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अगर फिर मौक़ा मिलता...

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 27 जून 2010, 21:09 IST

भारत के सफलतम वकीलों में से एक फाली एस नरिमन ने कहा है कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो वे भोपाल गैस के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड का मुक़दमा नहीं लड़ेंगे.

फाली एस नरिमन 1985 में यूनियन कार्बाइड की ओर से वकील थे. मानव इतिहास की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड को वे बचा रहे थे.

नरिमन साहब ने तो समय रहते बता दिया कि वे दोबारा ग़लती नहीं करेंगे.

जब हादसा हुआ तो अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और वहाँ का मीडिया उन्हें संवेदनशील मुख्यमंत्री कहा करता था. उनकी भूमिका को लेकर कई सवाल पूछे जा रहे हैं.

अभी अर्जुन सिंह ने कुछ नहीं कहा है कि उनकी सरकार ने यूनियन कार्बाइड के प्रमुख वारेन एंडरसन को निकल भागने में क्यों मदद की. शायद उनके ऐसे प्रायश्चित कथन के लिए उनकी आत्मकथा का इंतज़ार करना पड़े.

हो सकता है कि वे लिखें कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो वे वारेन एंडरसन को भागने नहीं देंगे. वे दोबारा दिल्ली में बैठे अपने आकाओं की बात नहीं सुनेंगे.

अभी वारेन एंडरसन ने भी कुछ नहीं कहा है. हो सकता है कि वे भी कहें कि अगर दोबारा मौक़ा मिले तो वे हादसे के बाद भारत जाने की ग़लती ही नहीं करेंगे या फिर यूनियन कार्बाइड के प्रमुख का पद ही स्वीकार नहीं करेंगे.

दो दिसंबर, 1984 को भोपाल में ज़हरीली गैस से हज़ारों लोग मारे गए थे और उसके बाद हज़ारों लोग बरसों-बरस धीमी-धीमी आती मौत के गवाह रहे. वे यह कहने को जीवित नहीं हैं कि अगर उन्हें दोबारा मौक़ा मिले तो उस रात भोपाल में न रहें और अपने किसी परिजन को न रहने दें.

अब वे यह बताने के लिए दुनिया में नहीं हैं कि अगर दोबारा मौक़ा मिलता तो वे भोपाल में बसते भी या नहीं.

यह कहना किसी के लिए भी आसान हो सकता है कि वह अतीत की ग़लतियाँ नहीं दोहराएगा. किसी बौद्धिक और सोच-विचार वाले व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वह वर्तमान में ऐसे निर्णय ले कि भविष्य में उसे पछतावा न हो.

कहना कठिन है कि ऐसा होगा. लेकिन हो सकता है कि कल लालकृष्ण आडवाणी कह दें कि अगर दोबारा मौक़ा मिले तो वे रथयात्रा ही न निकालें और हो सकता है कि वे कारसेवकों को अयोध्या में इकट्ठा ही न करें,जिससे कि बाबरी मस्जिद बच सके.

या फिर नरेंद्र मोदी कह दें कि अगर फिर वही परिस्थितियाँ रहीं तो वे गोधरा के बाद दंगे नहीं होने देंगे.

इसी तरह भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे बहुत से नेता शायद फिर से वही हथकंडे न अपनाएँ जिसकी वजह से वे कटघरे में खड़े हैं. कुछ नया तरीक़ा सोच लें.

हो सकता है कि दाउद इब्राहिम और ओसामा बिन लादेन फिर वही दोहराना चाहें जो उन्होंने किया.

लेकिन आम सोच समझ वाला कोई भी व्यक्ति ज़रुर अपनी ग़लतियाँ सुधारना चाहेगा.

काश, ऐसा होता फाली नरिमन साहब! कि इतिहास में जाकर ग़लतियाँ सुधारने के मौक़े मिलते.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:07 IST, 28 जून 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह विनोद जी, दाद देता हूँ आपके दिमाग़ की जो शानदार सच लिखा है. लेकिन काश इस में एक बात और जोड़ देते कि अंग्रेज़ों को अगर एक बार फिर हिंदुस्तान पर हुकूमत करने का मौक़ा मिलता तो वे क्या करते. रहा सवाल फ़ाली एस नरीमन का तो उनको मालिक कभी माफ़ नहीं करेगा जिन्होंने सब जानते हुए भी भोपाल के मुल्ज़िमों को बचाने का प्रयास करते हुए उनका हौसला बुलंद किया.

  • 2. 01:14 IST, 28 जून 2010 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    हम आम भारतीयों की जाने बहुत सस्ती है, यही घटना अगर अमेरिका में हुई होई तो इसका नतीजा सारी दुनिया देखती. वहा के नागरिक सरकार की नजरो में कीमती है और हमारी सरकार की नजरो में हमारी कीमत कीट पतंगों जैसी है. इतनी लाशे देख कर भी नेताओ का दिल नहीं पसीजता. चाहे वो भोपाल हो या फिर गुजरात. उन्हें सिर्फ अपनी राजनीती से मतलब है, देश के हाल से कोई लेना देना नहीं. न्याय के नाम पर भोपाल पीड़ितों के साथ भद्दा मजाक हुआ है. अब कौन न्याय पालिका पर भरोसा करेगा. कुछ ऐसा ही इंसाफ गुजरात दंगा पीड़ितों के साथ भी होगा. आखिर अमेरिका ने अल काइदा पर हमला किउ किया शायद वो भी ऐसी गलती दोबारा न करते.

  • 3. 01:21 IST, 28 जून 2010 anand:

    क्या उन वकील साहब को यह मालूम नहीं था कि कितने लोग मरे हैं? पैसों की ख़ातिर उन्होंने अपने ज़मीर की आवाज़ को दबा दिया...यह सोच-समझ कर नहीं किया गया काम है. कोई ग़लती या चूक नहीं. जिसे वह नहीं दोहराने का दावा कर रहे हैं. तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों का नैतिक पतन दुर्भाग्यूपर्ण और शर्मनाक है.

  • 4. 01:24 IST, 28 जून 2010 anand:

    कृपया उनको सफलतम मत कहिए. अपने आप को गिराने से नहीं बचा पाना तो विफलता हुई...

  • 5. 11:01 IST, 28 जून 2010 himmat singh bhati:

    बड़े पदों पर बैठे लोग अक्सर अपनी जिम्मेदारी भूलकर मनमाती करते हैं. इसके अलावा हमारी एक और कमजोरी है-हादसों से सबक नहीं लेना हमारी आदत बन चुकी है.

  • 6. 12:52 IST, 28 जून 2010 Ankit :

    आपने जो लिखा वो दर्शाता है की हमारी सोच और कार्यप्रणाली कैसी है. आप की बात का जवाब आप के ब्लॉग में ही है. हमें जब कभी मौका मिलाता है तो हम धर्म और जाति के नाम पे अटक जाते हैं. जैसे इस ब्लॉग में हुआ. भोपाल की बात में बाबरी और मोदी कहां से आ गए. जहरीली गैस ने पूछके तो नहीं मारा होगा कि तुम किस धर्म/जाति के हो? और हम(जनता और मीडिया) ये ही करते हैं. अति संवेदनशील और ज़रूरी मुद्दे जैसे भोपाल कांड पीडितों को मुआवजे के नाम पर किया हुआ मज़ाक, महंगाई, मतगणना, शिक्षा, स्वास्थ, खेती, व्यवसाय, न्याय प्रणाली सुधार की बात तो करते नहीं और यकीन मानिए जब भी हम इन मुद्दे पर बात करेंगे तो हम उसमें भी बाबरी और मोदी को ले आएंगे. क्यूंकि हम सिर्फ तर्क करना जानते हैं, सोचना नहीं!

  • 7. 14:13 IST, 28 जून 2010 Hiren Bhagat:

    विनोद जी, बाबरी और मोदी से जुड़ी आपकी टिप्पणी से मैं सहमत नहीं हूं. आपने 1984 के सिक्ख दंगों का जिक्र तक नहीं किया. बाबरी और गोधरा के पहले भी सांप्रदायिक दंगे हुए. मुझे उम्मीद है कि एक दिन आप उनके बारे में भी लिखेंगे.

  • 8. 14:33 IST, 28 जून 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB:

    वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता. यह बात वकील महोदय को भी समझनी चाहिए और जब सवाल हजारों बेगुनाह मौतों से जुड़ा हो तो काश, यदि, परन्तु जैसे शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं होता. अर्जुन सिंह जी क्या ज़वाब देंगें? अब तो बस टोपी इधर से उधर उछाली जा रही है! जिसके सिर पर गिर गयी वही कसूरवार. वैसे भी लगता तो यही है कि कोई भी कसूरवार मिलना मुश्किल है! हाँ एक बात तो निश्चित है कि इस मुद्दे के चलते अर्जुन सिंह जी जो जीवनी लिख रहे हैं, वह खूब बिकेगी. जनता को मूल विषय से भटकाया जा रहा है.

  • 9. 16:07 IST, 28 जून 2010 amit saharan, hisar- haryana:

    अगर मुझे मौक़ा मिले तो इस यूपीए सरकार के लिए फिर से वोट नहीं डालूंगा. काश ऐसा हो पाए.

  • 10. 16:47 IST, 28 जून 2010 गौरव कुमार:

    पूरी ईमानदारी के साथ लिखा गया ब्लॉग है. विनोद जी फाली एस नरिमन का पछतावा हास्यास्पद है. लेकिन क्या उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए. हमने हिटलर के कारनानों के लिए उसके मरने के बाद माफ नहीं कर दिया, बल्कि आज भी उस पर बहस हो रही है. फिर राजीव के किरदार पर क्यों नहीं. एक सवाल और-नारिमन ने तो अपना पछतावा कर लिया लेकिन आडवाणी या मोदी तो नस्लों को डराने वाले हैं और ऐसे लोग तो क्या उनके प्रशंसक भी कभी माफ़ी नहीं मांगते, इसलिए माफ़ी का सिलसिला नहीं चलेगा और शायद आपको इस तरह के ब्लॉग नहीं लिखने पड़ेंगे.

  • 11. 17:13 IST, 28 जून 2010 braj kishore singh:

    फिल्मों में रिटेक का अवसर मिलता है ज़िन्दगी में नहीं. इसलिए दिमाग का दही बनाने से क्या फायदा?

  • 12. 18:57 IST, 28 जून 2010 Ankur:

    मोदी और आडवाणी को तो आपने बखूबी लपेट लिया पर क्या आपको कांग्रेसियों से ये उम्मीद भी नहीं कि वे 1984 के सिख विरोधी दंगे भी न होने देते?

  • 13. 20:41 IST, 28 जून 2010 Amit Sharma:

    यह सब नाटक है. कल कोई और फाली एस नरिमन पैदा हो जाएगा जो यूनियन कार्बाइड का मुक़दमा लड़ेगा.

  • 14. 22:11 IST, 28 जून 2010 Rajesh kumar:

    आपकी बात एक चौथाई सही लगी. मोदी और अडवाणी जी का उदाहरण देकर एक बार आपने भी अर्जुन सिंह और राजीव गाँधी जी से ध्यान हटाने की कोशिश की है. यह सही नहीं है. दूसरी बात ये कि अगर अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून में आमूल-चूल परिवर्तन किया जाता तो इन हादसों के लिए इंतजाम जरूर किए जा सकते थे. अंग्रेजों ने कानून अपने रक्षा के लिए बनाए थे ताकि वे धोखाधड़ी और लापरवाही जैसे अपराधों के लिए मुक़दमों से आसानी से बच सकें.
    काफी विनम्रता से कहना चाहूँगा कि आपने भी भोपाल पीड़ितों के बारे में निष्पक्ष टिप्पणी नहीं की.

  • 15. 22:36 IST, 28 जून 2010 Murli Manohar:

    अब घड़ियाली आंसू बहाने का कोई फायदा नहीं है. सच तो यह है कि नरिमन ने पैसे और सफलता के लिए यूनियन कार्बाइड का मुक़दमा लड़ा था. और अब लोगों की नजर में पाक-साफ बनने के लिए पछतावे का नाटक कर रहे हैं.

  • 16. 22:57 IST, 28 जून 2010 E-Guru Rajeev:

    काश, ऐसा होता फाली नरिमन साहब कि इतिहास में जाकर गलतियाँ सुधारने के मौक़े मिलते. एण्डरसन को बचाने का जो पाप आपने किया है उसके लिये कोई क्षमा पर्याप्त नहीं है.

  • 17. 08:52 IST, 29 जून 2010 Dr.Lal Ratnakar:

    उन्होंने जो भी किया शोहरत और पैसे के लिए किया, वहां से 'मानवीयता' तब भी नदारद थी और अब भी. भारत में नेतागण और कानून के जानकार इस देश को ही प्रयोगशाला बनाते हैं और फिर प्रायश्चित करते हैं.

  • 18. 12:10 IST, 29 जून 2010 Maneesh Kumar Sinha:

    विनोद जी, कुल मिलाकर आपका ब्लॉग अच्छा है.

  • 19. 12:15 IST, 29 जून 2010 Maneesh Kumar Sinha:

    विनोद जी, लगता है कि बीजेपी को छोड़कर बाकी सभी दलों में आपके अच्छे मित्र हैं. बीजेपी या इसके नेताओं के बारे में दुष्प्रचार आप जैसे कई बुद्धजीवियों की रोजी-रोटी है. लगे रहो विनोद भाई.

  • 20. 13:11 IST, 29 जून 2010 vishal shivhare:

    जीओएम ने बड़े ही नौकरशाही तरीके से भोपाल गैस पीड़ितों के लिए मुआवज़े की घोषणा की है. जो लोग 26 साल तक मरते रहे, उनके लिए 10 लाख रूपए, अभी भी कई तरह की दिक्कतों से परेशान लोगों के लिए 3 लाख रूपए. इन पीड़ितों का जीवन मुश्किल भरा है. वे कई तरह के भयानक रोगों से जूझ रहे हैं. जीओएम से मेरा अनुरोध है कि वे सही तरीके से मदद करें.

  • 21. 13:54 IST, 29 जून 2010 himmat singh bhati:

    असल में ऐसे लोग सिर्फ़ अपने ही हित साधने की कोशिश में होते हैं. ब्लॉग काफी अच्छा लगा.

  • 22. 09:51 IST, 30 जून 2010 Iqbal Fazli, Asansol (WB):

    ओबामा से हाल में अपने मुलाक़ात के दौरान मनमोहन सिंह ने वारेन एंडरसन के बारे में एक शब्द तक नहीं बोला. कैसे हैं अपने देश के राजनेता?

  • 23. 12:31 IST, 30 जून 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    हम आम भारतीयों की जानें बहुत सस्ती हैं, यही घटना अगर अमेरिका में हुई होती तो इसका नतीजा सारी दुनिया देखती. वहां के नागरिक सरकार की नजरों में कीमती हैं और हमारी सरकार की नजरों में हमारी कीमत कीट पतंगों जैसी है. इतनी लाशें देख कर भी नेताओं का दिल नहीं पसीजता. चाहे वो भोपाल हो या फिर गुजरात. उन्हें सिर्फ अपनी राजनीति से मतलब है, देश के हाल से कोई लेना-देना नहीं.

  • 24. 15:22 IST, 30 जून 2010 Abhay Kumar:

    नरीमन साहब को यूनियन कार्बाईड को जितना फायदा पहुंचाना था, पहुंचा चुके, और पीड़ितों को जितना नुक़सान देना था, दे चुके. अब, हज़ जाने का कोई मतलब नहीं.

  • 25. 06:35 IST, 01 जुलाई 2010 Raja Rajasthani:

    हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि फली एस नरीमन को पद्म विभूषण (2007 में) और पद्म भूषण (1991 में) से सम्मानित किया जा चुका है. राष्ट्रपति ने उनको 1999 से 2005 के बीच राज्य सभा का सदस्य नियुक्त किया था. ध्यान देने की बात है कि हम कहां जा रहे हैं.

  • 26. 18:32 IST, 01 जुलाई 2010 Amit Kumar Jha, New Delhi:

    विनोद जी, बढ़िया ब्लॉग लिखा है अपने और ये बिलकुल सीधी-सच्ची सी बात है कि इतिहास में जाकर गलतियाँ सुधारने के मौके किसी को नहीं मिलते. लेकिन, फाली नरीमन जी की स्वीकारोक्ति कम-से-कम उनके अंतर्मन की आवाज़ को तो अभिव्यक्त करती है. वैसे तो भोपाल हादसे से जुड़े बहुत सारे राजनेता और अधिकारी आज जीवित हैं, लेकिन उनमें से कितनों ने ऐसा कहने का साहस दिखाया है, जो फाली नरीमन कह रहे हैं.

  • 27. 20:50 IST, 01 जुलाई 2010 manoj kumar:

    हैरत की बात तो यह है कि पूरे संसार को इस बात की चिंता है कि एंडरसन को सज़ा देने के लिये लाया जाए. अर्जुन सिंह और दोषियों को सजा दी जाए लेकिन कोई इस बात की परवाह नहीं कर रहा है कि जो लोग बिना कारण के तिल तिल कर मर रहे हैं, उन्हें कैसे बचाया जाए? आवाज उठायें कि उन्हें इलाज कैसे मुहैया हो, उन्हें दवा कैसे निःशुल्क मिल सके? आपने शायद एक खबर पढ़ी होगी जिसमें कहा गया था कि एंडरसन को नहीं भगाया जाता तो लोग उन्हें मार डालते. भोपाल पर यह इल्जाम लगाने से पहले किसी ने यह नहीं सोचा कि जो लोग अपनी जिंदगी बचाने में बेबस थे, वो भला किसी को किस तरह मार सकते थे?

  • 28. 23:23 IST, 01 जुलाई 2010 arvind:

    ऐसे लेख आप कब तक लिखते रहेंगे. उम्मीद करें कि कभी सच्चा विश्वलेषण भी करेंगे. पिछले 60 सालों में हुए दंगों में हज़ारों लोग मारे गए. इनमें 84 के दंगे भी शामिल हैं जिसके लिए कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार है. चाहे कोई भी राजनैतिक दल हो, अगर वह देश में नफ़रत फैलाती है, आलोचना की पात्र है.

  • 29. 17:09 IST, 05 जुलाई 2010 kanhaiya:

    काश अगर दुबारा मौका मिलता, पर ऐसा हो नहीं सकता. अभी तो ये ही कहा जा सकता है कि काश ये मौका हाथ से न जाए और ये दोषी फिर न फिसल जाएं.

  • 30. 23:17 IST, 07 जुलाई 2010 manoj saini, bangalore:

    सत्तर चूहे खाकर बिल्ली हज को चली. अब तो लाखों लोग मर गए हैं और न जाने कितने अपंग अनाथ हो गए. इतने सालो बाद फ़ाली नैरिमन का पछतावा बेकार है. जब वे यूनिय कारबाइड के लिए वकील बने तब तो उनकी आत्मा की आवाज़ मोटी फ़ीस के नीचे दब गई होगी.... और अब पछतावा कर रहे हैं. मुझे तो इनका पछतावा मगरमछ का आंसू लगता है. विनोद जी एक अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद.

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