अतीत की काली छाया बरक़रार है
इतिहास कभी-कभी सहेज कर रखने की चीज़ होती है, तो कभी-कभी इतिहास के काले अध्याय से लोग पल्ला झाड़ने की कोशिश करते है. ऐसा लगता है मानों नई सुबह, नई आशा और नई पहचान के बीच इतिहास के काले पन्ने की क्या आवश्यकता.
लेकिन दक्षिण अफ़्रीका में आकर कुछ अलग ही अहसास होता है. सोने की खान के कारण बसा जोहानेसबर्ग शहर रंगभेद काल में ख़ूनी संघर्ष और प्रताड़ना का गवाह रहा है. रंगभेदी सरकार के बर्बर कृत्य इस शहर से गहरे से जुड़े हुए हैं.
पिछले दिनों सोएटो जाने का मौक़ा मिला. सोएटो यानी साउथ वेस्ट टाउनशिप. ये नाम किसी महापुरुष या इतिहास की धरोहर नहीं, बल्कि उस काल की कड़वी सच्चाइयों को बयां करती है. जोहानेसबर्ग से आधे घंटे की ड्राइव और आप पहुँच जाते हैं इस टाउनशिप में.
रंगभेद काल में ये बस्ती उन लोगों के लिए बसाई गई थी, जिन्हें सरकार इस लायक़ भी नहीं समझती थी कि उन्हें किसी शहर में बसने हक़ है. काले, भारतीय और खान मज़दूरों की बस्ती. जो सिर्फ़ सेवा करने के लिए होते थे.
अब ये बस्ती बहुत बड़ी हो गई है और सोएटो भी बदल गया है. लेकिन इस शहर में जाकर छोटी-छोटी गलियों से गुज़रते आपको उस समय का अहसास होता है. कई इलाक़ों में अब भी आधारभूत सुविधाओं की कमी है और ये इलाक़े कभी दिल्ली में यमुना पुल के नीचे बसी झुग्गियों से कम नहीं.
इसी बस्ती में नेल्सन मंडेला का भी पुराना घर है, जो अब संग्रहालय बन गया है. सोएटो अब बदल गया है, लेकिन इस बस्ती ने रंगभेद काल की तमाम सच्चाइयों को सहेज कर रखी हुई है. मंडेला का पुराना घर, तो हेक्टर पीटरसन चौक, जहाँ पुलिस ने युवकों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाई थी.
सोएटो की जीती-जागती सच्चाइयों के अलावा जोहानेसबर्ग में 'रंगभेद शासनकाल' को समर्पित बड़ा संग्रहालय है. इस संग्रहालय में जाकर रुह काँप जाती है. उस समय के सच को जीवंत करने के लिए आपको ऐसे रास्तों से गुज़रने के लिए कहा जाता है, जो सिर्फ़ कालों के लिए था. बड़े-बड़े अक्षरों में कई जगह ये लिखा हुआ था कि ये रास्ता सिर्फ़ यूरोपीय लोगों के लिए है.
जोहानेसबर्ग ने इन सब यादों को सहेज कर रखा है. यादें अच्छी नहीं, यादें पीड़ा भी पहुँचाती हैं और यादें अच्छा अहसास नहीं करातीं. लेकिन इन कड़वी सच्चाइयों को जीने वाला दक्षिण अफ़्रीका इसके सहारे अब नई सुबह की तलाश में है.
अब भी सूरज पूरा नहीं निकला है....लेकिन यहाँ के लोग ऐसी चमकीली और खुली धूप में सांस लेने के लिए उतावले हैं, जिसमें उन्हें ये लगे कि इस देश की सारी धरती उनकी अपनी है....लोग अपने है.

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हम दक्षिण अफ्रीका से सीख सकते हैं कि किस तरह आज़ादी के बाद सहिष्णुता का परिचय देते हुए उन्होंने यूरोपियन को प्रेम-भाव से अपनाया. वहाँ की संस्कृति सामासिक है. एशियन, अफ़्रीकी और यूरोपियन सब साथ रहते हैं. लेकिन सैकड़ों सालों के बाद आज भी भारत में मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार होता है.
लगता है भारत के मुसलमानों की एक मानसिक्ता बन गई है कि किसी भी मामले में मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है जैसा मेरे भाई फ़िरोज़ साहब ने लिखा है. हक़ीक़त ये है कि दुनिया में किसी भी जगह से भारत का मुसलमान ख़ुशक़िस्मत है कि अभी भी इंडिया में बराबर खड़े होने की शक्ति रखता है लेकिन इंडिया का मुसलमान ख़ासकर वो तबक़ा जो इस सच्चाई से दूर है ऐसी बातें करता है. पंकज जी आप ख़ास फ़ुटबॉल के बारे में शानदार लेख लिखते तो बेहतर होता.
सच में सैकड़ों सालों बाद भी मुसलमान बदले नहीं हैं. आज भी उन्हें देश से पहले मज़हब दिखता है. फ़िरोज़ की टिप्पणी देखने लायक़ है. यहां पर हिंदू सौतेला व्यवहार झेल रहे हैं. मुसलमानों के लिए देश बांटे जाएंगे और हिंदुओं को हमेशा बोला जाएगा कि गीता सार समझो... और मज़हब के मामले में कोई टिप्पणी नहीं...
अरे फिरोज़ भाई, आप ग़लत कह रहे हैं. हिन्दुस्तानी भू-भाग के मूल निवासियों ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन आगंतुकों ने ही स्थानीय परंपराओं को नहीं अपनाया. अब बताइए ग़लती किसकी है? अगर कोई धारा से ख़ुद कटकर रहेगा तो उसके ठुकरा दिए जाने की शिकायत बेमानी होगी. बहरहाल, द. अफ्रीका से हम लोगों को सबक़ लेना ही चाहिए.
फिरोज साहब और सुधीर साहब आप दोनों भारतीयों की टिप्पणियाँ पढ़ कर मुझे यह लगा कि आप दोनों ही व्यक्तिगत सौतेलेपन के शिकार हैं. मेरा मानना है कि इसके लिए हमारे धर्म के ठेकेदार ज़िम्मेदार हैं. मेरी आप दोनों से विनती है कि धर्म से ऊपर उठकर देश के बारे में सोचिए. अपनी किस्मत ख़ुद बनाइए जिससे कि कोई किसी के साथ सौतेलापन न कर सके जिससे हमारा देश मजबूत हो. जब हमारा देश मजबूत होगा तो हम मजबूत होंगे. इससे सौतेलापन ख़त्म हो जाएगा. पंकज जी आपका लेख अच्छा लगा.
मैं समझा नहीं, क्या जोहानेसबर्ग में ग़लियों में अब भी वो निशान दिखते हैं जहाँ रंग या नस्ल भेदी निर्देश लिखे होते थे? अतीत का नाम लो और हिन्दोस्तान में मजहब समने ना आए यो तो हो नहीं सकता ।
फिरोज साहब का कहना सही है
मुस्लिम आबादी आज भी आधारभूत समस्याओं से जूझ रही है..
पंकज जी भारत में बैठे - बैठे आपने सोएटो की गलियों की सैर करा दी ! धन्यवाद ! कुछ ऐसा ही अनुभव मैंने सन २००८ में पोर्टब्लेयर यात्रा के दौरान सेलुलर जेल और आस पास की धरोहरों को देखने के बाद हुआ था ! बेशक कड़वीं यादें हमेशा कष्टकारी होती हैं लेकिन अगर इन यादों को संजो कर न रखा जाए तो आज की ऐशोआराम की सौगात की कीमत अनुभव कैसे होगा ? रही बात तंग व् मलिन बस्तियों की तो हमारे यहाँ तो यह वोट बैंक का सामान समझी जाती हैं वहां दक्षिण अफ़्रीका में इनका क्या महत्व है वहां की सरकार क्या सोचती है इन बस्तियों में रहने वालों के बारे में अगले लेख में आपसे आपेक्षा रहेगी ! इतिहास बीते कल का आयना है और इससे मुहं चुराना उचित न होगा फिर बात चाहे दक्षिण अफ़्रीका की हो या अपने हिंदुस्तान के इतिहास की !
हम सब एक ही धरती पर पैदा हुए हैं और सबका एक ही ईश्वर है. तो और सब कुछ भूल जाइए और सब से प्यार कीजिए. तभी हम इस पृथ्वी पर शांतिपूर्वक और प्रेम के साथ रह सकते हैं.
समझ में नहीं आता कि मुसलमानों के साथ कहां पर सौतेला व्यवहार हो रहा है. मैं भारत के एक नामी गिरामी संगठन में हूं और यहां पर आधे से ज्यादा स्टाफ मुसलमान हैं. ये सभी अच्छे पदों पर हैं और इनकी अच्छी साख है. जरूरत है कि मुसलमान शिक्षा पर ध्यान दें, फिर देखें कि उनकी शिकायत कितनी सही थी.
यह बात सही नहीं कि मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है.
यादें उस भूत की तरह होती हैं जिनसे जितना ही पीछा छुड़ाने की कोशिश करो, वह उतनी ज्यादा तेजी से पीछा करता है. भारत और पाकिस्तान भी कहाँ अतीत की काली छाया से बाहर आ सके हैं? अतीत को अगर हम भूल नहीं सकते तो उससे सीख लेकर आगे भविष्य के लिए कदम उठाने चाहिए.वैसे यह भी उतना ही बड़ा सच है कि वक़्त हरेक जख्म को खुद-ब-खुद भर देता है.
इस ब्लॉग में कुछ मुसलमान भाइयों की प्रतिक्रिया देखकर उनकी सोच पर दया आती है. आज़ादी के बाद भारत में जो मुसलमान पिछडे़ वो इसी कारण पिछडे़ क्योंकि दूसरे लोग जो अधिक मेहनती थे उन्होंने वे अवसर ले लिए. सिन्धी और सिख समाज ऐसे समाजों का उदाहरण है जिन्होंने विपरीत परिस्थितों में भी अपनी कठिन मेहनत से अपनी जगह बनाई है. मुसलमानों में सिर्फ दाऊदी बोहरा संप्रदाय ही ऐसा है जिनके लोग अपने परिश्रम के लिए जाने जाते हैं. हमें अपने आलस्य और अयोग्यता को छिपाने के लिए बहाने नहीं तलाश करने चाहिए.