बिहार, जाति और राजनीति
बिहार में जनता दल (यू) और बीजेपी गठबंधन टूटते टूटते रह गया है. अक्तूबर में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह गठबंधन अभी और मुसीबतों का सामना कर सकता है.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विकास पुरुष की छवि बनाने में लगे हैं लेकिन गुजरात के विकास पुरुष नरेंद्र मोदी को बिहार में देखना नहीं चाहते हैं. उन्हें डर है मोदी के कारण मुस्लिम वोट उनके पक्ष में नहीं आएगा..तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि नीतीश को अपने विकास के एजेंडा पर भरोसा नहीं है..
बिहार में मतदान विकास के नाम पर होगा या समीकरणों के आधार पर ये मतदान के बाद ही पता चल सकेगा लेकिन यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि बिहार का पूरा जनमत नीतीश कुमार के साथ है. नीतीश कुमार भी इस बात को जानते हैं और शायद इसीलिए वो मुसलिम के वोटों को लेकर बीजेपी से अलग तक होने को तैयार दिखते हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि बिहार में विकास हुआ है. सड़कें बनी हैं.नौकरियां भी दी गई हैं लेकिन ये विकास ऊँट के मुंह में जीरे के समान है.
नीतीश इंजीनियर रहे हैं और अब वो चुनाव के लिए विभिन्न जातियों की सोशल इंजीनियरिंग करने में लगे हुए हैं.
बिहार में जितने लोगों से मेरी बातचीत हुई है उसके आधार पर मैं यही कह सकता हूं कि बिहार के चुनाव उतने सीधे और सपाट नहीं होंगे जितना अभी हमें लग रहा है.
अगर जातिगत समीकरणों को और स्पष्ट किया जाए तो शायद तस्वीर होगी. सवर्ण यानी ऊंची जातियां हमेशा बीजेपी का वोट बैंक रही हैं लेकिन वो इस बार नीतीश कुमार से नाराज़ हैं यानी ये वोट बंट सकते हैं.
नीतीश कुमार दलितों और महादलितों के वोट बैंक में सेंध लगाने का दावा कर रहे हैं लेकिन इस बात पर यक़ीन करना मुश्किल है कि लालू और रामविलास पासवान का वोट बैंक रहा ये समुदाय इतनी जल्दी नीतीश के साथ चला जाएगा.
वैसे भी नीतीश कुमार कुर्मी और कोइरी यानी ओबीसी जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और दलितों के शोषण में इस समुदाय का भी बड़ा हाथ रहा है.
रही बात मुसलमानों की तो उन्हें नीतीश कुमार से फ़ायदा हुआ है. निचले और ग़रीब तबके के मुसलमान नीतीश के साथ हैं लेकिन पढ़े लिखे मध्यवर्गीय मुसलमान नीतीश से काफ़ी नाराज़ हैं और ध्यान रहे कि चुनावों से पहले माहौल बनाने में इस वर्ग का बड़ा हाथ रहता है.
शहरों में क़ानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर होने के कारण शहरी मतदाता नीतीश के साथ हो सकता है लेकिन यह संख्या काफ़ी कम होगी..
हां इस पूरे जोड़ तोड़ में कांग्रेस को छोड़ देना उचित नहीं होगा. कांग्रेस अपने बूते सरकार तो नहीं ही बना सकती है लेकिन अगर मुसलिम और दलित वोट बैंकों में सेंध लगाए तो खेल बिगाड़ने की स्थिति में आ ही सकती है.
ऐसे में नीतीश कुमार बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ आने में शायद ही परहेज़ करेंगे.
वैसे इन जातिगत विश्लेषणों की सटीकता इस बात पर भी निर्भर करती है कि किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और इस बारे में सटीक आकड़े किसी के पास नहीं है.
अभी बिहार में कहा जा सकता है कि कोई स्पष्ट विजेता नहीं है. पिछले बार लोगों ने लालू के ख़िलाफ़ वोट दिया था लेकिन इस बार क्या लोग नीतीश के समर्थन में वोट डालने निकलेंगे...ये सबसे बड़ा सवाल है...

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सार्थक अभिव्यक्ति!!
सुशील जी, इस तरह का लेख लिखने के लिए धन्यवाद. असल में, भाजपा, कांग्रेस या जद (यू)-ये सभी समुदाय आधारित राजनीति कर रहे हैं. लेकिन नीतीश कुमार से इसकी उम्मीद नहीं थी.
बिहार की जनता अब किसी भी तरह लालू राज नहीं चाहती. नीतीश का शासन काफी बेहतर रहा है. लेकिन उन्हें भी अति आत्मविश्वास से बचना चाहिए.
बहुत संतुलित लेख है. इस बात की प्रशंसा करनी होगी कि सारी संभावनाएं सामने रखते हुए भी सुशील जी ने अपना कोई निष्कर्ष थोपने से परहेज़ किया है. और लेख को अंजाम तक पहुंचाने वाला प्रश्न भी बेहद प्रासंगिक है कि क्या मतदाता नीतीश कुमार "के पक्ष में वोट डालने निकलेंगे" क्योंकि ज़्यादातर वोटिंग निगेटिव होती है.
नीतीश कुमार ने बिहार का विकास करना जितना आसान समझा था उनके लिए ऐसा करना उतना आसान नहीं निकला. बिहार में राजद के जंगल राज में सिस्टम पूरी तरह बर्बाद हो चुका था. सर्वत्र जिसकी लाठी उसकी भैंस चरितार्थ हो रही था ऊपर से जख्म पर नमक का काम कर रहा था भ्रष्टाचार. ऐसा भी नहीं है कि नीतीश सिर्फ विकास के एक सूत्री एजेंडे को लेकर चल रहे थे बल्कि उनके कार्यों का अगर बारीकी से विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि उनके एजेंडे में सबसे ऊपर था सवर्ण और दबंग पिछड़ी जातियों का गांवों और शहरों की राजनीति से वर्चस्व को पूरी तरह समाप्त कर देना. उन्होंने कई बार इन जातियों के लोगों को उकसाया भी लेकिन विफल रहे.
सुशील जी, आपने काफी अच्छा ब्लॉग लिखा है. बेशक बिहार बदलाव की राह पर है लेकिन अभी भी यह राज्य जाति के दांव पेंच से बाहर नहीं निकल पाया है. जिस दिन बिहार के लोग जाति भूलकर विकास की बात सोचेंगे, उस दिन यह राज्य शिखर पर होगा.
नीतीश को ऐसा नहीं करना चाहिए, अकेले नीतीश का चना नहीं फूटता. अब बाबा काबिल बन रहे हैं. जनता दल का सारा जमीनी आधार तो लालू ले गए, सरकार जो उनकी थी. अगर बीजेपी नहीं होती तो क्या नीतीश जीत पाते? उनको इस पर मंथन करना चाहिए. हारने पर फिर उनका ऊँट पहाड़ के नीचे आ जायेगा. लेकिन उनके इस घमंड के कारण लालू एंड कंपनी फिर से सत्ता में आ जाएगी. बुरा होगा बिहार की जनता का अगर वो बिहार प्रेमी हैं तो ऐसा न करें....मेरी तो यही प्रार्थना है.
सुशील जी, बेईमान नेताओं के बारे में लिखना अपना समय बर्बाद करना है. इसलिए दूसरे संवेदनशील मसलों पर ध्यान दें.
सही मायने में बिहार के मतदाताओं को जाति, लालू- नीतीश से इतर विकास के नाम पर वोट देना चाहिए. और अगर विकास की बात हो तो नीतीश बीस ही ठहरते हैं. यह भी सही है कि भारतीय राजनीति में जाति बहुत मायने रखती है और ऐसे में लालू एक बार फिर सत्ता में आने के सपने देख रहे हैं तो यह इस देश, लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा.
नीतिश कुमार फरिश्ता तो नहीं है.
नीतीश कुमार ने बिहार का पैसा वापस कर दिया, उसमें बुराई क्या है? किसी की मदद करके उसका ढीढोरा पीटना किसी भी तरह से सही नहीं माना जा सकता.
सही कहा आपने, महक तो कुछ ऐसी ही आ रही है. आपने कहा कि बिहार में जनता दल (यू) और बीजेपी गठबंधन टूटते टूटते रह गया है. मुझे तो लगता है यह फौरी इंतजाम है. यदि यह अलगाव हो जाता तो राष्ट्रपति शासन लग गया होता यानी बिना किसी मेहनत के अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता कांग्रेस के हाथों में होती। कांग्रेस की निगरानी में चुनाव... कहने की जरूरत नहीं ये नीतीश और भाजपा के लिए आत्महत्या जैसी स्थिति होती. एक और बात, इस अलगाव से जद यू में बिखराव की भी संभावना थी. यानी गठबंधन पर से खतरा टला नहीं है बस नफा-नुकसान की गणना के लिए युद्ध-विराम की स्थिति है.
मुझे लगता है कि बदलाव का युग आ रहा है जो बिहार की स्थिति भी दर्शाता है. लोगों को सर्वश्रेष्ठ नेतृत्व के बारे में सोचना चाहिए.
नीतीश कुमार ने काफी हद तक बिहार को बदलने की कोशिश की है जो कि सचमुच सराहनीय है. राजनीतिक दाव पेंच से बिहार के लोगों को घबराने की जरुरत नहीं है. बिहार का विकास हो, हम तो बस यही चाहते हैं. मुख्यमंत्री चाहे किसी भी पार्टी का हो पर वही हो जो राज्य में बदलाव चाहता हो.
इसका नाम भारत, जाति और राजनीति में दलितों का शोषण होना चाहिए.
मेरी नज़र में जनता दल(यू) और बीजेपी गठबंधन टूटने वाला था भी नहीं, ये एक रणनीति थी, तमाशा था कि जनता दल(यू) लघुमति और दलितों के लिए काम करते हैं और बीजेपी बहुमतिओं के लिए. इसके अलावा, नरेन्द्र मोदी को मुद्दा बनाने का कोई कारण ही नहीं है.
बिहार के विकास में नीतीश के सहयोगियों का भी बराबर का योगदान है.
नीतीश का काम अच्छा रहा है.
अब वो चुनाव के लिए विभिन्न जातियों की सोशल इंजीनियरिंग करने में लगे हुए हैं.
अच्छा लगा.
नीतीश को जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास हो गया है जो अच्छा नहीं है.
काम को अच्छा कहकर पक्ष में वोट देना अभी जल्दबाजी होगी.