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एक दिन पिता का....

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|मंगलवार, 22 जून 2010, 13:59 IST

अभी इसी महीने दुनिया के 58 देशों में फ़ादर्स डे यानी पिता-दिवस मनाया गया. दुनिया के बाक़ी देश अपने अपने पिता के हिसाब से जनवरी से नवंबर तक विभिन्न तिथियों में यह दिवस मनाते हैं.

लेकिन जितने जोश और उत्साह के साथ दुनिया में मदर्स डे मनाया जाता है और जिस शिद्दत से बच्चे माता दिवस का इंतिज़ार करते हैं और जैसे-जैसे उपहार उस दिन संतान की ओर से मां को मिलते हैं वैसा उत्साह और जोश और इस प्रकार के उपहार बहुत कम पिता के हिस्से में आते हैं.

बल्कि ऐसा लगता है कि पूरे उत्साह और जोश के साथ मदर्स डे मनानी वाली संतान फ़ादर्स डे इसलिए मुरव्वत में मना लेती है कि पिता जी के वंचित रह जाने का भाव कुछ कम हो सके.

देहात और निम्न मध्यम वर्ग में तो आज भी पिता बड़ी हद तक एक डिक्टेटर का किरदार निभाता है. परिवार के दैनिक और दूरगामी फ़ैसले उसी के हाथों में होते हैं. इसलिए वहां अलग से पिता-दिवस मनाने की न तो ज़रूरत होती है और न ही हिम्मत.

ऐसे दिवस बनाने के चोंचेले मध्य वर्ग को बहुत अच्छे लगते हैं और इसके ठोस कारण भी हैं. जिस प्रकार लोकतंत्रिक देशों में राष्ट्रपति या राजा को राष्ट्र का प्रतीक मानकर सिर्फ़ इज़्ज़त दी जाती है और आधिकार प्रधानमंत्री और उसकी मंत्री मंडल के हाथों में होती है उसी प्रकार मध्य वर्ग परिवार में पिता की पारंपरिक और सांकेतिक हैसियत होती है.

उसे माँ का पति होने के नाते एक्स ऑफ़िशियो पिता का दर्जा मिल जाता है (जैसे मौसा, फूफा, ताई, मामी की पारिवारिक महत्ता होती है).

पिता की बुनियादी अहमियत सिर्फ़ तीन अवसरों पर माँ से ज़्यादा होती है. एक उस समय जब आईकार्ड और अन्य क़ानूनी दस्तावेज़ों में पिता का नाम लिखना हो. दूसरे उस समय जब बेटे या बेटी का रिश्ता तय करने में उसे प्रमुख रोल निभाने के लिए बैठना नसीब हो और तीसरे उस समय में जब संतान को घर से बाहर किसी झगड़े में अपने दुशमन को बहुत ही गहरी गाली देने के लिए न चाहते हुए भी दुश्मन के परिवार से अपने पिता का सांकेतिक रिश्ता जोड़ना पड़ जाए.

बाक़ी अन्य मौक़ों पर पिता के पास बिलों पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई अधिकार नहीं होता.

कहने को इस दुनिया का समाज पिता प्रधान समाज है मगर इससे ज़्यादा ग़लत प्रोपैगैंडा संभव नहीं है. जिसे आप पैतृक समाज समझ रहे हैं ये वास्तविकता में आज भी माता प्रधान समाज है.

विश्वास न हो तो कहीं भी किसी भी दिन इस सवाल पर रेफ़्रेंडम करा कर देख लें कि अगर आपको माँ और पिता में से किसी एक के साथ रहने का मौक़ा मिले तो आप क्या करेंगे. 99 फ़ीसदी संतान किस के हक़ में फ़ैसला देगी ये आप भी जानते हैं.

ऐसे माहौल में अगर पिता के आंसू पोछने के लिए हर साल जून के तीसरे रविवार को फ़ादर्स डे मना भी लिया जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता है. 364 दिन तब भी माँ और उसकी संतान के ही रहेंगे.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:52 IST, 22 जून 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    क्या बात है वुसत साहब ! एकदम गर्म लोहे पर हथौड़ा मारा है आपने ! वो भी कस के ! सही कहा आपने मेरो दर्द न जाने कोये ? गाडी के दूसरे पहिये को पंक्चर हालत में घसीटना ठीक न होगा ! अब समय आ गया है कि बेचारे पिता के हकों के लिया लड़ा जाए और इसे अन्य दिवसों की तरह ही दर्जा मिलाना चाहिए ? सांकेतिक रिश्तों को जगह देने वालों को भी अपने कर्तव्यों और हकों के प्रति जागरूक होना चाहिए !

  • 2. 15:02 IST, 22 जून 2010 piyush:

    ख़ान साहब, यह ब्लॉग उस स्तर का नहीं है जैसे आपके पिछले ब्लॉग थे. दक्षिण एशिया का होने की वजह से मैं कह सकता हूँ कि यहाँ परिवार के सभी सदस्य महत्वपूर्ण होते हैं और उनका दर्जा बराबरी का होता है. अधिकतर लोग पूछे जाने पर यही कहेंगे कि वे माता-पिता दोनों के ही साथ रहना चाहते हैं.

  • 3. 16:30 IST, 22 जून 2010 Intezar Hussain:

    ख़ान साहब आपने पिता के बारे में जो टिप्पणी की है वह बिल्कुल सही है. लेकिन आप ये भूल गए कि बाप (पिता) एक दरवाज़ा हैं. और मां का रुतबा तीन गुना ज़्यादा होता है और बच्चे पहले माँ की गोद में आंखें खोलते हैं. इसलिए मां से ज़्यादा नज़दीक होना लाज़मी है. मगर ये अच्छा नहीं कि पिता को 365 दिन में एक दिन के लिए याद किया जाए. मैं आज के सभी लोगों से कहना चाहता हूं कि माता-पिता दोनों एक बराबर सलूक के हक़दार है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि माँ के पांव के नीचे जन्नत है तो पिता उसके दरवाज़े हैं. अगर दरवाज़े को बंद कर दिया जाए तो हम जन्नत में कैसे पहुंचेंगे.

    मेरा मानना है कि मदर्स डे या फ़ादर्स डे मनाना फ़ज़ूल बात है. हमें चाहिए कि अपने माता-पिता का आदर और ख़िदमत करके उनका सहारा बनें जिस प्रकार वे अपने माता-पिता का सहारा बने. आज मैं देख रहा हूं कि संतान अपने माता-पिता को कचरा या बेकार की चीज़ समझकर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दे रही है मगर वे भूल जाते हैं कि वे भी कभी इस स्थिति में पहुंचेंगे. मां-बाप के साथ बेहतर व्यवहार ज़रूरी है.

  • 4. 17:39 IST, 22 जून 2010 आनंद मिश्र:

    बिल्कुल स्तरहीन ब्लॉग. मेरे हिसाब से मदर्स और फादर्स डे मनाने की बात का भारतीय संस्कृति में कोई महत्व नहीं है.(जहाँ माता - पिता को भगवन का दर्जा मिला हुआ है ) ये पश्चिमी सभ्यता के लिए उचित हो सकती है. ये बात अलग बात है कि पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण के कारण आज के युवा माता - पिता को वो सम्मान नहीं दे रहे हैं जिनके वो हकदार हैं. पर पिता के विषय में यह कहना कि "उसे माँ का पति होने के नाते एक्स ऑफ़िशियो पिता का दर्जा मिल जाता है" पूर्णतः अनुचित और तर्क से परे है. यद्यपि खान साहब ने इस ब्लॉग को हास्य व्यंगात्मक बनाने का प्रयास किया है पर संभवतः उनसे विषयवस्तु चुनने में भूल हो गयी.

  • 5. 17:52 IST, 22 जून 2010 lokesh kumar:

    क्या ख़ूब कहा है सर आपने, ये एक कड़वी सच्चाई है चाहे कोई माने या न माने... लेकिन एक बात यहां ये भी देखनी है कि पिता कि अपेक्षा मां बच्चों के ज़्यादा क़रीब होती है. शायद इसलिए भी मां के प्रति भावना ज़्यादा निकल कर आती है...

  • 6. 18:37 IST, 22 जून 2010 Amit Kumar Jha, New Delhi:

    सच कहा खान साहब, हमारा समाज माताओं को जितनी महत्ता देता है, पिता को उसका दशांश भी नहीं मिलता है. जबकि, बच्चों के लालन-पालन, पोषण और विकास के हर मोर्चे पर पिता की भूमिका कमतर नहीं होती. ब्लॉग के बहाने अपने पिताओं की उपेक्षा पर अच्छा ध्यान आकृष्ट किया है. यहाँ मैं तुषार जोशी की चाँद पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा, जो समर्पित है पिताओं को:

    " छोड़ते हो धीरे से चलते हुए हाथ,
    और मुझे देते हो जीने की सौगात
    लड़खडआऊँ जब-जब,
    तब थामते हो तुम
    ओ बाबा! कितने प्यारे हो तुम I

    वृक्ष रूप से मुझ पर छाया धरते हो तुम,
    आकाश जितना मुझसे प्रेम करते हो तुम,
    जीत जाऊं मैं जब, नाचते हो तुम,
    ओ बाबा! कितने प्यारे हो तुम II

  • 7. 20:19 IST, 22 जून 2010 Anupam Gupta:

    जिस तरह से आपने परिवार में पिता की स्थिति का चित्रण किया है और तीन कारण गिनाए हैं जब बच्चे को पिता की ज़रूरत होती है, वे मेरी राय में बिलकुल बकवास हैं. पिता भी बच्चों से उतना ही प्यार करते हैं जितना माँ और यदि आपके साथ ऐसा नहीं है तो आपको अपने बर्ताव के बारे में सोचना चाहिए.

  • 8. 20:30 IST, 22 जून 2010 braj kishore singh:

    आपका कहना सही है धर्मग्रंथों से लेकर फिल्मों तक सभी माता की महिमा का ही बखान करते हैं और पिता बेचारा सबका पालन-पोषण करते हुए भी उपेक्षित रह जाता है.महाभारत में पिता की तुलना आकाश से की गयी है लेकिन मैं उन्हें एक ऐसा वटवृक्ष मानता हूँ जो सभी मौसमों की मार खुद अपने ऊपर झेलता है और परिवार को दुखों की भनक तक नहीं आने देता है.मैं आज जो भी हूँ अपने पिता की बदौलत ही हूँ.मैं तो एक बेडौल पत्थर था उन्होंने कभी लाड-प्यार से तो कभी डांट-फटकार से मुझे तराशा.मेरी सारी सफलताओं के लिए अगर कोइ जिम्मेदार है तो हैं मेरे पिता और मेरी विफलताओं के लिए अगर कोइ जिम्मेदार है तो वो हूँ मैं.

  • 9. 20:50 IST, 22 जून 2010 Anuj:

    मैं तो सोचता हूँ कि माता-पिता का संयुक्त दिन मनाना चाहिए, ख़ैर ये दिन अलग अलग मनाने में कोई बुराई नहीं है, आप जैसे ब्लॉग में लिख हैं ऐसे पिता को मैंने सिर्फ़ फ़िल्मो में देखा है, मेरी निजी जिंदगी में वो बहुत मिलनसार और मित्र ज्यादा हैं. मेरे दादाजी भी कभी ऐसे सख्त नही रहे. हाँ, थोड़े कायदे ज़रुर होते, जैसे शाकाहारी ही खाना या फिर कोई तम्बाकू वगैरह का व्यसन न रखें, इससे ज्यादा कभी नहीं. पर ये तो सही भी है. मेरे यहाँ पिता का महत्व सिर्फ कागजों पे नहीं, वास्तव में है. आशा करें कि भविष्य में उनके जैसा पिता बनने की कोशिश करे और फ़ादर्स डे पर उन्हे सलाम करे!

  • 10. 00:09 IST, 23 जून 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    ख़ान साहब, बहुत लंबे समय के बाद आपका लेख पढ़ने को मिला. लेख बिलकुल सच है. आज के ज़माने में हर इंसान को अपने बाप की कोई भी फ़िक्र नहीं है. जबकि माँ की इज़्ज़त करते हैं. ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि माँ का जो मुक़ाम है वह बाप का नहीं और बाप उस मुक़ाम को लेने के लायक़ भी नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर है कि बिना बाप के माँ बच्चे को जन्म नहीं दे सकती. इसलिए बाप भी इज़्ज़त का अधिकार रखता है. लेकिन आज के दौर में ऐसा नहीं क्योंकि क़यामत के आसार हैं.

  • 11. 21:02 IST, 23 जून 2010 Rakesh Jain:

    ख़ान साहब, एकदम सच्चा लिखा है. आजकल इस बात को कहने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए. पिता केवल एक पैसे कमाने वाली मशीन बन कर रह गया है और माँ सारे सुखों की हक़दार...

  • 12. 02:20 IST, 24 जून 2010 Rohitshyam:

    श्री खान साहब
    आप ने अपने ब्लॉग में जो पिता को अहमियत न देने की बात लिखी है,
    मैं उससे कतई सहमत नहीं हूँ भारतीय संस्कृति में मातर-देवोभव: के साथ ही
    पितर-देवोभव: भी उतने ही प्यार एवं आदर के साथ कहा जाता है माँ यदि
    धरती है तो पिता है आकाश,माँ है आशा तो पिता है विश्वास, विश्वास के बिना
    आशा फलीभूत नहीं होती है और आशा के बिना विश्वास अपूर्ण है अधूरा है
    हाँ आपने शायद उस संस्कृति से प्रेरित होकर लिखा होगा,जहाँ आये दिन
    पिता बदल जाते हैं तथा संतान की सम्पूर्ण जिम्मेदारी केवल माँ ही उठती है,किन्तु हमारी संस्कृति में (यहाँ भारतीय संस्कृति की बात हो रही है,हिन्दू या मुस्लिम संस्कृति की नहीं)
    किसी कारणवश पिता के न रहने या माता से नाता तोड़ लेने पर भी संतानें अपने जन्मदाता पिता का ही नाम लिखती हैं.

  • 13. 15:55 IST, 24 जून 2010 AK:

    बेहतरीन, बहुत बढ़िया. एक अलग ही नज़रिया पढ़ने को मिला. मैं जर्मनी में रहता हूँ और भारत की ख़बरों में दिलचस्पी रखता हूँ. कुछ अख़बारों का अपना एक अलग झुकाव देखने में आता है. आज बीबीसी हिंदी की वेबसाइट पर आया. बिलकुल निष्पक्ष और बेबाक राय पढ़ने को मिली. इसीलिए आज इंटरनेट और टीवी के ज़माने में भी मेरे पिता रेडियो पर बीबीसी हिंदी समाचार सुनना नहीं भूलते. मैं आशा करता हूँ कि आपके लेख अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचें.

  • 14. 00:42 IST, 25 जून 2010 अंकित श्रीवास्तव:

    मदर्स और फादर्स डे भारतीय संस्कृति के लिए सर्वदा अनुपयुक्त हैं, हमारे लिए माता-पिता की इज्जत करने के लिए किसी विशेष दिन की जरूरत नहीं, मदर्स और फादर्स डे पश्चिमी देशों के लिए ही प्रासंगिक हैं। हमारे देश मे माता पिता का दर्जा बहुत बड़ा है, जिसे समझने के लिए भारत की सरजमीं पर आकर यहाँ के समाज, इतिहास और धर्म-दर्शन को समझना पड़ेगा। पिता(दशरथ) के वचन की लाज रखने के लिए भगवान श्री राम चन्द्र जी ने राज्य का त्याग करके वनवास का वरण किया था, और श्रवण कुमार ने कांवर मे माता पिता को तीर्थयात्रा करवाई थी। हमारे धर्मग्रंथों मे भी मातृ ऋण, पित्र ऋण की अवधारणा है। इतना अवश्य है की सभी भारतीय अपने माता पिता और गुरु को वह सम्मान नहीं देते जो देना चाहिए।

  • 15. 17:02 IST, 25 जून 2010 Renu Pandey:

    खान साहब मैं आपके विचारों से बिल्‍कुल सहमत नहीं हूं क्‍योंकि हमारे समाज में माता को धरती तो पिता को आसमान की संज्ञा दी जाती है। पिता परिवार का मुखिया होता है, जीवन के तीन मौकों पर ही नहीं घर के हर क्षेत्र में उसका निर्णय महत्‍वपूर्ण होता है। मेरा मानना है कि भाग्‍यशाली हैं वे बच्‍चे जिन्‍हें माता पिता दोनो का प्‍यार और सान्निध्‍य मिलता है।

  • 16. 11:11 IST, 30 जून 2010 Ankit Srivastava:

    खान साहब, मैं आपसे सहमत नहीं हूं.

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