हरियाणा की बबली और सिंध की शहज़ादी
शहज़ादी से मेरी मुलाक़ात दो साल पहले सिंध प्रांत के उत्तरी शहर कश्मोर के एक सरकारी स्कूल में हुई थी जहाँ वे बच्चों को पढ़ा रही थीं. उस दिन वे काफी ख़ुश थीं क्योंकि उन की सरकारी नौकरी का वह पहला दिन था. मुझे याद है कि उन्हों ने कहा था कि स्कूल में पढ़ाते हुए उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है और यह उन के जीवन का सब से यादगार दिन है.
वे शिक्षक बनना चाहती थीं और उन का यह सपना साकार हो गया. भविष्य की ओर एक और क़दम बढ़ाते हुए वे अब किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाना चाहती हैं. 23 वर्षीय शहज़ादी का संबंध एक ग़रीब परिवार से है और वे अपने परिवार की पहली लड़की हैं जिन्हों ने स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. उन्हों ने यहाँ तक पहुँचने में कठोर परंपराओँ का सामना किया और काफी संघर्ष किया है. उन के किसान पिता यदि उन का साथ ने देते तो शायद वह कभी भी अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँच पातीं.
गुरुवार की सुबह एक सिंधी समाचार पत्र में उन की हत्या की दुःखद ख़बर सुनी. उन के छोटे भाई ने उन्हें मंगलवार को उस समय गोली मार दी जब वे स्कूल से वापस आ कर दोपहर का खाना खा रही थीं. उन के भाई के अनुसार स्कूल के उस्ताद से उन के यौन संबंध थे इसलिए उन को जीने का कोई अधिकार नहीं है. ख़बर में बताया गया है कि उस जुनूनी लड़के ने गाँव के सरपंच के कहने पर निर्दोष लड़की की हत्या कर दी.
शहज़ादी ऐसी परंपरा की भेंट चढ़ी हैं जिस की रक्षा केलिए पाकिस्तान में हिंसा का रास्ता लिया जाता है और इज़्ज़त के नाम पर हत्या उन की किस्मत में लिखी हुई थी. इस तथाकथित परंपरा की रक्षा के लिए सिंध में न जाने कितनी निर्दोष लड़कियों का बलिदान दिया जाता है.
ग़ैर-सरकारी संस्थाओं की ओर से जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल 1404 महिलाओं की हत्या कर दी गई थी जिस में करीब 700 इज़्ज़त के नाम पर थीं. औरत फाऊँडेशन ने आँकड़े दिए हैं कि पिछले महीने सिंध में इज़्ज़त के नाम पर 53 महिलाओं की जान ली गई. सिंध में इज़्ज़त के नाम पर हत्याओँ को 'कारो-कारी' कहा जाता है जो प्रांत के उत्तरी ज़िलों में सब से ज़्यादा होती हैं.
शहज़ादी को 'कारी' घोषित कर उन की हत्या कर दी गई क्योंकि वे समाज के लिए कलंक बन गई थी. विश्वविद्यालय में पढ़ाने का उन का सपना टूट गया और मेरे एक दोस्त कहते हैं कि ऐसे समाज में रहने वाली शहज़ादी को इस प्रकार के सपने देखने का कोई अधिकार नहीं है.
क्या सिंध की शहज़ादी और हरियाणा की बबली इस समाज के मूँह पर कलंक हैं? क्या सपने देखना उन केलिए पाप है? और क्या वे हमेशा 'कारी' कर मारी जाएँगी?

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हफ़ीज़ जी, मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या अगर आपके परिवार का कोई सदस्य ऐसे कदम उठाए तो उस कदम का स्वागत करेंगे? हमारे परंपरागत समाज में कोई नहीं चाहता कि उसकी इज्ज़त पर बट्टा लगे. मुझे तो यही लगता है कि मीडिया को इस मुद्दे को उछालने में कुछ ज्यादा ही रूचि है. इसके बजाय आप पाकिस्तान के सकारात्मक खबरों पर लिखते तो कुछ अच्छा ही होता.
ऐसी घटनाएँ और बारम्बार इनकी पुनरावृत्ति हमें एहसास दिलाती हैं कि कहीं आज भी हम मध्ययुगीन मानसिकता में तो नहीं जी रहे. जहाँ औरतों की स्वतंत्रता और स्वछंदता पर तरह-तरह की पाबंदियां चस्पा की हुई थीं और उन्हें महज एक वस्तु समझा जाता था. आज के इस आधुनिक, पल-पल बदलते प्रगतिवादी समाज में इस तरह की बर्बरता और क्रूरता के लिए कोई जगह नहीं हो सकती. सरकारों और समाज के प्रबुद्ध वर्ग को आगे आकर इस मुद्दे पर एक सकारात्मक और तार्किक रुख अपनाने की जरूरत है, ताकि शहजादी और बबली अपने सपनों को पूरा करने के लिए जीवित रह सके.
हफीज भाई ! शहजादी की मौत का मुझे भी बहुत दुःख है, लेकिन उनकी हत्या का कारण जैसा कि आपने अंतिम पैराग्राफ में लिखा है कि "क्या सपने देखना उनके लिए पाप है? " और शहजादी का सपना था विश्वविद्यालय में पढ़ाना, लेकिन उनकी हत्या "तथाकथित" सपने के लिए तो हुई ही नहीं, जैसा कि आपने खुद ही लिखा है.
शब्बीर भाई, मुझे लगता है कि आपकी टिप्पणी संतुलित नहीं है. और यह तब तक संतुलित नहीं हो सकती जब तक कि पुरुष और औरत को देखने का नजरिया समान न हो.
शहज़ादी 23 साल की थी, मतलब कि वो अपने फैसले लेने के लिए आज़ाद थी तो और कोई होता कौन है उसे मजबूर करने के लिए. जो आरोप लगे, क्या उससे पूछा गया कि क्या सच है? अगर कोई पुरुष ऐसे किसी रिश्ते में जाता है, तो उसका कत्ल क्यों नहीं होता? हफ़ीज़ जी, ये उन लोगों की सोच है जो औरतों को संपत्ति समझते हैं.
अपने समाज में शादी के पहले शारीरिक संबंध को ग़लत माना जाता है. इस मामले में कुछ लोग पश्चिमी समाज की परंपरा को मानने की सलाह दे सकते हैं. लेकिन भारत-पाक की सामाजिक संरचना में यह संभव नहीं. ऐसे में जरूरी है कि सभी पक्ष संयम का परिचय दें.
पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है. लेकिन दक्षिण एशिया में इनकी हालत काफी दयनीय है. हमें तो ऐसा ही लगता है कि महिलाओं के भाग्य विधाता समझने वाले लोग उन्हें आगे बढ़ता नहीं सकते. अगर ऐसे लोगों को उनकी करनी की सज़ा दे दी भी जाए तो भी ऐसी घटनाएं नहीं रुकने वालीं. समाज की सोच में बदलाव लाना होगा.
लेखन की भावना कितनी भी सच्ची क्यों न हो, लेकिन वे उस अमरीकी शैली के पक्षधर दिखते हैं जो भारत-पाकिस्तान की धार्मिक और सांस्कृतिक प्रणाली को नष्ट कर देगी.
मुल्क पर विदेशी आक्रमणकारियों के आने के बाद औरतें पर्दे में दाखिल होने लगीं. इस तरफ भी ध्यान दिया जाना चाहिए.
हफ़ीज़ भाई क्या एक ही सभ्यता, परंपरा और भौगोलिक क्षेत्र में बसने के बाद सिंध या हरियाणा में अंतर नहीं किया जा सकता. क्या हमने कभी किसी मर्द को ग़लत काम यानी यौन संबंध बनाने पर हत्या होते सुना है? क्या कथित रुप से शहज़ादी के साथ संबंध बनाने वाले व्यक्ति की हत्या की गई, नहीं न. ये दोहराव हर जगह है. हमारा नज़रिया ऐसा है कि भारत और पाकिस्तान के मामले में हम हर समय चीज़ों को सीमा रेखा के ऐनक देखते हैं जबकि इसे सभ्यता और भौगोलिक आधार पर देखा जाना चाहिए.
इस ब्लॉग से मुझे काफी पीड़ा हुई है. लेकिन लगता है कि मीडिया के पास लिखने और दिखाने के लिए ऑनर किलिंग ही रह गया है. बीबीसी तो इस मुद्दे को छोड़ ही नहीं रही है. अगर लिखना ही है तो मसलों की कमी नहीं जो देश और समाज को खोखला कर रहे हैं. भ्रष्टाचार का नासूर दोनों ही देशों के विकास को लील रहा है. हां, एक बात और. अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए साधुवाद.
यह बड़े ही दुःख की बात है कि हम भौतिक रूप से तो आधुनिक हो गए हैं लेकिन मानसिक रूप से आज भी पिछड़े हुए हैं. इज्ज़त के लिए हत्या करने में भी हमें हिचक नहीं होती. हत्या प्रत्येक स्थिति में निंदनीय है. जब बच्चों को मार डालना ही है तो क्यों उन्हें जन्म देते हैं और पालते-पोसते हैं?
शहजादी की निर्मम ह्त्या, कई सालों से चले आ रहे खोखले समाजवाद का परिणाम है. विषय गंभीर है और अधिकतर भारतीय तथा पाकिस्तानी परिवारों के सदस्य तब तक ही इस पर सहानुभूति जाहिर करेंगे जब तक ये किसी और के परिवार का मामला है. जैसे ही ये बात उनके अपने परिवार की लड़की के सम्बन्ध में आती है हम लोग अपनी सुविधा के मुताबिक राय बना लें देंगे. ब्लॉग अच्छा है.
भारतीय समाज न तो अमेरिकी समाज की तरह "जो जी चाहे वो करने" की आजादी दे सकता है, और न ही यह तालिबानी समाज की तरह "लड़कियों को बुर्के में बंद कर देना" ही चाहता है.
भारत और पाकिस्तान की संस्कृति ने उनको धरती के सबसे असहनशील देश में तब्दील कर दिया है. इज्ज़त के नाम पर की जाने वाली हत्याएं हर हाल में निंदनीय हैं.
भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मध्ययुगीन संस्थान हावी हैं. इनका समर्थन नहीं किया जाना चाहिए.
हफ़ीज़ जी, हमारे समाज में इज्ज़त के नाम पर लगातार बढ़ते अपराध पर आपने एक जीवंत मिसाल दी है. धन्यवाद.
खबर पर दी गई कई टिप्पणी पढऩे से मन को दुख हुआ। आखिर किसी को क्या है कि इज्जत केनाम पर किसी की जान लें। यह तो गलत बात है। खबर एक दम सही है। समाज में जो चल रहा है पत्रकार तो वही लिखेगा। जब कोई पुरुष ऐसा करता है तो फिर यह कथित इज्जत कहां चली जाती है। यदि सिंध की इस बेचारी शहजादी की जगह कोई लड़का होता और उसके किसी से संबंध होते तो क्या उसकी भी हत्या कर दी जाती। शायद नहीं। फिर यह दोहरा मापदंड क्यों।