे के हकों को ठूसने में लगे हुए हैं ? क्यों हम लोग दोगलेपन का दोशाला ओढ़े हुए हैं ?
भारतीय न्यूज़ मीडिया अपने रास्ते से भटक चूका है, भारत में लोग न्यूज़ चैनल्स को मनोरंजक और चटपटी खबरें और स्टोरी के रूप में ज्यादा देखते है, बजाय न्यूज़ की तरह देखने से! जहाँ तक बात भारतीय लोकतंत्र की है, तो मेरी नज़र में ये ब्रिटेन की सबसे बड़ी भेंट है, जिस पर बाबा साहेब ने अपनी मोहर लगायी है. अगर ऐसा न होता तो कोई तानाशाह सत्ता पे बैठा होता. भोपाल की समस्या में सरकार की मिलीभगत और कम इच्छाशक्ति का प्रदर्शन है, पर ये कोई एक मामला नहीं है, जहाँ सरकार ज़िम्मेदारी से भागी हो. बात छोटे-बड़े या कमज़ोर-ताकतवान की नहीं है, राजनैतिक इच्छाशक्ति की है. कई छोटे द्वीप जैसे देश ऐसे ही हमने आगे नहीं है, और नाहि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी तूती ऐसे ही बोलती है!
ज़ुबैर अहमद साहब लोकतंत्र में पानी ही काला नहीं होता बल्कि ज्यादातर नेताओं की सोच ही काली होती है. जो ऊपर से तो सफ़ेद होती है. जहाँ तक भारत का सवाल है मुझे तो मीडिया और नेता दोनों ही अपने रस्ते से भटके हुए नजर आते हैं.
एक बात जिसका आपने ज़िक्र नहीं किया है और वह यह कि भारत में राजनीतिज्ञ धर्म और जाति के आधार पर लोगों को अपनी ओर कर लेते हैं. अमरीका में यह संभव नहीं है.